प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
  आप सभी को मंगल प्रणाम, 
हर मनुष्य के पास बुद्धि अवश्य होती है, वह अपना हित किस कार्य में है, यह वह भलीभांति जानता है, जो वह इस बात को जानता है, वह उसे किस प्रकार से जानता है, 
उसे हम बाह्य दृष्टि कह सकते हैं, जो हम जगत में, संसार में कैसे हम व्यवहारकुशल हो,
किस प्रकार से अपनी वाणी का प्रयोग  करें,
बुद्धि का प्रयोग करें, यह हमें बताती है, बाह्य जगत में, सांसारिक जगत में कैसा हम व्यवहार करें, इसका हमें बोध कराती है, यह तो हुई हमारी बाह्य दृष्टि। 
              अब हम आंतरिक दृष्टि की बात करते हैं, हमारे अपने गुण दोष क्या है? उसे और हमें जागृति प्रदान करती है, हर मनुष्य गुण दोषयुक्त ही है, मगर अपने स्वयं के गुण दोष पहचान कर गुणों से किस प्रकार हम कार्य करें, दोषों का हम किस प्रकार से परिमार्जन करें, अपने स्वयं को किस प्रकार से हम परिष्कृत करें, यह गुण हममें आंतरिक चेतना विकसित करने पर बढ़ते हैं।
      हमें जीवन में बाह्य दष्टि, जिससे हम जगत को जाने वह अंतर्दृष्टि जिससे हम स्वयं को भी जाने, इन दोनों का ही बोध होना परम आवश्यक है, या यह कह सकते है, हमारे पास दोनों ही दृष्टियां अगर है, तो हम तुलनात्मक अध्ययन द्वारा कहां किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, कहां पर बोलना है? कहां नहीं, यह समझ आने लगेगा। 
         जीवन को जीने के लिए हमें अंतर्दृष्टि व
बाह्य दृष्टि दोनों के ही उचित संतुलन की कला
का निरंतर अभ्यास करना होगा, तभी हम धीरे-धीरे साम्यावस्था को प्राप्त हो सकते हैं,
यानी हमारी धीरे-धीरे समदृष्टि विकसित होने से हम दोनों ही प्रकार के व्यवहार मे निपुणता 
प्राप्त कर सकते हैं।
         जगत में हमें व्यवहारिक कला में निपुण होना पड़ेगा वह अपनी स्वयं की आंतरिक
समृद्धि के लिये हमें अपनी आंतरिक दृष्टि को
विकसित करना होगा।
     हम सामान्य जीवन जीते हुए भी जब इन 
दोनों का संतुलन करना सीख गये, तो जीवन की जो कला है, किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, यह हमें ज्ञात हो जायेगा।
     क्रमशः हम आंतरिक दृष्टि व बाह्य दष्टि 
दोनों में उचित संतुलन रखते हुए इस संसार सागर की यात्रा को इन दोनों ही समानांतर पटरियों पर अपने जीवन रूपी रेलगाड़ी को 
चलाने की कला को सीख पायेंगे।
       जितना हमारा अभ्यास बढ़ेगा, हम परिपक्व होते जायेंगे, जीवन के संतुलन को साधते जायेंगे , उतना ही हमारा व्यक्तित्व भी निखरेगा, इस प्रकार हम अंतर्दृष्टि का विकास
करके आंतरिक अनुभूति व शांति को प्राप्त कर पायेंगे वह बाह्य जगत को देखने व घटनाक्रमों को ठीक ढ़ंग से समझने की कला को सीख जायेंगे।
विशेष:- अंतर्दृष्टि विकसित होने पर हमारा अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली होगा, वह बाह्य दृष्टि विकसित होने पर हमें व्यवहारिक कुशलता का ज्ञान होगा, और जीवन में दोनों की ही हमें आवश्यकता पड़ती है, इति शुभम भवतू ।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है, नव वर्ष शुरू हो गया है,
नवीन संकल्पों को हम गढ़े, और विषम परिस्थितियों में हम कैसे संतुलन स्थापित करें, यह सीखने का प्रयास करें। 
         अनुकूल परिस्थितियों हो, तब तो हर कोई बाजी जीत ही जाता है, परंतु विपरीत परिस्थितियों हो, समय विषम हो, तब किस प्रकार से हम किसी भी समस्या का समाधान निकालते हैं, वहीं हमारी योग्यता का परिचय हमें देना होता है।
       जहां विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होने पर साधारण व्यक्ति उनसे हार मान लेते हैं, साधारण व्यक्तित्व के धनी वहीं से अपनी राहे तैयार कर लेते हैं, यानी कुल मिलाकर मेरा यह मानना है, परिस्थितियों चाहे कितनी भी विषम क्यों न हो, कोई ना कोई द्वार तो अवश्य होता है, बस वही हमें पूर्ण धैर्य से खोजना होता है, 
कैसे हम अपनी समस्या के विभिन्न पहलुओं की जांच करते हैं, उन्हें में उसका समाधान भी छिपा होता है। 
       कोशिश करते रहे, कोई भी समस्या हो,  विषमता में समता हम किस प्रकार से 
स्थापित करें, यही हमारी योग्यता का पता हमें चलता है। 
        सामान्य स्थिति व विषम परिस्थिति में अंतर तो निश्चित होता है, पर धैर्य पूर्वक अगर हम स्थितियों का आकलन अगर हम करते हैं,
तो उन्हें विषम परिस्थितियों में ही हमें मार्ग भी मिल जाता है। 
      विषम से विषम परिस्थिति भी हो, अगर हम धैर्य रखें तो हमें समझ में आता है, की समस्या को हम किस प्रकार सुलझा पायेंगे।
      परिस्थितियों विषम भी हो, तो भी कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलता ही है, सूझबूझ व धैर्य पूर्वक अवलोकन से हमें राह मिल ही जाती है। प्रतिकूलता में अनुकूलता या विषमता में समता हम कैसे स्थापित करें, 
प्रयास करते रहने पर हम उसमें कामयाब हो सकतें हैं।
     अगर हमारे व्यक्तित्व में यह खूबी है, तो उसका हमें पता भी होना चाहिये वह समय आने पर हम उसका किस प्रकार से स्थितियों को अपने पक्ष में करें, जिस किसी का नुकसान भी ना हो वह हमारा कार्य भी सिद्ध हो जाये।
       यह जीवन में अनुभव द्वारा ही सीखा जा सकता है, बुद्धिमान मनुष्य परिस्थितियों का सही आकलन करते हैं, वह फिर निर्णय करते हैं। 
      जहां सभी हार मान जाते हैं, एक कुशल रणनीतिकार वहीं से अपनी जीत को तय करते हैं। साहसिक व दूरदर्शी बने, समय अनुकूल क्या उचित है, यह अध्ययन करें, राह स्वयं ही निकल जाती है। विषमता में समता को जो खोज लेता है, वह अपनी राहें बनाना जानता है।
विशेष:-  विषमता में समता को देख लेना, किस प्रकार से हल निकलेगा, वह हमारे व्यक्तित्व की दुरंदेशी को बताता है, परिस्थितियों से हारे नहीं , वरन् उनसे जूझने का आंतरिक सामर्थ्य अपने आप में उत्पन्न करें, विषमता में समता का अभ्यास करें, उसमें पारंगत होने पर आपके हल दूसरों से भी जल्दी होंगे, क्योंकि आपने एक ही समस्या के विविध पक्षों को भली भांति समझ कर फिर निर्णय लिया है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे धैर्य जीवन का अंग, हम सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव, मान-अपमान, जय पराजय सभी आते ही हैं।
       ऐसा कोई मनुष्य नहीं, इसके जीवन में
संघर्ष ना रहा हो, जीवन का शुरुआती संघर्ष आपको आगे बढ़ाता है, धैर्य पूर्वक अपनी जीवन यात्रा को पूर्ण करें, उम्र के विविध पड़ाव अलग-अलग संकेत आपको प्रदान करते हैं।
   जैसे-जैसे आपकी उमर धीरे-धीरे बढ़ती है, मगर जीवन ऊर्जा घटती जाती है।
       अपने अनुभव से सीखे, वह धैर्य को हमेशा अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना ले। जब भी कोई निर्णय करें, सोच समझकर करें, परिदृश्य को पूर्ण ईमानदारी व धैर्य पूर्वक समझे, फिर कोई भी फैसला करें, 
जीवन में कई बार आप जो चाहते हैं, वह नहीं होता, इसके बाद भी अपना धैर्य बनाए रखे,
विपरीत समय में अगर आप धैर्य बनाए रखेंगे 
तो जीवन की कई उलझनों से आप बच सकते हैं, निर्णय करते समय अगर आप धैर्य पूर्वक चीजों को समझते हैं, तो यह आपके साथ ही
आपके साथ जो भी है, उन्हें भी मुश्किलों से उबरने में सहयोग प्राप्त होगा, जब आप धैर्य धारण करते हैं, तो कई चीजे स्वत: सुलझ जाती है।
     कोई भी मामला हो, जब आपके भीतर आंतरिक धैर्यता का गुण अगर आपने विकसित कर लिया है, तो आप उसे विषय से संबंधित जो भी बातें हैं, उन्हें ठीक ढंग से समझ सकते हैं, और उनका निराकरण निकाल सकते हैं, निराकरण करते समय आपका धैर्य व सूझबूझ दोनों ही काम आते हैं, निरंतर धैर्य धारण करने से आपके भीतर ऐसी क्षमता विकसित हो जाती है, जिससे आप स्थितियों को समझ कर फिर अपना कदम उठा सकते हैं। 
      इस प्रकार समस्या उत्पन्न होने पर हम निराकरण कर सकते हैं, समस्या कोई भी हो, 
सही ढंग से अगर हम समझे तो उसका निराकरण संभव है, किसी भी समस्या में आपकी संवाद की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है, आपसी संवाद द्वारा हम गलत फैमिलायों को दूर कर सकते हैं, और चीजों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
        जब हम धैर्यपूर्वक चीजों को समझते हैं,
तो हमारे पास उन सब बातों का जो हम करना चाहते हैं, रास्ता खुल जाता है, सभी पहलुओं को हम समझ पाते हैं, जीवन में 
सफलता व असफलता, दोनों ही आती है। 
           असफलता हमें और अधिक सिखाती है, हमारी स्वयं की क्षमता को और बेहतर करने की हमें शक्ति प्रदान करती है।
        जितना अधिक धैर्य हम में होगा, उतना ही हम बातों को ध्यान पूर्वक समझ कर उन्हें कर सकते हैं, आपसी संबंधों को भी हम एक मजबूत आधार प्रदान कर सकते है।
     जब हम पूर्णतया पारदर्शिता से अपनी बातों को रखते हैं, तो वह पारदर्शिता हमें सिखाती है, हम कैसे बातों को बेहतर ढंग से करें। 
        धैर्य वह कला है, जो हमारी बातों को हम कैसे पेश करें, उनका समाधान किस प्रकार निकाले, वह क्षमता हममें विकसित करती है।
विशेष:- धैर्य हमारा व्यक्तिगत गुण है, वह प्रतिकूल परिस्थितियों अगर उत्पन्न हो तो, 
उनका कैसे हम सामना करें, इसकी क्षमता हमें प्रदान करती है, निरंतर अगर हम धेर्य से कार्य करें, तो ऐसी जीवन की कोई भी समस्या नहीं है, जिसे हम सुलझा न सके। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम , 
    आज हम बात करेंगे, सजगता ही बचाव है,
अगर हम पूर्ण रूप से सजग है, तो हमें मालूम होता है, कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं, वह कितना महत्वपूर्ण है व उसे किस प्रकार से 
किया जाये।
       सजग रहकर हम सारी परिस्थितियां  ठीक प्रकार से समझ सकते हैं। आंतरिक सजगता हमें क्या कर्म करना है, क्या नहीं? 
यह बोध प्रदान करती है, व बाहृय  सजगता हमें व्यवहार कुशल बनाती है।
      इस प्रकार हमारे जीवन में दोनों ही प्रकार की सजगता अगर बराबर है, तो परिणाम निश्चित ही सुंदर होंगे।
      हम अपने कार्य के प्रति पूर्ण सजग रहें,
व जीवन का आपका कौन सा चरण है, अगर आप जीवन के प्रारंभिक चरण में है, 
तो शुरुआत से ही सजग रहकर अपनी भूमिका तय करिये, आपका जीवन आपका स्वयं का है, उसके परिणाम आपको ही प्राप्त होंगे, अन्य किसी को नहीं।
     अगर जीवन की शुरुआत में ही आपके पास लक्ष्य स्पष्ट है, तो आपने जीवन की सही शुरुआत प्रारंभ कर दी है, अस्पष्ट नजरिया हमारी उन्नति को रोकता है, अपनी स्वयं की रुचि कौन से क्षेत्र में है, हमें वही कार्य शुरुआत से करना चाहिये।
        शुरुआती जीवन में अगर अपने लक्ष्य को ध्यान में रखा, तो सफलता आपकी राह देख ही रही है, अगर किसी कारणवश आप जीवन के प्रारंभिक चरण में लक्ष्य तय नहीं कर पाये, आप जीवन के मध्य चरण में है, तो अपनी गतिविधियों को स्वयं जांचे, कहां चुक हो रही है, धैर्य पूर्वक कोई एक दिशा में आप कार्य करें, नहीं तो प्रारंभिक चरण में तो आप सजग नहीं रहे, जीवन के मध्य चरण में आप सजग अवश्य हो जाये, व अपने जीवन की रूपरेखा आप समझे, एक ही दिशा में कार्य करें, जीवन के प्रारंभिक चरण को खोने के बाद मध्य चरण में कोई गलती ना करे, अभी भी समय पूर्ण रूप से आपके हाथों से नहीं निकला है। 
     जीवन का प्रारंभिक व मध्य चरण अगर आप सजगता पूर्वक संपन्न करते हैं, तो अंतिम चरण में आपको इतनी चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं है, जीवन में सजग रहें।
सजगता ही बचाव है, नित्य प्रति प्रभु कृपा का
भी सुमिरण करते रहे, वह परमपिता सबका कल्याण ही करता है, उसकी शरण में रहकर अपने जीवन के समस्त कार्यों को संपन्न करें। 
अगर आपने प्रारंभिक व मध्य चरण सफलतापूर्वक पार कर लिया है, तो आपका अंतिम चरण प्रभु की कृपा से उत्तम ही होगा। 
प्रारंभिक व मध्य चरण के बाद ही जीवन का उत्तरार्ध आता है, अगर हमारे प्रारंभिक व मध्य के फैसले सजगतापूर्वक किये गये है, तो हमारे पूर्व में किया गये अच्छे कार्य व फैसले हमारा रक्षण करेंगे, जीवन के उत्तरार्ध में प्रभु की ओर धीरे-धीरे हम बढ़ते रहे, उसकी असीम अनुकंपा को अनुभव करें।
     सजग रहे, सरल रहे, आत्म बोध बनाये रखें, धैर्य पूर्वक अपना रास्ता तय करें, मंजिल की और कदम बढ़ाते रहे।
विशेष:- कोई भी फैसला जब हम करें, जीवन के सारे पहलुओं को देखने के बाद ही निर्णय करें, दूरगामी परिणामों को देखकर किसी भी कदम को बढ़ाये, धर्म ग्रंथ का अध्ययन करें , पुस्तकें पढ़ें, अनुभवी लोगों से मिले, उनके जीवन के अनुभवों को सुने, सजग रहे, परिवर्तनों को ध्यान पूर्वक देखें।
आपकाअपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।   

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      आज प्रवाह में मद् भागवत गीता का 
वर्तमान समय में क्या महत्व हैं,  इस बात पर हम चर्चा करेंगे। 
     भगवान श्रीकृष्ण के श्री मुख से निकली वाणी आज तो और भी प्रासंगिक है, यह आपको बताती है, कर्म के निर्धारण के बारे में।
      निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देती है, व अपने-अपने कर्म क्षेत्र में आप पूर्ण ईमानदारी से कार्यरत रहें, यह बोध प्रदान करती है।
     अपना जो भी कर्म हम कर रहे हैं, वह छोटा या बड़ा न होकर हम कितनी निष्ठा पूर्वक उस  कर्म को करते हैं, यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है। 
     इसका सरल निरूपण यह है, जो भी व्यक्ति जिस भी कार्य को कर रहा है, वह जितनी निष्ठा व लगन से उस कार्य को करेगा,
निश्चित ही उतने ही बेहतर परिणाम उसे प्राप्त  होंगे, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
    कर्म हमारा कैसा हो? जो भी कर्म हम करें,
उसका आधार केवल भौतिक मूल्य न होकर 
उसे कर्म को पूर्ण समर्पण भाव से करना, यह अधिक मूल्यवान है, इससे क्या होगा? आप उस कर्म को श्रृद्धा व रुचि पूर्ण तरीके से करेंगे तो उस कर्म में एक निखार आयेगा।
       श्रद्धा सहित किया गया कोई भी कार्य 
अपना प्रभाव बतलाता ही है, कर्म तो हमें करना ही है, पर जितनी निष्ठा पूर्वक हम अपना कार्य करेंगे, परिणाम बेहतर होते जायेंगे।
    मान लीजिये हम व्यापार करते हैं, तो हमारा व्यापार निष्ठा पूर्वक व ग्राहक की पूर्ण संतुष्टि होना चाहिये, अगर हम राजनेता है, 
तो समाज में किस प्रकार समाज की उत्तरोत्तर उन्नति हो,
समस्याओं का समाधान किस प्रकार कर सके सके, यह मूल भाव हमारे कर्म का होना चाहिये।
और अगर हम अध्यापक हैं, तो छात्र का सर्वांगीण विकास, यानी उसके व्यक्तित्व में 
क्या खूबियां हैं, उन्हें बताना व उसे उस  और प्रेरित करना, स्वयं का एक मुकाम समाज में बनाना व किस प्रकार सामाजिक व्यवस्था 
का वह अंग बने, ताकि जिससे सामाजिकता को और बढ़ावा मिले, यह उद्देश्य एक अध्यापक का होना चाहिये।
कुल मिलाकर जिस भी व्यक्ति का जो मूल कर्म है, पूर्ण ईमानदारी पूर्वक अगर हम समाज में करते हैं, तो बहुत सी समस्याएं अपने आप ही हल हो जायेगी।
        अगर ऐसा कोई भी अपने  जीवन में करता है, तो उसे परिणाम निश्चित ही अच्छे ही प्राप्त होंगे, क्योंकि किसी भी कर्म को आप जितनी निष्ठा से करते हैं, परिणाम उतने बेहतर होते जाते हैं।
     श्री भगवत गीता हमें यही सिखाती है, हम अपने कर्म को निष्ठा पूर्वक करें, जो भी कर्म हमने लिया है, या हमें प्राप्त हुआ है, ईमानदारी, निष्ठा व प्रसन्नता पूर्वक अपने कर्म को करें, निष्काम कर्म योग का यही सिद्धांत गीता हमें बताती है।
    जितनी सरल व्याख्या गीता जी में है, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, अपने कर्म को करिये, न कि दूसरे के कर्म की ओर हम देखें,
आपका जो भी कर्म है, वह पूर्ण ईमानदारी से करिये, यही गीता का मूल मंत्र है। 
विशेष:- अपने नित्य कर्म को पूर्ण ईमानदारी   व निष्ठा पूर्वक करना, इतना सरल संदेश हमें गीता जी प्रदान कर रही है, यह सभी के लिये उपयोगी व कालजयी ग्रंथ है, जिसे अगर हम सही तरीके से समझ जाये, तो फिर संशय की कोई बात ही नहीं उत्पन्न होती, अपने अपने कर्म को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से करने का संदेश गीता जी हमें प्रदान करती है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     आज का सामाजिक परिवेश किस प्रकार का निर्मित हुआ है, जहां पर युवा पीढ़ी के अपने सपने है, वे केवल भौतिकता की ओर आकर्षित है, शिष्टाचार व मूल्यों की सौगात, 
जिस समाज के द्वारा दी जाती है, वह भी  भ्रमित है।
      क्योंकि आज से 10 -15 वर्ष पूर्व का समाज हम देखें, तो नैतिक मूल्यों की कीमत थी, व्यक्ति धन किस प्रकार से कमा रहा है,
यह बहुत महत्वपूर्ण था। 
         विगत वर्षों में जो सामाजिक मूल्यों का पतन हुआ है, उसके लिये सभी वर्ग कुछ न कुछ रुप में समान दोषी है, इस स्थिति में सुधार किस प्रकार लाया जाया, यह गहन चिंतन का विषय है। 
       व्यक्तित्व विकास की शिक्षा हमें स्वयं उन जीवन मूल्यों पर जीना होती है, जिनकी हम अन्य व्यक्ति या ,परिवार से, समाज से अपेक्षा रखते हैं।
      सर्वप्रथम हमें स्वयं अपने ऊपर भी गौर करना होगा, जो सामान्यतः हम नहीं करते, 
दूसरे के दोषो को देखना सबसे आसान कार्य है, पर स्वयं के दोषों पर हमारी दृष्टि नहीं जाती।
       क्षरण मूल्यों का सभी और हुआ है, मात्र भौतिक उन्नति की और अगर समाज अग्रसर हो जाता है, तो जीवन मूल्यों की कीमत कम हो जाती है। 
        हमें संतुलित रूप से भौतिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु दृढ़ रहना होगा, पुरानी सभी परंपरा ठीक हो, व नई सारी गलत,
यह कहना भी उचित नहीं, कहां आवश्यक सुधार की आवश्यकता है, यह भी हमें देखना होगा। सब पुराना ठीक, सब नया खराब, 
इन दोनों के मध्य का का चुनाव, इन दोनों में जो उचित हो, समयानुकूल हो, उसे हम ग्रहण करे।
      वर्तमान की चुनौतियां और कठिन है, जब सब और से अनेक विचार चल रहे हो, तब मानसिक रूप से स्थिर चित्त होकर हमें हल तलाशना होगा, एक लेखक के नाते मैंने यह महसूस किया है कि नई पीढ़ी गैर- जवाबदार नहीं है, वरन वह अपने लक्ष्य के प्रति पहले से भी अधिक सजग है, मगर समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व है, यह बोध हमें नई पीढ़ी को अवश्य कराना चाहिये।
         समाज में कई प्रकार के विभिन्न मत-मतांतर, अनेक विचारधाराएं, अनेकों प्रकार की विविधता, इन सब में सामंजस्य  किस प्रकार हम वर्तमान समय में करें, यह बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य है, मगर यह किया जाना चाहिये।
     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है, अपने स्वयं के, परिवार के, समाज के उत्तरदायित्वों को किस प्रकार से निभाया जाये, यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। 
     मानवीय चेतना को अगर हम सकारात्मक  दिशा या चिंतन न दे सके, तो आने वाली भावी पीढ़ियां हमें इस बात के लिए उत्तरदायी ठहराएंगी  कि हममें इतनी समझ  नहीं थी, पर आप लोग तो समझदार व अनुभवी  थे। 
       आपने हमें सही मार्ग चयन हेतु प्रेरित क्यों नहीं किया। 
     हम अपने सीमित संसाधनों द्वारा भी, उनके कुशल उपयोग द्वारा सामाजिकता को, 
दायित्वों को निभा सकते हैं।
    संपूर्ण रूप से नई पीढ़ी को जवाब देह मानना अपनी जवाबदारी से चूकना है, उन्हें आवश्यकता व अधिकता का अंतर समझाने का मूल दायित्व हमारी वर्तमान पीढ़ी का है, जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते।
        साथ ही युवा साथियों से भी मेरी विनम्र अपील है, बुजुर्गों को कुछ समय अवश्य दें, 
उनके अनुभव आपके काम ही आयेंगे, उन्होंने काफी समय लोगों के बीच में जीवन बिताया है, जितनी गहरी समझ उनकी है, उतनी नई पीढ़ी की अभी नहीं, उनकी हर बात को महत्वहीन न माने, बुजुर्गों का अनुभव युवा पीढ़ी का जोश यह दोनों ही समाज के लिए एक सकारात्मकता का निर्माण करेंगे, तालमेल का जिम्मा निश्चित तौर से अनुभवी व्यक्ति का ही है, साथी बुजुर्गों से भी निवेदन 
वे भी युवा पीढ़ी के पक्ष को समझें, वर्तमान समय में तालमेल बहुत ही आवश्यक है। 
विशेष:- वर्तमान सामाजिक परिवेश अत्यंत ही विचित्र है, एक तरफ समाज में के अच्छे लोग हैं, जो निरंतर प्रयासरत हैं, दूसरी और कुछ लोग हैं, जो मात्र निंदा ही करते हैं, तो जो सामंजस्य बिठाने वाले लोग हैं, वह निश्चित ही श्रेष्ठ है, अत्यधिक महत्वाकांक्षा व अंतहीन दौड़, इनमें से हमें क्या चुनना है?  पुरातन व वर्तमान दोनों का आकलन  आवश्यक है,
हमारा वर्तमान हमारे कदम के अतिरिक्त 
आसपास के घटना चक्रों से भी प्रभावित तो होता है, पर आखिरकार चयन हमें ही करना होता है, हम क्या चाहते है?
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
     मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा है, जब वह अपना सफर करता है, तो उसे सर्वप्रथम वह परिवार, जिसमें वह पला बढ़ा, उसके पारिवारिक संस्कार, जो उसे प्राप्त हुए, उसकी परवरिश, उसके बाद उसका स्वयं का अपना
संघर्ष, यह सब उसकी जिंदगी में अनिवार्य आते ही है।
              इन सभी के बीच में परिवार की मान्यताएं, सामाजिक मान्यताएं, इन सबके बीच में व्यक्ति को उसकी नैसर्गिक  ऊर्जा जो प्राप्त हुई, परमात्मा से, वह या तो क्षीण होगी 
या उसमें वृद्धि होगी, अगर ऊर्जा क्षीण होती
हैं, तो निश्चित ही उसकी दिशा जिधर वह जा रहा है, सही नहीं है, और अगर उस ऊर्जा में अभिवृद्धि हुई है, तो वह सही दिशा की और जा रहा है। सवाल यह है कि हम अपने जीवन में इस सकारात्मकता का पता किस प्रकार करें , तो अपने आप को जांचे, अपना संपूर्ण जीवन आपने मातृ भोग-विलास में ही बिता दिया है, या अपने जीवन का इससे हटकर कुछ अलग उद्देश्य आपने तय किया है, जीवन की इस यात्रा में आपके सामने निश्चित ही कई पड़ाव आते हैं, तब आपको फैसला करना ही होते हैं, अन्य कोई भी उपाय नहीं होता, उस परिस्थिति में आप क्या फैसला कर रहे हैं, वह स्वविवेक, तात्कालिक परिस्थितियां, अनुकूलता, प्रतिकूलता सब कुछ हो सकता है, इस यात्रा में आपने जो निर्णय लिये है, वह दूरगामी  परिणामों को देखकर लिये है अथवा नहीं, अगर आपने अपने फैसले के दूरगामी परिणामों पर विचार किया है, तो निश्चित ही आपके फैसले सही होंगे, किसी भी निर्णय को लेने का बाद में क्या परिणाम उपस्थित होगा, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
         इसमें सबसे अधिक मूल्य आपके पारिवारिक संस्कारों का है, उन संस्कारों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका इसमें होती है, वर्तमान परिस्थितियों जो भी अच्छी या बुरी निर्मित हुई है, वह हमारे अपने फैसलों का ही परिणाम है, आगे भी आप जो फैसला गहरी समझ के आधार पर लेंगे, वह अधिकतम सही दिशा की और ही होगा। 
     हमारा जीवन केवल हमारा ना होकर परिवार ,समाज दोनों से जुड़ा हुआ है, हम परिवार व समाज की मात्र एक  इकाई है,
इसलिए हमारे फैसलों का दूरगामी परिणाम हमारे परिवार व समाज पर पड़ता ही है।
     हमें हमेशा कोई भी फैसला लेते समय तात्कालिक परिस्थितियां व दुरगामी  परिणाम 
दोनों का ही चिंतन करना चाहिये,  तात्कालिक व दीर्घकालिक फैसला आप अपने जीवन के अनुभव के आधार पर भी ले सकते हैं। 
      समयानुकूल निर्णय आपने कितने बुद्धिमत्ता पूर्वक लिये हैं, वही आपके जीवन के परिणाम बदलेगा। जो भी व्यक्ति अपने जीवन की शुरुआत में सही दिशा में संघर्ष करता है, वह अपनी बाद का समय सुखपूर्वक बिताता है, हमारे इसी जीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म या तो हमें ऊपर उठाते हैं या नीचे गिराते हैं, कोई अन्य इसके लिए कभी दोषी नहीं हो सकता। 
       अपनी दैनिक दिनचर्या का स्वयं आकलन अवश्य करते रहे, बिना किसी सोच विचार के जीवन रूपी नौका किधर जायेगी,
पता नहीं, अगर आपको दिशाबोध या ज्ञान नहीं हो रहा तो आप पुरानी कहावतों  का सहारा भी ले सकते हैं, क्योंकि वे काफी अनुभव के बाद ही बनाई हुई होती है, अथवा अनुभवी व्यक्तियों का मार्गदर्शन ले, किसी गुरु या ग्रंथ का आश्रय ले, स्वयं चिंतन भी करते रहे, जीवन को सही मूल्यों के साथ जीना, भले ही थोड़ी तात्कालिक परेशानी हमें उठानी पड़े, यही हमारे जीवन में सबसे अधिक आवश्यक है। 
विशेष:- हमारा, आपका सभी का जीवन एक यात्रा ही तो है, इस यात्रा में हमें कई साथी मिलेंगे, बिछड़ेंगे, पर अपना स्वयं का निर्णय, 
हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, यह हम स्वयं ही तय करते हैं, जिस प्रकार का हमारा सोच विचार होगा, उसी प्रकार की हमारी रणनीति भी होगी। जीवन कैसा जीना है, यह हमारे फैसलों पर ही निर्भर है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।