प्रिय पाठक गण,
सादर वंदन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, नियति शब्द पर, नियति यानी भाग्य, पर इस शब्द की जरा हम गहराई को समझे, जैसी नियत वैसी नियति, यानी आपकी आंतरिक विचारधारा
या नियत जैसी होगी, अंततः वही आपकी नियति बनेगी।
हमने कई बार चर्चा में लोगों से सुना
हैं, की जो नियति में लिखा है वह तो होगा ही,
पर इसका निर्माण किस प्रकार होता है, हमारे अपने कर्म ही हमारी नियति का निर्माण करते हैं, यह हमें नहीं भूलना चाहिए, हम चाहे किसी से कुछ छुपा ले, मगर हम स्वयं यह जानते हैं, कि हमारा कौन सा कदम सही था,
व कौन सा गलत, पर हम सभी अपने-अपने
स्वार्थवश अपने गलत निर्णय का भी
अपने तर्कों द्वारा बचाव करते हैं, कभी हम परिस्थिति को, कभी उस समय यही सही था,
इस प्रकार अपने निर्णय को हम स्वयं ही सही ठहराने लगते हैं, लेकिन अगर हमारा निर्णय सही नहीं है, तो फिर वह निर्णय हमारी नियति भी बन सकता है, और हमारे सही या गलत फैसलों का जो भी परिणाम है, वह हमारे जीवन में हमारी नियति है, यानी यह नियत है, तय है, जैसा हमारा कर्म वैसा परिणाम, इसी को हम नियति कहते हैं।
और हमारा कर्म जैसा भी हो, उसके परिणाम तो आकर रहते ही हैं, और उसे हम बदल नहीं सकते, और जो हम बदल नहीं सकते, उसे ही हम कह देते हैं यही हमारी नियति है, पर जरा विचार करके देखें, तो हम नियति को बदल सकते थे, अगर हमने अपने कर्म पर ध्यान दिया होता, तो नियति बदली भी जा सकती है, पर केवल तब, जब हमारे कर्मों की दिशा सही और अग्रसर हो, तो हम हमारी नियति का निर्माण स्वयं करते हैं,
जाने अनजाने ही हमारे द्वारा जो कर्म होते हैं,
वे ही हमारी नियति का निर्माण करते हैं।
विशेष:- नियति को हम स्वयं तय करते हैं, अपने कर्मो द्वारा, इसका दोष हम किसी और पर नहीं डाल सकते, इसलिए जब भी हम कोई कर्म करें, सोच विचार कर, समझ कर
फिर सही दिशा में कर्म करें, तो हमारी नियति
स्वाभाविक रूप से अच्छी होगी, जैसी नियत,वैसी हमारी नियति।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।