प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, विविधता पर, इस संपूर्ण सृष्टि में जो विविधता है, वही दरअसल इसको संपूर्ण भी बनाती है, आप देखें, भूमि के अंदर जब अलग-अलग बीज होते हैं, तो भूमि तो वही एक होती है,
मगर कहीं हम उन बीजों के माध्यम से जो देखते हैं, कहीं पर बीजों के माध्यम से जो वृक्ष उगते हैं, यह जो पौधे उत्पन्न होते हैं, वे अलग-अलग प्रकार के होते है, जैसे कोई हमें फल प्रदान करता है, कोई फूल प्रदान करता है, तो कोई फूल व फल दोनों प्रदान करता है, व कोई वृक्ष हमें औषधि प्रदान करता है, तो एक ही भूमि से हमें कई प्रकार की विविध वस्तु प्राप्त होती है, यह प्रकृति की विविधता ही तो है, जो हमें वरदान स्वरूप प्राप्त हुई है, हमें कई प्रकार के पेड़ पौधे, जीव जंतु, वनस्पतियां, खनिज की खदानें, नदियां,
पहाड़ और भी कहीं विविध वस्तु हमें प्राप्त हुई है, विविध प्रकार की संस्कृतियां, विभिन्न विचार, इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि में विविधता
हमें देखने को मिलती है, तो जो यह विविधता है, चाहे वह हमें वस्तुओं के रूप में देखने को मिले, संस्कृतियों के रूप में देखने को मिले,
या अन्य प्रकार से इसके हमें दर्शन हो, यह विविधता ही दरअसल ईश्वरीय दर्शन है,
हमारे भारतीय दर्शन 33 करोड़ देवताओं व
विभिन्न वैचारिक मतभेदों को इसी विविधता के साथ अपनाया है, यही हमारे भारतीय दर्शन की सबसे मजबूत कड़ी है,
पर आश्चर्यजनक रूप से हम इसका यह मूल स्वरूप भूल गये, वह हम सभी को एक समान रूप में देखने या विकसित करने की कल्पना में लग गये, जबकि यह प्रकृति विरुद्ध है, प्रकृति ने हमें विविधता प्रदान की है, और हमें उस विविधता का सम्मान करते हुए उसे स्वीकार करना चाहिए।
विशेष:- विविधता ही सृष्टि का सौंदर्य है, और यही इसकी सबसे बड़ी मूल ताकत है, अगर हम सृष्टि की विविधता को नष्ट करते हैं, तो हम ईश्वरीय वरदान का भी अपमान ही करते हैं, इसकी विविधता के साथ ही हम इसे अपनायें, जो भी है ,जैसा भी है, वह उसकी जगह अपनी विविधता के कारण है, उसका सम्मान करें।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद