प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    मुझे उम्मीद है, विभिन्न विषयों पर यह जो मेरा आपसे वार्तालाप है, यह आपको पसंद आ रहा होगा, इसी श्रृंखला में अब हम आज बात करेंगे, नियति पर, अगर हम इस शब्द पर गौर करें, तो इस शब्द का जो अर्थ है, वह नियत से बना नियति, यानी हमारी नियत, हमारी सोच,  जिस प्रकार की हमारी नियत या सोच होगी, अंततः वही हमारी नियति होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं, हम जो भी करते हैं, उसके पीछे हमारी वास्तविक मंशा क्या है? हमें आखिर परिणाम उसी का प्राप्त होता है, 
तो अगर हम हमारी नियत सही रखें, व अपने कार्यो को भी उसी अनुरूप करें, तो हमारी नियति निश्चित ही अच्छे परिणाम देने वाली होगी, देर सवेर हमें अंततः अपने ही कर्मों का परिणाम पलट कर वापस मिलता है, स्वर्ग नरक और कहीं नहीं,  इसी जगह पर ही है, जो जैसा बोयेगा, अंततः वही फसल उसे काटना भी होगी, तो जिसकी जैसी नियत, वैसी उसकी नियति, यह अटल है, इसमें कोई फेर बदल की गुंजाइश नहीं, यह तो विधि का अटल विधान है, जो अंततः घटता ही है, मगर हम अपनी अल्प बुद्धि के कारण यह समझ नहीं पाते हैं, कि हमारी नियत ही हमारी नियति का निर्धारण करती है, तो हमें अच्छी नियत रखते हुए हमेशा अच्छे कर्मों की ओर अग्रसर होना चाहिए, परिणाम भले ही देर से प्राप्त हो, मगर वह अच्छे होंगे। 
विशेष:- हमारी नियत या हमारी सोच जिस प्रकार की होंगी, वैसा ही हमारा आचरण भी होगा, और जैसा हमारा आचरण होगा, उसी के अनुरूप हमें परिणाम प्राप्त होंगे, और वही हमारी नियति भी होगी। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, सवाल जवाब पर, आज हमारे देश की जो परिस्थिति है, 
वहां पर सवाल जवाब करना , यानी देश के खिलाफ हो जाना है, यह जो स्थिति है, यह किसी भी देश के उज्जवल भविष्य के लिये 
ठीक नहीं, कोई भी एक राजनीतिक दल या उस दल द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम, अगर उससे कोई असहमत है, तो वह उनसे सवाल-जवाब कर सके, इसी में प्रजातंत्र की खूबसूरती है, असली प्रजातांत्रिक देश वही है, 
जहां हम सरकार की आलोचना भी कर सके 
वह उसके सही फैसलों की प्रशंसा भी कर सके, उसके सरकार चलाने के तरीकों पर सवाल भी उठा सके, ओर सरकारे जो भी स्थिति हो, देश में उस समय,  वे उनका जवाब भी दे।
       असली प्रजातंत्र वही है, जहां हम अपने वैचारिक मतभेद को भी मुखरता से सामने 
रख सके, निश्चित ही उन सवालों का उद्देश्य 
हमारे देश की आर्थिक ,सामाजिक, राजनीतिक प्रगति से जुड़ा होना चाहिये, यही सच्चे लोकतंत्र की निशानी है, जो भी विपक्ष में है, उसे सरकार की स्वस्थ आलोचना का अधिकार होना ही चाहिए, सवाल जवाब 
जब तक चलते रहेंगे, उनका उत्तर प्राप्त होता रहेगा, इस देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी, जिस दिन आपका सवाल करने का अधिकार आपसे ले लिया जाये, या यह दबाव बनाया जाये, की जो भी वर्तमान सरकारें कर रही है ,उनका समर्थन करें, फिर चाहे उनकी दिशा सही हो अथवा नहीं। 
       क्या वर्तमान समय में कोई भी सरकार है, जो दावा कर सकती है, की सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का स्वरूप ले लिया है, निश्चित ही हम नागरिक भी इसके लिये दोषी है, जो इन बातों से समझौता कर लेते हैं, पर क्या जो भी सरकारे कार्य करती है उनकी कोई जवाबदारी नहीं, जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, या तो अधिकारी का विभाग बदल दिया जाता है,
या कुछ समय के लिये  बर्खास्त कर दिया जाता है, जब तक सरकारी घूस लेने वाले अधिकारी कर्मचारियों पर कठोर कार्यवाही 
नहीं करती, बदलाव आना संभव नहीं, पर यहां भी राजनीतिक दलों के अपने स्वार्थ जुड़े होते हैं, इसलिए कार्यवाही की बजाय बचाव के तरीके ढूंढ लिए जाते हैं। 
विशेष:- किसी भी देश की जनता को प्रजातांत्रिक प्रणाली  में यह अधिकार है, 
वह सवाल जवाब कर सके, और सरकारों का भी यह दायित्व है वह उनका जवाब दे, जब तक यह प्रक्रिया ठीक ढंग से चल रही है, तब तक  प्रजातंत्र सुरक्षित है। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे स्मृति पर, 
स्मृति यानी यादें, कुछ भूली-बिसरी, कुछ बचपन की, स्कूल की, बाल सखाओं की,
इस तरह अनेक प्रकार की स्मृतियां हमारे मस्तिष्क में हमेशा समाहित रहती हैं, ईश्वर का दिया यह ऐसा उपहार है, पुरानी अच्छी स्मृतियां हमें पूर्ण करो ताजा कर देती है, अगर हम विचार करें, किस प्रकार  पुरानी यादें भी 
हमारे मस्तिष्क में सुरक्षित रहती है।
        जैसे ही हम किसी पुरानी स्मृति को 
याद करते हैं, एक चलचित्र की भांति सब कुछ हमारे सामने पुनः आ जाता है, जैसे अभी की ही घटना हो, कितने भी काल पुरानी स्मृति हो, जैसे ही हम उसे याद करते हैं, हमारे सामने सजीव हो उठती है।
        लेकिन स्मृतियां तो स्मृतियो
 है, पर वह हमें पुनः उस दौर  में ले जाती है,
जहां से हम गुजरे थे, ये हमारे हाथ में है,हम
किन स्मृतियों को संजोना चाहते हैं, किन्हें भूलना चाहते हैं, कुछ खुशनुमा होती है, कुछ दुखद होती है, पर यह मानवीय स्वभाव है, 
वह हमेशा पुरानी स्मृतियों की और चल देता 
 हैं, हमेशा बचपन की यादें एक मधुर स्मृति के रूप में हमारे सामने होती है, तब हमारे मन में कोई छल कपट नहीं होता, वे स्मृतियां हमेशा हमारे मन में एक खुशनुमा अहसास पैदा कर देती है, मानव मन हमेशा से सुखद स्मृतियों को संजोये रखना चाहता है।
         हमारे जीवन में अनेक प्रसंग ऐसे होते हैं, जिनकी स्मृतियां हमें हमेशा प्रेरणा प्रदान करती है, हर व्यक्ति के जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी स्मृतियां भी 
उन्हें बल प्रदान करती है, हमेशा मधुर व सरल व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हमेशा हमारी मधुर स्मृतियों का एक हिस्सा होते हैं, जो हमें आज भी जब हम उन्हें याद करते हैं, हम तरो- ताजा हो उठते हैं। 
         स्मृतियां हमारे जीवन में अपना प्रभाव 
छोड़ती ही है, हम अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाएं, जब भी हम किसी की स्मृति का हिस्सा
हो, वह एक सुखद एहसास उसके जीवन में हो, यही हमारे जीवन की सार्थकता भी है।
मधुर स्मृतियों को हम जीवन में संजोये।
 विशेष:- हम अपना जीवन इस प्रकार जिये,
जब भी हम किसी की स्मृति में हो, उसे एक मधुर अहसास हो, ऐसे व्यक्तित्व के रूप में
अपना जीवन जिये, जिसे हर व्यक्ति अपनी स्मृति में रखना चाहता हो।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, अपेक्षा पर, 
अपेक्षा यानी किसी से कोई आशा या उम्मीद, 
यह शब्द लगता तो छोटा सा है, मगर इसका प्रभाव बहुत ही गहरा है, हम सभी का जीवन 
जो हम जीते हैं, कहीं ना कहीं हम किसी से
कोई ना कोई अपेक्षा तो रखते हैं। 
      और यह स्वाभाविक भी है, हर कोई जो भी जीवन में कार्य करता है, उस कार्य के फल स्वरुप कुछ पाने की अपेक्षा भी रखता है, यह और बात हैं, वह  अपेक्षा पूरी हो भी सकती है,
नहीं भी।
       माता-पिता हमेशा अपनी संतान से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह अपने जीवन मे उनसे भी अधिक अभिवृद्धि को प्राप्त  हो, वह अपने जीवन में वह मुकाम हासिल करें, जो वे नहीं कर पाए, और यह अपेक्षा पूर्ण रूप से स्वाभाविक भी है, इसमें कोई संशय नहीं।
        ऐसे ही किसी भी देश के खिलाड़ियों से 
वहां के नागरिक यह अपेक्षा करते हैं, वह अपने खेल से स्वयं का व देश का नाम रोशन
करें , और जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, 
तो सभी को बड़ा दुख होता है।
         तो आप सभी ने देखा की अपेक्षा शब्द तो बड़ा छोटा सा है, मगर इसका प्रभाव बहुत 
गहरा है, नेताओं से नागरिकों को यह अपेक्षा होती है, वह उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे, इस प्रकार हम पाएंगे की हर व्यक्ति को, हर वर्ग को किसी ने किसी से कुछ अपेक्षाएं होती है, हर संबंध आपसे कुछ अपेक्षा चाहता है, और वह पूरी न होने पर 
वह आपसे नाराज भी हो सकता है, संबंध तोड़ भी सकता है, तो अपेक्षा करें, कि हम जीवन में किसी से अत्यधिक अपेक्षा ना करें, 
स्वाभाविक रूप से जो घटे, उसे हम जीवन में स्वीकार करें, और मैं भी इसी अपेक्षा के साथ, कि मेरे लेखों द्वारा समाज में कोई रचनात्मक परिवर्तन आए, सभी खुले मन से सोच सके, 
वार्तालाप कर सके, इसी अपेक्षा से मैं भी लेख लिखता हूं।
विशेष:- जीवन में दूसरों से अपेक्षा करना स्वाभाविक है, मगर क्या हम भी दूसरों की अपेक्षा पर उतने ही खरे उतरते हैं, अगर नहीं, 
तो हम उनसे यह अपेक्षा क्यों करते हैं? हमें सहज रूप से चीजों को स्वीकार करना चाहिए। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।


प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे,  उम्मीद पर, 
उम्मीद यानी आशा, कुछ करने की, कुछ अच्छा होने की, सोचिए अगर उम्मीद ही न हो,
कि हमारा आने वाला कल आज से बेहतर होगा तो हमारे लिये फिर प्रेरणा का कार्य कौन करेगा।
जनता उम्मीद करती है नेता से, नेता उम्मीद करते हैं जनता से, माता-पिता उम्मीद करते हैं बच्चों से, बच्चे उम्मीद करते हैं अपने माता-पिता से, भक्त उम्मीद करते हैं भगवान से,
यानी सब कुछ परिदृश्य उम्मीद पर चल रहा है, तो उम्मीद ही है, जो हमारे सपनों में जान फूंकती है, हमारे प्रयासों को बल प्रदान करती 
है, अध्यापक को छात्रों से उम्मीद होती है, वहीं छात्रों को अध्यापक से, एक राष्ट्र को उम्मीद दूसरे राष्ट्र से, इस प्रकार संपूर्ण विश्व मैं सभी एक दूसरे से उम्मीद लगाए रहते हैं, और वह उम्मीद ही है, जो जीवन ऊर्जा हमें प्रदान करती रहती है, अगर जीवन में उम्मीद ना हो, 
तो फिर जीवन कैसा खाली हो जाएगा, बगैर किसी उम्मीद के हम किस दिशा में जाएंगे,
तो जीवन में उम्मीद का एक बहुत बड़ा योगदान है, वह हमारे सपनों को पुनर्जीवित करती है, उन्हें परवान चढ़ाती है , और इसी उम्मीद में हम भी कलम चलाते रहते हैं, कि किसी को हमारे विचार पढ़ने से कुछ नया प्राप्त होगा, तो इसी उम्मीद के साथ कि आप हमेशा हमारे लेख पढ़ते रहे , और अपनी उम्मीदों को जगाए रखें, उम्मीद है तो सब कुछ है।
विशेष:- हर व्यक्ति को अपने जीवन में कुछ विशेष करने की उम्मीद होती है, और यही उम्मीद से ताकत प्रदान करती है, जीवन में कुछ हासिल करने की, तो उम्मीद से भरपूर रहे, और उम्मीद रखें हमारा भी दिन आएगा। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद


प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, निर्धारण शब्द पर, यह शब्द लगता तो छोटा सा है, 
मगर इसके मायने गंभीर है।
       आज हमारा जो जीवन है,  वह किस प्रकार संचालित होगा, यह निर्धारण क्या हम स्वयं अपने विवेक से करते हैं, यह समाज, 
पुरानी परिपाटी या  विवशता, आर्थिक दबाव , कौन यह निर्धारण करेगा, हमारा जीवन किस दिशा में जाये, आज जो सामाजिक स्थिति है, इसमें हमारे सामने 
आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक परिपाटी को चलाना, स्वयं की उन्नति पर ध्यान देना,
कड़ी प्रतिस्पर्धा, हमारे ऊंचे सपने, समाज का बदलता परिवेश, निरंतर बदलते मूल्य, ऐसे बहुत सारे कारण है, जो हमारे जीवन के
संचालन में , उसका स्वरूप कैसा होगा,
यह निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम इनमें से किसी भी एक कारण को मुख्य नहीं मान सकते, हर एक कारण की 
अपना एक महत्व है, जो निर्धारण में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है, पिछले कुछ समय से समाज में आर्थिक आधार को एक महत्वपूर्ण कारक जरूर माना जा सकता है,
जो हमारे जीवन, पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक मूल्यों व व समाज में हमारे स्थान
का निर्धारण करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण 
कारक के रूप में सामने आता है, आज समाज में आर्थिक पहलू सबसे पहले देखा जाता है, वह उसके सामाजिक स्तर के निर्धारण का सबसे बड़ा पैमाना है।
       इस प्रकार हम देखते हैं, हमारा जीवन
केवल हम तय नहीं कर सकते, उसमें कई महत्वपूर्ण कारण ऐसे हैं, जो इस बात को निर्धारित करने में अपनी अपनी भूमिका 
निभाते हैं, और समाज में हमारी भूमिका 
हम किस प्रकार से बुद्धिमता पूर्वक अपने आप को स्थापित करते हैं, किस प्रकार 
संघर्ष करते हैं,  समाज में हमारी क्या भूमिका होगी, किस प्रकार का हमारा कद होगा, इसका निर्धारण होता है।
        आज संपूर्ण विश्व एक दूसरे के सहयोग से संचालित है, तकनीकी व आर्थिक सहयोग 
के लिए परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है, इस प्रकार संपूर्ण विश्व मैं जो भी आर्थिक, राजनीतिक गतिविधियां है, वह एक दूसरे के 
परस्पर सहयोग पर निर्भर है, विश्व में कोई
एक देश एक तरफा फैसला नहीं कर सकता, 
क्योंकि वह संपूर्ण विश्व से जुड़ा है, अतः इसका निर्धारण करने में विश्व  के समस्त देशो का
सहयोग व समर्थन भी चाहिये।
      इस प्रकार हम पाते हैं निर्धारण जो भी होता है, चाहे वह परिवार में हो, व्यक्तिगत जीवन में हो, देश में हो, विश्व में हो, परस्पर सहयोग की भूमिका सबसे अधिक है, जितना अच्छा समन्वय होगा, उतने बेहतर परिणाम होंगे। 
विशेष:- हमें जीवन में अपनी भूमिका का निर्धारण बहुत सोच समझ कर करना चाहिये,
क्योंकि इस पर हमारी उन्नति किस प्रकार होगी, यह तय होता है, बगैर किसी दबाव के 
स्वतंत्र रूप से हम यह निर्णय करें या निर्धारित करें , हमें किस भूमिका का निर्वाह करना है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिया पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, सुविधा पर, 
आज का मनुष्य सुविधा भोगी बन चुका है, 
अत्यधिक सुविधा के कारण वह आलसी बनता जा रहा है, और श्रम से दूर रहने के कारण उसका स्वास्थ्य भी  बिगड़ता जा रहा है।
जीवन में मनुष्य की मूलभूत सुविधा रोटी, कपड़ा और मकान है, पर आज हमारे देश में
कई लोग  मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है, वहीं दूसरी और ऐसा वर्ग भी है, जो विलासिता की सुविधाओं से  परिपूर्ण है,
इनके पास आलीशान जीवन जीने की सभी सुविधाएं मौजूद हैं।
        आज एक तरफ देश में कई लोगों को मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है, जो की एक सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है,
स्वास्थ्य संबंधी, शिक्षा संबंधी सुविधा उपलब्ध कराना हर सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र  में सरकारी स्कूलों की स्थिति दयनीय है, व सरकारी अस्पतालों की भी स्थिति कुछ अधिक अच्छी नहीं कही जा सकती, जबकि यह मूलभूत आवश्यकता व सुविधाओं में से एक है।
      एक और बात विचारणीय है, हमें जितनी अधिक सुविधा प्राप्त होती है, उतने ही हम और सुविधाओं की उम्मीद लगा बैठते हैं,
आज विज्ञान के कारण हम  कई ऐसी सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना ही नहीं की थी, इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण मोबाइल है, हम आज मोबाइल से पूरी दुनिया से वार्तालाप व संपर्क कर सकते हैं, कोई सी भी जानकारी हम मोबाइल के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं, किसी प्रकार का आर्थिक लेनदेन भी हम
मोबाइल से कर सकते हैं, हम सूचना का आदान-प्रदान कर सकते हैं, क्या  कुछ वर्षों पहले यह संभव था, यह वैज्ञानिक क्रांति के कारण संभव हुआ। 
विशेष:- अत्यधिक सुविधा हमें निष्क्रिय कर देती है, हमें उतनी ही सुविधाओं को उपभोग करना चाहिए, जितनी हमारे लिए आवश्यक है, वरना स्वास्थ्य संबंधी समस्या हमें हो सकती है, अत्यधिक सुविधा जुटाने के फिर में हम कर्ज का शिकार हो सकते है।
आपका अपना,
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।