प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, लोकोक्ति 
यानी अपने अनुभवों के आधार पर लोगों द्वारा कहा गया कथन, जो समाज में प्रचलित हो जाता है, और गहरे अनुभव के कारण उन लोकोक्तियां में काफी वजन होता है, क्योंकि वह जनमानस द्वारा खुद जो उन्होंने अनुभव किया है, उसके आधार पर उनका वह कथन होता है, बोलचाल की भाषा में हम सामान्य रूप से  इनका  प्रयोग करते हैं।
      इससे भाषा की समृद्धि व गहराई में वृद्धि होती है, आईए जानते हैं,  कुछ लोकोक्तियों के बारे में, जैसे दिन भर चले ढाई कोस, यानी काफी मेहनत के बाद भी परिणाम का न मिलना, तो इसके बाद इस कहावत का जन्म हुआ, ऐसी ही एक और कहावत हम देखते हैं,
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद, यानी किसी 
ऐसे व्यक्ति को कोई चीज प्राप्त हो जाना, जिसे  उसकी उचित कद्र ही न हो, तब इस प्रकार की लोकोक्ति का जन्म हुआ, इसी प्रकार जनमानस में कहावतें या लोकोक्ति का प्रयोग शुरू हुआ, लोकोक्ति यानी, लोक  की उक्ति या कथन, जो उनके सामान्य जनजीवन में उपजे अनुभव के आधार पर आता है।
        सैंया भये कोतवाल, तो ड़र काहे का,
यह लोकोक्ति भी काफी प्रचलित है, यानी जिसके पास ताकत है, शक्ति है, उसका वरदहस्त प्राप्त होना, उसका साथ मिलना। 
      एक और कहावत या लोकोक्ति प्रचलित है, यथा राजा तथा प्रजा, यानी ऊपर के लोग जो आचरण करते हैं, जो शक्तिशाली है, सामान्य जन भी उनके पद चिन्हों पर चलते हैं या उनका अनुसरण करते हैं।
        धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का,
यानी बहुत अधिक चतुर लोगों को कुछ नहीं प्राप्त होता है, अधिक चतुराई के कारण वे सब कुछ खो देते हैं, तब यह लोकोक्ति प्रचलन में आई। 
        इस प्रकार हम पाते हैं, कि हमारे सामान्य जनजीवन में  ऐसी बातें जो हमें
प्रभावित करती है, उन्हें हम किस प्रकार से
अपने अनुभव के आधार पर शब्दों में पिरो देते हैं, वही धीरे-धीरे लोकोक्ति का रूप धारण कर लेती है, और यह गहरे अनुभव के बाद 
कोई कहता है, तो वह धीरे-धीरे प्रचलन में आ जाती है।
        एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा,
सोने पर सुहागा, इस प्रकार की अनेकों 
लोकोक्तियां द्वारा भाषा की समृद्धि और गहराई बढ़ती जाती है, कम शब्दों में कैसे अपनी बात कहना, और उसकी पूर्ण प्रभाव पड़ना, यह हम लोकोक्तियो के प्रयोग द्वारा समझ सकते हैं।
विशेष:- लोकोक्तियां से भाषा की समृद्धि और गहराई में वृद्धि होती है,  जनमानस में यह प्रचलित होती है, अनुभव के आधार पर , सामान्य  लोग अपना कथन कहते हैं, वह धीरे-धीरे लोकोक्ति के रूप में प्रचलित हो जाता है। इसका प्रभाव समाज पर पड़ता है,
क्योंकि यह गहरी अनुभव के बाद रची जाती 
है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे , परंपरा व समाज, हर समाज में कुछ परंपराएं होती है,
जिन्हें बगैर किसी भी जांच के जारी रखा जाता है, जो भी परंपराएं विकसित की गई थी, वह समय अनुकूल सही भी हो सकती है व गलत भी हो सकती है, उन्हें आज के संदर्भ में परखा जाना चाहिए, जो परंपरा 
समाज की उन्नति में सहायक हो, समाज को ऊपर उठाती हो, वह निरंतर जारी रखी जानी चाहिये, लेकिन जो परंपरा समाज के लिए ठीक नहीं, समाज को पीछे ले जाती हो, उन्हें पुनर्भाषित करने की जरूरत है, जो भी परंपरा समाज में स्वस्थ मूल्यों को स्थापित करें, उन्हें  बढ़ावा दे, व जो आज के समय में अनुकूल परंपराएं नहीं है, उन्हें हटाते भी जाये,
जैसे बाल विवाह की परंपरा, यह ठीक नहीं है, 
मृत्यु भोज पर अपनी सीमा रेखा से बाहर जाकर आयोजन करना, इस प्रकार की जो सामाजिक परिवेश में एक बुराई के रूप में 
परंपरा है, जिसे लोगों का हित संवर्धन नहीं होता, बल्कि वे और पीछे की और आते हैं,
उन परंपराओं पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है, जैसे हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति, इसमें नैतिक मूल्यों पर व पर्यावरण की रक्षा पर जोर दिया गया,
प्रकृति व पर्यावरण से सहयोग करते हुए आगे बढ़ने की जिसमें बात कही गई, ऐसी परंपराओं को बचाने की भी आवश्यकता है, 
स्वस्थ परंपराओं को हम बल प्रदान करे व
वह जो आज समाज के अनुकूल नहीं है, उन परंपराओं को हम हटाए भी, परंपरा इसलिए बनाई जाती है, ताकि वे समाज के संवर्धन
में सहयोगी हो, लेकिन कोई परंपरा समाज के लिए ठीक नहीं, तो सामूहिक रूप से उस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, आज के समय में सभी परंपरा  अच्छी हो, यह जरूरी भी नहीं, जांचने परखने के बाद जो भी परंपरा समाज के मूल्यों को स्थापित करती हो, जिसे समाज में एक सकारात्मक बदलाव होता है, संगठन की भावना का विकास होता है, जैसे मिलजुल कर त्योंहार मनाना, इससे  एक सामुदायिक भावना का विकास होता है,
एक जगह एकत्रित होने से हमें एक दूसरे के सुख दुखों को आपस में बांटने का मौका मिलता है, हम आपस में एक दूसरे को समझ पाते हैं,  सामूहिक उत्सव की  जो परंपरा है, यह एक अच्छी परंपरा है, इसे जारी रखा जाना चाहिये, बदलते परिवेश में शिक्षा एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है, समाज में सभी को
समान रूप से शिक्षा का अवसर प्राप्त हो,
ऐसा हमें परंपरा में स्थापित करना चाहिये,
इसके लिए हो तो एक सामूहिक कार्य योजना तैयार कर उस पर कार्य करना चाहिये,
स्वास्थ्य के संदर्भ में भी हमें मिलकर एक ऐसी परंपरा का विकास करना चाहिये, जिस व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व का विकास हो,
वह किसी भी बात के संपूर्ण पहलू को जांच परख कर फिर उस पर निर्णय करें, तो स्वस्थ मूल्यों को स्थापित करने वाली परंपराओं को बचाना व व आवश्यकता पड़े तो नई परंपराओं को विकसित भी करना चाहिये,
जो आज के समय से मेल खाती हो।
विशेष:- समाज में जो भी परंपरा स्थापित होती है, वह समाज के विकास के लिये होती है, लेकिन अगर कोई परंपरा समाज को अवनति की ओर ले जा रही है, तो उसे हमें हटाना भी चाहिये, वह कोई नयी परंपरा, जो हमें सामाजिक संदर्भ में आवश्यक प्रतीत है, जो आज के सामाजिक परिवेश में मनुष्य के सर्वांगीण विकास में आवश्यक हो, जो नैतिक, आर्थिक, सामाजिक विकास की ओर हमें अग्रसर करें, ऐसी परंपराओं का हम पोषण करें ।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।


प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में मेरा विषय है, नीट एग्जाम, यह परीक्षा रद्द की गई है, क्योंकि इसके पेपर लीक हुए, पर  क्या इतने मात्र से सारी व्यवस्था सुधर जायेगी, इस भ्रष्टाचार की जड़ें बड़ी गहरी है, जब तक उन पर प्रहार नहीं किया जायेगा, तब तक इस प्रकार की घटनाएं होती रहेगी, अफसरों की मिली भगत के बगैर 
यह संभव ही नहीं, उनकी पहचान की जाये, व उन पर कड़ी कार्रवाई करते हुए तुरंत बर्खास्त किया जाए व आर्थिक रूप से भी दंडित किया जाये, केवल कुछ समय के लिए उन्हें अपनी जगह से हटा देना इसका इलाज नहीं, 
जब तक दोषियों को चिन्हित करके उन्हें सख्त से सख्त सजा नहीं मिलती, व उनमें भय पैदा नहीं होता, आगे भी ऐसी घटनाएं होती रहेगी, अब थोड़ा विचार करें उन प्रतियोगियो पर, जो दिन रात अथक परिश्रम करके इन परीक्षाओं की तैयारी में जुटे रहते हैं,
परीक्षा हो जाने के बाद इस प्रकार से इसे रद्द कर देना प्रशासन की विफलता ही कही जायेगी , कितनी मुश्किलों से हर व्यक्ति मानसिक व आर्थिक दबावों को झेलते हुए
इन परीक्षाओं की तैयारी में लगा होता है, 
सरकार की प्रशासनिक विफलता के कारण
यह स्थिति उत्पन्न हुई है, यह उन लाखों प्रतियोगियों के साथ कुठाराघात है, मानसिक रूप से फिर से इन परीक्षा की तैयारी करना 
इतना आसान भी नहीं होता, प्रशासनिक विफलता का दंश इन प्रतियोगियों को झेलना पड़ रहा है, जब तक अधिकारियों पर,  जो भी इनमें शामिल है, कड़ी से कड़ी कार्यवाही तुरंत नहीं की जाती, और कार्यवाही भी इतनी कड़ी होनी चाहिये, ताकि अगली बार कोई
ऐसा करने का दु:साहस न करें।
      यह प्रतिभागियों के साथ उनके परिजनों के लिए भी एक कठिन समय है, किस प्रकार 
उनके परिजन उनके लिए साधन जुटाते हैं, वे अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं, यह उनके लिए भी एक पीड़ा है, यह सब कुछ अचानक नहीं हो जाता है, 
इन सबके लिए जो भी दोषी है, उन पर कड़ी कार्यवाही व वह अगली बार ऐसा ना हो, यह भी देखना बहुत जरूरी है।
       निश्चित तौर पर प्रशासनिक विफलता तो है ही, हमारी सामाजिक व्यवस्था की विफलता भी है, ऐसे दोषी लोगों का समाज भी पूर्ण बहिष्कार करें, तभी इन लोगों को इसका एहसास होगा, जब सामाजिक रूप से बहिष्कार होगा, तब ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति में निश्चित ही कमी तो आएगी। 
राज्य सरकार व केद्र सरकार दोनों को इस मामले में ऐसा कठोर कानून बनाना चाहिए,
जिससे दोषी लोग किसी प्रकार से छूट न सके उन्हें दंड मिले ही, प्रशासनिक व सामाजिक दोनों
तरफ से दो तरफा प्रहार जब ऐसे लोगों पर होगा, तभी हम व्यवस्था में परिवर्तन कर सकते हैं। अगली बार ऐसा कुछ ना हो, इस और भी ध्यान देना आवश्यक है।
विशेष:- यह केवल प्रशासनिक विफलता ही नहीं, हमारी सामाजिक विफलता भी है, इस प्रकार के प्रकरणों में में लिप्त अधिकारियों व अन्य लोगों का जब सामाजिक बहिष्कार पूर्ण रूप से होगा, तब लोग ऐसा करने का साहस ही नहीं करेंगे,  प्रशासनिक स्तर पर 
व सामाजिक स्तर पर दोनों जगह से ऐसे 
लोगों को बहिष्कृत किया जाए, तभी तस्वीर बदलेगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, प्रतिबद्धताओं पर, हम अपनी किसी बात पर कितने दृढ़ संकल्पित है, प्रतिबद्ध है, निरंतर सक्रिय है, जीवन में हमें 
परिणाम भी वैसे ही प्राप्त होते हैं।
      हम जितनी अधिक प्रतिबद्धता से परिवार व समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करेंगे, उतने ही शानदार परिणाम हमें मिलेंगे, हमें 
जीवन में हमारी हर भूमिका को गहराई से रेखांकित करने की जरूरत है, हम क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? यह सवाल अपने आप से अवश्य पूछे, क्योंकि उत्तर भी हमें भीतर से ही मिलेगा, जितना हम चिंतन करेंगे, उतना ही हम अपने आप को परिपक्व करेंगे, हमें अपने व्यक्तित्व की खूबियां व खामियां का पता चलेगा, और यह प्रक्रिया सतत जीवन में निरंतर चलती रहेगी , तो परिणाम बेहतर से बेहतर होते रहेंगे, प्रतिबद्धता से मेरा आशय 
निरंतरता से ही है, क्योंकि जब हम किसी भी कार्य को निरंतर करते हैं, ईमानदारी पूर्वक 
हम समय व श्रम प्रदान करते हैं, तो परिणाम निश्चित ही एक सुखद रूप में हमें मिलेंगे।
         हमारा जीवन केवल हमारा नहीं, इससे हमारा परिवार व समाज भी जुड़ा है, और अनिवार्य रूप से हमारी कोई भी गतिविधि 
हमारे समाज व परिवार में प्रभाव डालती ही है, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है, कि हम अपने मूल्यों व  हमारी सामाजिक संरचना के प्रति पूर्ण प्रतिबद्ध होकर अपनी भूमिका का निर्वहन करें, सबसे पहले बदलाव हमें स्वयं में करना होगा, उसके बाद हम किसी और से उम्मीद कर सकते हैं, वैसे भी हर
व्यक्ति की चौकस निगाहें एक -दूसरे पर होती है, अगर हम कोई काम प्रतिबद्धता पूर्वक व पूर्ण निष्ठा से करते हैं, तो उसके अनुकूल परिणाम निश्चित ही हमें प्राप्त होंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, पर यह जरूरी है,
हम अपनी प्राथमिकता, आवश्यकता और समाज के प्रति हमारी भूमिका का पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी व प्रतिबद्धता पूर्वक निर्वहन करें,  फिर आप देखेंगे , धीरे-धीरे आपकी विचारधारा से जुड़े लोग स्वयं ही  आप से जुड़ने लगेंगे, और एक श्रेष्ठ व परिणाम मूलक 
प्रक्रिया का निर्माण अपने आप होने लगेगा,
जो किसी भी समाज के लिए आवश्यक भी है,
आपकी निरंतरता दूसरों के लिए भी एक उदाहरण बनेगी, और स्वमेव एक सुंदर समाज का निर्माण होता जायेगा, हमें बस अपनी भूमिका का निर्माण उचित तरीके से निभाने की जरूरत है, बाकी सब धीरे-धीरे अपने -आप होने लगेगा। 
विशेष:- जो भी मूल्य समाज के लिए जरूरी है, उनके लिए सबसे पहले प्रतिबद्ध हमें होना पड़ेगा, किसी और को उसके लिए बताने से पूर्व हमें उस भूमिका में उतरना होगा, तभी परिणाम हमें आशा जनक प्राप्त होंगे, अगर हम प्रतिबद्धता पूर्वक अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करते हैं, तो परिणाम निश्चित ही श्रेष्ठ होंगे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, बदलते परिवेश पर, आज सामाजिक जीवन में हमें जो एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, वह है, सामाजिक मूल्यों की बदलती स्थिति, अगर आज से मात्र 20 से 25 वर्ष पूर्व हम निगाह डालें, तो व्यक्ति किस प्रकार से धन उपार्जित करता है, उस पर भी समाज की निगाह होती थी, मगर विगत कुछ वर्षों में मूल्यों की जगह 
धन की प्रतिष्ठा अधिक बड़ी है, धन किसी भी प्रकार से आये, अब इसकी स्वीकृति समाज में होने लगी है, यह जो परिवर्तन सामाजिक आया है, यह देखा जाये तो सामाजिक व नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन हीं हैं, किसी भी 
समाज के नैतिक मूल्य अगर धराशायी होते हैं,
तो धीरे-धीरे समाज एक संवाद विहीन स्थिति
में पहुंच जाता है,
      आज जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों की जगह धन ने ले ली है, जो किसी भी समाज के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है, पहले हम परिवार और समाज में इस बात को बड़ी दमदारी से रखते थे, की धन के आने के स्रोत 
शुद्ध हो, लेकिन आज वर्तमान समय में हमें यह देखने को मिल रहा है, की जो धनी है, उन्होंने धन किस प्रकार से कमाया, यह कोई मायने नहीं रखना, यह जो अवमूल्यन है समाज का, यह ठीक नहीं है, और दिन प्रतिदिन इसमें वृद्धि हो रही है, जो सही चिंतन करते हैं, उन्हें इस बारे में सोचना होगा। 
       धन कमाना कोई बुरी बात नहीं, मगर धन का स्रोत पारदर्शी व मूल्यों पर आधारित होना चाहिये, क्योंकि उसी से समाज में स्वस्थ 
 मूल्यों का निर्माण होगा, इस पर सभी वर्ग के लोगों को चिंतन करना चाहिये, विशेष कर जो बुद्धिजीवी वर्ग है, राजनीतिक व्यक्ति, शिक्षक, पत्रकार, डॉक्टर, व्यापारी वर्ग इन सब वर्गों को चिंतन करना चाहिये, जो हमारा सामाजिक परिवेश इस प्रकार बदल रहा है, वह किसी भी समाज की नैतिक उन्नति तो नहीं कर सकता, 
बदलते परिवेश में हमें नए साधन तो अपनाना चाहिये, मगर मूलभूत जो नीतिगत सिद्धांत है,
उन्हें हमें नहीं भूलना चाहिये।
विशेष:- बदलते परिवेश में आर्थिक पहलू भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, मगर वह हम किस प्रकार से अर्जन कर रहे हैं, उस और हमारी निगाह जरूर होना चाहिये।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

 प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, 4 मई को घोषित चुनाव परिणामों पर, जो परिणाम घोषित हुए हैं, उसमें मतदाताओं नेअलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलो
की जीत का मार्ग प्रशस्त किया है, मतदाताओं की परिपक्वता दिखी है, इसमें एक चीज बिल्कुल साफ हुई है, जो भी सत्ताधारी दल हैं,
वह अगर सही तरीके से काम करते हैं तो ही सत्ता में वापस आते हैं, जहां असम में जनता ने सत्ताधारी दल पर विश्वास जताया है, वह पांडिचेरी में भी सत्ताधारी दल जीता है, अन्य तीन राज्यों में सत्ताधारी दल सुशासन देने में विफल रहा, व जनता ने सत्ताधारी दल को  हराया है, तमिलनाडु में तो नई बनी पार्टी बहुमत के लगभग करीब हैं, यह लोकतंत्र में हमारी मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाता है, कि अगर उन्हें कहीं अच्छी संभावना नजर आती है, तो वह नए दलों को भी सत्ता प्रदान करने मे कोई चूक नहीं करते, इन चुनाव परिणामों ने एक एक बात तो यह साबित की है , जो भी राजनीतिक दल एकजुट होकर लड़े हैं, जिनका प्रबंधन अच्छा रहा है, वह विजयी  रहे हैं, केरल राज्य में कांग्रेस वाले गठबंधन की वापसी इसका उदाहरण है, वहीं कांग्रेस
असम और पश्चिम बंगाल में विफल रही है, 
वहीं तमिलनाडु में भी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सकी, जो भी दल प्रतिबद्ध होकर लड़े हैं,
उन्हें अच्छे परिणामों की प्राप्ति हुई हैं, खासकर इन चुनावो से यह संदेश गया है कोई भी राजनीति में अपराजेय नहीं है, समय आने पर मतदाता सबको सबक सीखा  ही देते हैं।
मतदाता अपने विवेक का पूर्ण इस्तेमाल करते हैं, यही भारतीय लोकतंत्र को और मजबूत बनाता है, यहां आज भी मतदाता राजा है,
यहां लोकतंत्र की जड़े गहरी एवं मजबूत है।
पुनः भारतीय मतदाताओं का विवेक से चयन करने के लिये आभार, एक जगह तमिलनाडु में नई राजनीति पार्टी को पूरा मौका देना, दूसरी और ममता बनर्जी की पराजय, केरल में कांग्रेस की वापसी, यह सब मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाते हैं, उन्होंने हर जगह स्थानीय तौर पर क्या अधिक ज्यादा जरूरी है उसे महत्व प्रदान किया।
विशेष:- भारतीय राजनीति एवं लोकतंत्र में 
व्यक्तिगत विशेषताएं भी लोगों को प्रभावित 
करती है, यह तमिलनाडु में विजयन का उदय दर्शाता है, लोकतंत्र और अधिक परिपक्व हो,
मतदाता और सजगता से निर्णय लें, यही उम्मीद। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज काफी दिनों बाद आपसे फिर रूबरू हो रहा हूं,
आज का मेरा विषय है, राजनीति, खासकर भारतीय राजनीति, आज पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने 
वाले हैं, संपूर्ण भारतीय जनमानस जो भारतीय राजनीति में रुचि रखते हैं, वे बड़ी उत्सुकता से परिणामों का इंतजार कर रहे हैं, 
पश्चिम बंगाल की और सब की निगाह सबसे अधिक होगी, वहां फिर ममता बनर्जी अपना जलवा बरकरार रखती है या फिर भारतीय जनता पार्टी की कोशिशें कामयाब होती है,
यह देखना बड़ा दिलचस्प रहेगा, पिछली बार भी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में लगा दी थी, पर वे ममता बनर्जी का विजय रथ नहीं रोक पाये, इस बार मुकाबला अधिक कड़ा लग रहा है, मगर जितना बंपर मतदान हुआ है, वह आखिरकार किस पक्ष में गया है, यह तो परिणाम ही तय करेंगे। 
         अगर ममता बनर्जी के पक्ष में मतदान हुआ, वे पुनः राज्य की मुख्यमंत्री बनती हैं,
तो विपक्षी दलों में भी उनका कद बढ़ेगा, इसके विपरीत अगर भारतीय जनता पार्टी 
कामयाब होती है, तो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के कद में अभिवृद्धि होगी।
        असम में भी मुकाबला बड़ा दिलचस्प है,
अगर वहां फिर भारतीय जनता पार्टी जीती तो
 मुख्यमंत्री हेमंत विश्वा का कद बढ़ेगा, वहीं अगर कांग्रेस जीती तरुण गोगोई का कद बढ़ेगा, मगर अभी तक संभावना भारतीय जनता पार्टी के जीतने की ही नजर आ रही है। 
    अब हम चलते हैं केरल की ओर, वहां पर अगर वाम मोर्चा जीतता है, तो यह उसकी नीतियों की जीत होगी, पर इस बार रुझान वहां कांग्रेस वाले गठबंधन के जीतने की नजर आ रहे हैं, अगर ऐसा होता है तो यह कांग्रेस पार्टी के लिये संजीवनी का काम करेगा,
देखते हैं मतदाता वर्तमान वाम मोर्चा की सरकार के काम से संतुष्ट है अथवा नहीं, 
यह चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे, फिर भी इस बार रुझान कांग्रेस वाले गठबंधन की जीत के अधिक नजर आते हैं। 
    अब हम बात करते हैं तमिलनाडु की, यहां द्रमुक  की सरकार है, यहां मुख्य दल दो ही है, दृमुक व अन्ना द्रमुक , बाकी दल  इनसे संयोजन करके ही वहां चुनाव लड़ते हैं, वहां पर अभिनेता विजयन की नई पार्टी भी कुछ प्रभाव डाल सकती है। यहां इस बार  अन्ना द्रमुक वाले गठबंधन की जीत के अधिक आसान नजर आ रहे हैं, यहां  का भी मुकाबला बड़ा दिलचस्प रहेगा।
     केंद्र शासित पांडिचेरी में भी चुनाव हो रहे हैं, यहां अभी भाजपा का शासन है, देखते हैं यहां ऊंट किस करवट बैठता है। यहां भी निश्चित रुझान किसी भी पार्टी के पक्ष में नजर नहीं आते।
     पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजा भारतीय राजनीति की दिशा को तय करेंगे, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी व तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल यह सभी को आईना बताने वाले होंगे , कि उनके कद में अभिवृद्धि हुई है या वे पीछे की और आये हैं।
यह मतदाताओं की परिपक्वता को भी बतायेंगे।
विशेष:-भारतीय राजनीति में हमेशा व्यक्तित्व के प्रति भी लगाव रहा है, उससे भी भारतीय राजनीति में मतदाताओं का रुख तय होता है,
मगर अब मतदाताओं को और अधिक परिपक्वता दिखाने की जरूरत है, जहां भी मूल विषयों पर आधारित मुद्दों पर मतदान करें, तभी भारतीय राजनीति में मतदाताओं की सही भूमिका तय होगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद