प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, प्रतिबद्धताओं पर, हम अपनी किसी बात पर कितने दृढ़ संकल्पित है, प्रतिबद्ध है, निरंतर सक्रिय है, जीवन में हमें 
परिणाम भी वैसे ही प्राप्त होते हैं।
      हम जितनी अधिक प्रतिबद्धता से परिवार व समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करेंगे, उतने ही शानदार परिणाम हमें मिलेंगे, हमें 
जीवन में हमारी हर भूमिका को गहराई से रेखांकित करने की जरूरत है, हम क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? यह सवाल अपने आप से अवश्य पूछे, क्योंकि उत्तर भी हमें भीतर से ही मिलेगा, जितना हम चिंतन करेंगे, उतना ही हम अपने आप को परिपक्व करेंगे, हमें अपने व्यक्तित्व की खूबियां व खामियां का पता चलेगा, और यह प्रक्रिया सतत जीवन में निरंतर चलती रहेगी , तो परिणाम बेहतर से बेहतर होते रहेंगे, प्रतिबद्धता से मेरा आशय 
निरंतरता से ही है, क्योंकि जब हम किसी भी कार्य को निरंतर करते हैं, ईमानदारी पूर्वक 
हम समय व श्रम प्रदान करते हैं, तो परिणाम निश्चित ही एक सुखद रूप में हमें मिलेंगे।
         हमारा जीवन केवल हमारा नहीं, इससे हमारा परिवार व समाज भी जुड़ा है, और अनिवार्य रूप से हमारी कोई भी गतिविधि 
हमारे समाज व परिवार में प्रभाव डालती ही है, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है, कि हम अपने मूल्यों व  हमारी सामाजिक संरचना के प्रति पूर्ण प्रतिबद्ध होकर अपनी भूमिका का निर्वहन करें, सबसे पहले बदलाव हमें स्वयं में करना होगा, उसके बाद हम किसी और से उम्मीद कर सकते हैं, वैसे भी हर
व्यक्ति की चौकस निगाहें एक -दूसरे पर होती है, अगर हम कोई काम प्रतिबद्धता पूर्वक व पूर्ण निष्ठा से करते हैं, तो उसके अनुकूल परिणाम निश्चित ही हमें प्राप्त होंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, पर यह जरूरी है,
हम अपनी प्राथमिकता, आवश्यकता और समाज के प्रति हमारी भूमिका का पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी व प्रतिबद्धता पूर्वक निर्वहन करें,  फिर आप देखेंगे , धीरे-धीरे आपकी विचारधारा से जुड़े लोग स्वयं ही  आप से जुड़ने लगेंगे, और एक श्रेष्ठ व परिणाम मूलक 
प्रक्रिया का निर्माण अपने आप होने लगेगा,
जो किसी भी समाज के लिए आवश्यक भी है,
आपकी निरंतरता दूसरों के लिए भी एक उदाहरण बनेगी, और स्वमेव एक सुंदर समाज का निर्माण होता जायेगा, हमें बस अपनी भूमिका का निर्माण उचित तरीके से निभाने की जरूरत है, बाकी सब धीरे-धीरे अपने -आप होने लगेगा। 
विशेष:- जो भी मूल्य समाज के लिए जरूरी है, उनके लिए सबसे पहले प्रतिबद्ध हमें होना पड़ेगा, किसी और को उसके लिए बताने से पूर्व हमें उस भूमिका में उतरना होगा, तभी परिणाम हमें आशा जनक प्राप्त होंगे, अगर हम प्रतिबद्धता पूर्वक अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करते हैं, तो परिणाम निश्चित ही श्रेष्ठ होंगे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, बदलते परिवेश पर, आज सामाजिक जीवन में हमें जो एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, वह है, सामाजिक मूल्यों की बदलती स्थिति, अगर आज से मात्र 20 से 25 वर्ष पूर्व हम निगाह डालें, तो व्यक्ति किस प्रकार से धन उपार्जित करता है, उस पर भी समाज की निगाह होती थी, मगर विगत कुछ वर्षों में मूल्यों की जगह 
धन की प्रतिष्ठा अधिक बड़ी है, धन किसी भी प्रकार से आये, अब इसकी स्वीकृति समाज में होने लगी है, यह जो परिवर्तन सामाजिक आया है, यह देखा जाये तो सामाजिक व नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन हीं हैं, किसी भी 
समाज के नैतिक मूल्य अगर धराशायी होते हैं,
तो धीरे-धीरे समाज एक संवाद विहीन स्थिति
में पहुंच जाता है,
      आज जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों की जगह धन ने ले ली है, जो किसी भी समाज के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है, पहले हम परिवार और समाज में इस बात को बड़ी दमदारी से रखते थे, की धन के आने के स्रोत 
शुद्ध हो, लेकिन आज वर्तमान समय में हमें यह देखने को मिल रहा है, की जो धनी है, उन्होंने धन किस प्रकार से कमाया, यह कोई मायने नहीं रखना, यह जो अवमूल्यन है समाज का, यह ठीक नहीं है, और दिन प्रतिदिन इसमें वृद्धि हो रही है, जो सही चिंतन करते हैं, उन्हें इस बारे में सोचना होगा। 
       धन कमाना कोई बुरी बात नहीं, मगर धन का स्रोत पारदर्शी व मूल्यों पर आधारित होना चाहिये, क्योंकि उसी से समाज में स्वस्थ 
 मूल्यों का निर्माण होगा, इस पर सभी वर्ग के लोगों को चिंतन करना चाहिये, विशेष कर जो बुद्धिजीवी वर्ग है, राजनीतिक व्यक्ति, शिक्षक, पत्रकार, डॉक्टर, व्यापारी वर्ग इन सब वर्गों को चिंतन करना चाहिये, जो हमारा सामाजिक परिवेश इस प्रकार बदल रहा है, वह किसी भी समाज की नैतिक उन्नति तो नहीं कर सकता, 
बदलते परिवेश में हमें नए साधन तो अपनाना चाहिये, मगर मूलभूत जो नीतिगत सिद्धांत है,
उन्हें हमें नहीं भूलना चाहिये।
विशेष:- बदलते परिवेश में आर्थिक पहलू भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, मगर वह हम किस प्रकार से अर्जन कर रहे हैं, उस और हमारी निगाह जरूर होना चाहिये।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

 प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, 4 मई को घोषित चुनाव परिणामों पर, जो परिणाम घोषित हुए हैं, उसमें मतदाताओं नेअलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलो
की जीत का मार्ग प्रशस्त किया है, मतदाताओं की परिपक्वता दिखी है, इसमें एक चीज बिल्कुल साफ हुई है, जो भी सत्ताधारी दल हैं,
वह अगर सही तरीके से काम करते हैं तो ही सत्ता में वापस आते हैं, जहां असम में जनता ने सत्ताधारी दल पर विश्वास जताया है, वह पांडिचेरी में भी सत्ताधारी दल जीता है, अन्य तीन राज्यों में सत्ताधारी दल सुशासन देने में विफल रहा, व जनता ने सत्ताधारी दल को  हराया है, तमिलनाडु में तो नई बनी पार्टी बहुमत के लगभग करीब हैं, यह लोकतंत्र में हमारी मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाता है, कि अगर उन्हें कहीं अच्छी संभावना नजर आती है, तो वह नए दलों को भी सत्ता प्रदान करने मे कोई चूक नहीं करते, इन चुनाव परिणामों ने एक एक बात तो यह साबित की है , जो भी राजनीतिक दल एकजुट होकर लड़े हैं, जिनका प्रबंधन अच्छा रहा है, वह विजयी  रहे हैं, केरल राज्य में कांग्रेस वाले गठबंधन की वापसी इसका उदाहरण है, वहीं कांग्रेस
असम और पश्चिम बंगाल में विफल रही है, 
वहीं तमिलनाडु में भी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सकी, जो भी दल प्रतिबद्ध होकर लड़े हैं,
उन्हें अच्छे परिणामों की प्राप्ति हुई हैं, खासकर इन चुनावो से यह संदेश गया है कोई भी राजनीति में अपराजेय नहीं है, समय आने पर मतदाता सबको सबक सीखा  ही देते हैं।
मतदाता अपने विवेक का पूर्ण इस्तेमाल करते हैं, यही भारतीय लोकतंत्र को और मजबूत बनाता है, यहां आज भी मतदाता राजा है,
यहां लोकतंत्र की जड़े गहरी एवं मजबूत है।
पुनः भारतीय मतदाताओं का विवेक से चयन करने के लिये आभार, एक जगह तमिलनाडु में नई राजनीति पार्टी को पूरा मौका देना, दूसरी और ममता बनर्जी की पराजय, केरल में कांग्रेस की वापसी, यह सब मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाते हैं, उन्होंने हर जगह स्थानीय तौर पर क्या अधिक ज्यादा जरूरी है उसे महत्व प्रदान किया।
विशेष:- भारतीय राजनीति एवं लोकतंत्र में 
व्यक्तिगत विशेषताएं भी लोगों को प्रभावित 
करती है, यह तमिलनाडु में विजयन का उदय दर्शाता है, लोकतंत्र और अधिक परिपक्व हो,
मतदाता और सजगता से निर्णय लें, यही उम्मीद। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज काफी दिनों बाद आपसे फिर रूबरू हो रहा हूं,
आज का मेरा विषय है, राजनीति, खासकर भारतीय राजनीति, आज पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने 
वाले हैं, संपूर्ण भारतीय जनमानस जो भारतीय राजनीति में रुचि रखते हैं, वे बड़ी उत्सुकता से परिणामों का इंतजार कर रहे हैं, 
पश्चिम बंगाल की और सब की निगाह सबसे अधिक होगी, वहां फिर ममता बनर्जी अपना जलवा बरकरार रखती है या फिर भारतीय जनता पार्टी की कोशिशें कामयाब होती है,
यह देखना बड़ा दिलचस्प रहेगा, पिछली बार भी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में लगा दी थी, पर वे ममता बनर्जी का विजय रथ नहीं रोक पाये, इस बार मुकाबला अधिक कड़ा लग रहा है, मगर जितना बंपर मतदान हुआ है, वह आखिरकार किस पक्ष में गया है, यह तो परिणाम ही तय करेंगे। 
         अगर ममता बनर्जी के पक्ष में मतदान हुआ, वे पुनः राज्य की मुख्यमंत्री बनती हैं,
तो विपक्षी दलों में भी उनका कद बढ़ेगा, इसके विपरीत अगर भारतीय जनता पार्टी 
कामयाब होती है, तो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के कद में अभिवृद्धि होगी।
        असम में भी मुकाबला बड़ा दिलचस्प है,
अगर वहां फिर भारतीय जनता पार्टी जीती तो
 मुख्यमंत्री हेमंत विश्वा का कद बढ़ेगा, वहीं अगर कांग्रेस जीती तरुण गोगोई का कद बढ़ेगा, मगर अभी तक संभावना भारतीय जनता पार्टी के जीतने की ही नजर आ रही है। 
    अब हम चलते हैं केरल की ओर, वहां पर अगर वाम मोर्चा जीतता है, तो यह उसकी नीतियों की जीत होगी, पर इस बार रुझान वहां कांग्रेस वाले गठबंधन के जीतने की नजर आ रहे हैं, अगर ऐसा होता है तो यह कांग्रेस पार्टी के लिये संजीवनी का काम करेगा,
देखते हैं मतदाता वर्तमान वाम मोर्चा की सरकार के काम से संतुष्ट है अथवा नहीं, 
यह चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे, फिर भी इस बार रुझान कांग्रेस वाले गठबंधन की जीत के अधिक नजर आते हैं। 
    अब हम बात करते हैं तमिलनाडु की, यहां द्रमुक  की सरकार है, यहां मुख्य दल दो ही है, दृमुक व अन्ना द्रमुक , बाकी दल  इनसे संयोजन करके ही वहां चुनाव लड़ते हैं, वहां पर अभिनेता विजयन की नई पार्टी भी कुछ प्रभाव डाल सकती है। यहां इस बार  अन्ना द्रमुक वाले गठबंधन की जीत के अधिक आसान नजर आ रहे हैं, यहां  का भी मुकाबला बड़ा दिलचस्प रहेगा।
     केंद्र शासित पांडिचेरी में भी चुनाव हो रहे हैं, यहां अभी भाजपा का शासन है, देखते हैं यहां ऊंट किस करवट बैठता है। यहां भी निश्चित रुझान किसी भी पार्टी के पक्ष में नजर नहीं आते।
     पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजा भारतीय राजनीति की दिशा को तय करेंगे, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी व तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल यह सभी को आईना बताने वाले होंगे , कि उनके कद में अभिवृद्धि हुई है या वे पीछे की और आये हैं।
यह मतदाताओं की परिपक्वता को भी बतायेंगे।
विशेष:-भारतीय राजनीति में हमेशा व्यक्तित्व के प्रति भी लगाव रहा है, उससे भी भारतीय राजनीति में मतदाताओं का रुख तय होता है,
मगर अब मतदाताओं को और अधिक परिपक्वता दिखाने की जरूरत है, जहां भी मूल विषयों पर आधारित मुद्दों पर मतदान करें, तभी भारतीय राजनीति में मतदाताओं की सही भूमिका तय होगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
  आप सभी को मंगल प्रणाम, 
हर मनुष्य के पास बुद्धि अवश्य होती है, वह अपना हित किस कार्य में है, यह वह भलीभांति जानता है, जो वह इस बात को जानता है, वह उसे किस प्रकार से जानता है, 
उसे हम बाह्य दृष्टि कह सकते हैं, जो हम जगत में, संसार में कैसे हम व्यवहारकुशल हो,
किस प्रकार से अपनी वाणी का प्रयोग  करें,
बुद्धि का प्रयोग करें, यह हमें बताती है, बाह्य जगत में, सांसारिक जगत में कैसा हम व्यवहार करें, इसका हमें बोध कराती है, यह तो हुई हमारी बाह्य दृष्टि। 
              अब हम आंतरिक दृष्टि की बात करते हैं, हमारे अपने गुण दोष क्या है? उसे और हमें जागृति प्रदान करती है, हर मनुष्य गुण दोषयुक्त ही है, मगर अपने स्वयं के गुण दोष पहचान कर गुणों से किस प्रकार हम कार्य करें, दोषों का हम किस प्रकार से परिमार्जन करें, अपने स्वयं को किस प्रकार से हम परिष्कृत करें, यह गुण हममें आंतरिक चेतना विकसित करने पर बढ़ते हैं।
      हमें जीवन में बाह्य दष्टि, जिससे हम जगत को जाने वह अंतर्दृष्टि जिससे हम स्वयं को भी जाने, इन दोनों का ही बोध होना परम आवश्यक है, या यह कह सकते है, हमारे पास दोनों ही दृष्टियां अगर है, तो हम तुलनात्मक अध्ययन द्वारा कहां किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, कहां पर बोलना है? कहां नहीं, यह समझ आने लगेगा। 
         जीवन को जीने के लिए हमें अंतर्दृष्टि व
बाह्य दृष्टि दोनों के ही उचित संतुलन की कला
का निरंतर अभ्यास करना होगा, तभी हम धीरे-धीरे साम्यावस्था को प्राप्त हो सकते हैं,
यानी हमारी धीरे-धीरे समदृष्टि विकसित होने से हम दोनों ही प्रकार के व्यवहार मे निपुणता 
प्राप्त कर सकते हैं।
         जगत में हमें व्यवहारिक कला में निपुण होना पड़ेगा वह अपनी स्वयं की आंतरिक
समृद्धि के लिये हमें अपनी आंतरिक दृष्टि को
विकसित करना होगा।
     हम सामान्य जीवन जीते हुए भी जब इन 
दोनों का संतुलन करना सीख गये, तो जीवन की जो कला है, किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, यह हमें ज्ञात हो जायेगा।
     क्रमशः हम आंतरिक दृष्टि व बाह्य दष्टि 
दोनों में उचित संतुलन रखते हुए इस संसार सागर की यात्रा को इन दोनों ही समानांतर पटरियों पर अपने जीवन रूपी रेलगाड़ी को 
चलाने की कला को सीख पायेंगे।
       जितना हमारा अभ्यास बढ़ेगा, हम परिपक्व होते जायेंगे, जीवन के संतुलन को साधते जायेंगे , उतना ही हमारा व्यक्तित्व भी निखरेगा, इस प्रकार हम अंतर्दृष्टि का विकास
करके आंतरिक अनुभूति व शांति को प्राप्त कर पायेंगे वह बाह्य जगत को देखने व घटनाक्रमों को ठीक ढ़ंग से समझने की कला को सीख जायेंगे।
विशेष:- अंतर्दृष्टि विकसित होने पर हमारा अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली होगा, वह बाह्य दृष्टि विकसित होने पर हमें व्यवहारिक कुशलता का ज्ञान होगा, और जीवन में दोनों की ही हमें आवश्यकता पड़ती है, इति शुभम भवतू ।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है, नव वर्ष शुरू हो गया है,
नवीन संकल्पों को हम गढ़े, और विषम परिस्थितियों में हम कैसे संतुलन स्थापित करें, यह सीखने का प्रयास करें। 
         अनुकूल परिस्थितियों हो, तब तो हर कोई बाजी जीत ही जाता है, परंतु विपरीत परिस्थितियों हो, समय विषम हो, तब किस प्रकार से हम किसी भी समस्या का समाधान निकालते हैं, वहीं हमारी योग्यता का परिचय हमें देना होता है।
       जहां विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होने पर साधारण व्यक्ति उनसे हार मान लेते हैं, साधारण व्यक्तित्व के धनी वहीं से अपनी राहे तैयार कर लेते हैं, यानी कुल मिलाकर मेरा यह मानना है, परिस्थितियों चाहे कितनी भी विषम क्यों न हो, कोई ना कोई द्वार तो अवश्य होता है, बस वही हमें पूर्ण धैर्य से खोजना होता है, 
कैसे हम अपनी समस्या के विभिन्न पहलुओं की जांच करते हैं, उन्हें में उसका समाधान भी छिपा होता है। 
       कोशिश करते रहे, कोई भी समस्या हो,  विषमता में समता हम किस प्रकार से 
स्थापित करें, यही हमारी योग्यता का पता हमें चलता है। 
        सामान्य स्थिति व विषम परिस्थिति में अंतर तो निश्चित होता है, पर धैर्य पूर्वक अगर हम स्थितियों का आकलन अगर हम करते हैं,
तो उन्हें विषम परिस्थितियों में ही हमें मार्ग भी मिल जाता है। 
      विषम से विषम परिस्थिति भी हो, अगर हम धैर्य रखें तो हमें समझ में आता है, की समस्या को हम किस प्रकार सुलझा पायेंगे।
      परिस्थितियों विषम भी हो, तो भी कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलता ही है, सूझबूझ व धैर्य पूर्वक अवलोकन से हमें राह मिल ही जाती है। प्रतिकूलता में अनुकूलता या विषमता में समता हम कैसे स्थापित करें, 
प्रयास करते रहने पर हम उसमें कामयाब हो सकतें हैं।
     अगर हमारे व्यक्तित्व में यह खूबी है, तो उसका हमें पता भी होना चाहिये वह समय आने पर हम उसका किस प्रकार से स्थितियों को अपने पक्ष में करें, जिस किसी का नुकसान भी ना हो वह हमारा कार्य भी सिद्ध हो जाये।
       यह जीवन में अनुभव द्वारा ही सीखा जा सकता है, बुद्धिमान मनुष्य परिस्थितियों का सही आकलन करते हैं, वह फिर निर्णय करते हैं। 
      जहां सभी हार मान जाते हैं, एक कुशल रणनीतिकार वहीं से अपनी जीत को तय करते हैं। साहसिक व दूरदर्शी बने, समय अनुकूल क्या उचित है, यह अध्ययन करें, राह स्वयं ही निकल जाती है। विषमता में समता को जो खोज लेता है, वह अपनी राहें बनाना जानता है।
विशेष:-  विषमता में समता को देख लेना, किस प्रकार से हल निकलेगा, वह हमारे व्यक्तित्व की दुरंदेशी को बताता है, परिस्थितियों से हारे नहीं , वरन् उनसे जूझने का आंतरिक सामर्थ्य अपने आप में उत्पन्न करें, विषमता में समता का अभ्यास करें, उसमें पारंगत होने पर आपके हल दूसरों से भी जल्दी होंगे, क्योंकि आपने एक ही समस्या के विविध पक्षों को भली भांति समझ कर फिर निर्णय लिया है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे धैर्य जीवन का अंग, हम सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव, मान-अपमान, जय पराजय सभी आते ही हैं।
       ऐसा कोई मनुष्य नहीं, इसके जीवन में
संघर्ष ना रहा हो, जीवन का शुरुआती संघर्ष आपको आगे बढ़ाता है, धैर्य पूर्वक अपनी जीवन यात्रा को पूर्ण करें, उम्र के विविध पड़ाव अलग-अलग संकेत आपको प्रदान करते हैं।
   जैसे-जैसे आपकी उमर धीरे-धीरे बढ़ती है, मगर जीवन ऊर्जा घटती जाती है।
       अपने अनुभव से सीखे, वह धैर्य को हमेशा अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना ले। जब भी कोई निर्णय करें, सोच समझकर करें, परिदृश्य को पूर्ण ईमानदारी व धैर्य पूर्वक समझे, फिर कोई भी फैसला करें, 
जीवन में कई बार आप जो चाहते हैं, वह नहीं होता, इसके बाद भी अपना धैर्य बनाए रखे,
विपरीत समय में अगर आप धैर्य बनाए रखेंगे 
तो जीवन की कई उलझनों से आप बच सकते हैं, निर्णय करते समय अगर आप धैर्य पूर्वक चीजों को समझते हैं, तो यह आपके साथ ही
आपके साथ जो भी है, उन्हें भी मुश्किलों से उबरने में सहयोग प्राप्त होगा, जब आप धैर्य धारण करते हैं, तो कई चीजे स्वत: सुलझ जाती है।
     कोई भी मामला हो, जब आपके भीतर आंतरिक धैर्यता का गुण अगर आपने विकसित कर लिया है, तो आप उसे विषय से संबंधित जो भी बातें हैं, उन्हें ठीक ढंग से समझ सकते हैं, और उनका निराकरण निकाल सकते हैं, निराकरण करते समय आपका धैर्य व सूझबूझ दोनों ही काम आते हैं, निरंतर धैर्य धारण करने से आपके भीतर ऐसी क्षमता विकसित हो जाती है, जिससे आप स्थितियों को समझ कर फिर अपना कदम उठा सकते हैं। 
      इस प्रकार समस्या उत्पन्न होने पर हम निराकरण कर सकते हैं, समस्या कोई भी हो, 
सही ढंग से अगर हम समझे तो उसका निराकरण संभव है, किसी भी समस्या में आपकी संवाद की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है, आपसी संवाद द्वारा हम गलत फैमिलायों को दूर कर सकते हैं, और चीजों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
        जब हम धैर्यपूर्वक चीजों को समझते हैं,
तो हमारे पास उन सब बातों का जो हम करना चाहते हैं, रास्ता खुल जाता है, सभी पहलुओं को हम समझ पाते हैं, जीवन में 
सफलता व असफलता, दोनों ही आती है। 
           असफलता हमें और अधिक सिखाती है, हमारी स्वयं की क्षमता को और बेहतर करने की हमें शक्ति प्रदान करती है।
        जितना अधिक धैर्य हम में होगा, उतना ही हम बातों को ध्यान पूर्वक समझ कर उन्हें कर सकते हैं, आपसी संबंधों को भी हम एक मजबूत आधार प्रदान कर सकते है।
     जब हम पूर्णतया पारदर्शिता से अपनी बातों को रखते हैं, तो वह पारदर्शिता हमें सिखाती है, हम कैसे बातों को बेहतर ढंग से करें। 
        धैर्य वह कला है, जो हमारी बातों को हम कैसे पेश करें, उनका समाधान किस प्रकार निकाले, वह क्षमता हममें विकसित करती है।
विशेष:- धैर्य हमारा व्यक्तिगत गुण है, वह प्रतिकूल परिस्थितियों अगर उत्पन्न हो तो, 
उनका कैसे हम सामना करें, इसकी क्षमता हमें प्रदान करती है, निरंतर अगर हम धेर्य से कार्य करें, तो ऐसी जीवन की कोई भी समस्या नहीं है, जिसे हम सुलझा न सके। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।