प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     आज का सामाजिक परिवेश किस प्रकार का निर्मित हुआ है, जहां पर युवा पीढ़ी के अपने सपने है, वे केवल भौतिकता की ओर आकर्षित है, शिष्टाचार व मूल्यों की सौगात, 
जिस समाज के द्वारा दी जाती है, वह भी  भ्रमित है।
      क्योंकि आज से 10 -15 वर्ष पूर्व का समाज हम देखें, तो नैतिक मूल्यों की कीमत थी, व्यक्ति धन किस प्रकार से कमा रहा है,
यह बहुत महत्वपूर्ण था। 
         विगत वर्षों में जो सामाजिक मूल्यों का पतन हुआ है, उसके लिये सभी वर्ग कुछ न कुछ रुप में समान दोषी है, इस स्थिति में सुधार किस प्रकार लाया जाया, यह गहन चिंतन का विषय है। 
       व्यक्तित्व विकास की शिक्षा हमें स्वयं उन जीवन मूल्यों पर जीना होती है, जिनकी हम अन्य व्यक्ति या ,परिवार से, समाज से अपेक्षा रखते हैं।
      सर्वप्रथम हमें स्वयं अपने ऊपर भी गौर करना होगा, जो सामान्यतः हम नहीं करते, 
दूसरे के दोषो को देखना सबसे आसान कार्य है, पर स्वयं के दोषों पर हमारी दृष्टि नहीं जाती।
       क्षरण मूल्यों का सभी और हुआ है, मात्र भौतिक उन्नति की और अगर समाज अग्रसर हो जाता है, तो जीवन मूल्यों की कीमत कम हो जाती है। 
        हमें संतुलित रूप से भौतिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु दृढ़ रहना होगा, पुरानी सभी परंपरा ठीक हो, व नई सारी गलत,
यह कहना भी उचित नहीं, कहां आवश्यक सुधार की आवश्यकता है, यह भी हमें देखना होगा। सब पुराना ठीक, सब नया खराब, 
इन दोनों के मध्य का का चुनाव, इन दोनों में जो उचित हो, समयानुकूल हो, उसे हम ग्रहण करे।
      वर्तमान की चुनौतियां और कठिन है, जब सब और से अनेक विचार चल रहे हो, तब मानसिक रूप से स्थिर चित्त होकर हमें हल तलाशना होगा, एक लेखक के नाते मैंने यह महसूस किया है कि नई पीढ़ी गैर- जवाबदार नहीं है, वरन वह अपने लक्ष्य के प्रति पहले से भी अधिक सजग है, मगर समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व है, यह बोध हमें नई पीढ़ी को अवश्य कराना चाहिये।
         समाज में कई प्रकार के विभिन्न मत-मतांतर, अनेक विचारधाराएं, अनेकों प्रकार की विविधता, इन सब में सामंजस्य  किस प्रकार हम वर्तमान समय में करें, यह बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य है, मगर यह किया जाना चाहिये।
     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है, अपने स्वयं के, परिवार के, समाज के उत्तरदायित्वों को किस प्रकार से निभाया जाये, यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। 
     मानवीय चेतना को अगर हम सकारात्मक  दिशा या चिंतन न दे सके, तो आने वाली भावी पीढ़ियां हमें इस बात के लिए उत्तरदायी ठहराएंगी  कि हममें इतनी समझ  नहीं थी, पर आप लोग तो समझदार व अनुभवी  थे। 
       आपने हमें सही मार्ग चयन हेतु प्रेरित क्यों नहीं किया। 
     हम अपने सीमित संसाधनों द्वारा भी, उनके कुशल उपयोग द्वारा सामाजिकता को, 
दायित्वों को निभा सकते हैं।
    संपूर्ण रूप से नई पीढ़ी को जवाब देह मानना अपनी जवाबदारी से चूकना है, उन्हें आवश्यकता व अधिकता का अंतर समझाने का मूल दायित्व हमारी वर्तमान पीढ़ी का है, जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते।
        साथ ही युवा साथियों से भी मेरी विनम्र अपील है, बुजुर्गों को कुछ समय अवश्य दें, 
उनके अनुभव आपके काम ही आयेंगे, उन्होंने काफी समय लोगों के बीच में जीवन बिताया है, जितनी गहरी समझ उनकी है, उतनी नई पीढ़ी की अभी नहीं, उनकी हर बात को महत्वहीन न माने, बुजुर्गों का अनुभव युवा पीढ़ी का जोश यह दोनों ही समाज के लिए एक सकारात्मकता का निर्माण करेंगे, तालमेल का जिम्मा निश्चित तौर से अनुभवी व्यक्ति का ही है, साथी बुजुर्गों से भी निवेदन 
वे भी युवा पीढ़ी के पक्ष को समझें, वर्तमान समय में तालमेल बहुत ही आवश्यक है। 
विशेष:- वर्तमान सामाजिक परिवेश अत्यंत ही विचित्र है, एक तरफ समाज में के अच्छे लोग हैं, जो निरंतर प्रयासरत हैं, दूसरी और कुछ लोग हैं, जो मात्र निंदा ही करते हैं, तो जो सामंजस्य बिठाने वाले लोग हैं, वह निश्चित ही श्रेष्ठ है, अत्यधिक महत्वाकांक्षा व अंतहीन दौड़, इनमें से हमें क्या चुनना है?  पुरातन व वर्तमान दोनों का आकलन  आवश्यक है,
हमारा वर्तमान हमारे कदम के अतिरिक्त 
आसपास के घटना चक्रों से भी प्रभावित तो होता है, पर आखिरकार चयन हमें ही करना होता है, हम क्या चाहते है?
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
     मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा है, जब वह अपना सफर करता है, तो उसे सर्वप्रथम वह परिवार, जिसमें वह पला बढ़ा, उसके पारिवारिक संस्कार, जो उसे प्राप्त हुए, उसकी परवरिश, उसके बाद उसका स्वयं का अपना
संघर्ष, यह सब उसकी जिंदगी में अनिवार्य आते ही है।
              इन सभी के बीच में परिवार की मान्यताएं, सामाजिक मान्यताएं, इन सबके बीच में व्यक्ति को उसकी नैसर्गिक  ऊर्जा जो प्राप्त हुई, परमात्मा से, वह या तो क्षीण होगी 
या उसमें वृद्धि होगी, अगर ऊर्जा क्षीण होती
हैं, तो निश्चित ही उसकी दिशा जिधर वह जा रहा है, सही नहीं है, और अगर उस ऊर्जा में अभिवृद्धि हुई है, तो वह सही दिशा की और जा रहा है। सवाल यह है कि हम अपने जीवन में इस सकारात्मकता का पता किस प्रकार करें , तो अपने आप को जांचे, अपना संपूर्ण जीवन आपने मातृ भोग-विलास में ही बिता दिया है, या अपने जीवन का इससे हटकर कुछ अलग उद्देश्य आपने तय किया है, जीवन की इस यात्रा में आपके सामने निश्चित ही कई पड़ाव आते हैं, तब आपको फैसला करना ही होते हैं, अन्य कोई भी उपाय नहीं होता, उस परिस्थिति में आप क्या फैसला कर रहे हैं, वह स्वविवेक, तात्कालिक परिस्थितियां, अनुकूलता, प्रतिकूलता सब कुछ हो सकता है, इस यात्रा में आपने जो निर्णय लिये है, वह दूरगामी  परिणामों को देखकर लिये है अथवा नहीं, अगर आपने अपने फैसले के दूरगामी परिणामों पर विचार किया है, तो निश्चित ही आपके फैसले सही होंगे, किसी भी निर्णय को लेने का बाद में क्या परिणाम उपस्थित होगा, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
         इसमें सबसे अधिक मूल्य आपके पारिवारिक संस्कारों का है, उन संस्कारों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका इसमें होती है, वर्तमान परिस्थितियों जो भी अच्छी या बुरी निर्मित हुई है, वह हमारे अपने फैसलों का ही परिणाम है, आगे भी आप जो फैसला गहरी समझ के आधार पर लेंगे, वह अधिकतम सही दिशा की और ही होगा। 
     हमारा जीवन केवल हमारा ना होकर परिवार ,समाज दोनों से जुड़ा हुआ है, हम परिवार व समाज की मात्र एक  इकाई है,
इसलिए हमारे फैसलों का दूरगामी परिणाम हमारे परिवार व समाज पर पड़ता ही है।
     हमें हमेशा कोई भी फैसला लेते समय तात्कालिक परिस्थितियां व दुरगामी  परिणाम 
दोनों का ही चिंतन करना चाहिये,  तात्कालिक व दीर्घकालिक फैसला आप अपने जीवन के अनुभव के आधार पर भी ले सकते हैं। 
      समयानुकूल निर्णय आपने कितने बुद्धिमत्ता पूर्वक लिये हैं, वही आपके जीवन के परिणाम बदलेगा। जो भी व्यक्ति अपने जीवन की शुरुआत में सही दिशा में संघर्ष करता है, वह अपनी बाद का समय सुखपूर्वक बिताता है, हमारे इसी जीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म या तो हमें ऊपर उठाते हैं या नीचे गिराते हैं, कोई अन्य इसके लिए कभी दोषी नहीं हो सकता। 
       अपनी दैनिक दिनचर्या का स्वयं आकलन अवश्य करते रहे, बिना किसी सोच विचार के जीवन रूपी नौका किधर जायेगी,
पता नहीं, अगर आपको दिशाबोध या ज्ञान नहीं हो रहा तो आप पुरानी कहावतों  का सहारा भी ले सकते हैं, क्योंकि वे काफी अनुभव के बाद ही बनाई हुई होती है, अथवा अनुभवी व्यक्तियों का मार्गदर्शन ले, किसी गुरु या ग्रंथ का आश्रय ले, स्वयं चिंतन भी करते रहे, जीवन को सही मूल्यों के साथ जीना, भले ही थोड़ी तात्कालिक परेशानी हमें उठानी पड़े, यही हमारे जीवन में सबसे अधिक आवश्यक है। 
विशेष:- हमारा, आपका सभी का जीवन एक यात्रा ही तो है, इस यात्रा में हमें कई साथी मिलेंगे, बिछड़ेंगे, पर अपना स्वयं का निर्णय, 
हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, यह हम स्वयं ही तय करते हैं, जिस प्रकार का हमारा सोच विचार होगा, उसी प्रकार की हमारी रणनीति भी होगी। जीवन कैसा जीना है, यह हमारे फैसलों पर ही निर्भर है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण, 
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में ज्योतिष विज्ञान पर हम आगे 
चर्चा करेंगे भाग 2 पर। 
अभी तक की चर्चा में हमने 12 राशि व
वन के मूल तत्व व प्रकृति के बारे में चर्चा की,
साथ ही अंक विज्ञान में पांच अंक तक हमने चर्चा की थी, अब उसके आगे फिर हम अंक 6 से चर्चा प्रारंभ करते हैं। 
अंक  ६, इस अंक को शुक्र का अंक माना जाता है, यह एक सौम्य ग्रह है, इस अंक से प्रभावित जातक मगर मुस्कान व सौम्य व्यवहार का मालिक होता है, जीवन में वैभव 
वह विलासिता का कारक यह ग्रह है, सारी शारीरिक शक्ति व कला का भी कारक है।
शुक्र प्रधान जातक मूलत सुख वैभव व
विलासिता प्रधान जातक होते हैं, कला की और इनका रुझान होता है।
अब हम बात करते अंक ७ पर, यह ग्रह मूलतः केतू से प्रभावित होता है, यह हृदय से सोचने वाला अंक है, किसी के भी मानस को पढ़ लेना इस अंक का विशिष्ट गुण है, यह यात्रा के शौकीन होते हैं, इन्हें यात्रा करना बड़ा अच्छा लगता है, यह थोड़े बेचैन स्वभाव के होते हैं,
इन्हें धर्म कार्य से जुड़ने पर लाभ होता है,
विशेष कर इन्हें मंदिर नित्य प्रति जाना चाहिये, वैसे यह हदय के बड़े अच्छे होते हैं, थोड़े भावनात्मक व्यक्ति होते हैं, इन्हें दिल से जुड़े रिश्तों को निभाना अधिक पसंद है। 
वैसे केतु ग्रह अगर बलवान हो तो आपकी चर्चा सब और होती है, क्योंकि यह भावनात्मक रूप से सभी की मदद करने वाला ग्रह है। पढ़ चुकी है यात्रा का भी कारक है, तो मन में भी उथल-पुथल मची रहती है, 
उनकी आंतरिक यात्रा भी जारी रहती है, ऐसा
 क्यों? यह प्रश्न उनके मस्तिष्क में हमेशा रहता
हैं।
अब बात करते हैं नंबर 8 की, यह अंक शनि प्रधान अंक है, शनि न्याय का कारक वह थोड़ा रूखे स्वभाव वाला ग्रह है, यह धीमा चलने वाला, मगर इस तरह से अपने कार्य को करने वाला ग्रह माना जाता है, 8 अंक वाले जातक 
न्याय प्रिय होते हैं, मगर लगातार इनको जीवन में मेहनत करना पड़ती है, इस अंक के प्रभाव के कारण यह उनके जीवन में होता ही है, यह निराशा जल्दी हो जाते हैं। मगर उनके स्वभाव में न्याय प्रियता देखी जाती है। 
कब आते हैं अंक ९ पर, यह अंक मंगल ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है, मंगल भूमि व भवन,
शौर्य, साहसिक कार्य इसके अंतर्गत आते हैं,
अंक नौ से प्रभावित व्यक्ति किसी के आगे
झुकना पसंद नहीं करते, इन्हें अपना स्वाभिमान बड़ा प्यारा होता है, वैसे ये उदार
चित्स्वत भाव के होते हैं।  इन्हें सेनापति का दर्जा प्राप्त है। जहां साहस व शौर्य का कार्य हो, ईशान से के जातक अच्छी तरह कर सकते हैं, इनके जीवन में संघर्ष अधिक देखा गया है, मगर यह संघर्ष से घबराते नहीं है। 
उसका डटकर सामना करते हैं। 
इस प्रकार 1 से 9 तक अंक का अपना-अपना स्वभाव है, और वह इस अंक से प्रभावित जातक के व्यक्तित्व में आपको देखने को मिलेगा।
विशेष:-ज्योतिष विज्ञान वास्तव में एक अद्भुत विज्ञान है, जिस पर जितना शोध किया जाए उतने अधिक नए आयाम आपको प्राप्त होंगे।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में मेरा लेख है, ज्योतिष पर,
यह भी एक विज्ञान है, जिसमें अलग-अलग प्रकार की गणनाएं है, जैसे हस्तरेखा, कुंडली, 
हस्ताक्षर विज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र, अंक विज्ञान, वह हमारा तेज, हमारा जो चेहरे का 
तेज है, वह भी हमारी आंतरिक जो भी विचारधारा है, उसका हमें परिचय दे देता है। 
         नक्षत्र ज्ञान भी उनमें से एक है, कुल 27 नक्षत्र होते है, जिसमें हमारी बारह राशियां 
बटी हुई है, इन 27 नक्षत्र से ही 12 राशियों का निर्माण होता है। 
      सवा दो नक्षत्र की एक राशि मानी जाती 
हैं, एक नक्षत्र के भी चार चरण होते हैं। 
   बारह राशियां भी चार तत्वों में बटी हुई है,
इनमें तीन जल तत्व, तीन पृथ्वी तत्व, तीन वायु तत्व, तीन अग्नि तत्व इस प्रकार से इन राशियों का निर्धारण है।
      इनमें पृथ्वी तत्व की राशियां है,
वृषभ ,कन्या,मकर। 
     वायु तत्व की राशियां, 
इनमें है मिथुन, तुला ,कुंभ। 
   जल तत्व की राशियां,
इनमें है, कर्क ,वृश्चिक ,मीन। 
   अग्नि तत्व की राशि है, 
मेष ,सिंह , धनु ।
फिर स्वभाव के आधार पर। 
 चर राशि:- मेष, कर्क ,तुला, मकर। 
स्थिर राशि:- वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ।
द्विस्वभाव राशि:- मिथुन, कन्या, धनु ,मीन। 
लिंग के आधार पर। 
विषम राशियां:- मेष, मिथुन, सिंह,तुला,धनु, कुंभ।
सम राशियां:- वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन। 
इस प्रकार हम राशियों का वर्गीकरण पाते हैं। 
फिर उनमें किस राशि में कौन से ग्रहों की प्रबलता है, कौन सा ग्रह किस ग्रह के साथ युति कर रहा है, कौन से ग्रह की दृष्टि कितनी है, वैसे हर ग्रह को सप्तम दृष्टि तो प्राप्त है।
इस प्रकार की अनेक गणनाएं ज्योतिष में होती है। 
इस प्रकार राशियों का वर्गीकरण किया गया है। 
27 नक्षत्र में भी हर नक्षत्र का अपना-अपना विशिष्ट गुण है, हर एक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। एक नक्षत्र अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है, इसे 27 नक्षत्र के अतिरिक्त एक अलग मान्यता दी गई है, ज्योतिषीय गणना में
मूल रूप से तो 27 नक्षत्र ही जाते हैं, इन 27 नक्षत्रों में हर नक्षत्र का मूल मंत्र भी है, उनकी जड़ी भी है, कौन से वृक्ष या वनस्पति की जड़, उसे नक्षत्र के अनुसार हम रखें ,यह नक्षत्र विज्ञान में बताया गया है। 
अब हम आते हैं ज्योतिष की एक और शाखा अंक विज्ञान पर, 
इसमें  १ अंक को सूर्य माना जाता है, वह आत्मा का कारक व प्रशासनिक अधिकारी व प्रशासन से जुड़े कार्य इसके अंतर्गत आते हैं।
इसमें  २ अंक को  चंद्रमा का अंक माना जाता है, यह कला व मन का प्रतिनिधित्व करता है,
मानसिक शक्तियों व मनुष्य का व्यवहार कुशल होना हमें इससे ज्ञात होता है, यह किसी भी योजना को किस प्रकार से किया जाये, मिलनसार होने के कारण इसमें माहिर होता है। 
अब हम ३ अंक पर आते हैं, यह अंक मूल रूप से बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधित्व  करता है, यह ज्ञान का कारक है, मगर स्वाभिमानी भी है, अत्यधिक स्वाभिमानी होने के कारण होने  इसमें तानाशाह, यानी हम जो कहे वही हो, ऐसा गुण भी पाया जाता है, मगर यह स्वभाव से किसी का अहित नहीं करते, इनका ज्ञान बहुत ही व्यवहारिक व नियमों पर आधारित है, वे वह स्वयं भी नियमों पर चलते हैं, वह सामने वाले से भी इसी की अपेक्षा रखते हैं, एक तरह से कठोर शिक्षक इन्हें कहा जा सकता है, इनका ज्ञान विस्तृत होता है। 
अब हम अंक ४ को लेते हैं , अंक चार राहु का अंक है, यह अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि का मालिक है, मगर यह अपने अनुसार ही कार्य करता है,
इस अंक से प्रभावित व्यक्ति को प्रशंसा बड़ी अच्छी लगती है, आप इस अंक से प्रभावित व्यक्ति  को केवल काम सौंप दीजिये, मगर उसे तरीका मत बताइये, वह कार्य को अपने तरीके से ही करना पसंद करता है, मगर कार्य कैसे होगा? वह भलीभांति जानता है, मगर उसे रोक-टोक पसंद नहीं,इस अंक से प्रभावित व्यक्ति अपने तरीके से ही कार्य करना पसंद करते हैं। एक सफल कूटनीतिज्ञ 
इसी अंक के अंतर्गत आते हैं, एक सफल राजनीतिज्ञ में अच्छा राहु होना बड़े ही अच्छे संकेत होते हैं, आज हम जो तकनीकी ज्ञान को कर पा रहे हैं, जिसे हम डिजिटल कहते हैं,  वह भी राहु की ही देन है, एक तरफ से हम कह सकते हैं एक अच्छे राहु प्रधान व्यक्ति में बातचीत की कुशलता पाई जाती है, एक विशेष आकर्षण इस प्रकार के जातक में देखने को मिलेगा। 
अब हम अंक ५ पर आते हैं, अंक पांच बुध का अंक है, बुद्धि का कारक, इस अंक से प्रभावित व्यक्ति एक कुशल वक्ता होता है, 
यह अंक मध्य का अंक है, अतः सभी अंकों का सहयोग इसे  प्राप्त है, इस अंक को सभी अंकों का सहयोग प्राप्त होता है, मगर अत्यधिक विचार करने के कारण स्नायु मंडल से जुड़ी समस्याएं देखने को मिलती है, जिसे हम अंग्रेजी में नर्वस सिस्टम भी कहते हैं, अंक पांच के व्यक्तियों को अत्यधिक विचार करने से बचना चाहिये, पर यह इस अंक का मुख्य स्वभाव है, तो यह विशेषता इस अंक के जातक के भीतर होगी ही, व्यापार के लिये,
लोगों से मित्रता किस प्रकार  की जाये, सामंजस्य स्थापित करने में इसका कोई सानी नहीं, कब क्या करना है? इस मामले में यह चतुर होता है, संवाद की कुशलता बुध ग्रह से प्रभावित व्यक्ति में पाई जाती है।
शेष फिर अगले अंक में। 
ज्योतिष विज्ञान भी एक वृहत शास्त्र है, इसकी कई शाखाएं हैं, अपना अपना तरीका है, मगर आश्चर्यजनक रुप से हमें ज्ञात होता है, ज्योतिष की सभी विधाएं लगभग एक दूसरे से मिलते-जुलते परिणाम  ही बताती है, और यहीं से ज्योतिष विज्ञान के महत्व का हमें पता चलता है, हमारा प्राचीन विज्ञान अत्यंत है, यह घर शोध का विषय है, आप जितना इसे जानेंगे ,उतना लगेगा कम जाना है। 
विशेष:- हम सभी परमपिता के बनाये इस सृष्टि चक्र में रहते हैं, इसमें भी कई भेद हैं, मगर ज्योतिष विज्ञान ऐसा विज्ञान है, जो आपका मार्गदर्शन करता है, वह यह बताता है कि आपकी जो मूल प्रवृत्ति है, वह जन्म से किस प्रकार  की है, तो आपको अपने जीवन यापन हेतु कौन सी आजीविका का चयन करना चाहिये, किस प्रकार के परिणाम आपके लिए सकारात्मक रहेंगे, वह आपके मूल व्यक्तित्व के अनुसार उसे निर्धारित करता है, यही ज्योतिष विज्ञान की मूल अवधारणा है, और आश्चर्यजनक रूप से हमें देखने को मिलता है, यह सत्य है। मगर हम इसे जितना गहराई से जानेंगे, उतना ही हमें आनंद व व्यावहारिक ज्ञान  प्राप्त होगा।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
            उम्मीद है आप सभी को मेरी यह वैचारिक शैली व यात्रा पसंद आ रही होगी,
विविध विषयों पर जो भी मेरी अनुभूति रही है,
उसे कलमबद्ध करने का एक छोटा सा प्रयास है ।
        आज का हमारा विषय है, सेहत, यानी व्यक्ति के पास सब साधन हो, पर सेहत अच्छी न हो, तो वह सब साधन भी फिर उसे व्यर्थ प्रतीत होते हैं, अच्छी सेहत के लिए हमें शारीरिक के साथ ही मानसिक ऊर्जा को भी बदलने का प्रयास करना चाहिये, क्योंकि शरीर की सेहत व मन की सेहत एक ही सिक्के के दोनों पहलू है, एक पुरानी कहावत भी है, " मन चंगा, तो कठौती में गंगा", यह केवल मात्र कहावत नहीं है, यह जीवन का असल सूत्र है, जो एक कहावत के माध्यम से हमें सारी बात बताता है। 
       और उद्धरण  हम लेते हैं, तो पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख हाथ में माया, तीजा सुख प्रभु की छाया, तो यहां भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, हमारे पास सबसे पहले अच्छा स्वास्थ्य हो, फिर भौतिक सुख सुविधा भी हो, तो प्रभु की कृपा तो अपने आप ही प्राप्त हो जाती है।
         सर्वप्रथम सेहत अगर हमारी अच्छी है, 
तो हम स्वयं तो भीतर- बाहर से ऊर्जावान होंगे, साथ ही भौतिक संसाधनों का हम उपयोग करने में समर्थ होंगे, फिर तीसरा जो सुख है, वह परमपिता की, ईश्वर की अनुकंपा, यह तीन किसी भी व्यक्ति के जीवन में है, तो मानो वह स्वर्ग में ही है। 
      अगर सेहत अच्छी है, तो आप अच्छा महसूस करेंगे, साथ ही भौतिक साधन पास में होने से आपको सांसारिक चिंता भी नहीं होगी,
तब इन दोनों के साथ तीसरा जो सेहत व मानसिक सेहत का राज है, इन दोनों के साथ है ,उस परमपिता परमेश्वर की कृपा।
      यह मेरी नजर में त्रिवेणी स्नान ही है, अगर यह तीन बातें किसी के भी जीवन में है, 
तो वह मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों ही प्रकार से समृद्ध है। 
         आंतरिक व बाह्य दोनों प्रकार की समृद्धि किसी के पास हो, तो फिर उसे ईश्वर की कृपा तो प्राप्त है ही, और इसके लिए हमें उन परमपिता का कृतज्ञ होना चाहिये, प्रभु का धन्यवाद, जिन्होंने हमें मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों प्रकार से समृद्ध किया।
          यह त्रिवेणी स्नान ही है, जब इन तीनों का संगम जीवन में हो, तो फिर मनुष्य को और क्या चाहिए? 
         यही प्रार्थना है, आंतरिक समृद्धि ही हमें बाह्य समृद्धि प्रदान करती है, वस्तुतः यह एक ही सिक्के के दो पहलू है। 
         आज हमें भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, वह हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, पहले जितनी कारे नहीं थी, सभी के पास, 
अधिकतम लोगों के पास यह संसाधन उपलब्ध है। 
          मगर अच्छी सेहत इन सभी संसाधनों से ऊपर है, सेहत हमारी अगर अच्छी है, तभी हम बाकी सभी का जीवन में आनंद उठा सकते हैं, तो फिर आप क्या सोच रहे हैं? 
आज से ही इस त्रिवेणी में स्नान करना प्रारंभ करिये, मानसिक, शारीरिक व भौतिक, यह भी एक त्रिवेणी ही है। 
विशेष:- हम सभी के लिए अच्छी सेहत का मतलब केवल शारीरिक सेहत न होकर मानसिक भी हो, मानसिक व शारीरिक दोनों ही सेहत आवश्यक भी है, वह एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू है, जो हमारे जीवन में 
अगर संतुलन के रूप में है, तो तीसरा सुख प्रभु की कृपा हमारे जीवन में है ही, उनका नित्य सुमिरन उनकी अनन्य कृपा को हम याद करते रहे। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, कालजयी ग्रंथ गीता जी पर, कालजयी  इसलिये कह रहा हूं, विचार पूर्वक जब हम मंथन करते हैं, तो पाते हैं, कितने साधारण शब्दों में भगवान  श्रीकृष्ण श्रीमद् भागवत गीता में कर्म की व्याख्या करते हैं, वे स्पष्ट रूप से कहते है,
स्वधर्म ही सबसे उत्तम है।
      यानी आपने जो भी कर्म करने का बीड़ा उठाया है, यह जीवन में आजीविका के लिये भी आप जो कर्म कर रहे हैं, उसे पुर्ण ईमानदारी व निष्ठा पूर्वक हम करें, वे निष्काम कर्मयोग को सबसे अधिक महत्व प्रदान  करते हैं, अपना जो भी कार्य है, वह पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी पूर्वक आप करें शेष फल ईश्वर के ऊपर छोड़ दे, इतने साधारण शब्दों मैं इतनी गहरी बात गीताजी में कही गई है। 
     वह कर्तव्य पथ से हटने की बात कभी नहीं कहते, बल्कि पूर्ण ईमानदारी से, दृढ़तापूर्वक अपने कर्म पथ पर डटे रहने की बात करते हैं, उन्होंने निज कर्म को श्रेष्ठ माना 
हैं, आप कोई सा भी कर्म आजीविका के लिये भी जो अपना रहे हैं, पूर्ण निष्ठा पूर्वक आप करें, अब निष्काम कर्म हम किस प्रकार करें,
हर करम में कुछ ना कुछ भाव जुड़ ही जाता है, कभी हम कोई सामाजिक कार्य करते हैं,
तो हमारी ख्याति का, गरिमा का भाव, हमारी पछ परख, यह जुड़ जाता है, भगवान श्रीकृष्ण इस भाव से भी ऊपर उठकर सहज भाव से कर्म करने की बात कहते हैं, वे कर्म तो करने की कहते हैं, मगर कर्म फल में आसक्ति का त्याग करने की बात करते हैं, क्योंकि जैसे ही हम कर्म में  आसक्ति उत्पन्न करते है, हम कर्म बंधन की ओर बढ़ जाते हैं। 
    कर्म तो हमें वही करना है, मगर उसे कर्म के फल में जो हमारी आसक्ति है, बस उसका  हमें त्याग कर देना है, इस आसक्ति का मानसिक रूप से, भीतर से त्याग हम कर देते
हैं, तो कर्म करते हुए भी हम कर्म बंधन के भार से मुक्त हो जाते हैं।
       नि:स्पृह भाव से, इस कर्म को जो हम कर रहे है, हम करते रहे, बगैर स्वार्थ के, इतना सुंदर संदेश गीताजी हमें प्रदान करती है। 
     वह हमें कर्म से हटाती नहीं, कर्म बंधन से हटाने का मार्ग बताती है, अपना कर्तव्य  मानकर हम यह जीवन  जीवन की गतिविधियां उनके प्रति समर्पण भाव से कर दें, शेष परमात्मा पर छोड़ दे, यही समत्व भाव 
भगवान श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं। 
        स्व- अनुशासन का पाठ हमें  भगवत गीता में प्राप्त होता है, हमें अपने दोषो पर कार्य करना चाहिये, हमने जो भी कर्म अपनाया है, कहीं हम उससे विमुख तो नहीं हो रहे, उसे पूर्ण ईमानदारी से हम करें, यही गीता जी का सार है। 
        यह एक अद्भुत ग्रंथ है, जो किसी वर्ग- विशेष , संप्रदाय से न जुड़ा होकर आपको अपने जीवन मैं किस प्रकार जीना चाहिये,
जीवन पद्धति का विकास करने के लिये इस ग्रंथ का मनन व चिंतन अवश्य करना चाहिये,
यह सभी के लिये एक बहु उपयोगी ग्रंथ है,
इसमें किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई बात ना कह कर कर्म की महत्ता को दर्शाया गया है।
        ऐसे सर्वश्रेष्ठ मानव मात्र को शिक्षा प्रदान करने वाले, चेतन प्रदान करने वाले, अद्भुत ग्रंथ श्रीमद् भागवत गीता वह उनके नायक श्री कृष्ण जी को सादर वंदन। 
      श्री मद्भागवत  गीता हर दौर में पठनीय,
मनन करने योग्य, चेतन को जागृत करने वाला ग्रंथ है, जो उनकी शरणागति होकर अपना कार्य करते हैं, निसंदेह वह इस जीवन में 
अपने स्वकर्म को करते हुए ऊंचाई को पाते हैं।
   ऐसे अद्भुत व कालजी ग्रंथ को बारंबार प्रणाम, जो हमें दिशा प्रदान करता है, अंधकार से प्रकाश की और, चेतना को जागृत करने वाला अनुपम यह ग्रंथ है।
विशेष:- हम अपना स्वकर्म पूर्ण ईमानदारी से व निष्काम भाव से करें, शेष परमात्मा पर छोड़ दे, बस यही संदेश है, गीता जी का, सरल व सहज रूप में वह कहते हैं, आपका जो भी कर्म है, वह पूर्ण निष्ठा पूर्वक आप करें, इसी में आपका कल्याण निहित है, ऐसे ग्रंथ को एक बार अवश्य आप पढ़ें, मनन करें, यही विनय।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम। 



प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, स्वाभिमान पर, स्वभाव+अभिमान, इन दो शब्दों से मिलकर यह बना है, जो भी प्रकृति से हमें 
प्राप्त हुआ, वही सत्य है।
      स्वाभिमान, यानी अपनी मूल प्रवृत्ति या
प्रकृति जो हमें ईश्वर ने प्रदान की है, वही हमारा स्वभाव है, या स्वाभिमान भी है।
        सभी की अपनी- अपनी आदतें होती हैं,
मगर एक बात अगर हम गहराई पूर्वक विचार करें , तो वह यह है, कि मानवीय करुणा से 
ओत-प्रोत होना, मनुष्य होना यह हम कभी न भूलें।
        हमारा जो भी स्वभाव है, स्वाभिमान है, 
वह ऐसा हो, जिससे हमारे आत्म सम्मान को 
भी ठेस न पहुंचे, साथ ही अन्य के भी आत्म सम्मान को हम ठेस न लगायें।
       मनुष्य की मूल प्रकृति यह रही है, कोई उसे पहचाने, जाने, उसकी लोकप्रियता हो,
यह एक ऐसी ख्वाहिश है, जो सभी के अंतर्मन में बसी होती है।
         अपनी मौलिक विशेषताओं को हमें
पहचानना चाहिये व पूर्ण ईमानदारी से उस
पर कार्य करें, अगर हममें कोई भी हुनर है, 
तो उसे हमें लगातार, निरंतर अभ्यास के द्वारा 
हम किसी भी विधा में शीर्ष पर जा सकते हैं। 
हम सभी के जीवन में उतार- चढ़ाव, जय पराजय, हानि -लाभ, सभी आते ही हैं, मगर अपने अच्छे समय में हम बिल्कुल शांतचित्त होकर उसका आनंद उठायें, व विपरीत समय होने पर भी धैर्य बनाए रखें। 
      अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को 
कभी भी नीचा न होने दे, हम जीवन में जो भी कर रहे होते हैं, वह कोई और भले ही नहीं जानता हो, हम स्वयं तो जानते ही हैं।
    जैसे ही हम अपनी विशेषताओ पर सही तरीके से कार्य करना सीख जाते हैं, जीवन को सही अर्थों में हम जीना ही सीखने है।
    जीवन का हर पल आनंदमय व खुशनुमा ही है, मगर उसके लिए हमें बाह्य जगत के साथ अपने आंतरिक जगत यानी अपने मनोभावों पर भी कार्य करना होंगा।
     शांतचित्त  से हम सब घटनाक्रम जो हमारे जीवन में घटित हुए हैं, कुछ में तो हमारी मर्जी शामिल होती है, कुछ में नही।
       अगर प्रकृति ने हमें सामंजस्यता का गुण
प्रदान किया है, तो हमें आगे बढ़कर नेतृत्व करना ही चाहिये, क्योंकि यह गुण आपके नेतृत्व की क्षमता को प्रदर्शित करता है।
        इसी प्रकार हम अपने स्वभाव के अनुसार अगर अपनी जीवन शैली को ढालते 
हैं, तो हमें जीवन में प्रतिकूल भी अनुकूल जाना पड़ेगा। 
       अपने निजी स्वभाव को समझकर फिर उस पर पूर्ण रूप से , दृढ़ता पूर्वक अगर हम अमल करते हैं, तो हमें कामयाबी भी प्राप्त
होगी, व अपनी पहचान को हम अपने उस
गुण की बदौलत ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। 
       धन हमें भौतिक सुख सुविधाएं तो प्रदान कर सकता है, मगर हमारा आंतरिक वैभव हमारी असली पूंजी है।
       भौतिक व आध्यात्मिक  दोनों ही पहलू जरूरी भी है। 
      सबके अनुभव अपने हैं, समस्याएं भी अलग-अलग है, मगर अपने स्वभाव को समझकर हम अपने कार्य को अगर करते हैं,
और अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते हैं, धैर्य पूर्वक हम उनका सामना करते हैं, चीजों को वास्तविक रूप से किस प्रकार घटेगी ,देखते हैं, तो आपकी कामयाबी की राह पक्की है। 
विशेष:- हम सभी को ईश्वर ने कोई न कोई मौलिक विशेषता प्रदान की है, और उसी मौलिक विशेषता को हम पहचाने व पूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करें, आपका 
स्वाभिमान भी सुरक्षित रहेगा, कामयाबी  भी प्राप्त होगी, अपने लक्ष्यों के प्रति ईमानदार रहे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदेमातरम्।