प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हमारा विषय है ,आवरण 
हम जैसे हैं, उस पर हम एक आवरण चढ़ा लेते हैं, और धीरे-धीरे उन आवरणों की संख्या
इतनी अधिक हो जाती है, हम अपना मूल स्वरूप ही खो बैठते हैं, हम जैसे हैं, जो भी हमें प्रकृति से प्राप्त है, उसे उसी मूल रूप में रखना हमारा कर्तव्य है, मगर शायद आज का दौर प्रस्तुतीकरण का दौर है, आपमें भले उतनी काबिलियत ना हो, पर उस पर आवरण तो चढ़ा ही सकते हैं, एक या दो आवरण हो, 
तब तक तो ठीक है, मगर जब आवरण की परतें इतनी अधिक हो जाए कि सत्य ही समझ नहीं आये, तो हमें फिर से एक बार 
यह समझना होगा, सत्य छिपता नहीं, भले ही उस पर कितने भी असत्य के आवरण चढ़ा दिये
 जाये, मगर वर्तमान परिदृश्य मैं अगर हम समाज को देखें, तो चहूं और एक ही प्रकार
का वातावरण है, किस प्रकार हम ऐसा प्रस्तुतीकरण करें कि हमारी खामियां तो 
नजर ही नहीं आये, हमारा ऊपरी आवरण 
इतना प्रभावशाली हो, कोई व्यक्ति  हमारा सही व्यक्तित्व जान ही न सके, जो हम आवरण में लपेटकर पेश कर दे, बस वही सच नजर आये, यह विकृति समाज में, राजनीतिक दलों में व संपूर्ण समाज के विभिन्न वर्गों में 
तेजी से व्याप्त हो गई है, हम किसी के भी व्यक्तित्व का सही आकलन ही नहीं कर पाते, क्योंकि आवरणों की परत ही इतनी चढ़ी हुई है, जिसमें सब कुछ धुंधला नजर आता है। 
समाज में व्याप्त यह जो परिवर्तन है, वह सामाजिक हित में तो कतई उचित नहीं है,
सच आखिरकार कितनी भी परतो में हो, सामने आता ही है, इसलिए आवरण कितना जरूरी है, यह अवश्य समझे, अनावश्यक रूप से इसका जो दुरुपयोग हो रहा है, उससे हमें सावधान रहने की जरूरत है। 
विशेष:- आज हर व्यक्ति इतने आवरण में कैद है, कि उसका मूल व्यक्तित्व या स्वरूप 
जो प्रकृति ने उसे प्रदान किया है, आवरणों 
की परतो ने समाज में एक अस्वस्थ परंपरा को जन्म दे दिया है, जहां बिना आवरण के कोई सामने आना ही नहीं चाहता, और यह समाज के लिए घातक है, कोशिश करें आवरण की आवश्यकता जितनी उचित हो, 
केवल उतनी मात्रा में ही उसका प्रयोग करें। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, विविधता पर, इस संपूर्ण सृष्टि में जो विविधता है, वही दरअसल इसको संपूर्ण भी बनाती है, आप देखें,  भूमि के अंदर जब अलग-अलग बीज होते हैं, तो भूमि तो वही एक होती है,
मगर कहीं हम उन बीजों के माध्यम से जो देखते हैं, कहीं पर  बीजों के माध्यम से जो वृक्ष उगते हैं, यह जो पौधे उत्पन्न होते हैं, वे अलग-अलग प्रकार के होते है, जैसे कोई हमें फल प्रदान करता है, कोई फूल प्रदान करता है, तो कोई फूल व फल दोनों प्रदान करता है, व कोई वृक्ष हमें औषधि प्रदान करता है, तो एक ही भूमि से हमें कई प्रकार की विविध वस्तु प्राप्त होती है, यह प्रकृति की विविधता ही तो है, जो हमें वरदान स्वरूप प्राप्त हुई है, हमें कई प्रकार के पेड़ पौधे, जीव जंतु, वनस्पतियां, खनिज की खदानें, नदियां,
पहाड़ और भी कहीं विविध वस्तु हमें प्राप्त हुई है, विविध प्रकार की संस्कृतियां, विभिन्न विचार, इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि में विविधता 
हमें देखने को मिलती है, तो जो यह विविधता है, चाहे वह हमें वस्तुओं के रूप में देखने को मिले, संस्कृतियों के रूप में देखने को मिले, 
या अन्य प्रकार से इसके हमें दर्शन हो, यह विविधता ही दरअसल ईश्वरीय दर्शन है,
हमारे भारतीय दर्शन 33 करोड़ देवताओं व
 विभिन्न वैचारिक मतभेदों को इसी विविधता के साथ अपनाया है, यही हमारे भारतीय दर्शन की सबसे मजबूत कड़ी है, 
पर आश्चर्यजनक रूप से हम इसका यह मूल स्वरूप भूल गये, वह हम सभी को एक समान रूप में देखने या विकसित करने की कल्पना में लग गये, जबकि यह प्रकृति विरुद्ध है, प्रकृति ने हमें विविधता प्रदान की है, और हमें उस विविधता का सम्मान करते हुए उसे  स्वीकार करना चाहिए।
विशेष:- विविधता ही सृष्टि का सौंदर्य है, और यही इसकी सबसे बड़ी मूल ताकत है, अगर हम सृष्टि की विविधता को नष्ट करते हैं, तो हम ईश्वरीय वरदान का भी अपमान ही करते हैं, इसकी विविधता के साथ ही हम इसे अपनायें, जो भी है ,जैसा भी है, वह उसकी जगह अपनी विविधता के कारण है, उसका सम्मान करें। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद


प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, परिचय शब्द पर, परिचय यह शब्द अपने आप में बड़ा महत्व रखता है, परिचित व्यक्ति यानी जाना-
पहचाना, जिस पर हम भरोसा कर सकते हैं। 
      इस शब्द के कई अर्थ है, जैसे किसी की वाणी, व्यक्ति अपनी वाणी से क्या वार्तालाप करता है, किस प्रकार के शब्दों का चयन
करता है, इससे हमें उसके संस्कारों का परिचय मिलता है, हम कहीं पर जाएं, किसी कार्यक्रम में शामिल हो, और वहां कोई भी परिचित न हो, तो वह कार्यक्रम भी चाहे कितना ही अच्छा हो, हमें बेरंग सा लगता है। 
      परिचय हमें किससे बढ़ाना चाहिए, वैसे
व्यवहारिक सूत्र यह है, हमें सभी से परिचय 
रखना चाहिये, मगर फिर भी हमें गुणीजन
व अपने से बेहतर लोगों से परिचय करना चाहिए, ताकि हमारी गरिमा मैं और अभिवृद्धि हो, क्योंकि जैसे लोगों से हमारा परिचय होगा, 
उसी प्रकार की हमारी सामाजिक स्थिति निर्मित होगी। हमें किसी से भी परिचय करते समय सावधानी बरतनी चाहिए, तुरंत किसी
का भी विश्वास न करके हमें परख कर फिर परिचय बढ़ाना चाहिए।
       साथ ही हमें अपनी संतानों को भी इस बात की शिक्षा देंनी चाहिए, कि वे अपनी 
संगति व परिचय हमेशा अच्छे गुणों वाले
व्यक्तियों से रखें, इससे हमें कुछ सीखने को भी मिलता है, परिचय हमेशा सोच समझ कर 
जांच परख कर ही करें।
विशेष:- परिचय हमेशा सोच समझ कर व 
   गुणीजनों से ही करना चाहिए, बातचीत हम भले ही सबसे करें, लेकिन घनिष्ठ परिचय हमेशा गुणवान व अच्छे लोगों से करें, जिससे आपकी सामाजिक गरिमा में भी अभिवृद्धि होगी।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे सत्ता पर, 
सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए, सभी को
सत्ता चाहिए, यह एक छोटा सा शब्द है,
मगर इसके मायने बड़े है।
      जिस किसी के पास भी सत्ता आती है,
वह साथ में मद भी लाती है, जो सत्ता पाकर
मद में नहीं आता, वह बुद्धिमान है, मगर 
ऐसा होता नहीं है, कोई भी व्यक्ति जब सत्ता धारण करता है, तब  स्वाभाविक रूप से 
सत्ता का मद उसे आता ही है, जिन बातों के लिए पूर्व में आसीन सत्ताधारियों को कोसता 
था, सत्ता प्राप्ति के बाद वह भी उन्ही राहो पर चल पड़ता है, सत्ता का असर ही कुछ ऐसा है।
सत्ता प्राप्ति के बाद सत्ता का सदुपयोग होना चाहिए, मगर देखने में आता है, सत्ता प्राप्त होने के बाद वह भी अपनी पूर्ववर्ती सत्ताधारियों जैसा ही आचरण करने लगते हैं, 
जिन बातों के लिए उनकी आलोचना करते थे,
अब वह स्वयं भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं, और यह समाज के लिए बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, इसमें बदलाव तभी संभव है, जब स्वच्छ छवि वाले राजनेता, जिन्हें  सत्ता का मोह नहीं है, जो अच्छे कार्य के लिए संकल्पित है, जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हीं लोगों के हाथ में सत्ता 
 रहे, एक कहावत भी है, यथा "राजा तथा प्रजा" यानी जैसा शासक होगा, जैसी सत्ता होगी, उनके जैसा आचरण  होगा, जनता भी उनके ही पदचिन्हो पर चलेगी।
विशेष:- सत्ता का हमेशा सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं, क्योंकि समाज में जैसा शासक संदेश देता है, वह आचरण करता है, जनता भी वैसा ही करती है। सत्ता हमेशा विवेकशील लोगों के हाथों में होना चाहिए।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हमारा विषय है ,जिज्ञासा, कुछ करने की, कुछ जानने की, कुछ नया खोजने की, वह जिज्ञासा ही है, जो हमें कुछ नया करने को प्रेरित करती है, मनुष्य ने आधुनिक विज्ञान के जितने भी आविष्कार किये हैं,
वह उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण ही किये है, कुछ नया खोजने व करने की प्रवृत्ति हमारे जिज्ञासा के कारण ही हमें कुछ नया करने की प्रेरणा प्रदान करती है, कोई भी कार्य किस प्रकार होगा, किस प्रकार कुछ नए तरीके से किसी  कार्य को हम करें, ताकि वह अन्य लोगों से बेहतर व कुछ अलग हो, ऐसा हमारी जिज्ञासा के कारण ही संभव है, किसी प्रकार का नया आविष्कार या कोई नया प्रयोग जो हमें जीवन में और अधिक बेहतरी की ओर अग्रसर करें, वैज्ञानिक रूप से भी जितनी उन्नति हुई है, वह मानवीय जिज्ञासा का ही परिणाम है, और वह जिज्ञासा ही है, जो हमें नित निरंतर नये शोध की और हमें ले जाती है, जितनी हमारी जिज्ञासु प्रवृत्ति होगी, उतना ही हम जीवन में बेहतर कर पाएंगे, कुछ नया जानने व करने की प्रेरणा हमें हमारी जिज्ञासा 
ही प्रदान करती है, अगर यह प्रवृत्ति मनुष्य में विकसित न होती तो जो भी परिवर्तन हुए है,
वे परिवर्तन न हुए होते, हमारी जिज्ञासा हमें नए परिवर्तन , नए शोध, व कुछ अलग करने का साहस प्रदान करती है, जो जितना जिज्ञासु होता है, वह उतना ही अधिक प्रयत्नशील भी होता है, और जो अधिक प्रयत्न करेगा, उसके हिस्से में सफलता भी 
अधिक होगी, जीवन में अपनी जिज्ञासा को जागृत रखें, नित्य नए परिवर्तन को समझे, 
कुछ नया जानने की जिज्ञासा ही जिंदगी में ऊर्जा को जागृत किये रहती है,  जीवन में जिज्ञासु बने, व नई मंजिलों की और अग्रसर हो। 
विशेष:- जिज्ञासा को जागृत किये बगैर हम अपने जीवन में वहीं के वहीं खड़े हो सकते हैं, 
अगर जीवन को सकारात्मक परिवर्तन व आगे की ओर अग्रसर करना है, तो हमें जिज्ञासु होना होगा, नई चीज किस प्रकार होती है, वे कैसे कार्य करती है, यह जिज्ञासा ही हमें अपने जीवन में और आगे ले जायेगी।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह में आज चर्चा का विषय है, सदाबहार
अभिनेता धर्मेंद्र जी का स्वर्गवास, 
        अभिनेता धर्मेंद्र ने शुरुआत से ही कड़ी मेहनत की, वे उसे दौर के अभिनेता थे, जब कई नामी सितारे उनके सामने थे, दिलीप कुमार, राज कपूर जैसे दिग्गज अभिनेता उनके सामने थे, उस समय जब शारीरिक गठन की और किसी अभिनेता का इतना ध्यान नहीं था, उन्होंने अपने शरीर पर भी पूरा ध्यान दिया, वे परदे पर बलशाली नजर आते थे, और इसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत थी,
वे अपनी जवानी के दिनों में बहुत ही खूबसूरत नजर आते थे, 
          उनकी फिल्म " फूल और पत्थर" जिसने भी देखी होगी, वह इस बात की गवाही देगा, उस दौर की लोकप्रियअभिनेत्री मीना कुमारी के साथ उनकी इस फिल्म में जोड़ी थी।
       कई अभिनेताओं के सामने होने के बाद भी अपने दमदार अभिनय, खूबसूरती व लगातार मेहनत की बदौलत उन्होंने फिल्मों में शिखर को छुआ, मगर इन सब के बीच उन्होंने अपने मूल व्यक्तित्व को, जो की एक जिंदादिल इंसान होने का था, उसे कभी नहीं गंवाया। 
         फिल्म शोले में जय- वीरू की जोड़ी के रूप में जो ऐतिहासिक फिल्म बनी, वह आज भी उस दौर की यादें ताजा कर देती है, और अपने दौर की बहुत सफलतम फिल्म थी, व आज भी है।
           वे सदाबहार अभिनेता रहे, उन्होंने गंभीर, चुलबुले, रोमांटिक, अल्हड़, आक्रामक 
अपने फिल्मों के सभी किरदारों को बड़ी ही खूबसूरती से निभाया।
          अपने संपूर्ण जीवन में  जो उनकी विशेषता रही, वह यह कि उन्होंने अभिनेता के तौर पर ही नहीं, एक विराट व्यक्तित्व के रूप में अपने आप को जिया। 
    उन्होंने दो विवाह किये, मगर फिर भी दोनों ही परिवारों के बीच सामंजस्य  बनाकर वह चले, उनका  व्यक्तित्व एक ऐसे रूप में हमारे सामने आता है, जो चकाचौंध की दुनिया में भी अपने मूल व्यक्तित्व को बरकरार रख सका, उनकी यही खूबी उन्हें अपने समकालीन अभिनेताओं से अलग एक मुकाम देती है। 
       वे अपनी उम्र के इस पड़ाव पर भी लगातार सक्रिय रहे, और उनकी लगातार सक्रियता ने  ही उन्हें उस पायदान पर पहुंचाया,
जहां से वे  हमेशा अपने चाहने वालों के चहेते बने रहेंगे।
       उन्होंने लगातार सक्रियता पूर्वक जीवन जी कर यह बताया की उम्र एक पड़ाव हो सकती है, मगर जिंदादिली वाला स्वभाव ही 
उनकी ताकत था, इतने बड़े मुकाम पर 
पहुंचने के बाद भी उनकी सरलता, सौम्यता व सादगी, उनका ठेठ ग्रामीण परिवेश, अपनी माटी से अंत तक लगाव उनकी शख्सियत में मानो चार चांद लगा देता है। 
             उनके निधन के साथ ही एक ऐसे सदाबहार अभिनेता कभी अंत हो गया, जो अपने निजी जीवन में भी बडे ही जिंदा दिल रहे, उनका निधन भले ही हो गया, मगर वे अपने चहेते दर्शकों के दिलों पर हमेशा राज करेंगे। 
           उन्हें सादर नमन, एक अभिनेता के रूप में आपने जो प्रसिद्धि हासिल की, लोगों
का स्नेह व प्यार पाया, वह बहुत ही कम लोगों के नसीब में होता है।
       पुनः ऐसे अभिनेता सदियों में होते हैं,
जिनका व्यक्तित्व भी इतना विराट हो, वह हमेशा अपनी माटी से जुड़े रहे, यही उनकी सबसे बड़ी खासियत भी थी, उन्होंने अपने पूरे परिवार को भी एकजूट रखा।
        ऐसे अभिनेता, जो हमेशा याद  रहेंगे,
अलविदा। 
  विशेष:- फिल्मी पर्दे पर ही नहीं, उन्होंने अपने निजी जीवन को भी पूर्ण गरिमा से जिया, बेशक ,उन्होंने दो विवाह किये, मगर दोनों ही रिश्तों को उन्होंने पूर्ण शिद्दत से निभाया, वे  एक शानदार अभिनेता और एक सदाबहार व्यक्तित्व के मालिक थे, सभी दर्शकों की ओर से उन्हें सादर नमन। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, वितरण पर, 
यानी किसी भी वस्तु या साधनों का वितरण
हम किस प्रकार करें, यह बहुत महत्वपूर्ण है। 
और अगर हमें यह सीखना है तो प्रकृति से बड़ा शिक्षक कोई नहीं, प्रकृति हमें सिखाती है की वितरण असमान रूप से न करके सभी के बीच समान रूप से किया जाये, उसकी मिसाल हम सूर्य , पृथ्वी, जल, वायु, आकाश
इन सभी से प्राप्त कर सकते हैं, यह सभी को समान रूप से उपलब्ध है, इनके वितरण में कोई असमानता नहीं है, कोई अमीर- गरीब,
ऊंच-नीच, अपना -पराया ऐसा कोई भी भेद नहीं है, जब प्रकृति ने इतनी सुंदर व्यवस्था हमें प्रदान की है, तो हम उससे यह क्यों नहीं सीखते, मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण उपलब्ध साधनों के वितरण में गड़बड़ी करता है, और असंतुलन को जन्म देता है, मनुष्य अपने स्वार्थ को परे  रख सके, तो बहुत सारी व्यवस्थाएं स्वयं सुचारू रूप से चलने लगेंगी,
जब साधनों के वितरण में असमानता उत्पन्न होती है, तो समाज में रोष उत्पन्न होता है, व
असमान वितरण के कारण सामाजिक संतुलन बिगड़ता है, इसकी जवाबदारी 
निश्चित रूप से सबसे अधिक राजनीतिक लोगों की है, मगर क्या उन्हें चुनकर हम ही लोग नहीं भेजते, तो हमारा चुनाव ऐसे राजनीतिक लोगों का होना चाहिए, जो 
निष्पक्ष व समान वितरण किस प्रकार हो,
वह व्यवस्था बनाने में सहायक हो, न कि
वह असमान वितरण में सहयोगी हो, अच्छी विचारधारा वाले लोगों को चुनने का जो अधिकार हमें प्रजातांत्रिक व्यवस्था ने दिया है,
हम उसका उपयोग सही राजनेताओं को चुनने में करे, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल के हो, मगर उनकी विचारधारा व कार्यशैली अच्छी होनी चाहिए, जो समाज में सही वितरण को , साधनों को किस प्रकार बांटा जाए, ताकि समाज के आधिकाधिक वर्ग तक 
समस्त साधन पहुंच सके, जितना समान रूप से समाज में वितरण होगा, उतना ही समाज
सशक्त होगा, वितरण प्रणाली इस प्रकार विकसित की जाए की जो समाज में पिछड़े व निम्न वर्ग के लोग हैं, वे भी  अपने स्वाभिमान के साथ मुख्यधारा में शामिल हो।
विशेष:- कोई भी समाज या देश उसके नागरिकों से बनता है, किसी भी देश राजनीतिक कार्यक्रम इस प्रकार के होने चाहिए, जो साधनों के समान वितरण की व्यवस्था सुनिश्चित कर सके, तभी समाज व देश सशक्त होगा, व मानवीय मूल्यों की भी
सुरक्षा होगी।