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प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      आज प्रवाह में मद् भागवत गीता का 
वर्तमान समय में क्या महत्व हैं,  इस बात पर हम चर्चा करेंगे। 
     भगवान श्रीकृष्ण के श्री मुख से निकली वाणी आज तो और भी प्रासंगिक है, यह आपको बताती है, कर्म के निर्धारण के बारे में।
      निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देती है, व अपने-अपने कर्म क्षेत्र में आप पूर्ण ईमानदारी से कार्यरत रहें, यह बोध प्रदान करती है।
     अपना जो भी कर्म हम कर रहे हैं, वह छोटा या बड़ा न होकर हम कितनी निष्ठा पूर्वक उस  कर्म को करते हैं, यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है। 
     इसका सरल निरूपण यह है, जो भी व्यक्ति जिस भी कार्य को कर रहा है, वह जितनी निष्ठा व लगन से उस कार्य को करेगा,
निश्चित ही उतने ही बेहतर परिणाम उसे प्राप्त  होंगे, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
    कर्म हमारा कैसा हो? जो भी कर्म हम करें,
उसका आधार केवल भौतिक मूल्य न होकर 
उसे कर्म को पूर्ण समर्पण भाव से करना, यह अधिक मूल्यवान है, इससे क्या होगा? आप उस कर्म को श्रृद्धा व रुचि पूर्ण तरीके से करेंगे तो उस कर्म में एक निखार आयेगा।
       श्रद्धा सहित किया गया कोई भी कार्य 
अपना प्रभाव बतलाता ही है, कर्म तो हमें करना ही है, पर जितनी निष्ठा पूर्वक हम अपना कार्य करेंगे, परिणाम बेहतर होते जायेंगे।
    मान लीजिये हम व्यापार करते हैं, तो हमारा व्यापार निष्ठा पूर्वक व ग्राहक की पूर्ण संतुष्टि होना चाहिये, अगर हम राजनेता है, 
तो समाज में किस प्रकार समाज की उत्तरोत्तर उन्नति हो,
समस्याओं का समाधान किस प्रकार कर सके सके, यह मूल भाव हमारे कर्म का होना चाहिये।
और अगर हम अध्यापक हैं, तो छात्र का सर्वांगीण विकास, यानी उसके व्यक्तित्व में 
क्या खूबियां हैं, उन्हें बताना व उसे उस  और प्रेरित करना, स्वयं का एक मुकाम समाज में बनाना व किस प्रकार सामाजिक व्यवस्था 
का वह अंग बने, ताकि जिससे सामाजिकता को और बढ़ावा मिले, यह उद्देश्य एक अध्यापक का होना चाहिये।
कुल मिलाकर जिस भी व्यक्ति का जो मूल कर्म है, पूर्ण ईमानदारी पूर्वक अगर हम समाज में करते हैं, तो बहुत सी समस्याएं अपने आप ही हल हो जायेगी।
        अगर ऐसा कोई भी अपने  जीवन में करता है, तो उसे परिणाम निश्चित ही अच्छे ही प्राप्त होंगे, क्योंकि किसी भी कर्म को आप जितनी निष्ठा से करते हैं, परिणाम उतने बेहतर होते जाते हैं।
     श्री भगवत गीता हमें यही सिखाती है, हम अपने कर्म को निष्ठा पूर्वक करें, जो भी कर्म हमने लिया है, या हमें प्राप्त हुआ है, ईमानदारी, निष्ठा व प्रसन्नता पूर्वक अपने कर्म को करें, निष्काम कर्म योग का यही सिद्धांत गीता हमें बताती है।
    जितनी सरल व्याख्या गीता जी में है, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, अपने कर्म को करिये, न कि दूसरे के कर्म की ओर हम देखें,
आपका जो भी कर्म है, वह पूर्ण ईमानदारी से करिये, यही गीता का मूल मंत्र है। 
विशेष:- अपने नित्य कर्म को पूर्ण ईमानदारी   व निष्ठा पूर्वक करना, इतना सरल संदेश हमें गीता जी प्रदान कर रही है, यह सभी के लिये उपयोगी व कालजयी ग्रंथ है, जिसे अगर हम सही तरीके से समझ जाये, तो फिर संशय की कोई बात ही नहीं उत्पन्न होती, अपने अपने कर्म को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से करने का संदेश गीता जी हमें प्रदान करती है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
 आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, स्पंदन या तरंग पर, यह एक सूक्ष्म विज्ञान है, स्पंदन यानी किसी भी जगह या मनुष्य के भीतर या वहां पर वातावरण में जो भी स्पंदन या तरंगे विद्यमान है, वह किस प्रकार की है।
       सकारात्मक ऊर्जा है या नकारात्मक ऊर्जा है, किस प्रकार के स्पंदन वातावरण में व्याप्त है, यह निष्कर्ष ध्वनि जो वहां पर है, भले ही वह सूक्ष्म रूप में ही क्यों न हो, उस वातावरण की ऊर्जा को बदलने की अचूक सामर्थ्य रखती है। 
     जब साधारण रूप से कहे शब्दों का हमारे ऊपर प्रभाव होता है, तो सूक्ष्म ऊर्जा जो किसी भी वातावरण में है, वहां की ऊर्जा को नकारात्मक या सकारात्मक कर सकती है। 
      यह एक गहरे शोध का विषय है, पर सामान्य रूप से भी बातचीत द्वारा हम कौन सी ऊर्जा उत्पन्न कर रहे हैं, व अगर मौन भी है, तो कौन से स्पंदन हमारे भीतर चल रहे है,
हमारे भीतर सूक्ष्म तरंगे तो चल ही रही है, 
उन्ही तरंगों को हम किस प्रकार से सकारात्मक तरंगों में परिवर्तित करें, यही हमारा प्राचीन विज्ञान व दर्शन हमें बताता है। 
      आंतरिक ऊर्जा का परिवर्तन हम शनै शनै हमारे अभ्यास द्वारा कर सकते हैं, इसे हम विज्ञान या कला दोनों ही कह सकते हैं, यह दोनों का समन्वय है।
       इसे हम परा विज्ञान भी कह सकते हैं, कोई भी मंदिर या स्थान एक दिन में सिद्ध स्थल नहीं बन जाते हैं, वहां पर निरंतर पूजा -पाठ, 
हवन, आरती आदि नियमित किये जाते हैं,
जिससे वहां का वातावरण ऊर्जामय  हो जाता है, यही प्रक्रिया अगर हम अपने घरों में दोहराते हैं, तो घरों की ऊर्जा भी जो है, वह संतुलित होने लगती है। 
      निरंतर चलने वाली यह प्रक्रिया किसी भी स्थान या वस्तु या अपने आसपास के वातावरण को बदलने की एक अद्भुत सामर्थ्य रखती है, इस विज्ञान से हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षि भली भांति परिचित थे, भारतीय संस्कृति की गहराई को अगर हमें वास्तव में समझना है, तो हमें सूक्ष्म तरंगों पर कार्य करना होगा, हम स्वयं भी निरंतर अभ्यास द्वारा अपने  आप को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर सकतेहैं, हमारा शरीर कई प्रकार की ऊर्जाओं का एक जोड़ है, जब हमारा जन्म हुआ, उस समय जब हम मां के गर्भ में थे, तब जो ऊर्जा हमारे 
भीतर बन रही थी, बाद में जब जन्म हुआ तो हमारे आसपास भी भिन्न ऊर्जा वाले व्यक्ति, 
वस्तु के संपर्क में हम आते हैं, अपने जीवन काल के दौरान हम कई प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही ऊर्जाओं के मध्य अपना जीवन जीते हैं।
      हम अपनी आंतरिक ऊर्जा को तो निश्चित ही परिवर्तित कर सकते हैं, यह हमारे स्वयं के नियंत्रण में है, परंतु बाह्य ऊर्जा जो वातावरण से, परिवेश से, अनेक अन्य विचारों से, हमारे आसपास घट रही है, उस पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं होता। 
    हमारा जीवन व यह शरीर स्पंदनो को समझता है, यह समस्त ब्रह्मांड एक स्पंदन है, 
इसमें सभी प्रकार की ऊर्जा है, हम उनमें से किस ऊर्जा से संपर्क स्थापित करते हैं, या करना चाहते हैं, हम उसे ही जाने- अनजाने में आकर्षित करते हैं, बस यही समस्त ब्रह्मांड का सूक्ष्म व विराट दोनों ही स्वरुप है।
      सूक्ष्म से विराट, विराट से सूक्ष्म, हम इस ऊर्जा को किस प्रकार से देखते हैं, यह हमारी अपनी दृष्टि भी हो सकती है।
      प्राचीन महर्षियो ने गहरे शोध के बाद कई बातों को स्थापित किया, हो सकता , हम उन रहस्यो से परिचित नहीं है, पर सत्य है या असत्य, यह तो हमें निरंतर उस चेतना से जुड़ने पर ही प्राप्त हो सकता है।
          मगर स्पंदन की जो भाषा है, आप किसी के लिए भी आंतरिक रूप से अच्छा या बुरा जो भी भीतर से सोचते हैं, वह अंततः कार्य करता तो है।
        इतना तो मैंने स्पंदनों पर कार्य करने के बाद महसूस किया है, सूक्ष्म में जो चलता है, 
अंत में वहीं घटता है, क्योंकि उसके बीज हमारे भीतर विद्यमान थे, व उन्हें  उचित वातावरण अगर हमने प्रदान किया, तो वे निश्चित ही एक समय बाद  वे प्रस्फुटित होंगे 
ही।
         मेरा यह आलेख आप सभी को पसंद आयेगा, ऐसा मेरा मानना है, जो भी मैंने आंतरिक रूप से महसूस किया है, वही मैंने 
शब्दों के रूप में लिखा है। 
    आप सभी का दिन मंगलमय  व ऊर्जा पूर्ण हो, सभी के जीवन में समृद्धि आंतरिक व बाह्य दोनों ही प्रकार की, भौतिक व आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समृद्धि जीवन में बढ़े।
       सूक्ष्म स्पंदनों के साथ हम  इस लेख को आज विराम देते हैं, शेष फिर ।
     विशेष:- स्पंदन हम चाहे या न चाहे, अपना कार्य करते ही है, परिवार से ,व हमारे जन्म से 
जो भी हमें प्राप्त हुआ, पूर्व जन्म, इस जन्म वह आगे अभी हम क्या कर रहैं हैं? कितने प्रकार के विभिन्न स्पंदनों के मध्य हमारी यह
जीवन यात्रा चल रही है, किन स्पंदनों की और हम आकर्षित हो रहे है, कुछ तो हमारे हाथ में
हैं, कुछ हमारे हाथ नहीं भी है, इस प्रकार यह एक मिला-जुला स्वरूप है। 
      वैसे गहरी आत्म शक्ति द्वारा हम अपने पूरे जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं, अगर हम इसे सही रूप में समझ सके तब। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद, 
वंदे मातरम्।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      हम सभी उस विराट के अंश है, हम चाहे अथवा न चाहे, माने अथवा न माने, कुछ चीजें हमारे हाथ में है, कुछ नहीं। 
      यहीं पर हमें श्रीमद् भागवत गीता को सही अर्थों में समझने की आवश्यकता है।
     यहां भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से इसकी व्याख्या करते हैं, वह कर्म की महत्ता को समझाते व कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए 
श्रीमद् भागवत गीता में स्पष्ट घोषणा करते हैं,
की स्वधर्म का पालन हीं सबसे अधिक उत्तम धर्म है, न कि पर धर्म का।
     स्पष्ट रूप से वे कहते हैं, कि आपका जो भी कर्म है, वह गुण दोष से युक्त हो सकता है, 
जैसे अग्नि में धुंआ, सूर्य में अत्यधिक ताप,
जो भी गुण धर्म जिस भी वस्तु या जीव के है,
वे स्वाभाविक है। 
      यहां पर मनुष्य योनि सर्वोपरि इसलिये कही गई है, कि वह विवेकपूर्ण ढंग से अपने जीवन को जी सकता है, उसे किस प्रकार का जीवन जीना है, वह यह तय कर सकता है, 
मनुष्य में कई प्रकार की पूर्व जन्म से प्राप्त धारणाएं व इस जन्म के कर्म सभी का फल उसे प्राप्त होता ही है। 
    निज कर्तव्य को भगवान  श्रीकृष्ण सर्वोपरि  मानते हैं, फिर भी वह गीता जी में 
तीन मार्ग निष्काम कर्म मार्ग, सांख्य योग व भक्ति योग तीनों का ही विवेचन करते हैं, तीनों ही मार्ग मुझ तक आते हैं, यह वह स्पष्ट वर्णन करते हैं, परंतु आपका स्वभाव किसके अधिक अनुकूल है, वह मार्ग आपके लिए श्रेष्ठ है, कर्म सिद्धांत को  सर्वश्रेष्ठ घोषित इसलिये करते हैं,
क्योंकि यह सबसे सरलतम सिद्धांत है, कोई भी जीव कर्म करे बिना रह ही नहीं सकता, तो उन्होंने निज कर्तव्य को श्रेष्ठ कहा।
      इसकी सही व्याख्या हम इस प्रकार कर सकते हैं, जैसे कोई इंजीनियर है, कोई डॉक्टर है, कोई राजनेता है, अध्यापक है, विद्यार्थी है, 
धर्म का उपदेशक है, तब जो भी उसका निज कर्तव्य जो उसने चुना है, या प्रारब्ध वश उसे प्राप्त हुआ है, उसे पूर्ण निष्ठा व मनोयोग पूर्वक वह करें। 
         इतने मात्र से भी हम अपने जीवन में संतुलन ला सकते हैं, व ईश्वरीय कृपा के पात्र बन सकते हैं।
       गीता में निज  कर्तव्य को वे सर्वोपरि मानते हैं, व इसी और वह जगत को प्रेरित करते हैं, क्योंकि यह बड़ा ही सरल व सुलभ मार्ग है, इसमें साधारण शब्दों में गहरी बात कही गई है, इतनी सरलतम व्याख्या भी अगर हम नहीं समझ पाये तो फिर इसमें भगवान का भी क्या दोष?  वे तो सदैव प्राणी मात्र के हित का ही चिंतन करते हैं।
         फिर वे सांख्य योग का भी वर्णन करते हैं, पर वे उसमें कहते हैं व्यक्ति को अपनी अहंकार भाव का व देह के अभिमान का भी 
पूर्णतः त्याग करना होगा, यह मार्ग थोड़ा कठिन होने से वह कर्मयोग को ज्यादा सहज मानते हैं, एक और भक्तिमार्ग का भी विवेचन में करते हैं, वह कहते हैं, तू जो कुछ भी करता है, वह मेरे अर्पण कर दे, नित्य मेरे नाम का
सुमिरन करते जा, नित्य उनका सुमिरन करने से फिर धीरे-धीरे भाव शुद्ध होने लगेंगे, और यह भक्तिमार्ग से भी संभव है।
      आपका चित्त व शरीर किस प्रकार से बना है, इन तीनों मार्ग में से आपके स्वभाव 
के अनुसार आपको कौन सा मार्ग अधिक अनुकूल प्रतीत होता है, वह आप अपना सकते हैं, मार्ग तीनों ही सही है, पर भगवान  श्री कृष्ण ने निष्काम कर्मयोग को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया, उन्होंने निज कर्म जो आपने चुना है, या  प्रारब्ध वंश आपको प्राप्त हुआ है, उसे आप पूर्ण ईमानदारी व निष्ठापूर्वक करें, बस यही श्री कृष्ण जी का 
संदेश है, और यह कालजयी है, सदा शाश्वत है।
     भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, आप अपना  कर्म निष्ठा पूर्वक करें वह उसके फल का भार मुझ पर छोड़ दे, अपने अहं भाव का त्याग करें,
चाहे वह कर्मयोग, सांख्य योग, भक्ति योग 
किसी भी माध्यम से हो, निज कर्तव्य को 
निष्ठापूर्वक करने की बात कहता है। 
     हमें इसी जीवन में ईश्वर का सामीप्य प्राप्त हो सकता है, अगर हम  निष्काम भाव से कार्य करने की प्रेरणा श्रीमद्भगवतगीता से प्राप्त करें। यह एक कालजयी  ग्रंथ है, और बहुत ही सरल ,सहज रूप में कर्म सिद्धांत की इसमें व्याख्या की गई है। 
    निज  कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक करना ही इसका मुख्य संदेश है।
विशेष:- अपने-अपने कर्म को पूर्ण निष्ठा व
ईमानदारी पूर्वक हम करें, अहंकार भाव का त्याग करें, समर्पण व निष्ठापूर्वक अपने कार्य को करें, बस इतने मात्र से भी आप उनकी कृपा के पात्र बन सकते हैं, अपने कर्तव्य को करें व परिणाम की चिंता उस प्रभु पर छोड़ 
 दे, यही गीता -सार है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदेमातरम्।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
         परम वन्दन, आप और हम सभी उसी के आश्रय में है, यह चराचर जीव जगत इस एक सत्ता के आश्रय में है।
        वे प्रभु कभी किसी को, कभी किसी को
निमित्त बनाकर कार्य करते हैं, मगर उनकी कृपा को समझ पाना हमारे बस में है नहीं,
वे जैसे चाहेंगे  इस संसार सागर में आपकी गति को उधर ही मोड़ देंगे, जिसमें आपका हित  हो, जब हम उनकी अनन्य शरण हो जाते हैं, तो वह लीलामय प्रभु भी फिर अपनी कृपा हम पर बरसाने लगते हैं।
          जो परम भक्ति -भाव से, पूर्ण श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण करते हैं, तो वह हमें अधोगति से निकालकर परम गति की और 
हमें चलाने लगते है।
     वह जब चाहे, तब संपूर्ण सृष्टि को आपके अनुकूल बना सकते हैं या फिर प्रतिकूल भी बना सकते हैं। 
    कब क्या घटता है? केवल वे  ही जानते हैं,
हम सब तो केवल अपना- अपना दायित्व निभाते हुए उनकी शरणागत होकर रहे, नित्यप्रति जो भी परम मंगल भाव से वंदन करता है, उनकी शरण में रहकर जो कार्य करता है, वह इस भवसागर में तो मुक्त हो ही जाते हैं, उनके कृपा -आश्रय में होने से   प्रतिकूलताएं भी अनुकूलताओं में बदल जाती है। 
       अपनी समस्त सफलताओं का श्रेय हमें उनके श्री चरणों में ही डाल देना चाहिये, वह जिसको भी अपनी मंगल शरण में लेते हैं, उसे फिर कभी भी वह नहीं छोड़ते, संसार में सभी हमसे केवल अपने अपने -अपने स्वार्थो की
पूर्ति हेतु ही हमसे बंधे होते हैं, मगर वह परमात्मा बिना किसी स्वार्थ के अपनी कृपा हम पर बरसाते हैं, निमित्त वे जिसे चाहे, उसे बना दे। 
      वे कृष्ण, कन्हैया, गिरधारी हम सभी की लाज रखने वाले हैं, वे बालकृष्ण, नटखट है, इस प्रकार उनकी चंचलता व नित्य मधुर होठों पर सदैव मुस्कान को वे धारण करने वाले हैं।
उनकी मुस्कान अति प्रिय व मधुर है, वह स्वयं भी बड़े ही मधुर है।
      वह अपनी दिव्य शक्ति व माधुर्य से इस संपूर्ण जगत का संचालन कर रहे हैं, उनकी कृपा नित्य बरस रही है, मंगल कर रही है। 
      परम मंगल को प्रदान करने वाले, प्राणी मात्र को शरण में रखने वाले, परम माधुर्य जिनकी वाणी में है। जो चातुर्य से पूर्ण है, जो समस्त मंगल कामनाओं को पूरा करने वाले हैं
उनकी नित्य कृपा से ही सब कार्य पूर्ण हो रहे हैं, वही संसार के समस्त सुख वैभव को प्रदान करने वाले हैं, मंगल शरणागति द्वारा ही हम उनकी कृपा को पा सकते हैं, कोई भी अन्य उपाय नहीं है ।
        इस संसार चक्र में हम सभी हैं, केवल उनकी मंगल कृपा के सिवा कोई भी अन्य द्वारा नहीं है। 
       सद्गुरु सबका मंगल करें, सब पर कृपा करें, वे परमात्मा सब पर कृपा करें, यही मंगल भाव, उनके श्री चरणों में हमें लेकर आता है। 
      हे परम पिता, परमात्मा, अगर हम यह समझते हैं, तो हम भूल कर रहे हैं, वह हमसे जो कार्य करवाना चाहता है, उसने हमें माध्यम बनाया है, यह उसकी मंगल कृपा ही तो है। हम जैसे कितने ही इस संसार में आए व गये,
मगर जिस पर उसकी कृपा बरसी, वह इस संसार सागर में रहते हुए भी उनकी कृपा से मुक्त हो गया। 
      वे प्रभु समय-समय पर किसी का मान बढ़ा देते हैं, कभी मान घटा भी देते हैं, वे जो भी करते हैं, भेद केवल वहीं जानते हैं, अगर सब कुछ हम जान ले तो फिर उस विराट सत्ता को कौन मानेगा?  वे सबका मान रखने वाले हैं।
 विशेष:- हम सभी का जीवन एक नौका की भांति है, हम सब संसार -सागर में है, वह उनकी कृपा बिना हम एक पग भी नहीं चल सकते, उनके मंगल कृपा में रहे, आनंद में रहे, 
अपने प्रयास करते रहे, शेष परमात्मा पर छोड़ दे। आपका हित किस मे छिपा है, वे ही जानते हैं ।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 

  

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
            आप सभी को मंगल प्रणाम, प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में आप सभी का हृदय से स्वागत।
      आज हम बात करेंगे, आत्म शक्ति पर, हमारी आत्म शक्ति ही, हमें संघर्ष जीवन के जो भी हमारे सामने उपस्थित होते हैं, उन संघर्षों 
 में हमें विजय श्री प्रदान करते हैं, स्थितियां चाहे कितनी ही प्रतिकूल ही क्यों न हो, प्रबल आत्मविश्वास हमें उन सभी से पार करता है, 
            प्रबल आत्क्तिमविश्वास द्वारा ही हम परिस्थितियों का सामना करते हैं, अपनी आंतरिक शक्ति को हम कभी भी क्षीण न होने दे, वह आत्म शक्ति ही हमें समझ प्रदान करती है, धैर्यता देती है।
       अनुकूल परिस्थितियों सदैव नहीं होती, 
प्रतिकूल परिस्थितियों भी सदैव नहीं होती,
अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियां जायेगी, समय ने जो लिख रखा है, वह तो अवश्य घटेगा, घटनाक्रमों से विचलित न होते हुए अपने प्रयासों में निरंतरता बनाये रखें।
          बुद्धि पूर्वक, श्रद्धा पूर्वक, मनोयोग से हर पहलू को हम देखें, जांचे, परखे, फिर हम आगे बढ़े, व्यवधान कोई भी हो, अधिक समय तक वह रहने वाला नहीं, किसी भी निर्णय को लेने से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार करें, तो हम निर्णय ले सकेंगे। 
     अगर हमारी दिशा सही है, तो प्रयत्न करते रहने पर हमें परिणाम अवश्य प्राप्त होंगे।
  कर्म की गति बड़ी ही गहन हैं, आप और हम कई बातों का निर्धारण नहीं कर सकते, कई कर्म सूक्ष्म होते है, कई कर्म हम जानते ही नहीं, सही है अथवा नहीं?    फिर भी हम कर देते हैं, इस प्रकार हम काल व परिस्थितियों के आधीन होते हैं, कई बार हमें सब पता होता है, पर हम विरोध करने की स्थिति में नहीं होते हैं।
     इस कलि- काल में केवल नाम सुमिरन ही हमें समस्त प्रकार के तापों से मुक्त कर सकता है, अन्य कोई भी उपाय है ही नहीं।
     भगवान  का नाम सुमिरन करने पर हम आंतरिक रूप से जागृत होते हैं, हमारे द्वारा 
फिर  कोई गलत आचरण नहीं होगा ,
क्योंकि परमात्मा का नित्य सुमिरन हमें धीरे-धीरे सही मार्ग की और ले जाता हैं, जिससे हमारा जीवन-पथ आलोकित होने लगता है।
        जिनकी कृपा मात्र से अनेकों प्रकार के
संकट स्वमेव हटने लगते हैं, परमात्मा हमें स्वयं प्रेरित करने लगता है, वह अपने भक्तों पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं, जो आंतरिक भाव से प्रभु से जुड़ जाता है, उसकी सारी समस्याएं फिर प्रभु स्वयं हल करने लगते हैं, निस्वार्थ भाव से उनका सुमिरन अत्यंत ही मंगलकारी होने लगता है।
      नित्यप्रति उनकी मंगल शरण में रहने से फिर सब मंगल ही होगा , ऐसे परमेश्वर की हम नित्य शरणागति हो, उनका परम वंदन करते रहे। अपने नित्य कर्तव्य कर्मों को करते हुए भी हम उनका लीला गान करते रहे, यही एकमात्र मंगल उपाय है, जो हमें हर प्रकार के दोषो से रहित करता जाता है।
         हमारे सारे कर्म उसकी मंगल कृपा से भस्म हो जाते हैं, जीवन हैं, तब तक हमें जीना तो होगा ही, युक्ति युक्त तरीके से, उनकी मंगलमय शरणागति होकर रहे, उनके मंगल आश्रय में  रहे।
       जो भी घटे, वह उनकी असीम अनुकंपा से घटे, मंगल हो या अमंगल, जो भी प्रभु की इच्छा हो, वह हो, ऐसी अनन्य शरणागति भाव से जीवन की  डोर हम उनसे बांध ले।
       आत्मबोध हो जाने पर फिर हम चाहे गृहस्थाश्रम में हो, अपने निजी कर्म को करें,
कहीं भी रहे, परम कृपा शरण  में रहे।
    नित्य उनकी मंगलमय कृपा का अनुसरण करते रहे। 
     नित्यं ध्यायंते योगिन:, योगी  जन  जिनको नित्य भजते हैं, भक्तजन जिनकी कृपा का सदैव अनुभव करते हैं, कर्मयोगी अपने कर्म द्वारा जिनका मंगलमय आचमन करते हैं,
इस प्रकार इस संसार सागर को पार करने में हम सक्षम नहीं, उनकी मंगल कृपा का नित्य अनुभव करते रहे, सांसों में वह बसा है, हर क्षण उसका मंगल सुमिरन चलने दे।
       परमात्मा का सुमिरन करते रहें, उसकी कृपा सदैव बरस रही है। 
विशेष:- अपनी आंतरिक आत्म शक्ति को कभी भी क्षीण न होने दे, संसार में जो भी सफल हुआ है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो,
उसकी मंगलमय कृपा आधार बिना कुछ संभव ही नहीं है, परमेश्वर आप सभी पर कृपा करें, हम सभी चाहे या ना चाहे, उसके आधीन है, जो भी घटे, वह मंगल ही घटे, यही मंगल कामना। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद, 
जय भारत, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
       हम सभी उसी एक परमपिता के अंश है,
माया के आवरण के कारण हम यह समझ नहीं पाते हैं, भौतिक सुख सुविधाओं की अत्यधिक चमक वह बहुलता ने मानो हमारे भीतर की शुद्धता भीतर तक नष्ट कर दिया है,
इस विश्व में हम सभी किसी न किसी रूप में 
एक दूसरे पर आश्रित है, यह संपूर्ण ब्रह्मांड भी एक दूसरे से सहयोग करता हुआ चालित हैं,
यही परम सत्य है, जिसे हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपने अर्थबोध द्वारा जान लिया था, फिर सर्वसाधारण के लिये उन्होंने उसे रहस्य को ग्रंथो व पुराणों में विभिन्न श्रुतियों के माध्यम से कहा।
      परंतु जो ऋषि या मनीषी उसके मूल स्वरूप को जान गये, उनकी बातों को बाद में अपनी बातें मिलकर इसका मूल स्वरूप बदल दिया गया, और यहीं से मनुष्य का चातुर्य, जो वह करना चाहता है, उसे किस प्रकार से मोड़ना है, वह करने लगता है। 
    यह सृष्टि अनंत काल से अपने ही स्वाभाविक नियमों पर ही कार्य करती आ रही है, इसमें तनिक भी संशय  नहीं है।
     भौतिक आवरण अधिक गहरा होने से हम उसे तथ्य को स्पर्श ही नहीं कर पाते हैं, जो की परम चेतना से आबद्ध है।
       कथन भी है सत्यम, शिवम, सुंदरम 
सत्य ही शिव है, और शिव ही सुंदर है।, 
     उसकी कृपा के विविध रूप हमें प्रकृति की उदारता में देखने को मिलते हैं, कैसे वह सहज रूप से सभी का पोषण करती है, किसी से भी भेदभाव नहीं करती। 
      यही तो उसका परम रहस्य है, वह इसका आशय जो भीतरी गहराई में जाकर समझ जाता है, वह इस संसार सागर को जीता हुआ भी इसमें लिप्त नहीं होता, उस परम आश्रय  की शरण में  वह अपना जीवन चलाने लगता है।
        वह समान रूप से सभी का भरण पोषण करता है, वही अविनाशी सत्ता, जिसका कभी भी विनाश नहीं होता, युगों युगों से स्वचालित होकर सब की रक्षा कर रही है। 
       आंतरिक शांति हमें तभी प्राप्त हो सकती है, जब हम उसके परम आश्रय के भीतर चलते हैं, अपने हदय में  उस अविनाशी सत्ता 
को जिसने भी स्थान प्रदान किया, फिर उस परमात्मा के द्वारा वह निमित्त बन जाता है, और फिर उसके द्वारा वहीं घटता है ,जो वह चाहता है, हम सभी एक निमित्त हैं, कौन कब, कहां ,क्या भूमिका निभायेगा, वह तय करने 
वाला भी है, और प्रेरणा प्रदान करने वाला भी। 
     क्या कारण है?  हम चाह कर भी वह नहीं कर सकते जो हम चाहते हैं, हम वही करते हैं जो वह चाहता है, यह बहुत ही सूक्ष्म भेद है,
कुछ तो ऐसा अवश्य है, जो हम सभी की समझ के बाहर है। 
      हम जन्म लेते हैं, एक दिन मृत्यु को प्राप्त होते हैं, मगर इन सब के मध्य का जो जीवनकाल है, वह हमारा अपना है, हम उसे किस प्रकार गुजारते हैं, इस पर ही हमारे भविष्य की नींव है। 
      बुद्धिमानी पूर्वक जगत को हम कैसे जिये,
जब हम यह कला जान लेते हैं, तो हमारे बहुत सारे संशय स्वयं चिन्ह भिन्न हो जाते हैं।
       कोई भी कर्म एक दिन में पूर्ण नहीं होता, एक लंबी प्रक्रिया होती है, उसके उपरांत ही कुछ घटता है, उसके आरंभिक बीज तो हमारे अवचेतन मन में पहले से ही पढ़ चुके होते हैं, जैसे-जैसे हमारी आंतरिक चेतना जागृत होती है, हमें भीतर से आंतरिक शांति का अनुभव होने लगता है। 
       भौतिक संसाधनों का कब, कैसा , कहां क्या उपयोग करना है, भावनात्मक रूप से कब हमें प्रभावित होना है? यह हमारी समझ में आने लगता है, और यह समझ में आ जाना भी उनकी कृपा का ही एक रूप है, जिसे जितने सही रूप में हम समझते जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन आसान होने लगता है, जीवन की जो भी गांठे हैं, वह सुलझने  लगती है, धीरे-धीरे हम महाप्रयाण की ओर बढ़ने लगते हैं।
     शनै- शनै हम परमात्मा की कृपा को जीवन में अनुभव करने लगते हैं, उसकी कृपाल के हम पात्र बन जाते हैं, फिर वह जो भी भूमिका हमें प्रदान करें। 
विशेष:- हम सभी उसी के परम आश्रय में है,
           उसकी कृपा के बिना जीवन में कुछ घटता ही नहीं, बस हम उसकी कृपा के पात्र बने रहे, बस यही विनय हम करते रहे, फिर जो भी होगा, वह उसकी कृपा से ही घटेगा।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।



प्रिय पाठक गण, 
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    प्रवाह की इस मंगलमय अद्भुत यात्रा में
आप सभी का स्वागत है, दीपावली पर्व की शुरुआत हो चुकी है, यह हमारा भारत देश है,
जहां पर हमारी संस्कृति का ताना-बाना ही
कुछ इस प्रकार से गूंथा गया है, कि हमें हर माह में कुछ न कुछ त्यौहार अवश्य मिलेंगे, इसके पीछे जो भी हमारे मनीषी ,ऋषि विचारक हए, उनका मुख्य उद्देश्य यही था,
हम जीवन को उत्साहपूर्वक, आनंद पूर्वक जिसमें, उसे ऊर्जा को जो हमें परम पिता से,
परमेश्वर से प्राप्त हुई है, नित्य प्रति उन त्योहारों व उत्सव के माध्यम से हम पुनः सृजित करते रहें।
       इसी क्रम में दीपावली का यह अनूठा दीपों से सजा पर्व हम मनाने जा रहे हैं।
    इसकी शुरुआत धनतेरस से होने जा रही है, फिर रूप चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा वह इस पर्व है जो अंतिम दिवस है, वह भाई -दूज के रूप में मनाया जाता हैं,
     इस प्रकार यह पांच दिवसीय पर्व संपूर्ण 
भारतवर्ष में उत्साह से मनाया जाता है, यह 
पर्व अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व भी है।
लक्ष्मी पूजन अमावस्या के दिन होता है, जिस समय चंद्रमा क्षीण होता है, मगर हम इतने सारे दीपक लगाकर उस अंधकार को दूर कर देते हैं, इस प्रकार से यह पर्व हमें अपने मन के
अंधकार प्रकाश की विजय को बताता है।
      धनतेरस से शुरु हुआ यह पर्व हमें धन की महत्ता को बताता है, धन केवल रुपया पैसा ही नहीं, हमारा स्वास्थ्य भी हमारा धन है, इस दिन आयुर्वेद के जनक धन्वंतरी भगवान के  पूजन की परंपरा भी है।
      फिर आती हैं रूप चौदस, इस दिन उबटन लगाकर सभी अपने रूप को निखारते हैं, फिर आता है मुख्य दिन, लक्ष्मी पूजन का दिवस, 
इस दिन हम सभी अपनी संस्कृति व परंपरा अनुसार माता लक्ष्मी का पूजन करते हैं, 
      इसके उपरांत गोवर्धन पूजा आती है, 
यह देश अभी भी कृषि प्रधान देश है, तो इसलिए गौ माता व बैलों की की पूजा की जाती है, आज भी गांव में बड़े उत्साह से उन्हें सजाया व संवारा जाता है।
     फिर अंतिम दिवस हम भाई दूज के रूप में
इस मंगलमय त्यौहार की पूर्णाहुति करते हैं,
इस दिन बहनें अपने भाइयों के जीवन की मंगल कामना करते हुए उन्हें अपने घर भोजन हेतु आमंत्रित करती है, स्पीकर भाई वह बहन के स्नेह वह सद्भाव से इस मंगलमयी में त्यौहार का समापन होता है।
   हमारी भारतीय संस्कृति तीज त्योहारों के माध्यम से हमें ऊर्जा प्रदान करती है, यही इन त्योहारों का  मुख्य उद्देश्य है, नित्य उल्लास से हम अपने जीवन को जिये, हमारी संस्कृति हमें यही संदेश प्रदान करती है। 
  आप सभी को दीपावली पर्व के इस पांच दिवसीय मंगलमयी पर्व की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं,
  आइये ,हम हमारी इस संस्कृति पर गर्व करें,
जिसने हमें उल्लास पूर्वक जीना सिखाया। 
पुनः आप सभी को दीपावली पर्व की अनंत अनंत हार्दिक शभकामनाएं।
विशेष:- दीपावली का पर्व मानो हमें यह संदेश प्रदान करता है, अंधकार कितना भी घना हो, 
प्रकाश की किरणों से हम उसे दूर कर सकते है, हमारे अच्छे सद्विचार भी हमारे लिए प्रकाश का ही कार्य करते हैं, शुभ संकल्प करें, और उसे पर दृढ़ता पूर्व अमल करें, इन्हीं मंगलमयी व शुभ भावों के साथ आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
उस परमपिता को भी मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, लयबद्धता, यह संपूर्ण सृष्टि एक दूसरे से लयबद्ध है, यहां कुछ भी अकारण नहीं होता, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक दूसरे पर निर्भर है, इसमें कोई स्थिर है ,व कोई चलता है, मगर उनका अनुपात तय है, सब अपनी-अपनी सीमाओं में अपना कार्य करते हैं, सूर्य नित्य प्रतिदिन जिस प्रकार से आता है, वह तय है, चंद्रमा 15 दिन बढ़ता है, 15 दिन  घटता है, से कृमश: हम शुक्ल पक्ष और कृष्ण के नाम से जानते हैं, इसी प्रकार मंगल ,बुध, राहू, केतु, गुरु, शुक्र 
इत्यादि सब ग्रह समय-समय पर अपना प्रभाव दिखलाते हैं, यह जो हमारा शरीर है, यह भी संपूर्ण ब्रह्मांड का एक छोटा सा अंश है, हम चाह कर भी ब्रह्मांड किसी गतिविधि से अलग नहीं हो सकते, यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक दूसरे से
ओत-प्रोत है, भले ही हमें इसकी लयबद्धता का पूर्ण ज्ञान न हो, मगर इसके अपने नियम है अवश्य, और  यह उन्हीं नियमों पर कार्य करता है।
     हम कितना भी प्रयत्न कर ले, वह ब्रह्मांड अपने हिसाब से ही कार्य करता है, कब किस समय क्या होना है, किस प्रकार से घटना है, वह सब हमारी सोच से भी परे है, कुछ विधान हम नहीं जानते, मगर वह होता उसी लयबद्धता से है, सृष्टि का यह कम आदिकाल से चलता आ रहा है, हमारा संपूर्ण शरीर भी इसी ब्रह्मांड का एक छोटा सा अंग है, अगर हम अपने शरीर पर ठीक ढंग से कार्य करें, तो चुकी हम इसी ब्रह्मांड का एक छोटा सा हिस्सा है, अगर हम अपने शरीर के परिचालन को सीख जायें तो हम स्वयं अपने आप को जानने लगेंगे, जैसे ही हम अपने भीतर की और अग्रसर होंगे, एक दिव्य चेतना हमारे भीतर घटती है, और वह हमें उस संपूर्ण ब्रह्मांड से एकाकार व लयबद्ध कर देती है,
जैसे ही हम उसे दिव्य चेतना के संपर्क में 
आते है, उसे सृष्टि की लय से हमारी लय मिल
जाती है, फिर सहज ही हमारे सारे कार्य होने 
लगते हैं।
अगर हम बहुत गौर से चीजों को समझें, तो जब हम कोई पुराना गीत संगीत सुनते हैं, तो हमें उसकी लयबद्धता का आभास होता है।
क्योंकि वह गीत अपनी संपूर्ण चेतना में रचे गये हैं। यह संपूर्ण संसार एक लयबद्धता के अनुसार ही कार्य करता है, हम चाह कर भी इसके नियमों को बदल नहीं सकते, यही इसकी खास बात है, तो कोशिश करिये हम इस लयबद्धता से एकाकार हो सके। आप और हम सभी कोशिश करें इससे तादात्म्य स्थापित कर सके।
विशेष:- हम चाहे ना चाहे, यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक नियम के तहत चलता है, इसकी अपनी लय है, इसका एक अपना तरीका है, जो प्राचीन वैज्ञानिक या ऋषि हुए, उन्होंने अपने गहन अनुसंधान से जो भी जाना वह हमें दिया। इस बारे में प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं, आप देखिये किस प्रकार वह अपने नियमों पर कार्य करती है, वह किसी से भी भेदभाव नहीं करती, और यही उसकी लयबद्धता है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह की इस यात्रा में आपसे साझा करना चाहता हूं, कुछ विचार या प्रयोग, जो मैंने स्वयं अनुभूत किये हैं, जिनका मुझे जीवन में लाभ प्राप्त हुआ है, इसीलिए आप सभी से इसे साझा कर रहा हूं।
     हम सभी का जन्म कहां होगा, क्या हम तय करत हैं? अगर नहीं, तो फिर कुछ तो ऐसा अवश्य है, जो हमें नहीं पता, द्वितीय हमारी मृत्यु कब व कैसे होगी, हम साधारण जो जीवन जी रहे हैं? हम इसके बारे में क्या जानते हैं? 
     अब कुछ बातें जीवन पर, क्या हम अपनी संपत्ति को अपने साथ ले जा सकते हैं? जवाब होगा नहीं।
    आप कहेंगे धन तो जीवन के लिये आवश्यक है, आज के भौतिक युग में इसके बिना काम नहीं होता, यह भी आज का एक कड़वा सत्य ही है। 
       मगर क्या केवल भौतिक समृद्धि से ही 
हमारा जीवन समृद्ध होगा। 
      हमारा जीवन एक यात्रा है, तो हमें सभी आयामों को पार करना पड़ेगा। 
     भौतिक, आध्यात्मिक, स्वास्थ्य, मान सम्मान, आंतरिक शांति, वैचारिक दृढ़ता, परिषदों के अनुरूप क्या आवश्यक है? इसकी गहरी समझ, अच्छी संतान, अच्छा परिवार, समझदार पत्नी। 
     यह सब अगर हमारे जीवन में है, तो सही अर्थों में हम समृद्ध हैं, तभी हम कह सकते हैं कि हम समृद्ध हैं। 
    तो आप अपने जीवन को स्वयं देखें, इनमें से अगर अधिकतम आपके पास है, तो आप एक समृद्धशाली इंसान है , हमारे सारे कार्य अगर हो रहे हैं? कोई बड़ी बाधा हमारे जीवन में नहीं आ रही है? तो हमारा जीवन आंतरिक शांति से तो भरपूर है। 
     कुछ सूत्र जीवन के,
स्वयं पर पूर्ण ध्यान दें, अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखें, दूसरा हमारे जीवन में हम जो भी धन कमा रहे हैं, वह बुद्धिमत्ता पूर्वक खर्च करें, स्वयं का भरण पोषण, उचित समय पर दान, भविष्य की जरूरते, इन सभी का शुरुआत से ही जीवन में उचित समन्वय रखें। 
         अपने निजी अनुभवों को अपनी शक्ति बनाये, न कि कमजोरी।
       एक राह बंद होती है, तो दूसरी अवश्य खुलती है, मेहनत से कभी न घबराये, चाहे आप नौकरी कर रहे हो या व्यवसाय। 
        नई बातें हमेशा सीखें, सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण हमेशा जीवन में रखें।
     हमारा जीवन एक प्रयोग है, अच्छा प्रयोग 
जब भी करना हो, अवश्य करें। हमें भीतर से उसकी प्रेरणा प्राप्त होगी। 
     कोई भी कौशल जीवन में अवश्य सीखें, 
वह आपकी अपनी निजी संपत्ति हो जायेगी,
धन भौतिक है, मगर हम जब कोई भी कौशल सीखते हैं, वह हमेशा हमारी ताकत बनेगा। 
स्वयं खुश रहें, आनंदित रहे, तभी तो आसपास का वातावरण भी खुशनुमा होगा। 
       आंतरिक शांति पर सर्वप्रथम ध्यान दें, 
अगर हम यह कर पाये तो हमारे अधिकतर निर्णय सही साबित होंगे, क्योंकि आंतरिक शांति होने पर हम उस निर्णय को सही तरीके से समझ सकेंगे, हम यह निर्णय क्यों ले रहे हैं? इसके क्या परिणाम होंगे?
     यह हमेशा हमें जांचते रहना चाहिये,
हमेशा दीर्घकालिक रणनीति जीवन में बनाये,
साथ ही तात्कालिक परिस्थितियों में भी क्या अधिक सही है, सतत अध्ययन करते रहे, इससे आपका निर्णय अधिकतम सही दिशा में होंगे।
    हमेशा प्राथमिकता क्या है? यह हमें अवश्य समझना चाहिये, उम्र बढ़ने पर हमारी प्राथमिकता में परिवर्तन भी आता है, सकारात्मक सोचे, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखें। 
     अपने मित्र कौन है? यह अवश्य हमें पता हो, कौन हितेषी ? व्यवहारिक जीवन में कभी भी हम इस पहलू को अनदेखा न करें।
      अपने जीवन की इस अद्भुत यात्रा का आनंद उठायें, आपस में मतभिन्नता होने पर भी जिस जगह आप निवास करते हैं, उन सभी का सर्वाधिक हित किस प्रकार संभव है, 
इस नीति पर कार्य करें। 
विशेष:- जीवन में अनुभव भी लोगों की सलाह सुने, उस पर गौर करें, अगर उनकी सलाह अच्छी है? और वह हमारी परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त है, तब तो ठीक है, अगर नहीं है, तू विनम्रता पूर्वक सुनने के बाद फिर 
निर्णय करें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद, 
जय भारत, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज विजयदशमी का पावन पर्व है, इस पर्व का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है, कि इसी दिन प्रभु श्री राम ने दशानन यानी रावण पर विजय प्राप्त की थी, इस प्रकार अगर हम देखें, तो यह पर्व अधर्म पर धर्म की जीत का महत्व भी बताता है, अगर हम अपने जीवन में सत्य का आचरण करें, तो वह ईश्वर सदैव हमारे साथ ही होगा, मगर हम केवल कहने मात्र से नहीं, जितना अधिक मात्रा में हमसे हो सके, उतना सत्य का आचरण अगर हम करते है, तो परमात्मा की शक्ति सदैव हमारे साथ होगी, सत्य कहने वाला व्यक्ति भले ही अकेला भी हो, मगर उसके सत्य आचरण की शक्ति बहुत अधिक होती है, हमें परमपिता परमेश्वर से नित्य प्रार्थना करनी चाहिये, वह हमें सत्य मार्ग पर अडिग रखें, हमारी सोच सदैव सकारात्मक हो, कितनी भी  विपरीत परिस्थितियों हमारे सामने हो, मगर सत्य मार्ग का अवलंबन हम कभी न छोड़े, अंततः वह सत्य का मार्ग हमारी राह प्रशस्त करेगा व जीवन में आने वाली किसी भी प्रकार की कठिनाई से हमें लड़ने का साहस प्रदान करेगा, हमारा जीवन जब तक है, विभिन्न प्रकार के संघर्ष हमारे जीवन में अनिवार्यतः आते ही है, हम अपने संकल्प पर दृढ़ रहे,
और परमपिता परमेश्वर से अपने संकल्प पर दृढ़ रहने का नित्य निरंतर आशीर्वाद लेते रहे, 
उसकी कृपा  निरंतर प्राप्त करें, संकल्प बली होने से हमारे व्यक्तित्व में भी निखार आता है, 
कोशिश करें हम जो भी कहे ,सत्य कहें उसका अनुसरण भी करें, क्योंकि सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति की ख्याति भी नित्य प्रति बढ़ती जाती है, जो अपने संपूर्ण जीवन को 
उस परमपिता परमेश्वर की शरण में रहकर जीता है, उनकी नित्य अनुकंपा को सदैव याद करता है, उसका वर्तमान में भी क्षरण नहीं होता, युगों युगों तक उसके आचरण के हम गीत गाते हैं, हम सभी का जन्म ईश्वरीय कृपा की देन हैं, मानव जीवन अनेक योनियों के बाद हमें प्राप्त होता है, इस अमूल्य मानव जीवन को हम सकारात्मक भाव से जिये,
हमारी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्वयं व अपने परिवार के प्रति होती है, राष्ट्र व विश्व भी उसके बाद ही आते हैं, सबसे पहले स्वयं का सुधार, 
फिर परिवार का सुधार, फिर गली, मोहल्ले राष्ट्र व विश्व, इस प्रकार क्रमशः हम अपने जीवन को नित्य अगले पायदान पर चलाते जाये, विषम से विषम परिस्थिति भी अगर आप संकल्प के धनी है, तो विपरीत परिस्थितियों में भी आप विजयी होंगे, अपने सत्य धर्म को कभी न त्यागे, क्योंकि सत्य आचरण से बड़ा कोई शुद्ध नियम है ही नहीं,
जो भी व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है, 
उसकी भले लोग लाख बुराई भी करें, मगर वे भी जानते हैं, की सत्य हमें कहां से प्राप्त होगा, हां ,मगर सत्य का अनुसरण करते समय हमारा भाव किस प्रकार का है, उसका हेतु क्या है, वह भी एक महत्वपूर्ण व विचारणीय विषय है, अगर हमारे सत्य से समाज का हित होता है, तो वह सत्य निश्चित  ही अनुकरणीय है, आप सभी को विजयादशमी पर्व की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं, परमपिता परमेश्वर सभी के जीवन में मांगल्य लाये।
इन्हीं शुभ  व सुंदर भावो के साथ पुनः आप सभी को विजयादशमी पर्व की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।



प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आज गणेश चतुर्थी का पावन पर्व, और योग संयोग ऐसा अद्भुत है, कि बुधवार को गणेश चतुर्थी आ रही है, गणेश जी  को प्रथम पूज्य कहा गया है, वह हमें बुद्धि प्रदान करते हैं,
उनका शीश बड़ा है, वे विचारवान है, उनके कान बड़े हैं, वे सब को धैर्य से सुनने वाले हैं, 
सुनते वे सबकी है, मगर धैयपूर्वक अंतिम फैसला बुद्धि से करते हैं, हिंदू धर्म ग्रंथो में 
उनका प्रथम स्थान है,  मनुष्य में बुद्धिमत्ता जगाने वाले हैं, अगर हममें बुद्धि ही  जागृत नहीं होगी, तो हम लौकिक या पारलौकिक दोनों ही कार्यों में असफल हो जायेंगे, जो भी बुद्धिमान हैं, वह अपने समस्त कार्यों का आरंभ उनके श्री चरणों का वंदन करके करते हैं, वे प्रथम पूज्य हैं, और वे प्रथम पूज्य इसलिए भी हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है,
वे त्वरित निर्णय करने वाले हैं , जिस किसी 
भी व्यक्ति में बुद्धि जागृत नहीं होती, वह फिर कोई भी सही निर्णय करने में सक्षम नहीं होता,  बुद्धि का जागरण करने वाले, प्रथम पूज्य, श्री गणेशजी के चरणों में सादर वंदन, 
जो भी सच्चे हदय से उनकी शरण में आता है, उसे वे बुद्धि, खास तौर से व्यवहार कुशल भी वे बनाते हैं, ऐसे सभी भक्तों को अपनी शरण में लेने वाले गणेश जी की आरती  ही इस प्रकार प्रारंभ होती है, मंगल मूर्ति मोरया, वे मंगल की मूर्ति है, वे मंगल को ही प्रदान करने वाले हैं,  जीवन में बुद्धि और शौर्य दोनों प्रदान करने वाले हैं, जिसके जीवन में विनम्रता है, उसके लिये फिर कुछ भी कठिन नहीं, जो भी विनम्र हैं, वह सभी समस्त लोगों के बीच में अपनी विनम्रता के कारण भी लोकप्रिय हो जाते हैं, ऐसे प्रथम पूज्य, श्री गणेश जी की 
स्थापना आज हर घर में ,गली में, सार्वजनिक गणेश उत्सव के रूप में, एक आल्हाद सबके मन में जगाती है, आज से कई वर्ष पूर्व स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक, उन्होंने सभी को एकजुट करने के लिये इस सुंदर उत्सव की शुरुआत की, हमारा संपूर्ण भारतीय  दर्शन उत्सव प्रिय है, इसमें पल-पल पर त्यौहार है, जो हमें यह सिखाते हैं, उत्साहपूर्वक जीवन जीना, यही सबसे उत्तम धर्म है, हर समय प्रसन्न चित्र रहकर , सभी परिस्थितियों का सामना करते हुये समस्त समाज को एकजुट बनाये रखना, ऐसा यह उत्तम पर्व है, जिस प्रकार के भाव को लेकर
श्री बाल गंगाधर तिलक ने दिव्य व भव्य आयोजन की शुरुआत की थी, वह आज संपूर्ण भारतवर्ष में बड़े उत्साह से मनाया जाता है, सभी और जनता का उत्साह देखते ही बनता है, अगर हमारे जीवन में सब हो, और उत्साह ना हो, तो फिर जीवन में एक नीरसता आने लगेगी, इसलिए लोक मंगल का
यह अद्भुत पर्व है, जो हमें बुद्धि व उत्साह दोनों को प्रदान करने वाला है, आज संपूर्ण देश में यह परंपरा अपने दिव्य व भव्य  स्वरूप  में  मनाई जाती है, संपूर्ण भारतवासी, सनातन धर्म का जो भी अवलंबन ग्रहण करते हैं, उन सभी को सादर वंदन, गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
     मंगल मूर्ति मोरया, 
जय गणेश  काटो क्लेश।
भारत माता की जय, 
जय हिंद। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा। 
विशेष:- लोक कल्याण को ध्यान में रखकर
इस सुंदर पर्व को बाल गंगाधर तिलक जी ने शुरू किया था, आज पुनः इस पर्व पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं व समाज का मंगल किस प्रकार हो, यह बुद्धि सभी को श्री गणेश जी प्रदान करें, इस पर्व का मूल भाव हम ग्रहण करें , बाल गंगाधर तिलक, उनके प्रति हमारी सच्ची आस्था अगर है, तो लोक कल्याण की जिस भावना से उन्होंने इसकी स्थापना की थी, वह मर्म हम सभी समझे।
आयोजन दिव्य व भव्य दोनों ही हो,  भव्यता है व दिव्यता   दोनों का ही समावेश इस त्यौहार में होना चाहिये।
पुनः आप सभी को गणेश चतुर्थी के पावन पर्व की अनंत हार्दिक शभकामनाएं।
।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है, किसी भी नेतृत्वकर्ता  जो सर्वप्रथम गुण है वह है साहस, पूर्ण साहस।
       समाज में जिस किसी को भी नेतृत्व करना है, उसमें सबसे पहले गुण सत्य मार्ग का अनुसरण करना होना चाहिये, पूर्ण साहस से सत्य को कहना, किसी भी प्रकार से दबाव में न आना, यह सर्वप्रथम गुण एक नेतृत्वकर्ता का होना चाहिये, मान व सम्मान भी परे जो कह सके,  वह दृढ़ता एक नेता में होना चाहिये, समाज में हर कोई अपने नेता का अनुसरण भी करता है, इसलिए कुछ मौलिक गुण एक नेतृत्वकर्ता में अवश्य होने चाहिये।
        सब का सम्मान, परंतु अगर कुछ कहीं गलत घट रहा है, तो उसका सादर सधे शब्दों में विरोध , वह भी एक आवश्यक गुण होना चाहिये।
          पारदर्शिता, सबको साथ में लेकर चलना, विपरीत परिस्थितियों में भी हौसला ना खोना, अपने भीतर सभी के लिए समान भाव रखना, यह कुछ विशेषताएं हैं, जो किसी भी नेतृत्व करने वाले को बाकी लोगों से अलग करती है।
      किसी व्यक्ति विशेष का अनुसरण  न करके न्याय सिद्धांतों को हम पहचाने, किसी पर  अनुचित दबाव न बनाएं वह अनुचित दबाव सहन भी ना करें। 
     पूर्ण समर्पण से, साक्षी भाव से, केवल प्रभु की शरणागति होकर, जो महामंगल को ही प्रदान करती है, अन्य शरण न ले।
     पर जब नेतृत्व करें, तो विनम्र भाव से जो भी अपने समक्ष है, उसे अवश्य समझने का प्रयास करें, समय की प्रतीक्षा करें, धैर्य रख, समय आने पर निर्णय करें, निर्णय भूमिका में हम रहे ना रहे, 
प्रभु को निर्णय करने दे, बस पूर्ण साक्षी भाव से अपने कर्तव्य को गति प्रदान करते रहे।
    जब हमारे मानस में केवल वे प्रभु होते हैं, वह स्वयं हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं।
      सत्य को बताने होने पर अगर सामाजिकता को कोई हानि पहुंचती है, तो उसे उजागर न करें।
      मगर अगर सत्य सामाजिकता के हित में, सामाजिक नियमों के अनुकूलता को परिपालन हेतु कहा गया है, यह कहां जाना चाहिये, तो सड़े हुए शब्दों में भी अपनी बात को रखना ही चाहिये।
सही नेतृत्व करता कोई भूल नहीं करता, ऐसा नहीं है, मगर वह अपनी भूलों से सीखता है, उनका परिमार्जन करता है, शोधन करता है।
       हमारे आचार, विचार व व्यवहार में एकरूपता का अभाव हमें पतन की ओर अग्रसर कर देता है, हमें उससे बचना चाहिये।
        वाणी का प्रयोग हम समाज के हित संवर्धन के लिए करें,
सकारात्मक रूप से हम कार्य करें , साथी जो नकारात्मक शक्तियां है उनका विरोध भी अवश्य करें, जैसे खेत में हम फसल होते हैं, तो खरपतवार भी साथ में उग जाती है, परम फसलों को नुकसान ना इसलिए कीटनाशक डालकर खरपतवार को नष्ट करते हैं, इस प्रकार एक नेतृत्वकर्ता को चाहिये कि वह नैतिक मूल्यों का समर्थन करें वह अनावश्यक खरपतवार का उचित उपचार करें। 

विशेष:- एक नेतृत्वकर्ता में समर्थन कब करना है, कब नहीं, यह चेतना अवश्य होना चाहिये, क्योंकि चेतना से जो पूर्ण होगा वही सही निर्णय कर भी सकेगा।
प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 परमपिता परमेश्वर को सादर वंदन, आप सभी में स्थित परमात्मा के पावन अंश को भी सादर नमन, 
   आज प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा मे हम बात करेंगे श्रीमद्भागवत गीता पर, मैं जो विभिन्न प्रकार के विषय व लेख लिख पा रहा हूं, यह मां सरस्वती का आशीष है। 
      यह ग्रंथ कालजयी ग्रंथ है, कालजयी  मेरा तात्पर्य यह है, इसमें भगवान श्रीकृष्ण  द्वारा जिस प्रकार से संशयो का निवारण किया गया है , वह किसी भी काल में उतना ही सत्य है, जितना तब कहा गया था। 
       इसमें प्रथम अध्याय से लेकर 18 अध्याय तक अलग-अलग विषयों पर जितने सुंदर तरीके से हर बात को समझाया गया है,  वह अद्भुत  व  अमूल्य है। यह हर काल में सभी को प्रेरणा प्रदान करने वाला है। 
        इसमें गृहस्थ धर्म, कर्म योग, संन्यास धर्म, सांख्य योग, भक्ति योग, आत्म तत्व और कौन सा कर्म करना उचित है? अथवा उचित नहीं, इसका बड़ा ही सुंदर विवेचन इसमें दिया गया है। 
       जो भी व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक गीता जी का अध्ययन ,मनन व चिंतन करता है, वह स्वयं तो जागृत होता ही है, अन्य को भी जागृत करता है। इसका जो कोई भी व्यक्ति श्रद्धा पूर्व किसका अध्ययन करेगा , तो वह उसके जीवन में अत्यंत उपयोगी साबित
होगा। 
हमारे जीवन में कई अवसर ऐसे आते है, जब हमें कोई ना कोई निर्णय अवश्य करना ही होता है, परिस्थितियों का निर्माण ही इस प्रकार   हो जाता है, कि हमें कोई न कोई निर्णय तो अवश्य ही ।
करना पड़ता है।
    मेरी नजर में गीता जी एक अद्भुत ग्रंथ है, जो सर्वसाधारण के लिए वह सभी के पढने योग्य है।  
    भगवान श्रीकृष्ण जी ने बिल्कुल व्यावहारिक उपाय बताएं है।
चार रूप में अगर हम गीता जी का अध्ययन करते हैं तो यह एक अत्यंत ही जीवन में उपयोगी ग्रंथ है, इसे एक बार सभी को पढ़ना आवश्यक चाहिये।
विशेष:-श्रीमद् भागवत गीता किसी धर्म-विशेष का ग्रंथ न होकर
व्यवहारिक शिक्षा का ग्रंथ है, जो हमें जीवन जीने के अनमोल सूत्रों से अवगत कराता है।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
प्रथम संवाद हमारा स्वयं से होना चाहिये, हम क्या कर रहे है , क्यों कर रहे हैं, उसका हम क्या परिणाम चाहते हैं।
    जीवन में संतुलन की स्थापना किस प्रकार हो, हम सभी का जीवन चाहे -अनचाहे ही सही, आपस में जुड़ा ही है, क्या हम ऐसे समाज या परिवार की कल्पना कर सकते हैं, जहां पर सब सहयोग करने की बजाय आपसी खींचतान करते हो, अगर ऐसा होता है,
तो यह एक अच्छा संकेत नहीं है, हमें स्वयं सबसे पहले सहयोगात्मक वह सकारात्मक रूख पर ही कार्य करना होगा, स्व-  परिवर्तन मैं दृढ़ता अगर होगी तो हमारे आसपास भी परिवर्तन अवश्य होगा।
स्वर्ग व नरक दोनों का निर्माण हमारे स्वयं के हाथों में है। जहां पर सहयोग है, समर्पण है, निष्ठा है, एक -दूसरे के प्रति कुछ करने का भाव है, वहां पर स्वर्ग की सृष्टि स्वयं ही हो जायेगी, जहां पर हम आपसे खींचतान में होंगे, नरक का निर्माण हम स्वयं कर होंगे।
           सामंजस्य के जहां पर स्वर हो, वहां पर स्वर्ग ही है, जहां पर सामंजस्य नहीं है, वहीं पर नर्क है, सबसे पहले हम स्वयं का सुधार करें, फिर उस सुधार पर दृढ़तापूर्वक हम अमल करें, ऐसा करने पर हमारे आसपास भी परिवर्तन अवश्य आयेगा ही।
          अपनी मौलिक सोच पर पूर्ण दृढ़ रहे, जब भी ,जहां भी ,
जैसे भी हो, हम प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करें, माना कि सबका स्वभाव भिन्न है, मगर फिर भी लगातार अच्छी दिशा में की गई कोशिश अंततः सुखद परिणाम ही लाती है।
            हम साधनों का उपयोग करें न कि साधन हमारा, जब साधन हमारी सोच -समझ पर हावी हो जाये तो समझे हम कहीं ना कहीं गलत राह पर हैं, चिंतन- मनन द्वारा ही इसका समाधान संभव है।
             हम स्वयं कहां पर चूक कर रहे हैं, इसे भी समझना आवश्यक है, प्रतिदिन हमें क्या करना है, क्या नहीं, इसका जितना सही निर्धारण हम करते जायेंगे, उतना ही अधिक प्रभावी ढंग से हम अपने जीवन को सही दिशा की और लेते जायेंगे, स्वयं के विचारों के बीच में जो बहुत सारे विचार एकत्र हो जाते हैं, उनमें से हमें जिन पर कार्य करना है, वह हम अलग कर ले, तभी हम हमारे कार्य का निर्धारण सही रूप में कर सकते हैं, जितना हम अपने आप को व्यवस्थित करते हैं, उतना ही अधिक सुधार  हमें जीवन में देखने को प्राप्त होगा।
             समय अनुकूल निर्णय क्या सही है, परिस्थितियों का सही निर्धारण करने के बाद तुरंत निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करना, यह आपको स्वयं सीखना होगा, आप जितनी सूझबूझ से निर्णय लेंगे, उतनी ही सटीकता आपके जीवन में आती जायेगी, अपनी आंतरिक दृढ़ता को कायम रखें। 
           स्वयं परिस्थितियों का सही अवलोकन करे, उसके उपरांत निर्णय ले, आपका निर्णय सही होते जायेंगे। बुद्धिमानी पूर्वक सोच समझ कर, आसपास की घटनाओं का सही विश्लेषण करने के बाद आप जो भी निर्णय लेंगे, वह कमोबेश सही होगा।
आपकाअपना 
सुनील शर्मा 
जयभारत 
जय हिंद।


प्रिय पाठक गण,
         सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आप सभी को मेरे द्वारा लिखे गये लेख कैसे लग रहे हैं, कृपया अपनी प्रतिक्रिया मुझे अवश्य प्रेषित करें, इससे मेरा भी उत्साहवर्धन होता है। 
         चलिये, अब आज हम इसी वैचारिक श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं, मेरा आज का विषय है , प्रतिबद्धता। 
        इसे अगर हम सही ढंग से समझे तो हम सभी का जीवन एक मामले में तो समान ही है, हम सभी को जीवन में समान समय प्राप्त है, फिर उसी समय में कोई हमें शीर्ष पर दिखता है, वह कोई नहीं। इसका सबसे स्पष्ट कारण केवल एक ही है, हमारी अपनी स्वयं के जीवन के लक्ष्य के प्रति अस्पष्टता, जब तक हमें स्वयं ही यह ज्ञात नहीं कि हमें इस जीवन में क्या करना है, किस प्रकार से जीवन को जीना है, तब हम किसी भी व्यक्ति व परिस्थिति स्थिति को इसका दोष नहीं दे सकते, जब हमारे सामने हमारा लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट हो तो हर बात बेमानी हो जाती है, क्योंकि जैसे ही आप स्वयं अपने लक्ष्य का निर्धारण करते हैं, पहला कदम आपका वहीं से प्रारंभ हो जाता है, सबसे पहले हमें अपनी स्वयं की रुचियों को जानना चाहिये, क्योंकि जो भी हमारी रुचि का क्षेत्र होगा, उधर हमारी प्रगति की संभावना सबसे अधिक होगी, इसका कारण भी बिल्कुल स्पष्ट हैं, जैसे ही आप अपनी रुचि के क्षेत्र में कार्य करते हैं, तब आप उसे कार्य से भीतर से जुड़ जाते हैं वह आप उसमें आनंद को महसूस करते हैं, फिर उसे कार्य को करने की आपकी ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है वह जैसे ही आपके कार्य करने की ऊर्जा भीतर से बढ़ती है, आप अपने लक्ष्य की ओर बिल्कुल स्पष्ट और धैर्य पूर्वक आगे बढ़ते जाते हैं।
              इसीलिए सर्वप्रथम तो हमें अधिक से अधिक स्वाध्याय करना चाहिये, स्वाध्याय यानि स्वयं का अध्ययन, अगर आपको पुस्तकें पढ़ना पसंद है, तो किस प्रकार की पुस्तक आपको पढ़ना पसंद है, समाज में लोगों से मिलना-जुलना जुलना पसंद है व विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेना तो निश्चित ही आपको रचनात्मक सक्रियता पसंद है, अगर आपको इस प्रकार की गतिविधियां पसंद है, तो जैसे ही आप इन गतिविधियों से जुड़ते हैं,
आपकी ऊर्जा द्विगुणित हो उठती है।
          निष्क्रियता से जीवन में किसी भी उपलब्धि को हासिल नहीं किया जा सकता है। आपकी सक्रियता ही आपको उस मुकाम तक पहुंचा सकती है, जहां तक आपको जाना है, पता आपको स्वयं होना चाहिये , हमें किस और कार्य करना है, इसके लिये सबसे पहले हमें अपनी अभिरुचियों को जानना होगा। 
        जीवन में आपने जो भी सोचा है, या फिर आप सोचते हैं,
उन सब पर आपकी स्वयं की प्रतिबद्धता ही इस बात का निर्णय करती है कि आपके जीवन में क्या प्राप्त होगा, अगर सकारात्मक रवैये से हम अपने आसपास के घटनाक्रम का सही ढंग से अवलोकन करते हैं, तो हमें अपने लक्वष्यों  उसको जीवन में कैसे हासिल करना है, इसके प्रति स्पष्टता होगी , वह आप फिर उसी दिशा में कार्य करगे।
             और लक्ष्य स्पष्ट होने व एक दिशा में कार्य करने पर परिणाम तो आना तय है।
           अपने लक्ष्य के प्रति स स्पष्ट उसे करने के प्रति आपकी गंभीरता हीजीवन में उस मुकाम तक लेकर जायेगी, जिसकी आप कल्पना करते हैं। जैसे ही हमारे सामने लक्ष्य स्पष्ट होता है, हम उस दिशा मैं कार्य करने की आधी तैयारी तो मात्र लक्ष्य के सही निर्धारण से ही कर लेते हैं।
           जब आप तो अपनी रुचियां को जान लेते हैं कि वह किस विषय में है, और दृढ़ता पूर्वक आप उसे पर कार्य करते हैं, तो निश्चित ही आपकी सफलता उसी समय से शुरू हो जाती है, हो सकता है आपकी रुचि के क्षेत्र अधिक हो , तब आपको आपकी 
सर्वाधिक रुचि किस क्षेत्र में है, उसे स्वयं जानना चाहिये, जब आप अपनी सर्वाधिक रुचि वाले क्षेत्र की ओर जाते हैं तो आपकी मानसिक जुडाव के कारण आपको उसे कार्य को करने में कभी भी थकान महसूस नहीं होगी, वरन् और अधिक ऊर्जा प्राप्त होगी।
इस प्रकार जब आप अपनी अभिरुचि को पहचान लेंगे तो उसके बाद आपकी उसके प्रति प्रतिबद्धता ही आपके आगे का मार्ग प्रशस्त करती जायेगी।
विशेष:- हमारी या किसी और के जीवन की जब हम उपलब्धियां को देखते हैं, तो उनके पूरे जीवन को सही ढंग से देखिये, वे अपने पूर्ण जीवन को प्रतिबद्धता पूर्वक जीते हैं, तभी वे किसी विशेष मुकाम पर पहुंचते हैं, तो फिर जागृत होइये, अपनी अभिरुचि को पहचानिये व पहचानने के बाद उसके प्रति प्रतिबद्धता पूर्वक कार्य करिये, निश्चित ही परिणाम आपके पक्ष में खड़े होंगे। 
इति शुभम भवतू।
आपका अपना 
सुनील शर्मा ।
जय भारत। 
जय हिंद।



प्रिय पाठक गण,
       सादर प्रणाम, 
हम सभी अपने जीवन को समृद्ध बनाना चाहते  हैं, पर क्या आपने कभी भी ठहर कर विचार किया  है, जीवन में समृद्धि किस प्रकार आयेंगी।
          हमारे अपने जीवन के कई चरण है, प्रातः काल अगर हम
अगर जल्दी उठने का अभ्यास करें, प्रातः कालीन सैर पर हम अवश्य जाये, कोशिश करें प्रकृति से तादात्म्य  स्थापित करें,
उसे समय सांसारिक बातों से भी हम दूर रहे, तो हमारे भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगेगा, हम जितना अपने आप को स्थिर चित्त करते हैं, हीआंतरिक शांति को प्राप्त होते हैं।
           मनोयोग पूर्वक प्रकृति से जुड़े, एक आनंद धारा को
महसूस करें, घूमने जाते समय सांसारिक विचारों से दूर रहने का प्रयास करें। 
        आप पाएंगे, अभी तक हम जो जीवन जी रहे थे, वह हम जी नहीं रहे थे, केवल उसे ढो भर रहे हैं।
         केवल एक दिन को जीवन उत्सव ना बनाइये, अपने पूरे जीवन को ही एक शानदार उत्सव बनाये, जो भी आपसे रूबरू हो, वह आपका कायल होने लगे।
           हमें आंतरिक शांति तभी प्राप्त हो सकती है, जब हम समन्वय करना सीख ले, किस प्रकार से चीजों को समायोजित किया जाता है, वह कल अगर हम सीख ले तो किसी भी प्रकार की अशांति हमारे जीवन में होगी ही नहीं। 
          जीवन में विभिन्न समस्याएं भी आती ही है, वह जीवन का अनिवार्य तत्व व सत्य है, मगर आप उसे समय अपने जीवन मूल्यों को अगर सहेज कर रख पाते हैं तो देर सवेर स्थिरता अवश्य आती हैं।
जीवन मूल्यों को जीते हुए जब हम चलते हैं, साथ में जो भी हमारे हैं, उनके साथ सही बर्ताव करते हैं, सही समन्वय स्थापित करते हैं,
तो निश्चित ही हम आंतरिक शांति के द्वार अपने जीवन में खोलते हैं।
हम सभी के जीवन में स्थिति चाहे भिन्न-भिन्न हो, मगर उन्हें सकारात्मक संवाद व मार्ग द्वारा ही सुलझाया जा सकता है।
जितना अधिक हम मंथन करेंगे, जीवन को बुद्धिमत्ता पूर्वक सही तरीके से जीने के सूत्र हम बना लेंगे, जैसे स्वास्थ्य, संवाद, समय का उपयोग, समन्वय इस प्रकार के उत्तम गुना का समावेश जीवन में कर ले तो हम पाएंगे हमारा जीवन आंतरिक शांति की और आने लगा है।
           जीवन मूल्यों को सही तरीके से अपने जीवन में स्थापित करने पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे हम उन उत्तम गुना को धारण करते जायेंगे, आंतरिक शांति में अभिवृद्धि अपने आप ही होने लगेगी, 
अपने मूल विचार पर सदैव दृढ़ रहे। सामाजिक जीवन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाये, सदा मदद की कोशिश करें, जो भी हमारी सीमाओं के भीतर हो, वह हम अपने जीवन में अवश्य करें, 
स्वयं जागृत हो, साथ में औरों को भी जागृत करें। 
            इस प्रकार हम नित्य निरंतर अपने साधना पथ पर बढ़ते जाये, आप पाएंगे एक अलग सा एहसास जिंदगी में आने लगा है। 
पूर्ण रूप से सजगता ही जीवन की आंतरिक शांति की दिशा में पहला कदम है। पहला कदम सही रखिये, अपने सही ध्येय को सामने रखिये, कदम बढ़ते जाये, अपने आप परिवर्तन भीतर से घटने लगेगा।
विशेष:- हम सभी के जीवन का मूल उद्देश्य ही यह है कि जीवन में सभी प्रकार की समृद्धि हमें मिले और यह तभी संभव है, जब हम भाई अब आंतरिक विचारों में एक उचित संतुलन को स्थापित कर सके, अगर हम ऐसा कर सके तो उसके फलस्वरुप हमारे जीवन
में आंतरिक शांति की अभिवृद्धि होने लगेगी। 
इति शुभम भवतू।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
         आप सभी का स्नेह ,आशीर्वाद बना रहे, यही प्रार्थना। मृत्यु हमारे जीवन का अंतिम सत्य है, जो अनिवार्य रूप से घटेगा ही, तब हम किस प्रकार का जीवन जिएं कि जब हम मृत्यु का  वरण करे तो वह भी सुखदाई हो।
         हमारे मन में आंतरिक अशांति ना हो, मृत्यु ही निर्वाण है। मृत्यु किसकी, इस शरीर से जो भी संबंध हम अच्छे या बुरे निभाते हैं,उन सब की। क्या हम जीते जी ही मृत्यु का वरण कर सकते है, मृत्यु के बाद जो घटना घटती है, हमारे सब संबंध छूट जाते हैं, वही स्थिति अगर हैं हमारे मन में आज ही मान ले,जीते जी ही हम संबंधों को शरीर से तो निर्वाह करें, किंतु भीतर से हमें निरंतर आभास रहे की मृत्यु अनिवार्य सत्य है, जो आएगी ही, घटित होगी ही, तो हम इस जीवन को जीते हुए भी एक खिलाड़ी की भांति जीवन को जी सकते है। जीते जी हम मृत्यु का आभास मन में कर ले, तो हमारा भय स्वमेव ही छूट जायेगा, क्योंकि यह घटना हम चाहे या ना चाहे, घटकर ही रहेगी।
             तो क्यों ना हम जीवन को पूर्ण जिंदादिली से जीने का प्रयत्न करें, जिस भी पल को जिये, पूर्णतया उसी पल में रहे, भीतरी आनंद की स्थिति में बने रहे, आत्मबोध सदैव बना रहे। जब हम यह जान लेते हैं कि मृत्यु ही जीवन की अंतिम घटना है, हम सब कुछ यहीं छोड़ कर जाने वाले हैं, तो क्या हमारे पीछे, मृत्यु के बाद कुछ ना रहेगा, ऐसा कहना तो ठीक नहीं, क्योंकि हमारी अच्छी या बुरी यादें, हमारे कर्म का प्रतिफल, हमारी मृत्यु हो जाने के बाद भी अपना कार्य करेगा।
           हमारे कर्मों की ऊर्जा शक्ति सकारात्मक रही है,तो वह हमारी मृत्यु के उपरांत भी लोगों को जीवन प्रदान करेगी, इसीलिए अपने जीवन को एक दिशा बोध अवश्य दें, मृत्यु तो तय है, इसलिए जीवन को इस प्रकार जिये कि हमारी मृत्यु के बाद भी सुखद अनुभूति हम छोड़ जाए। निश्चित ही यह शरीर तो छूटेगा,मगर हमारे जीवन ऊर्जा हमने किस प्रकार से हमारा जीवन जिया, हमारे जाने के बाद भी अपना कार्य करती रहेगी, जीवन को सकारात्मकता से जिए,ताकि यह भाव हमारे शरीर की मृत्यु के बाद भी एक अच्छी सकारात्मक ऊर्जा के रूप में सभी को संबल प्रदान करता रहे।
विशेष:-मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, जब हम यह अच्छी तरह समझ जाएंगे तो हमारे जीवन की हर घटना विवेकपूर्ण ढंग से हम करेंगे व मृत्यु को भी सुखद बना सकेंगे।
आपका अपना
सुनील शर्मा
जय हिंद, जय भारत।
इति शुभम भवतु

अंर्तघट में घट रही घटना,
        अंतर्घट में घट रही घटना।
सुन तो सही तू,सुन तो सही।
        विराम उसमें, विराम उसमें कर तो सही।
यात्रा कर तो सही, यात्रा कर तो सही।
         सब कुछ तेरे भीतर, जज्बात भीतर के,
पढ़ तो सही, पढ़ तो सही।
         कहीं देर ना हो जाए, मंजिल छूट जाए।
हमको पढ़कर जरा देख तो सही,
         देह से परे भी, भीतर भीतर गहरे चल।
खिलाता जा तू अंतर्मन को।
          राम वही है, घनश्याम वही है।
भीतर के पट खोल रे, भीतर के पट खोल रे।
         राधा वहीं है,  कृष्ण वही है।
प्रेम ही है जीवन में अनमोल रे, जीवन चुका,
        तब समझ में आया उसका मोल रे।
प्रिय पाठक  गण,
सादर नमन,
आप सभी को महाशिवरात्रि की मंगल शुभकामनाएं, आइए शिव जी के जीवन से कुछ प्रेरणा प्राप्त करें, जीवन में जैसे उन्होंने हलाहल का पान किया, वैसे ही हम भी विष को स्वयं ग्रहण करें वह औरों के लिए अमृत छोड़ दे।
इसका सही विवेचन तो यही है कि हम परिवार व समाज के हित में कठिनाइयों को स्वयं वहन करें, परिवार व समाज कल्याण के पथ पर अग्रसर हो, पुनः आप सभी को महाशिवरात्रि की अनेकों अनेक मंगल शुभकामनाएं परमपिता महाकाल चिता की भस्म रमा कर  हमें यह प्रेरणा प्रदान करते हैं कि यह जीवन एक दिन मृत्यु का वरण करेगा, हम समाज में स्वयं का कल्याण समाज कल्याण करते हुए जीवन को जिये।
यही शिवरात्रि का परम भाव है,
ओम नमः शिवाय
सबका कल्याण हो, सभी जीवो में वही शिव है।
आपका अपना
सुनील शर्मा
प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मेरा मंगल प्रणाम,
आज संवाद करेंगे त्रिवेणी पर, त्रिवेणी क्या है? इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या  है, कुछ अपनी बुद्धि अनुसार आप सभी से कहता हूं।
त्रिवेणी का संगम हमने कई बार सुना है, तीन नदियों का संगम वहां त्रिवेणी कहलाती है।
आइए विवेचन करते हैं कुछ हटकर, हमारा स्वयं का जीवन भी एक त्रिवेणी है। इसके तीन सुंदर सोपान या घाट है।
प्रथम, स्वयं का कल्याण या सुधार।
द्वितीय परिवार का कल्याण व सुधार।
तृतीय समाज का कल्याण व सुधार।
क्रमशः स्वयं में सुधार करें, बड़ों का सम्मान करें बराबरी वालों से मित्रता पूर्ण व्यवहार करें व बच्चों को को स्नेह दे।
यह हमारे व्यवहार की त्रिवेणी है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि इस शब्द के कई गहन अर्थ है।
ज्ञान, वैराग्य, भक्ति
आचार, विचार, व्यवहार
ब्रह्मा, विष्णु, महेश
सत्यम, शिवम, सुंदरम
सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश
ज्ञान, धन, विवेक
इस प्रकार अवलोकन करने पर हमें कई स्वरूप प्राप्त होते हैं।
सरस्वती ज्ञान की देवी है, लक्ष्मी जी धन की देवी है, गणेश जी विघ्नहर्ता व विवेक के प्रदाता है । यह भी एक त्रिवेणी का रूप है।
ज्ञान द्वारा हमें धन अर्जित करना है, बुद्धि पूर्वक उसका उपयोग करना है, इन  प्रतीकों में हमें गहन संदेश दिए गए हैं, जिसे सही अर्थों में हृदयंगम करने की आवश्यकता है।
आशा करता हूं आप सभी सुधि पाठकों को इस संवाद में, यही आपके हृदय को छू ले, इसी प्रकार हम इस प्रवाह में चलते रहे।
आप सभी का स्नेह आशीर्वाद सदैव बना रहे।
विशेष:-इस प्रकार त्रिवेणी के विभिन्न रूपों की आपने व्याख्या समझी, प्रभु कृपा से जो प्रेरणा प्राप्त होती है, वह मेरे इन लेखों में आ जाती है।
आप सभी अपनी प्रतिक्रिया मेरे ब्लॉग पर अवश्य दें, इससे मुझे और भी सुंदर लेख लिखने की प्रेरणा प्राप्त होगी।
इति शुभम भवतु
आपका अपना
सुनील शर्मा