प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, संवाद पर,
संवाद शब्द लगता तो बड़ा छोटा सा है, मगर इस शब्द के मायने बहुत गहरे हैं, संवाद सबसे पहले स्वयं से करें, क्या हम जिस मंजिल पर जाना चाहते हैं, इस दिशा में कार्य कर रहे हैं,
या हम पाना तो कुछ और चाहते हैं, मगर हमारी दिशा उस तरफ नहीं है, स्वयं से संवाद प्रथम सीढ़ी है, द्वितीय सीढ़ी परिवार से
संवाद है, व तृतीय सीढ़ी समाज से संवाद,
और यह क्रम है, इसी क्रम में हमें संवाद को स्थापित करना होगा, जहां संवाद होता है, व किया जाता है, वहां पर समाधान भी निकल कर आते हैं।
हमारी जो कथाएं है, वह भी एक विस्तृत संवाद ही हैं, जो समाज को एक निश्चित धारा
की और ले जाती है, कथाएं दरअसल समाज से संवाद का ही माध्यम है, विभिन्न कथा के माध्यम से कथाकार समाज से एक सजीव संवाद स्थापित करते हैं, और उसे एक स्वस्थ दिशा देने का प्रयास करते हैं।
विभिन्न राजनीतिक दल भी अपने कार्यकर्ताओं से कार्यशालाओं के माध्यम से संवाद स्थापित करते हैं, संवाद की परंपरा बहुत पुरानी है, इसके माध्यम से हम अपने विचारों का आदान-प्रदान करते है, स्वस्थ संवाद किसी भी समाज को आगे करने के लिए एक प्रेरक की भूमिका निभाता है, जिस भी परिवार व समाज में संवाद की स्वस्थ परंपरा पोषित होती है, वह परिवार और समाज वृद्धि की और अग्रसर होता है।
संवाद किसी भी समाज के लिये आवश्यक है, क्योंकि हम संवाद के माध्यम से ही एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान करते हैं,
व किसी निर्णय पर पहुंचने के लिये स्वस्थ संवाद जरूरी भी है, जहां संवाद नहीं होता,
वहां पर फिर विवाद की संभावना बढ़ जाती है, इसीलिए संवाद को हम बनाये रखें, संवाद जारी रहने से समस्या का हल निकल ही आता है, निरंतर संवाद से हमें पता चलता है, कि आखिर समस्या क्या है? जहां पर संवाद ही नहीं हो, तो हम समस्या का समाधान किस प्रकार करेंगे। समस्या किसी भी प्रकार की हो सकती है, मानसिक ,आर्थिक , सामाजिक, राजनीतिक, मगर इन सबका हल हम उचित संवाद को स्थापित करके ही कर सकते हैं।
विशेष:- हमारी परंपरा में संवाद की परंपरा बहुत पुरानी है, विभिन्न कथाक्रम भी संवाद ही है, जैसे रामायण में भी संवाद है, शिव -पार्वती, याज्ञवल्क्य -भारद्वाज , कागभुशुण्डि -
गरुड़। संवाद से समस्याओं का समाधान प्राप्त होता है, एक दिशा हमें मिलती है।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।