प्रिय पाठक गण,
सादर वंदन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज हम प्रवाह में चर्चा करेंगे, गुरु पूर्णिमा पर, हम सभी के जीवन में गुरु की आवश्यकता , मार्गदर्शन हमें हमेशा चाहिये,
जीवन में प्रथम गुरु हमारी मां होती है, जो हमें निस्वार्थ भाव से कर्तव्य पालन की शिक्षा हमें प्रदान करती है, गुरु की महिमा हम वर्णन नहीं कर सकते, उनकी महिमा अगम अपार है, जो हमारी समझ से परे है, गुरु जो कुछ भी करते हैं, उसमें शिष्य का हित ही छुपा रहता है, वे सब विधि से शिष्य का कल्याण ही करते हैं ।
जिनके जीवन में कोई गुरु नहीं, उन्हें अगर मार्गदर्शन प्राप्त करना हो, तो श्री कृष्ण भगवान से प्रार्थना कर उनकी गुरु रूप में वंदना करना चाहिये, जिन्होंने हमें गीता जैसा
अद्भुत ग्रन्थ प्रदान किया, जिसमें उन्होंने निष्काम कर्म योग की शिक्षा प्रदान की, श्री कृष्ण भगवान के जैसा गुरु मिलना बड़े ही सौभाग्य की बात है, क्योंकि उनकी जो शिक्षाएं है, वे लौकिक व पारलौकिक दोनों ही प्रकार की है, जीवन संघर्ष मे वे हमें अपने कर्तव्य का पालन करना सीखाते हैं, व शठे शाठ्यम की अद्भुत नीति का भी हमें पाठ पढ़ाते हैं, वे बताते हैं, की सभी जगह केवल सीधेपन से कार्य नहीं चलता है, समय अनुसार हमें अपनी नीति को लागू करना चाहिये, कब कहां क्या उपयोगी है, इसका हमें पूर्ण अवलोकन के बाद कदम उठाना चाहिये,
ऐसी अद्भुत शिक्षा प्रदान करने वाले केवल श्रीकृष्ण ही है, इसीलिए तो उनके लिए कहा गया है, श्री कृष्ण वंदे जगतगुरु।
एक और उनके जैसा प्रेमी गुरु मिलना मुश्किल है, जो शरण में जाने पर आपके सारे अपराधों को क्षमा कर देता है, व अपने हृदय से लगा लेता है। श्री कृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व ही अद्भुत है। कई कठिनाइयों से घिरे होने पर भी वे सत्य मार्ग नहीं छोड़ते , अपनी विशिष्ट शैली से वे सब को प्रभावित करते हैं, जो जिस रूप में उनको भजना चाहता है, वह उस रूप में उसे उपलब्ध है, यह उन्होंने अपने विराट स्वरूप द्वारा भी बतलाया है।
विशेष:- गुरु महिमा का हम कितना भी वर्णन करें, नहीं कर सकते, वह हमेशा शिष्य के हित को सबसे ऊपर रखते हैं, उसके कल्याण का मार्ग किसमें छुपा है, इस और उसे प्रेरित करते हैं, इस संबंध में दोहा भी है, गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।