प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आज गणेश चतुर्थी का पावन पर्व, और योग संयोग ऐसा अद्भुत है, कि बुधवार को गणेश चतुर्थी आ रही है, गणेश जी  को प्रथम पूज्य कहा गया है, वह हमें बुद्धि प्रदान करते हैं,
उनका शीश बड़ा है, वे विचारवान है, उनके कान बड़े हैं, वे सब को धैर्य से सुनने वाले हैं, 
सुनते वे सबकी है, मगर धैयपूर्वक अंतिम फैसला बुद्धि से करते हैं, हिंदू धर्म ग्रंथो में 
उनका प्रथम स्थान है,  मनुष्य में बुद्धिमत्ता जगाने वाले हैं, अगर हममें बुद्धि ही  जागृत नहीं होगी, तो हम लौकिक या पारलौकिक दोनों ही कार्यों में असफल हो जायेंगे, जो भी बुद्धिमान हैं, वह अपने समस्त कार्यों का आरंभ उनके श्री चरणों का वंदन करके करते हैं, वे प्रथम पूज्य हैं, और वे प्रथम पूज्य इसलिए भी हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है,
वे त्वरित निर्णय करने वाले हैं , जिस किसी 
भी व्यक्ति में बुद्धि जागृत नहीं होती, वह फिर कोई भी सही निर्णय करने में सक्षम नहीं होता,  बुद्धि का जागरण करने वाले, प्रथम पूज्य, श्री गणेशजी के चरणों में सादर वंदन, 
जो भी सच्चे हदय से उनकी शरण में आता है, उसे वे बुद्धि, खास तौर से व्यवहार कुशल भी वे बनाते हैं, ऐसे सभी भक्तों को अपनी शरण में लेने वाले गणेश जी की आरती  ही इस प्रकार प्रारंभ होती है, मंगल मूर्ति मोरया, वे मंगल की मूर्ति है, वे मंगल को ही प्रदान करने वाले हैं,  जीवन में बुद्धि और शौर्य दोनों प्रदान करने वाले हैं, जिसके जीवन में विनम्रता है, उसके लिये फिर कुछ भी कठिन नहीं, जो भी विनम्र हैं, वह सभी समस्त लोगों के बीच में अपनी विनम्रता के कारण भी लोकप्रिय हो जाते हैं, ऐसे प्रथम पूज्य, श्री गणेश जी की 
स्थापना आज हर घर में ,गली में, सार्वजनिक गणेश उत्सव के रूप में, एक आल्हाद सबके मन में जगाती है, आज से कई वर्ष पूर्व स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक, उन्होंने सभी को एकजुट करने के लिये इस सुंदर उत्सव की शुरुआत की, हमारा संपूर्ण भारतीय  दर्शन उत्सव प्रिय है, इसमें पल-पल पर त्यौहार है, जो हमें यह सिखाते हैं, उत्साहपूर्वक जीवन जीना, यही सबसे उत्तम धर्म है, हर समय प्रसन्न चित्र रहकर , सभी परिस्थितियों का सामना करते हुये समस्त समाज को एकजुट बनाये रखना, ऐसा यह उत्तम पर्व है, जिस प्रकार के भाव को लेकर
श्री बाल गंगाधर तिलक ने दिव्य व भव्य आयोजन की शुरुआत की थी, वह आज संपूर्ण भारतवर्ष में बड़े उत्साह से मनाया जाता है, सभी और जनता का उत्साह देखते ही बनता है, अगर हमारे जीवन में सब हो, और उत्साह ना हो, तो फिर जीवन में एक नीरसता आने लगेगी, इसलिए लोक मंगल का
यह अद्भुत पर्व है, जो हमें बुद्धि व उत्साह दोनों को प्रदान करने वाला है, आज संपूर्ण देश में यह परंपरा अपने दिव्य व भव्य  स्वरूप  में  मनाई जाती है, संपूर्ण भारतवासी, सनातन धर्म का जो भी अवलंबन ग्रहण करते हैं, उन सभी को सादर वंदन, गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
     मंगल मूर्ति मोरया, 
जय गणेश  काटो क्लेश।
भारत माता की जय, 
जय हिंद। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा। 
विशेष:- लोक कल्याण को ध्यान में रखकर
इस सुंदर पर्व को बाल गंगाधर तिलक जी ने शुरू किया था, आज पुनः इस पर्व पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं व समाज का मंगल किस प्रकार हो, यह बुद्धि सभी को श्री गणेश जी प्रदान करें, इस पर्व का मूल भाव हम ग्रहण करें , बाल गंगाधर तिलक, उनके प्रति हमारी सच्ची आस्था अगर है, तो लोक कल्याण की जिस भावना से उन्होंने इसकी स्थापना की थी, वह मर्म हम सभी समझे।
आयोजन दिव्य व भव्य दोनों ही हो,  भव्यता है व दिव्यता   दोनों का ही समावेश इस त्यौहार में होना चाहिये।
पुनः आप सभी को गणेश चतुर्थी के पावन पर्व की अनंत हार्दिक शभकामनाएं।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, अखंड राष्ट्र की जो परिकल्पना हैं, वह मेरी कुछ इस प्रकार से है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम सभी जातिवाद, संकीर्ण सोच को छोड़ नहीं पाये हैं,
क्या सही अर्थों में समावेशी संस्कृति को स्थापित कर पाये हैं।
       हम सभी को अपनी-अपनी जाति पर, जिसमें हम उत्पन्न हुए, गर्व अवश्य होना चाहिए, मगर जब बात राष्ट्र की हो, तो हर व्यक्ति के लिए राष्ट्र ही प्रथम होना चाहिये।
     इस देश में अब सभी प्रकार के आरक्षण हटाकर केवल आर्थिक कमजोरी के आधार पर आरक्षण को लागू करना चाहिये।
   इससे सभी वर्गों को बराबरी से लाभ भी मिलेगा वह सभी के साथ न्याय होगा।
    जातिगत आधार को हटाकर आर्थिक आधार को मानने से वास्तव में जिनको इसकी जरूरत है, उन्हें अधिकार प्राप्त होगा, निश्चित यह फैसला लेने में सभी राजनीतिक दलों को थोड़ी कठिनाई तो आयेगी, मगर इसमें किसी का नुकसान न होकर सुधार है।
     आर्थिक आधार भी जो वास्तव में बहुत ही कमजोर स्थिति में हो, केवल उन्हीं के लिये हो,
इससे शासन पर बोझ भी अधिक नहीं आयेगा वह जिन लोगों को तक वास्तव में इसका लाभ पहुंचना है उन तक इसका लाभ पहुंचेगा,
जब सरकारी समय-समय पर अलग प्रकार के संशोधन करती है, तो फिर इस प्रकार का संशोधन क्यों नहीं, अगर सभी राजनीतिक पार्टियों इस पर सहमत हो तो काफी अच्छा कार्य हो सकता है।
 और यह देश के हित में भी है, क्योंकि इसमें सभी वर्ग जो आर्थिक रूप से बहुत कमजोर है, वे सभी पात्र होंगे, इसके लिए आवश्यक सशोधन पूर्ण विचार विमर्श के बाद आ सकता है।
देश में नीतियों पर तो अब  तर्कपूर्ण फैसले होने चाहिये।
   इससे सभी वर्गों के बीच में आपसी समन्वय भी स्थापित होगा, क्योंकि इसका मूल आधार आर्थिक होगा। 
जिस समय संविधान में यह व्यवस्था दी गई, निश्चित ही  वह उस समय की आवश्यकता रही होगी, लेकिन समय के साथ अगर परिवर्तन करना आवश्यक है, तो उसे पर भी गहराई से विचार किया जाना चाहिये, मेरे विचार से कोई भी प्रबुद्ध नागरिक मेरे इस विचार से असहमत नहीं होगा।
क्योंकि ऐसा करने से एक समन्वय की भी स्थापना होगी। पर केवल जो बहुत अधिक आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, उन्हीं को इसका लाभ दिया जाना चाहिये, दूसरा कदम शिक्षा 
वह स्वास्थ्य पर होना चाहिये, क्योंकि यह भी हमारी मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी हुई
बातें हैं, सरकारी स्कूलों की पढ़ाई की गुणवत्ता पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिये, ताकि
वह गुणवत्ता के मामले में अन्य महंगे स्कूलों का मुकाबला कर सके। 
साथ ही शिक्षा में राष्ट्रीय स्वाभिमान की शिक्षा भी देना चाहिये, कि जब राष्ट्र की सरकार हमारे बारे में इतना कुछ कर रही है, तो हमारा भी दायित्व है ,हम राष्ट्रीय स्वाभिमान को प्रथम स्थान जीवन में प्रदान करें। 
      क्योंकि अधिकार  व कर्तव्य एक ही सिक्के के दोनों पहलू है, और दोनों ही अनिवार्य घटक है। शिक्षा में स्व रोजगार से जुड़ी शिक्षा पर प्राथमिक स्तर से ही ध्यान देने 
की जरूरत है, इसमें किसका रुझान किधर है ऐसा पहचान कर उसे प्रारंभ से ही उसके रुझान के अनुसार शिक्षा दी जाये, इससे यह होगा कि स्वरोजगार भी विकसित होता जायेगा।
स्कूल शिक्षा में जो भी बालक पढ़ने आते हैं वह अबोध होते हैं, उन में प्रारंभ से ही  राष्ट्र प्रेम को विकसित किया जाना चाहिये, क्योंकि आखिरकार उन्हें ही देश को चलाना व इसमें रहना है।
हम सब भारतीय हैं ,ऐसा राष्ट्रीय स्वाभिमान सभी में जागृत हो, आपसी सद्भाव, भाईचारा, 
प्रेम, मिलजुलकर कार्य करने का भाव, पर्यावरण के प्रति रुझान इस प्रकार के भावों को प्रारंभ से ही विकसित किया जाना चाहिये।
एक नागरिक होने के नाते हम अपने स्तर पर अपने राष्ट्र के लिए क्या बेहतर कर सकते हैं, इस पर भी विचार हो, राष्ट्र ने हमें क्या दिया उसकी बजाय हम यह सोचे हमने राष्ट्र को क्या दिया। 
स्वतंत्रता व स्वच्छंदता में बड़ा अंतर है, इस अंतर को हमें समझना होगा, हमारी स्वतंत्रता हममें एक बोध जगाने वाली होना चाहिये।
स्वतंत्र जरूर हो, मगर स्वच्छंद ना हो, कोई भी कदम उठाने से पहले उसे कदम का अपने राष्ट्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह प्रश्न अपने आप से हम अवश्य पूछे। इस राष्ट्र के नवनिर्माण ,पुनर्निर्माण में हमारी क्या रचनात्मक भूमिका है, इसे अवश्य समझे।
 विशेष:-  यह राष्ट्र किसी जाति , धर्म, संप्रदाय, भाषा, बोलियां इन सभी से ऊपर है, इस प्रकार की भावना जब इस देश में बालक, युवा, वरिष्ठ नागरिक गण , सभी में सामूहिक रूप से होगी, तभी अखंड राष्ट्र की हमारी परिकल्पना साकार हो सकती हैं, जिसकी कल्पना हमारे क्रांतिकारी व स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी, गर्व से कहो हम सब भारतीय हैं। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, शिक्षा का अर्थ है, मानव को इस प्रकार से जीवन जीने के योग्य बनाना, वह अपने स्वयं के लिए, 
परिवार के लिए, समाज के लिए एक समन्वयक के रूप में हो।
          स्वयं तो अपना हित करें, परिवार समाज का भी हित जिसमें हो, वह कार्य भी साथ-साथ करता रहे।
         शिक्षा यानी मनुष्य का सर्वांगीण विकास, सहयोग, करुणा, 
मैत्री, साहस, नैतिकता इन सभी गुणों का विकास शिक्षा के माध्यम से ही किया जा सकता है।
       अन्याय का मुकाबला करना, परिस्थितियों से हार न मानना,
यह सब माननीय गुण विकसित करना ही शिक्षा या शिक्षाविद का
मूल कर्तव्य है।
      मात्र भौतिक साधन या केवल जीवन को ऐसे ही जीने के लिए हमें यह मानव देह नहीं प्राप्त हुई है, एक विशिष्ट उद्देश्य को लेकर हम जिए, जीवन को एक बेहतर लय प्रदान करें, ताकि समाज में सभी को उनका बेहतर स्थान प्राप्त हो सके।
     चुनौतियों से कभी न घबराये, शिक्षा से मनुष्य का परिवर्तन होता है, अगर शिक्षा से जीवन में परिवर्तन नहीं आता, तो फिर ऐसी शिक्षा का कोई भी मूल्य नहीं है। 
        शिक्षा से सामाजिक परिवर्तन आना चाहिए, विभिन्न कुरितियां जो समाज में है, उनका उन्मूलन हम किस प्रकार करे,
यही हमारी शिक्षा का मूल भाव हो। 
        समाज में फैली विषमताओं को हटाना व सभी के साथ सामान बर्ताव करना, यह परिवर्तन  समाज में शिक्षा के द्वारा ही हो सकता है।
         समाज में फैली कुरीतियों को शिक्षा के माध्यम से ही दूर किया जा सकता है , शिक्षा का उद्देश्य मात्र आर्थिक दृष्टि से सक्षम बनाना ही नहीं, वरुण वैचारिक समृद्धि और सामाजिक नियमों का किस प्रकार हम पालन करें, समाज में ,परिवार के विकास में हम किस प्रकार अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान कर सकते हैं।
      वह अगर हम कर पाते हैं, तो शिक्षा को सही अर्थो में हम
समझ पाएंगे। 
      किसी एक व्यक्ति -विशेष का विकास न हो, सर्वांगीण विकास, एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में, बालक- बालिकाओं को हम शिक्षा के माध्यम से तराशे, वह तो मासूम होते हैं, हम उनके बालमन में 
जिस प्रकार के भावों को डाल दें, वही धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व का एक अंग बन जाते है।
       अगर हमें किसी भी देश, राष्ट्र या विश्व को सही मायने में अगर आगे ले जाना है, तो हमें शिक्षा का वह स्वरूप, जो  उन्हें  ऊर्जावान बनाये, परिवार व समाज में भी उनकी ऊर्जा एक सकारात्मक दिशा की ओर प्रवाहित हो, ऐसा शिक्षा का मौलिक उद्देश्य होना चाहिये।
      मानवीय संवेदना व चेतना का माध्यम हमें शिक्षा को बनाना चाहिये, बालपन से नैतिक, साहसिक वह रचनात्मक गुना को अपनाने के लिए हमें उन्हें प्रेरणापदान करना चाहिये।
       शिक्षा का मूल उद्देश्य तो यही है, इस देश में कई महान विभूतियां हुई, जिन्होंने समाज कल्याण में अपनी उर्जा लगाई।
       शिक्षा का मौलिक उद्देश्य एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में बालक बालिकाओं का निर्माण करना है, जिन्हें सही ज्ञान नहीं,
उन्हें इस बात के लिए तैयार करना की आने वाले समय में उनसे
ही यह विश्व, राष्ट्र व समाज है।
       हमारा आचरण इस प्रकार हो, समाज में सहयोग, करुणा, 
समता, आपसी भाईचारा, में नैतिक गुणों को हमें नई पीढ़ी में डालना होगा।
      वे नौनिहाल ही आने वाले समय में जन नेता, अध्यापक, 
इंजीनियर, वकील, अधिकारी, व्यापारी जो भी वे बने, एक आत्मबोध के साथ अपने जीवन को दिये।
          यह हमारी जवाबदेही  है, समाज को अगर उत्थान करना
है, तो नहीं पीढ़ी में हमें सात्विक ऊर्जा, नैतिकता व करुणा, देश पम, पर्यावरण की रक्षा व  आपसी समन्वय की महत्ता को बताना होगा।
       नई पीढ़ी में हमें सत्य पालन का महत्व, पर्यावरण से जुड़ाव,
सामाजिक नियम व उनका क्या महत्व है।
         हम सभी किसी न किसी प्रकार इस समाज का एक अभिन्न अंग है। हमारा कार्यकलाप कैसा हो ? हमें नई पीढ़ी को समझाना,
यह शिक्षा, शिक्षाविद वह समाज के प्रबुद्धवर्ग की भी महती
जवाब दे है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद। 

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगल में यात्रा में आप सभी का स्वागत है, हमारा जीवन एक अथाह सागर के समान है, जिसमें हर पल नई चुनौतियां और अवसर आते रहते हैं। 
         ऐसे में निडरता ही वह गुण है, जो मनुष्य को इन चुनौतियों 
का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है, निडर होने का अर्थ भय से मुक्त हो जाना ही है, क्योंकि जो भयमुक्त हो गया, उसे ही हम निडर कह सकते हैं। 
        हम निडरता पूर्वक कोई भी बात कहे, मगर उसका हेतु 
वास्तव में क्या है, यह  हमें ज्ञात होना चाहिये।
     इतिहास साक्षी है कि जिन महापुरुषों ने निडरता का परिचय दिया, वही युगों -युगों तक याद किये जाते हैं।
       महाराणा प्रताप का संघर्ष हो या भगत सिंह का बलिदान, 
स्वामी विवेकानंद का शिकागो में  भाषण हो, गांधी जी का अहिंसा आंदोलन, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की स्थापना,
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पूर्ण स्वराज की मांग, यह सारे उदाहरण उनकी निडरता को दर्शाते हैं, जिन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप नेतृत्व की बागडोर संभाली, निडरता वह गुण है, जो साधारण से व्यक्ति को भी असाधारण बनाने की क्षमता रखता है, निडरता का सही अर्थ सही समय पर सही बात कहने
कि कला भी है।
        निडरता जब ज्ञान से परिपूर्ण हो, तो वह और सशक्त हो जाती है, तीसरा तत्व है , अभ्यास, निरंतर अभ्यास से निडरता का 
हम में संचार होता है, वास्तविक निडरता  मे विवेक अवश्य होना चाहिये। 
निडर व्यक्ति खतरों को भी समझते हैं, वह समय पर साहस भी करते हैं, समाज के विकास के लिए निडरता का होना अत्यंत आवश्यक है।
जब हम किसी भी अन्याय के खिलाफ खड़े होना सीख जाते हैं,
पूर्ण  निडरता पूर्वक अपनी बात को सामने रखते हैं , तभी सामाजिक परिवर्तन संभव है। 
       आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो निडरता आत्मज्ञान है, जिसने स्वयं को पहचान लिया, उसे फिर किसी का भय नहीं होता ।
      गीता में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को निडर होने का उपदेश देते हैं, क्योंकि निडरता ही मनुष्य को कर्तव्य पथ पर अडिघ रह सकती है।
            व्यक्तिगत जीवन में निडरता हमें स्वयं पर विश्वास करना सिखाती है, यहीं पर मानव से महामानव बनने की प्रक्रिया की शुरुआत होती है।
            स्वामी विवेकानंद का भी प्रसिद्ध कथन हैं, उठो, जागो, और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, यही निजता का सच्चा स्वरूप है।
             सत्य पर अटल रहे, सत्य को कोई भी पराजित नहीं कर सकता, सत्य सदैव ही विजयश्री का ही वरण करता है।
विशेष:- भयमुक्त होकर अपने लक्ष्य की और बढे। जीत की और एक कदम आगे बढ़ायें, संग्राम से कभी पीछे न हटे, परिस्थितियों जिसे डिगा न सके, वह हौसला हम में होना चाहिये।

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय अद्भुत यात्रा में आप सभी का स्वागत है, 
स्वतंत्रता दिवस अभी कुछ दिन पहले ही गया है, दर असल यह ले लेख उसी समय के लिये था, पर किसी करोड़ उसे समय पोस्ट नहीं कर पाया।
स्वतंत्रता दिवस पर सभी देशवासियों को सादर नमन, सादर वंदन 
देश ने हमें क्या दिया, यह न सोच कर हम देश को क्या दे रहे हैं,
इस पर विचार अवश्य करें? 
       आज स्वतंत्रता के 78वें वर्ष  में प्रवेश करने के उपरांत भी 
क्या हम वैचारिक रूप से स्वतंत्र हैं।
   हम अपने विचार, जो भी हमारे भीतर उमड़ रहे हैं, वह कितनी स्वतंत्रता पूर्वक हम अभिव्यक्त कर सकते हैं, यह मंथन का विषय है।
        समाज में वैचारिक मंथन होना अत्यंत आवश्यक है, हमारा समाज विभिन्न विचारधारा, विभिन्न पंथो, भिन्न-भिन्न वक्तियों, भिन्न भूभाग, अलग-अलग भूभाग के अलग-अलग रीति रिवाज, मगर क्या है वह जो हम सबको आपस में जोड़ता है, वह हमारा देश है, 
इस देश की मिट्टी है, जो भी व्यक्ति अपनी जननी, जनक, जन्मभूमि इन तीनों के प्रति कृतज्ञता नहीं होता, वह मानो अपने आपका बोझ ही उठाये होता है।
         "विभिन्नता में एकता" , हमारे राष्ट्र की प्रथम विशेषता है,
चाहे हम किसी भी धर्म मत पंथ जाति समूह के सदस्य हो, जब बात राष्ट्र की आती है, हम सभी अपने-अपने तरीके से राष्ट्र के हित का ही अनुसरण करते हैं, राष्ट्र का अभ्युदय ही चाहते हैं।
      वैचारिक असमानता का मतलब यह नहीं है कि हम किसी भी रूप में राष्ट्रीयता के विरोधी है?
     पिछले कुछ समय से जिस प्रकार से वैचारिक असहमति को भी  अन्य बातों से जोड़ दिया जाता है, वह किसी भी राष्ट्र के लिए गौरव का विषय नहीं है। 
      हम सभी इसी राष्ट्र के एक अंग है, सभी को समान अवसर प्राप्त हो, असमानता न हो, वह केवल शारीरिक, आर्थिक ही नही,
वरन मानसिक स्वतंत्रता भी हो।
     एक खुले महल में हम बगैर किसी भय के अपनी बात को    कह सके, यह एक राष्ट्र की सही परिकल्पना है। 
    अगर हम द्वेष पूर्ण ढंग से किसी के प्रति बर्ताव करते हैं, तो हम निश्चित ही राष्ट्रीयता का सही अर्थ अभी भी समझे नहीं है, जब हम एक राष्ट्र की बात करते हैं, तो उसमें अमीर- गरीब, अभिजित्य  वर्ग, अधिकारी, राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, साधारण जनता, सभी आ जाते हैं। 
          वैचारिक मतभिनता समाज में होती ही है, पर उन सभी में आवश्यक समन्मेंवय  भी उतना ही आवश्यक होता है, भिन्न-भिन्न प्रकृति, भिन्न-भिन्न समूह, पंथ , विभिन्न मतों को मानने वाले, सभी शमिल है।
       समस्याएं कितनी भी हो, मगर हमारा मानस भीतर से सही हो, तो अनेक समस्याओं के बाद भी हम उनका मुकाबला करके राह निकाल सकते हैं।
     हम अपने प्राण पर कितने अडिग हैं, हमारी राहे वहीं से निकलती है, जीवन मे सत्य पाठ को किसी भी सूरत में हम न भूले। सत्य-पथ को अगर हम अपना मूल आधार बनाते हैं, तो देर सवेर हमें विजय श्री प्राप्त होगी।
      हम याद रखें, हमारा आचरण हम स्वयं तय करते हैं, कोई और नहीं। 
     समुद्र मंथन भी जब हुआ था, तब उसमें से सबसे पहले हलाहल विष ही बाहर आया था , आज फिर समझ में समुद्र मंथन की आवश्यकता है, ऐसा मुझे लगता है। 
      आज का समुद्र मंथन वैचारिक समुद्र मंथन है, हो सकता है आज भी जब हम समुद्र मंथन करेंगे, तो पहले हलाहल  विष ही बाहर आने की संभावना है ।
          हमारी विचारधारा जोड़ने की है या तोड़ने की? यह हमें तय करना ही होगा।
       समाज में हम लोगों को आपस में जोड़ने का कार्य करें, समाज के प्रति प्रतिबद्ध हो, समाज से ही राष्ट्र बनता है, यह राष्ट्र सभी का है, सभी के अधिकार के साथ जवाबदेही भी तय होना चाहिये।
         जो भी इस राष्ट्र में रहते हैं, यह राष्ट्र उन सभी का है , समाज में हम लोगों को जोड़ने का कार्य करें, समाज के प्रति प्रतिबद्ध हो, 
सभी को समान स्वतंत्रता  का भी अधिकार  है।
     आज का समुद्र मंथन वैचारिक समुद्र मंथन है, हमारी विचारधारा जोड़ने की है, या तोड़ने की? यह हमें तय करना ही चाहिए। 
        समाज  व राष्ट्र के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य भी है, हमें कर्तव्य को पूरा करने की और ध्यान देना चाहिये, अधिकार तो आपको स्वत: ही प्राप्त हो जायेगा।


  

प्रिय पाठक गण,
          सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    अपने-अपने निज कर्म में जो भी समत्भाव  से प्रतिष्ठित है,
जिनमें न राग है, न द्वेष है, मानो वह प्रत्येक व्यक्ति श्री कृष्ण की शरण में ही है।
        जब कोई भी व्यक्ति राग  व द्वेष दोनों से ही परे होकर 
अपने करते हुए पथ पर अविचल भाव से बढ़ते जाते हैं, वे भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों का पथ प्रदर्शन करते हुए बढ़ते जाते हैं, तब वह मनुष्य इस संसार में रहता हुआ भी मानव परमात्मा के निकट ही है। 
      सम बुद्धि प्राप्त योगी राह में आने वाली बाधाओं से विचलित नहीं होता है, क्योंकि उसने परमात्मा का आश्रय ग्रहण कर लिया 
हैं, फिर वह संसार में सभी का आश्रय त्याग कर अपने निज कर्तव्यों को ईश्वरीय कृपा से पूर्ण कर लेता है।
     उसके मार्ग की समस्त बाधाएं ही मानो उसका मार्ग प्रशस्त करते हए चलती है, जो सत्य- पथ का अनुसरण करते हैं, वह भयभीत नहीं होते, कोई उन्हें डिगा नहीं सकता।
       भगवान श्रीकृष्ण गीताजी में स्पष्ट रूप से यह उद्घोषणा कर रहे हैं। 
      वे अपने निज कर्तव्य में स्थित रहने की बात कर रहे हैं, जो भी व्यक्ति अपने निज कर्तव्य को ईमानदारी से पूर्ण करता है, वह परमपिता परमेश्वर समस्त प्रकार की बाधाओं को हटाता जाता है।
आंतरिक दृढ़ता से जो परिपूर्ण होते हैं, वह परमपिता का आश्रय ग्रहण करते हुए समस्त प्रकार से अपने निज कर्तव्य को पूर्ण करते हुए परम पद के अधिकारी हो जाते हैं। 
        उनके जीवन में आत्म प्रकाश हो जाने से फिर वह समस्त प्रकार के मोह को त्याग कर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य शरण में हो जाते है। जिनकी शरणागति मात्र समस्त संशयो को हटाने 
वाली है। उन परमपिता को अनन्य भाव से नमन करते हुए हम अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहे, अपने आचरण में दृढ़ता बनाए रखें, अविचल  होकर अपने मार्ग पर हम बढ़ते जाये , मार्ग की बाधाओं का स्वत: ही शमन होने लगेगा।
       जिस किसी पर भी भगवान की अनन्य कृपा होती है, यत्र तत्र, सर्वत्र उसकी जयकार होती ही है, समस्त प्रकार के  आश्रय छोड़कर  श्रीकृष्ण शरणागति को जो ग्रहण कर लेते हैं।
     सहस्त्रों सूर्यो सी प्रबल उसकी ऊर्जा होती है, वह अपने पथ पर बढ़ते जाते हैं, भक्ति भाव उनके हृदय में गहरा होता है, श्री कृष्ण की शरण में जो होकर चलते हैं। 
      वे अपने समस्त कर्मों को उनके अर्पण कर देते हैं , वह भय व शोक को इसी जीवन में छोड़कर उनकी अनन्य शरणागति को प्राप्त कर समस्त बाधाओं को पार कर लेते हैं।
     अपने पथ को स्वयं चुनते हैं, बाधाओ को हटाकर युद्ध में, संग्राम में विजय को प्राप्त करते हैं। 
         अन्य शरणागति का आश्रय ग्रहण करने वाले समस्त प्रकार की शंकाओं का निवारण कर लेते हैं।
       किसी कारणवश अगर वह मार्ग का अनुसरण मोहवश नहीं कर पाते , तो वह पतन को प्राप्त हो जाते हैं। भयमुक्त होकर इस संसार सागर में वे विचरण करते हैं।
विशेष:- आपका अपना जो भी मूल कर्तव्य है, वह अपनी संपूर्ण ईमानदारी से करिये, शेष उस प्रभु पर छोड़ दीजिये। सत्यमेव जयते। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
                        परमपिता परमेश्वर सभी का कल्याण करें, 
वर्तमान से हमारे भविष्य का निर्माण, जो भी अपने वर्तमान क्षणों का साक्षी बन सका, वह आंतरिक आनंद को प्राप्त कर लेता है।
         समय की बहती  धारा में वर्तमान का सदुपयोग करें,
जिसे वर्तमान क्षण की पूर्णता को, उस ऊर्जा को महसूस कर लिया, वर्तमान में ही मंगल कामना से भरे विचारों को जिसने भी जीवन में स्थान प्रदान किया, उस पर परमात्मा की मंगल कृपा बरसने लगती है, उसकी कृपा तो नित्य है, निरंतर है, वह तो जल की धारा है, अन्य कृपा को प्राप्त करने के लिए हमें वर्तमान समय काल में ठहरना होगा, इस एक उपाय के सिवाय सब उपाय व्यर्थ है। वर्तमान क्षण में ठहरने पर हम में एक अद्वितीय ऊर्जा का संचार होता है।
        ऐसी ऊर्जा, जो कभी भी क्षीण नहीं होती, परम ऊर्जा  परमेश्वर से प्राप्त करिये, अपने सारे कर्म उन्हें अर्पण कर दें।
      अच्छा- बुरा, पाप-पुण्य , राग -द्वेष , यह सब हमारे सांसारिक द्वंद है, जो भी करें, होश पूर्वक, सोच समझकर फिर कार्य करें, 
वर्तमान को संवारे, वर्तमान क्षण पर पूरा ध्यान रखें, अपने स्वाभिमान को हर कीमत पर जीवित रखें, जीवंत ऊर्जा से भरपूर रहे, जिसने भी वर्तमान को सही तरीके से समझा, उस पर कार्य किया , वर्तमान की अवहेलना न करें, उन क्षणों को भीतर महसूस करें, साक्षी भाव से उस अस्तित्व को महसूस करें, मौन को गहराई से भीतर उतरने दे, वर्तमान क्षणो  का इन पलों का आनंद महसूस करें।
       वर्तमान में रहे, सजग दृष्टि रखें, अपने व्यक्तित्व की गरिमा 
बनाए रखें, जिसने भी वर्तमान को सही अर्थों में महसूस किया, 
उसे परम ऊर्जा का साक्षात्कार जिसने भी किया, फिर सारे कर्म स्वचालित रूप से होंगे।
     भीतर से जो परिपूर्ण हुआ, परि पूर्णता केवल वर्तमान को सही ढंग से साधने में ही है, जो वर्तमान क्षणों को जितना साध लेता है,
वह उतना ही जीवन में उन्नति को प्राप्त होता है। 
        जैसे-जैसे हम इस कला को अपने जीवन का एक अंग बना लेंगे, कमाल घटने लगेगा, सारी उलझने भी हटती है, समय पर हमें सजग होना होता है, वर्तमान समय का जितना सही सदुपयोग हम करते हैं, उतनी ही सजग दृष्टि हममें विकसित होने लगती है, हम आनंदित होकर अपना कार्य उत्साह से करने लगते हैं।
        आंतरिक पूर्णता को उपलब्ध हो, स्वयं भी वर्तमान में रहे, 
सजकता पूर्वक हर क्षण का उपयोग करें, सफलता आपके साथ-साथ चलने लगेगी।
       उत्साह ही जीवन का प्रारंभ है, निरंतर उत्साह बनाये रखें,
निरूत्साहित होकर न जिए, हर दिन एक नया जीवन होता है। 
      आंतरिक पूर्णता को उपलब्ध हो, वर्तमान का आनंद लें, 
स्वयं भी वर्तमान में रहे, सजकता पूर्वक  हर क्षण का उपयोग करें।
      आनंदमय जीवन तभी होता है, जब हम अपने वर्तमान में होते हैं। वर्तमान समय का सही सदुपयोग करने पर सफलता आपके साथ-साथ चलने लगती है, संघर्ष तो पग- पग पर है।
     सभी घटनाओं को परम साक्षी भाव से ग्रहण करें, वर्तमान परिस्थितियों का सही तरीके से अवलोकन करे, समय काल को समझें, समय फिर कभी वापस नहीं आता, जो अपने समय की कद्र नहीं करते, समय भी फिर उनकी कद्र नहीं करता, व्यवस्था को समझें, क्या हो रहा है? क्या करना है? आंतरिक व बाह्य दोनों पलों को हम खूबसूरती से जिये।
 विशेष:- वर्तमान में सजग रहे, आपको सजगता पूर्वक सभी कार्यों को करना चाहिये, साक्षी भाव से कार्य को करते रहें, समय काल को महत्व दें, महत्वपूर्ण विषयों की अनदेखी न करें, सजग रहकर अपना कार्य करें।