प्रिया पाठक गण, सादर वंदन,
आप सभी को मेरा मंगल प्रणाम,आज प्रवाह में कुछ बदलाव के साथ समसामयिक मुद्दे पर जो कि समाज में जो कुछ घट रहा है उस पर मेरी लेखनी आज चलेगी।
मेरा आपसे यह संवाद ही तो है जो आपके और मेरे बीच एक अद्भुत से बंधन को जन्म देता ह
खैर, अब हम आते हैं आज के विषय पर, राजनीतिक नैराश्य का दौर है, महाराष्ट्र में जो घट रहा है, उसने तमाम राजनीतिक मर्यादाओं को किनारे कर दिया है
आज सभी राजनीतिक दल बस येन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं, ऐसे में मेरी कलम तो चलना ही है, और भीतर गहराई में जो अनुभव कर रहा हूं वही लिखूंगा।
आज भारत माता की आजादी के लिए जिन शहीदों ने वह कई गुमनाम लोगों ने भी पूर्ण आस्था के साथ जो बलिदान देश हित में दिया था, आज उन सभी के बलिदान पर यह नेता ऊपरी तौर पर उनका गुणगान कर ले,लेकिन अंतरात्मा में झांक कर जरा देखें कि इनका कितना नैतिक पतन हो चुका है।
आज कोई भी चुनाव धनबल के बिना संपन्न नहीं होता, समस्त राजनीतिक दलों की कथनी व करनी अलग है। वस्तुत इन लोगों को वास्तव में आत्ममंथन की जरूरत है।
सारा देश इनके नाटक को देख रहा है समझ रहा है। सभी राजनीतिक दल सत्ता के लालची हो गए हैं।
इनसे अब कोई सा भी राजनीतिक दल अछूता नहीं है।
मेरे देश के नौजवान भाई बहनों, आदरणीय सभी सम्मानीय नागरिक गण, अब यह वक्त का तकाजा है, हमें अब चुप नहीं रहना चाहिए। जो भी नागरिकों शिद्दत से महसूस करते हैं कि देश में अब सब कुछ गलत दिशा में जा रहा है, तो पुनः एक जन आंदोलन जैसा जयप्रकाश नारायण ने चलाया था, उसकी अब देश को जरूरत है ।
मेरा ब्लॉग लिखने का उद्देश्य निजी स्वार्थ ना होकर उन तमाम सकारात्मक शक्तियों को एक सूत्र में पिरोने का महत्वपूर्ण बीड़ा इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने उठाया है। आज मैंने थोड़ा लीक से हटकर यह लेख जरूर लिखा है, अंतरात्मा की गहराई से मेरे शब्द निकले हैं।
आज फिर देश को भगत सिंह से इंकलाब नौजवानों की जरूरत है। यह देश आपको पुकार रहा है, उठ खड़े होइए, आपने वह माददा है। आप लोग देश की दिशा बदल सकते हैं।
जय हिंद जय भारत
विशेष:-यह लेख मां भारती के चरणों में समर्पित है यह लेख सभी नौजवान युवा साथियों प्रबुद्ध नागरिक गणों वह आंतरिक चेतना से जागृत उन सभी के लिए मेरा इस ब्लॉक के माध्यम से आह्वान है वे संगठित हो,ईस मैली-कुचैली राजनीतिक कुरीतियों को उखाड़ फेंके।
पुनः जय हिंद
आपका अपना
सुनील शर्मा
प्रिय पाठक गण,
सादर नमन
आप सभी को सादर वंदन,
आशा है कि सामाजिक संवाद पर आधारित यह ब्लॉग आपको एक नई चेतना दे रहा होगा।
परम आराध्य श्री कृष्ण भगवान के श्री चरणों में प्रणाम करते हुए गीता के सूत्र वाक्य स्वधर्म पालन पर कार्य करते हुए उसकी आखरी परिणति को ध्यान में रखकर उनके गीता के अंत में कहे गए सूत्र वाक्य यतो धर्म ततो जय को अंतर में रखर इस महा समर में जो कि प्रत्येक के जीवन में आता है,उनके परम शब्दों को शीश पर धारण कर अपनी करते हुए पालना करते रहूंगा।
व यही संदेश सभी को गीता के मर्म को समझें,श्री कृष्ण ने संपूर्ण मानवता के हित में अपने संपूर्ण शक्ति व चातुर्य से कार्य किया। इसीलिए वह आज भी जन-जन के आराध्य है।
उनका संघर्ष हमेंजीवन मूल्य पर खड़े रहने की इच्छा शक्ति प्रदान करता है। वे श्रीकृष्ण अनूठे रणबांकुरे थे, वे प्रेमियों के प्रेमी, पथ प्रदर्शक वह सदैव संपूर्ण सामाजिक हित में क्या जरूरी है, इसका चिंतन करते हुए कार्य करते थे। तभी तो उनका जीवन वृतांत एक महामानव के रूप में हमें प्रेरणा देता है।
विशेष जब भी हम मन में किसी प्रकार का संकल्प विकल्प,तब पूर्ण मनोयोग से उनकी शरण में जाने पर वे तुरंत ही आपके हृदय में उसका समाधान प्रकाशित कर देते हैं यही उनकी परम कृपा है।
आपका अपना
सुनील शर्मा
प्रिय पाठक वृंद,
सादर नमन,
सभी सुधि पाठक गण आप सभी को परमपिता परमेश्वर सदैव अनेक खुशियों वह सौभाग्य दायक पल जीवन में प्रदान करें।
आप और हम इस परमपिता की अनूठी संरचनाएं हैं। मानव को मिला प्रकृति का मिला यह अद्भुत वरदान है कि वह अपनी समस्त अंतर्निहित शक्तियों का जागरण कर उन्हें चाहे जिस दिशा में मोड़ सकता है।
ईश्वर अगर कहीं स्थित है, तो वह गहरे हमारे अंतःकरण मैं स्थित संपूर्ण साक्षी भाव से प्रत्यक्ष सूक्ष्म अवस्था घटना की रिकॉर्डिंग कर रहा है।
हम इस जीवन में जो भी अच्छा या बुरा विचार करते हैं। वह अवश्य समय पाकर प्रस्फुटित हो जाता है।
हमें हमारे प्रत्येक मनोभावों को दृढता से पैर रखते हुए अपनी दिशा तय करना चाहिए। क्या यह संभव है कि हम चाहते कुछ और हैं और होता कुछ और है निश्चित ही हम कहीं ना कहीं कुछ अवश्य छोड़ रहे हैं। निरंतर ध्यान पूर्वक अवलोकन करते रहिए।
वह परमात्मा तो सदैव प्रसन्न चित्त व सदा सभी का सहायक व कृपा करने वाला है, लेकिन इस रहस्य को जानने हेतु हमें अपने भीतर की और अनिवार्य रूप से जाना ही होगा। तब ही हम उन सभी अनसुलझे सवालों को समझ सकेंगे कोशिश अवश्य करें, सृष्टि के परम रहस्य आपके भीतर विद्यमान हैं।
जो सब जानकर भी अनजान है,वह केवल आपकी प्रत्येक स्थूल और सूक्ष्म क्रियाओं का तटस्थ भाव से आकलन कर रहा है। वही दिव्यता हम सभी के भीतर विद्यमान हैं, आवश्यकता इस के स्वरूप को जान कर इसमें जाने की है।
हम सभी एक उर्जा पिंड है, हमारे भीतर सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियां दोनों ही विद्यमान है। हम किसे अधिक सीचते हैं। वही शक्ति हमारे भीतर अधिक मात्रा में निर्मित होने लगती है।
अतः हम अहो भाव से उसे धन्यवाद अवश्य अर्पित करें,सुख और दुख दोनों में समत्व भाव बनाए रखकर अपने जीवन नौका को उसके हवाले कर फिर अपने कर्मों को करें, यही परम रहस्य है।
विशेष :- प्रतिकूल व अनुकूल दोनों ही परिस्थितियों में अपने विवेक को न खोए , यही आपको और लोगों से हटकर सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करेगा।
इति शुभम भवतु
आपका अपना
सुनील शर्मा
प्रिय पाठक वृंद,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
मेरा यह प्रयास अनवरत या निरंतर जारी रहेगा, मुख्य ध्येय वैचारिक परिवर्तन को हमारी आंतरिक चेतना में उतारे। उस दिशा में हम समग्र दृष्टि से विचार करें, तब स्वत
ही हमें दिशा प्राप्त हो जाती है।
हम जो कर्म करते हैं, वह हमें पूर्ण रूप से ज्ञात होता है,अगर हम अनवरत अच्छे प्रयासों व विचारों को बल देंगे तो सृष्टि रोमियो आप से जुड़कर उस दिशा की ओर आपको ले चलेगी हम जो सोच रहे हैं वह भी हमारे कर्म का ही एक हिस्सा है अतः हम जो भी सोचते हैं या करते हैं उस पर हमारी दृष्टि अवश्य ही होना चाहिए जब हम एक दिशा में पूर्ण सजगता से कार्य करते हैं तो हमें अनुकूल परिणाम निश्चित ही प्राप्त होते हैं ऐसा हो ही नहीं सकता कि हम वह परिणाम पा सकें जो हम सोचते हैं पर यह एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है चलते रहिए अपने देखे हुए सपनों की ओर वे पूरे होकर रहेंगे
विशेष आपने जो भी कार्य सोच रखा है उस दिशा में अपनी संपूर्ण ऊर्जा को लगाने से वह विचार देर सवेर अवश्य फलीभूत होगा क्योंकि आप उसे कंपनी गहन विचार प्रक्रिया का हिस्सा बना चुके हैं अच्छा सोचिए और दृढ़ता पूर्वक उसका अनुसरण करिए
इति शुभम भवतु
आपका अपना सुनील शर्मा
प्रिय मित्रों ,
प्रबुद्ध पाठकगण ,
युवा साथियों ,मातृशक्ति ,विभिन्न विभिन्न देशों ,प्रांतों से मेरे इस ब्लॉग को नियमित अध्ययन करने वाले सभी को मेरा सादर नमन।
आज मैं आपसे इस विषय पर बात करूंगा ,संघर्ष क्यों जरूरी है ।जैसे ही हमारा जन्म होता है ,हम जहां पर भी जन्म लेते हैं उस स्थान विशेष वह परिवार की समाज की अपनी निजी मान्यताएं होती है ।जिनसे हमारा परिचय जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं ,कराया जाता है ,फिर हम ईश्वरप्रदत्त अपनी बुद्धि के अनुसार उन मान्यताओं से या तो साम्यता स्थापित करते हैं या संघर्ष। दरअसल किसी भी समाज में जो परंपराएं सदियों से चली आ रही होती है ,आपका मन या तो उनसे तादात्म्य बिठा लेता है या फिर उसका विरोध करने लगता है ।
जो चीज हम अपने स्वभाव के अनुकूल नहीं पाते ,वह हटाते जाते हैं ,व जो अनुकूल पाते है वह ग्रहण करते जाते हैं ।अनुकूल ,प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारा सामना अपने जीवनकाल में अवश्य होता है ।हम प्राचीन परंपराओं ,अपने अनुभवों ,अनुकूलता, प्रतिकूलता को उसमें शामिल करते हुए अपने अनुकूल परिदृश्य की रचना करना चाहते हैं ,और यही से हमारे जीवन के संघर्ष की शुरुआत हो जाती है ।अपने देश और समाज की परंपराओं को जीते हुए हम उनमें कई ऐसी कुरीतियों का अनुभव करते हैं ,जो कि मानव हित में नहीं होती है उन कुरीतियों के उन्मूलन हेतु हमारे मन में वैचारिक संघर्ष चलने लगता है ।
हम अपने अध्ययन से उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर अपना संघर्ष जारी रखते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। विश्व की विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन अगर हम करते हैं ,तो प्राचीन संस्कृति में हमें हिंदू धर्म ,ईसाई धर्म, मिस्त्र की संस्कृति ,इस्लाम धर्म आदि का स्वरूप देखने को मिलता है ।अलग-अलग धर्म या पंथ अपने अपने तरीके से इसका विवेचन करते हैं ,व व्यक्ति की बुद्धि इनमें उलझती जाती है और आज वर्तमान में तो पूरे विश्व में संचार माध्यमों के आदान-प्रदान व संस्कृतियों के वैचारिक व सांस्कृतिक आदान-प्रदान की दिशा में पहल की जाने लगी है। इन सब में हम अपने आप को कहां पर खड़ा कर पाते हैं, इसका विचार तो हमें ना चाहते हुए भी करना ही पड़ता है, यहीं से हमारे और आपके विभिन्न संघर्षों की शुरुआत हो जाती है।
मूलभूत आवश्यकताएं जैसे रोटी, कपड़ा, मकान के बाद व्यक्ति का मन विलासिता व भविता की ओर आकर्षित होने लगता है, वह इन्हें पाने का भरसक प्रयत्न करता है, वह लगातार इन सब चीजों से जूझते रहने पर वह स्वयं अपनी अंतर्दृष्टि को विकसित करने का प्रयास करता है। जो जितना अधिक से अधिक सतर्क होता जाता है, वह अपने संघर्ष को एक दिशा देने में कामयाब हो जाता है। एक छात्र पढ़ाई करता है अथक मेहनत और परिश्रम से वह अपनी पढ़ाई पूर्ण करके अपने जीवन यापन की तैयारी करता है। विश्व में कहीं पर भी जन्मे हुए सभी मानव अपने अपने समाज में या परिवेश में वहां की एक निश्चित अवधारणा से संस्कृति से अपना परिचय करता हुआ उनसे तादात्म्य उठाने की कोशिश करता है।
क्या आप में से किसी ने भी इस विषय का गहराई से अध्ययन किया है कि हमें हमारे जन्म से ही प्रकृति ने कितने बहुमूल्य उपहारों से हमें नवाजा है। हमें कुछ चीजें प्रकृति की ओर से बगैर किसी शुल्क के प्रदान की गई है। जिसमें भूमि, जल, वायु, सूर्य, आकाश, चंद्रमा आदि शामिल है। क्या हम इन प्रति उपहारों का उचित तरीके से दोहन कर रहे हैं व उनके संरक्षण के उपाय कर रहे हैं।
इन सभी बातों का उत्तर केवल ज्ञान अध्ययन प्राचीन संस्कृतियों में जो एक मानवीय जीवन जीने का तरीका बताया गया था, उनमें उन्हें सन्निहित है। पुनः हिंदू धर्म या वैदिक धर्म या मानव धर्म है इंसानियत का धर्म हम कहें, उसे कोई भी इनाम दें पर वह संपूर्ण विश्व के हित में हो ऐसा किस प्रकार से किया जा सकता है। संपूर्ण मानवता का हित केवल इसी बात में निहित है कि सभी संस्कृतियों में किसी न किसी गुण विशेष को प्रधानता देते हुए बनाई गई है। तब सभी संस्कृतियों के अध्ययन के पश्चात सार्वभौमिक सत्य क्या है, यह जानना चाहिए वह इसके आधार पर जीवन जीने की कोशिश हमें करनी चाहिए।
मानव जीवन परस्पर संघर्ष पर आधारित होकर समन्वय पर आधारित होना चाहिए, पर क्या यह इतना आसान है, इसके लिए भी हमें अपने आप को मानसिक रूप से अपना आत्म बल बढ़ाते हुए सही दिशा में आगे बढ़ना होगा। आज जब संपूर्ण मांगता कराती नजर आती है, तब विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में एक " वैदिक धर्म " या " सनातन सत्य " जो किसी भी काल में बदलता ही नहीं है, को वर्तमान की कसौटी पर वर्तमान परिदृश्य के आधार पर पुनर्परिभाषित करते हुए इसके व्रत ज्ञान को संपूर्ण विश्व में फैलाना होगा।
तभी वह वर्ग संघर्ष, सामाजिक, संघर्ष व अनेकों प्रकार के संघर्ष जो चाहे, अनचाहे हम पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं उनका उत्तर खोजकर सही दिशा बोध के साथ उस ओर चलना चाहिए अन्यथा हम अपने निजी स्वार्थों के कारण एक वैश्विक संकट की ओर बढ़ने लगेंगे। इसके निराकरण हेतु संपूर्ण मानव जाति को एकजुट होकर प्रयास करने चाहिए। हमें अपनी शिक्षा में मानवीय मूल्यों की स्थापना द्वारा ही एक दिशा प्रदान की जा सकती है।
आइए संकल्प लें मानव जाति के हित में प्रकृति से समन्वय स्थापित करें ना कि उसे संघर्ष करें। लेकिन यह सब इतना समझ भी नहीं है अपनी-अपनी जगह पर आप सभी मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देते हुए जीवन को जिए। तभी हम इस संघर्ष में अपने आप को बचाते हुए विश्व को बचाते हुए एक अच्छा समाज भविष्य आगामी पीढ़ियों को धरोहर के रूप में प्रदान कर पाएंगे।
विशेष = जीवन में बिना संघर्ष के कोई भी सफलता नहीं प्राप्त होती है निरंतर नए प्रयास व नए उत्साह के साथ लगातार अनवरत संघर्ष हमें जारी रखना होता है तभी हम अपने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं
आपका अपना,
सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद,
सादर नमन।
आप सभी का दिन शुभ एवं मंगलमय हो इंहीं शुभ भाव के साथ अंतर्यात्रा के पड़ाव में आज हम बात करेंगे हमारे मानसिक बल कि, हमारे अंदर परमपिता परमेश्वर ने कई प्रकार की शक्तियां प्रदान की है उनमें से एक है मानसिक बल
शारीरिक बल से कई हजार गुना काम करता है आपका मानसिक बल जैसे आप कोई कार्य कर रहे हैं उसमें आप को 3 माह का समय लग रहा है उसमें अगर आप अपने मानसिक बिरयानी मनोबल से काम करेंगे तो हो सकता है आप उस कार्य को और जल्दी कर ले मानसिक उत्साह न होने पर कोई भी कार्य आप करें आप की गति धीमी होती है इसका उदाहरण आप खेल के क्षेत्र में लिख सकते हैं कैसे एक खिलाड़ी अपनी संपूर्ण मानसिक बल से खेलता है तो वह अन्य खिलाड़ी साथियों से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब होता है आपके भीतर का मानसिक बल आपको अपने कार्यक्षेत्र में एक विशिष्टता प्रदान करता है जो भी व्यक्ति पूर्ण मनोयोगपूर्वक अपने कार्य को करते हैं वह आश्चर्यजनक रूप से अन्य लोगों से अच्छे परिणाम पाते हैं आप अपनी मानसिक शक्तियों को जितना प्रेरित करते हैं वह उतनी ही अधिक शक्तिशाली हो कर आपको अपने लक्ष्य को पाने में मदद करती शारीरिक बल से मानसिक बल निश्चित ही कहीं अधिक श्रेष्ठ है अपनी श्रेष्ठता को आप जितना बढ़ाते जाएंगे उतनी अधिक क्षमता से कार्य को कर पाएंगे आप जो भी करना चाहते हैं वह पहले तय करने फिर पूर्ण मनोयोग से उस में जुट जाएं निश्चित ही आप अपनी मंजिल के करीब होंगे यह भी याद रखें उस व्यक्ति से सभी जुड़ना चाहेंगे दुरुस्त आए व्यक्ति को सहयोग कब मिलेगा उसका ही व्यक्ति अपनी मानसिकता बन के कारणों से कहीं अधिक अच्छा कार्य करने में कामयाब होता है तात्कालिक असफलताओं से घबराकर अर्जुन जैसे अपने लक्ष्य पर नजर रखने वाले ही कामयाब होते हैं मन में अपनी कामयाबी का उत्साह सदैव बनाए रखें
विशेष = अपने मानसिक बल को हमेशा सकारात्मक उर्जा से जुड़े सकारात्मक विचार मन में रखे शुभ संकल्पों को जीवन में स्थान दे आपको सफलता अवश्य प्राप्त होगी।
आपका अपना,
सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक गण,
सादर नमन।
आप सभी का दिन मंगलमय हो ,ईश्वर आप सभी को समृद्धि प्रदान करें ,इन्हीं मंगल भाव के साथ आज चर्चा करते हैं वर्तमान समय में धर्म की उपयोगिता पर।
वर्तमान समय में जब सभी और केवल भौतिक साधनों को ही येन-केन-प्रकारेण किसी भी प्रकार पाने की होड़ सी मची है ,आंतरिक अशांति और अधिक बढ़ती ही जा रही है इसका सबसे सरल उपाय यही है कि अपने साधन संपत्ती का व मानसिक शक्तियों का प्रयोग करें जब भी हम धन.को कमाये तो देखें वह नीति पूर्ण तरीके से कमाया गया हो ।वह खर्च करें तब भी हम सोच समझ कर उसे खर्च करें ,आय-व्यय का संतुलन स्थापित करें ,कुछ अंश आय का दान व कुछ बचत पर भी खर्च करें कई कार्य हमारे सामने अनायास भी आ जाते हैं ,उस समय हमारी निरंतर की गई छोटी सी बचत भी अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होती है ,वर्तमान परिपेक्ष्य में अपने आप को सजग रखें अपनी नीति स्पष्ट रखें।
बगैर किसी डर.के.अपनी बात को कहना सीखें यह भी एक महत्वपूर्ण कला है ।जिसे हमें अपने दैनंदिन जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग मानना चाहिए ,आपकी निडरता आपका कई मायनों में बचाव करती है यह आपको मानसिक शक्ति प्रदान करती है और जीवन में मनोबली व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं अतः सकारात्मक चिंतन व निरंतर उसे बनाए रखते हुए लक्ष्य को ध्यान में रखकर उस दिशा में कार्य करने पर वह सिद्ध होता है। सकारात्मक ऊर्जा हमें अपनी चिंतन द्वारा प्राप्त होती है।
धर्म का पालन हमें आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। नियम पालन अच्छे नियम हमें विभिन्न संकटों से बचाते हैं प्रभु का स्मरण हमें ज्ञान प्रदान करता है ,किस प्रकार व्यावहारिक बुद्धि द्वारा समाधान को निकाला जाए हमारी दृष्टि विकसित होती है ।हम अपनी मानसिकता से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हैं।
पहले छोटे छोटे लक्ष्य निर्धारित करें उन पर पूर्ण दृढ़ता से अमल करें छोटे छोटे लक्ष्य ही मिलकर एक बड़े लक्ष्य की ओर हमें ले जाते हैं ।स्वयं सकारात्मक चिंतन रखें और उसका प्रभाव अवश्य पड़ता है, विपरीत परिस्थितियों में अपनी विचारधारा को न छोड़े ईश्वर आपके साथ सदैव है ध्यान रखें सृष्टि की रचना इस प्रकार की गई है जो कि संतुलन पर आधारित है एक दूसरे के सहयोग द्वारा ही हम अपना और दूसरों का जीवन संचालित कर सकते हैं।
क्या आप अपना सारा जीवन स्वयं के बलबूते पर जीत सकते हैं ,पिता, माता ,पत्नी ,भाई ,मित्र कितने लोग आप को सहायता व सहयोग प्रदान करते हैं। तब आप अपने जीवन को सुचारु रुप से चला सकते हैं परस्पर आपसी सहयोग व सम्मान व आपके परिवार और समाज दोनों को समृद्ध करता है ,समृद्धि से मेरा आशय केवल धन संपदा होकर आंतरिक समृद्धि से है हमारी विचार सम्पदा हमारी सबसे बड़ी पूंजी होते हैं इस समय में हमारे द्वारा विगत में किए गए सही कर व्यवहार ही हमें संकट से बचाते हैं।
विशेष = जीवन में ईश्वर व सभी को रोज धन्यवाद दे जो आपको सहयोग करते हैं और असहयोग करने वालों को भी धन्यवाद दे जिनके कारण हम अपने संघर्ष को बाध्य होते हुए और अधिक प्रयास के द्वारा अपनी मंजिल को पाते है प्रार्थना से मानसिक शक्ति में अभिवृद्धि होती है अतः दैनिक प्रार्थना को जीवन का अभिन्न अंग बना दें।
आपका अपना,
सुनील शर्मा।
प्रिय पाठको ,
सादर नमन
आप सभी का दिन शुभ हो मंगलमय हो आज अंतर्यात्रा में हम बात करेंगे की प्राकृतिक रूप से हम सभी में कुछ विशेषताएं ऐसी मिली होती है जो अन्य लोगों में नहीं होती है । कोई खेलों की और ज्यादा आकृष्ट होता है कोई कला की ओर किसी में संगीत की अधिक समझ होती है कोई मानवीय मनको भली भांति पढ़ लेता है. कुल मिलाकर मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि हमें अपनीमौलिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है न की नकल पर ।
अपनी मूल अभिरुचि किन विषयों में है वह जानना जरूरी है क्योंकि आपकी. अभिरुचि जिस मे।रहा ह आप उन से अधिक प्रेरित होते हैं अपने आप को जानने की प्रक्रिया में आप अपनी रुचिजिन क्षेत्रों में है उन्हें पहले जाने वह देखें कि जिन रुचि है उन क्षेत्रों में आपके प्रयास कैसे हैंजिस क्षेत्र में आप की.रुचि.होगी.उसमेँ।आप बड़ी आसानी से उपलब्धियों को हासिल कर सकते हैं क्योंकि आप का मानसिक झुकाव. जिस क्षेत्र की ओर है उस मे आप स्वयं अपना अपना नाम अवश्य करें मारी स्वतंत्र सोच अगर होती तो हम सब से पहले क्या करना पसंद करते हैं
दरअसल जिस क्षेत्र को हम पसंद करते हैं उसमें हम अधिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकते हैं इसके लिए हमें अपनी मौलिक अभिरुचि को जानने का प्रयास करना चाहिए शांत होकर जब आप बैठेंगे तब आप स्वयं अपनी विशेषताओं का।आकलन कर सकेंगे जो विशेषताएं आपने मौलिक रुप में है वही आपको अन्य लोगों से भिन्न स्वरुप प्रदान करती है आपकी मौलिकता आपको अन्य लोगोंं से अलग कर रही है अपने स्वरूप वह विशेषताओं को जानने पर ही आप स्वयं की उन्नति कर सकते हैं फिर वह चाहे आर्थिक मानसिक या बौधिक उन्नत ही क्यों ना हो
आशा है आप सभी को मेरे लेखों में विविधता का दर्शन हो रहा होगा जिस भी व्यक्ति का जो मूल स्वभाव होता है वह उसके ज्यादा अनुकूल होता है अपने मौलिसुबह को जरुर जानिए
विशेष = किसी भी की नकल न करके अपने मूल स्वभाव में जियो निश्चित ही आप अंदर से काफी अच्छा महसूस करेंगे
आपका अपना
सुनील शर्मा