प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   मुझे पूर्ण विश्वास है आप सभी को मेरा यह प्रवाह पसंद आ रहा होगा, मैंने अपनी और से संपूर्ण कोशिश की है, कि मैं अधिक से अधिक
विषयों का समावेश इसमें कर सकूं, इसी श्रृंखला में आज का मेरा लेख है, स्वयं से प्रश्न,
      हमारे जीवन का अधिकांश समय हम इसी बात में व्यतीत कर देते हैं कि अन्य लोग क्या कर रहे हैं, कभी हम स्वयं से यह प्रश्न करते है, हम स्वयं  जीवन में क्या कर रहे हैं,
क्या हम अपने आप से संतुष्ट हैं , हम भीतर से शांत है, क्या हम अपनी उसी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे हम स्वयं आंतरिक रूप से महसूस करते हैं, या हम अन्य लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, उसी पर चल रहे हैं,  क्या हम स्वयं से कभी यह प्रश्न करते हैं, कि जिस मार्ग पर भी हम चल रहे हैं, वह हमें आंतरिक संतुष्टि प्रदान करता भी है, अथवा नहीं। 
      हम सभी को अपने जीवन काल में अनेक दुविधाओं से गुजरना होता है, विभिन्न समस्या हमारे जीवन में उपस्थित होती है, उनका समाधान करते समय क्या हम विवेकपूर्ण निर्णय लेते है, या भावनाओं में बहकर पक्षपातपूर्ण निर्णय करते है, केवल अर्जुन के जीवन में ही यह प्रश्न या द्वंद्व नहीं खड़ा हुआ था, हम सबके जीवन में यह प्रश्न खड़े होते हैं,
हम सभी यह याद रखें, कोई भी धर्म ग्रंथ या गुरु हमें केवल दिशा प्रदान कर सकते हैं,
अंततः मार्ग पर चलना तो हमें ही होता है,
और स्वयं से प्रश्न पूछे बगैर यह संभव नहीं, 
हमें अपने आप को जांचना चाहिए, कि हम कोई भी कदम जो जीवन में उठाते हैं, उसके
पीछे आखिर हमारी मंशा क्या है?
        इसको हम एक उदाहरण द्वारा समझे, 
की माता-पिता , गुरुजन जब हमें डांटते हैं, तो उसे व्यवहार के पीछे उनका यह मकसद होता है, कि हम अपने जीवन में सुधार व प्रगति करें , यानी एक सकारात्मक परिणाम के लिए वह हमें  डांटते हैं, तो हम भी अपने कदम को इसी प्रकार जांचे, की जो भी हम कदम उठा रहे हैं उसके परिणाम सकारात्मक होंगे या
नकारात्मक, फिर जब हम आकलन करके यह निर्णय लेंगे, तो वह शत प्रतिशत तो नहीं, 
मगर बहुत कुछ सकारात्मक भावना के अनुकूल होगा, इसी को मै स्वयं से प्रश्न पूछना कहता हूं। 
विशेष:-  जिन प्रश्नों के उत्तर हम दूसरों से चाहते हैं, सबसे पहले उन प्रश्नों को हम अपने जीवन में भी पूछे, हम कोई भी निर्णय किस प्रकार करते हैं, उस निर्णय के पीछे का हमारा आधार किस प्रकार का है, अगर सकारात्मक परिणाम पाने के लिए वह निर्णय लिया है, 
उसके पीछे की आपकी मंशा स्पष्ट है, बस यही स्वयं से प्रश्न पूछना है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   मुझे पूर्ण विश्वास है आप सभी को मेरा यह प्रवाह पसंद आ रहा होगा, मैंने अपनी और से संपूर्ण कोशिश की है, कि मैं अधिक से अधिक
विषयों का समावेश इसमें कर सकूं, इसी श्रृंखला में आज का मेरा लेख है, स्वयं से प्रश्न,
      हमारे जीवन का अधिकांश समय हम इसी बात में व्यतीत कर देते हैं कि अन्य लोग क्या कर रहे हैं, कभी हम स्वयं से यह प्रश्न करते है, हम स्वयं  जीवन में क्या कर रहे हैं,
क्या हम अपने आप से संतुष्ट हैं , हम भीतर से शांत है, क्या हम अपनी उसी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे हम स्वयं आंतरिक रूप से महसूस करते हैं, या हम अन्य लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, उसी पर चल रहे हैं,  क्या हम स्वयं से कभी यह प्रश्न करते हैं, कि जिस मार्ग पर भी हम चल रहे हैं, वह हमें आंतरिक संतुष्टि प्रदान करता भी है, अथवा नहीं। 
      हम सभी को अपने जीवन काल में अनेक दुविधाओं से गुजरना होता है, विभिन्न समस्या हमारे जीवन में उपस्थित होती है, उनका समाधान करते समय क्या हम विवेकपूर्ण निर्णय लेते है, या भावनाओं में बहकर पक्षपातपूर्ण निर्णय करते है, केवल अर्जुन के जीवन में ही यह प्रश्न या द्वंद्व नहीं खड़ा हुआ था, हम सबके जीवन में यह प्रश्न खड़े होते हैं,
हम सभी यह याद रखें, कोई भी धर्म ग्रंथ या गुरु हमें केवल दिशा प्रदान कर सकते हैं,
अंततः मार्ग पर चलना तो हमें ही होता है,
और स्वयं से प्रश्न पूछे बगैर यह संभव नहीं, 
हमें अपने आप को जांचना चाहिए, कि हम कोई भी कदम जो जीवन में उठाते हैं, उसके
पीछे आखिर हमारी मंशा क्या है?
        इसको हम एक उदाहरण द्वारा समझे, 
की माता-पिता , गुरुजन जब हमें डांटते हैं, तो उसे व्यवहार के पीछे उनका यह मकसद होता है, कि हम अपने जीवन में सुधार व प्रगति करें , यानी एक सकारात्मक परिणाम के लिए वह हमें  डांटते हैं, तो हम भी अपने कदम को इसी प्रकार जांचे, की जो भी हम कदम उठा रहे हैं उसके परिणाम सकारात्मक होंगे या
नकारात्मक, फिर जब हम आकलन करके यह निर्णय लेंगे, तो वह शत प्रतिशत तो नहीं, 
मगर बहुत कुछ सकारात्मक भावना के अनुकूल होगा, इसी को मै स्वयं से प्रश्न पूछना कहता हूं। 
विशेष:-  जिन प्रश्नों के उत्तर हम दूसरों से चाहते हैं, सबसे पहले उन प्रश्नों को हम अपने जीवन में भी पूछे, हम कोई भी निर्णय किस प्रकार करते हैं, उस निर्णय के पीछे का हमारा आधार किस प्रकार का है, अगर सकारात्मक परिणाम पाने के लिए वह निर्णय लिया है, 
उसके पीछे की आपकी मंशा स्पष्ट है, बस यही स्वयं से प्रश्न पूछना है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर वंदन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, नियति शब्द पर, नियति यानी भाग्य, पर इस शब्द की जरा हम गहराई को समझे, जैसी नियत वैसी नियति, यानी आपकी आंतरिक विचारधारा 
या नियत जैसी होगी, अंततः वही आपकी नियति बनेगी। 
       हमने कई बार चर्चा में लोगों से सुना
हैं, की जो नियति में लिखा है वह तो होगा ही,
पर इसका निर्माण किस प्रकार होता है, हमारे अपने कर्म ही हमारी नियति का निर्माण करते हैं, यह हमें नहीं भूलना  चाहिए, हम चाहे किसी से कुछ छुपा ले, मगर हम स्वयं यह जानते हैं, कि हमारा कौन सा कदम सही था,
व कौन सा गलत, पर हम सभी अपने-अपने 
स्वार्थवश अपने गलत निर्णय का भी  
अपने तर्कों द्वारा बचाव करते हैं, कभी हम परिस्थिति को, कभी उस समय यही सही था,
इस प्रकार अपने निर्णय को हम स्वयं ही सही ठहराने लगते हैं, लेकिन अगर हमारा निर्णय  सही नहीं है, तो फिर वह निर्णय हमारी नियति भी बन सकता है, और हमारे सही या गलत फैसलों का जो भी परिणाम है, वह हमारे जीवन में हमारी नियति है, यानी यह नियत है, तय है, जैसा हमारा कर्म वैसा परिणाम, इसी को हम नियति कहते हैं। 
        और हमारा कर्म जैसा भी हो, उसके परिणाम तो आकर रहते ही हैं, और उसे हम बदल नहीं सकते, और जो हम बदल नहीं सकते, उसे ही हम कह देते हैं यही हमारी नियति है, पर जरा विचार करके देखें, तो हम नियति को बदल सकते थे, अगर हमने अपने कर्म पर ध्यान दिया होता, तो नियति बदली भी जा सकती है, पर केवल तब, जब हमारे कर्मों की दिशा सही और अग्रसर हो, तो हम हमारी नियति का निर्माण स्वयं करते हैं,
जाने अनजाने ही हमारे द्वारा जो कर्म होते हैं,
वे ही हमारी नियति का निर्माण करते हैं।
विशेष:- नियति को हम स्वयं तय करते हैं, अपने कर्मो द्वारा, इसका दोष हम किसी और पर नहीं डाल सकते, इसलिए जब भी हम कोई कर्म करें, सोच विचार कर, समझ कर 
फिर सही दिशा में कर्म करें, तो हमारी नियति 
स्वाभाविक रूप से अच्छी होगी, जैसी नियत,वैसी हमारी नियति।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज 5 सितंबर शिक्षक दिवस है, जो हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन जी का जन्म दिवस भी है, वह स्वयं एक शिक्षक भी रहे, व उन्हीं की याद में 5 सितंबर को, जो उनका जन्म दिवस भी है, हम शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं।
    अगर हम आज के संदर्भ में देखें, तो शिक्षकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि संचार के इतने अधिक साधन
हो गए हैं की सूचनाएं भी हमें भ्रमित करने लगी है, हम किस दिशा की ओर अग्रसर हो, 
ऐसे में शिक्षकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, वे अपने ज्ञान द्वारा 
उन सूचनाओं में से हमारे लिए क्या महत्वपूर्ण व उपयोगी है, क्या समाज हित में है, वह हमें बता सकते हैं, पिछले कुछ सालों में जिस प्रकार से नैतिक मूल्यों का क्षरण हुआ है,
तो उन मूल्यों को पुनः स्थापित करने में भी 
हमारे शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं, कोई भी राष्ट्र या देश तभी सशक्त होता है, जब वहां साधनों के साथ,
उन साधनों का किस प्रकार उपयोग किया जाये,
यह मार्गदर्शन करने वाले बेहतर शिक्षक हो,
 राष्ट्र की नींव किस प्रकार मजबूत की जाए, जिस पर राष्ट्र का नवनिर्माण हम कर सके, केवल साधन हमें वह ऊंचाई नहीं दे सकते, लेकिन उनका सही व समुचित प्रयोग, जो हमें हमारे शिक्षक प्रदान करते हैं, 
वही हमें शीर्ष पर पहुंचा सकते हैं, हमारे जीवन में शिक्षकों की भूमिका ऐसी है, जो हमारा जीवन गढ़ती है, सभी शिक्षक बंधुओं को शत शत नमन। 
विशेष:- शिक्षक हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, व हमारा जीवन गढ़ते हैं, उसे संवारते हैं, उनकी राष्ट्र निर्माण व हमारे जीवन के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है, 
उन्हें शत शत नमन। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, लगन यानी किसी भी विषय में व्यक्ति तब शीर्ष पर पहुंच सकता है, जब वह पूर्ण लगन से उस पर कार्य करें, एक ही विषय में दो अलग-अलग व्यक्तियों के प्रदर्शन में जो भिन्नता हमें देखने को मिलती है, वह उन दोनों की लगन में,
जिसकी लगन ज्यादा है, उसका प्रदर्शन हमें बेहतर देखने को मिलेगा।
        जब कोई भी व्यक्ति किसी विषय या 
या खेल, या कोई और भी क्षेत्र हो, जब अपनी पूर्ण अभिरुचि या लगन से कार्य करता है, तो परिणाम भी उतने ही शानदार प्राप्त होते हैं।
      पूर्ण लगन से कार्य करने पर अन्य किसी और की तुलना में जो व्यक्ति अधिक लगन से काम करता है, वह अधिक अच्छे परिणाम प्राप्त करता है, बिना लगन के कोई कार्य करने पर हमें अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं 
हो सकते। 
      जब किसी की भी उम्र कम हो, उसी समय हमें उसकी अभिरुचि या लगन किस और है, यह परख करके हमें जिस कार्य में उसकी अभिरुचि या लगन है, उस कार्य हेतु उसे प्रोत्साहित करना चाहिये, इससे उसे अपने जीवन में जो परिणाम प्राप्त  होंगे,
वह बहुत ही बेहतर होंगे, पूर्ण लगन से कोई
 भी कार्य करने पर उस कार्य की सफलता में कोई संदेह नहीं रह जाता, बल्कि स्वयं की अभिरुचि होने से  वह और अधिक लगन से उस कार्य को करता है, व आज के प्रतियोगी दौर में अन्य लोगों से बेहतर करता है।
विशेष:- हमें जीवन के प्रारंभिक काल में ही 
किसी की अभिरुचि या लगन किस और है,
यह ज्ञात करना चाहिए व उसे उसी और प्रेरित करना चाहिए, ताकि वह अधिक से अधिक श्रेष्ठ परिणाम अपने जीवन में हासिल करें। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत,
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, युवा पीढ़ी पर, 
आज की युवा पीढ़ी स्वतंत्र विचारधारा वाली 
व किसी भी कार्य को करने से पहले संपूर्ण रूप से विचार करने वाली है, वह पहले से कहीं अधिक सजग है, उसके अपने विचार 
वह बिल्कुल स्पष्ट तरीके से परिवार व समाज के सामने रखती है, उनके मन में किसी प्रकार का कोई संशय नहीं है, बिना किसी भय के
वह अपने विचारों को प्रस्तुत करती है, अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले वह स्वयं देख परख कर करना चाहती है, राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर भी वह अपनी स्पष्ट राय रखती है, हो सकता है, पुरानी पीढ़ी  व युवा पीढ़ी में वैचारिक मतभेद हो, मगर वह अपने 
कर्तव्य भी बखूबी निभाना जानती है, विवाह जैसे गंभीर विषय पर भी वह सोच समझकर निर्णय करना चाहती है, केवल माता-पिता या परिवार के दबाव में वह कोई फैसला नहीं लेती, क्योंकि उन्हें मालूम है, यह उनके जीवन का एक ऐसा महत्वपूर्ण फैसला है, जिस पर उन्हें अपने जीवन साथी से वैचारिक साम्यता का होना आवश्यक है, और वह देख परख,
 कर, आपस में अपने होने वाले जीवनसाथी से बात कर फिर इस बात का निर्णय करना चाहते हैं, और मेरी दृष्टि में यह सही भी है,
समय अनुकूल कुछ परिवर्तन हमें स्वीकार करना चाहिये, और उन्हें इस बात की इजाजत देना चाहिये, कि इस निर्णय पर उनका स्वयं का पूर्ण अधिकार हो, वे स्वतंत्र रूप से बगैर किसी दबाव के यह निर्णय ले, आज की युवा पीढ़ी ना तो अपने विचार किसी पर  अनावश्यक रूप से मनवाना चाहती है, व
वह स्वयं भी किसी के वैचारिक दबाव में 
नहीं आना चाहती। 
     युवा पीढ़ी आज के संदर्भ में क्या सही है, 
क्या गलत है, इसका फैसला करना बखूबी जानती है, पुरानी पीढ़ी को उनका विश्वास करना चाहिये, व उनका हौसला बढ़ाना चाहिये, परिवर्तन समय के साथ आते ही हैं,
वह परिवर्तन हमें स्वीकार करना चाहिये।
विशेष:- आज की युवा पीढ़ी पढ़ी-लिखी, 
स्वतंत्र विचारधारा वाली है, वह कोई भी कार्य करने से पहले उसके हर पहलू की जांच करती है, और यह तो अच्छी बात है, मगर इस बात के लिए भी युवा पीढ़ी को उत्तरदायी ठहराया जाता है, कि वह बुजुर्गों की बात नहीं मानती, युवा पीढ़ी दरअसल हर कार्य सोच समझकर करना चाहती है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
मेरे इस ब्लॉग पर आप सभी का हृदय से स्वागत, आज हम प्रवाह में चर्चा करेंगे, मापदंड पर, क्या हम अपना स्वयं का जीवन 
दूसरे के मापदंडों पर या समाज के मापदंडों पर आधारित रखते हैं, या हम स्वयं अपने लिए नए मापदंड तैयार करते हैं, हमारी अपनी प्रगति का आधार हम स्वयं तय करते हैं या सामाजिक मापदंड, जब ईश्वर ने हमको सभी को अलग-अलग गुण प्रदान किये, तो हम सभी को एक ही मापदंड से कैसे परख सकते हैं, यह तो प्रकृति की व उस परम पिता द्वारा प्रदत्त विविधता व विशिष्टता की भी अवहेलना  ही होगी।
       हमें अपने मापदंड स्वयं तय करने होंगे,
हमारे जीवन के लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा, 
यह हम स्वयं तय करें, क्योंकि हम जीवन में जो भी करेंगे, अंततः उसके परिणाम हमें ही
प्राप्त होंगे, तो किसी और के मापदंड से हम अपने जीवन की दिशा क्यों तय करें, हमें अपने मापदंड व जीवन की दिशा स्वयं ही तय करना चाहिए। 
     जीवन हमारा है, तो लक्ष्य भी हमें ही तय करना होंगे, जो परिपाटी चली आ रही है, समय के अनुसार उनका आकलन भी होना चाहिए, नये मापदंड स्थापित होना चाहिए,
समय व काल के अनुसार, परिस्थितियों के आधार पर, नयी खोजो के कारण पुराने मापदंड में आवश्यक परिवर्तन भी जरूरी है।
जीवन में प्रगति का आधार सही सोच व समझ से तय होता है, और सही सोच व समझ ही हमारे मापदंड का आधार होना चाहिए। 
विशेष:- समाज में जो मापदंड बने हैं, उनका पुनरावलोकन होना जरूरी है, सभी मापदंड गलत भी नहीं है, मगर सभी आज के परिप्रेक्ष्य में खरे भी नहीं उतरते, वर्तमान काल के आधार पर क्या जरूरी है, क्या आवश्यक फेर बदल हो सकता है, जिससे हमारी प्रगति बाधित न हो, वह हमारे मापदंड का आधार होना चाहिए। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।