साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में मेरा विषय है, दिवंगत मशहूर शायर बशीर बद्र, उनकी शायरी की अपनी एक अलग पहचान है, जो जमीन से जुड़ी हुई शायरी की है, साधारण शब्दों में असाधारण बात कह देना, यह उनकी शायरी की विशेषता थी, उनका जाना उर्दू शायरी के लिये व साहित्य प्रेमियों के लिए एक ऐसा खालीपन है, जो कभी भरा नहीं जा सकता। 
       वे शायरी की महफिलों की शान हुआ करते थे, क्योंकि उनके द्वारा लिखी शायरी सीधे दिल को छूती थी, उन्होंने अपने द्वारा लिखी शायरी के द्वारा अवाम  में एक मुकाम हासिल किया था, उनकी शायरी में जीवन की तल्खी को भी उन्हें बड़ी शिद्दत से कहा है, नाराजगी को भी किस प्रकार से शायरी में तब्दील करना, उनकी शायरी रूह को छूने वाली शायरी थी, सीधे  व सरल शब्दों में 
अपनी बात कहने की जो उनकी कला थी, 
उसने उन्हें शायरी के जगत में एक विशिष्ट 
स्थान दिया, 
      व्यक्ति आते हैं, चले जाते हैं, मगर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो समाज पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाते हैं, उन्हें में से एक नाम 
है, शायर बशीर बद्र, वह भले ही शारीरिक रूप से चले गए हो, पर उनकी शायरी जनमानस हमेशा अपनी अमिट प्रभाव को कायम रखेगी, जनमानस क्या चाहता है, इस पर उनकी गहरी पकड़ थी, बड़े अदब से, 
अपने शब्दों को संवारना व उन्हें  अपनी कलम के जरिए लोगों तक पहुंचाना, उनकी शख्सियत हमेशा उनकी शायरी के जरिए 
हमें प्रेरणा देती रहेगी।
    साहित्यिक जगत के लिए यह एक दुःखद घटना है, जिसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो सकती, उन्हें दिल से सलाम।
विशेष:- शायर बशीर बद्र का इस प्रकार जाना जाना   समाज व साहित्य प्रेमियों के लिये एक ऐसा खालीपन है, जो शायद भरा न जा सके,
अपनी शायरी के बलबूते जनमानस पर जो अमिट प्रभाव उन्होंने डाला, वहां सदियों तक याद रखा जाएगा। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
  आप सभी को मंगल प्रणाम, 
हर मनुष्य के पास बुद्धि अवश्य होती है, वह अपना हित किस कार्य में है, यह वह भलीभांति जानता है, जो वह इस बात को जानता है, वह उसे किस प्रकार से जानता है, 
उसे हम बाह्य दृष्टि कह सकते हैं, जो हम जगत में, संसार में कैसे हम व्यवहारकुशल हो,
किस प्रकार से अपनी वाणी का प्रयोग  करें,
बुद्धि का प्रयोग करें, यह हमें बताती है, बाह्य जगत में, सांसारिक जगत में कैसा हम व्यवहार करें, इसका हमें बोध कराती है, यह तो हुई हमारी बाह्य दृष्टि। 
              अब हम आंतरिक दृष्टि की बात करते हैं, हमारे अपने गुण दोष क्या है? उसे और हमें जागृति प्रदान करती है, हर मनुष्य गुण दोषयुक्त ही है, मगर अपने स्वयं के गुण दोष पहचान कर गुणों से किस प्रकार हम कार्य करें, दोषों का हम किस प्रकार से परिमार्जन करें, अपने स्वयं को किस प्रकार से हम परिष्कृत करें, यह गुण हममें आंतरिक चेतना विकसित करने पर बढ़ते हैं।
      हमें जीवन में बाह्य दष्टि, जिससे हम जगत को जाने वह अंतर्दृष्टि जिससे हम स्वयं को भी जाने, इन दोनों का ही बोध होना परम आवश्यक है, या यह कह सकते है, हमारे पास दोनों ही दृष्टियां अगर है, तो हम तुलनात्मक अध्ययन द्वारा कहां किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, कहां पर बोलना है? कहां नहीं, यह समझ आने लगेगा। 
         जीवन को जीने के लिए हमें अंतर्दृष्टि व
बाह्य दृष्टि दोनों के ही उचित संतुलन की कला
का निरंतर अभ्यास करना होगा, तभी हम धीरे-धीरे साम्यावस्था को प्राप्त हो सकते हैं,
यानी हमारी धीरे-धीरे समदृष्टि विकसित होने से हम दोनों ही प्रकार के व्यवहार मे निपुणता 
प्राप्त कर सकते हैं।
         जगत में हमें व्यवहारिक कला में निपुण होना पड़ेगा वह अपनी स्वयं की आंतरिक
समृद्धि के लिये हमें अपनी आंतरिक दृष्टि को
विकसित करना होगा।
     हम सामान्य जीवन जीते हुए भी जब इन 
दोनों का संतुलन करना सीख गये, तो जीवन की जो कला है, किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, यह हमें ज्ञात हो जायेगा।
     क्रमशः हम आंतरिक दृष्टि व बाह्य दष्टि 
दोनों में उचित संतुलन रखते हुए इस संसार सागर की यात्रा को इन दोनों ही समानांतर पटरियों पर अपने जीवन रूपी रेलगाड़ी को 
चलाने की कला को सीख पायेंगे।
       जितना हमारा अभ्यास बढ़ेगा, हम परिपक्व होते जायेंगे, जीवन के संतुलन को साधते जायेंगे , उतना ही हमारा व्यक्तित्व भी निखरेगा, इस प्रकार हम अंतर्दृष्टि का विकास
करके आंतरिक अनुभूति व शांति को प्राप्त कर पायेंगे वह बाह्य जगत को देखने व घटनाक्रमों को ठीक ढ़ंग से समझने की कला को सीख जायेंगे।
विशेष:- अंतर्दृष्टि विकसित होने पर हमारा अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली होगा, वह बाह्य दृष्टि विकसित होने पर हमें व्यवहारिक कुशलता का ज्ञान होगा, और जीवन में दोनों की ही हमें आवश्यकता पड़ती है, इति शुभम भवतू ।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है, नव वर्ष शुरू हो गया है,
नवीन संकल्पों को हम गढ़े, और विषम परिस्थितियों में हम कैसे संतुलन स्थापित करें, यह सीखने का प्रयास करें। 
         अनुकूल परिस्थितियों हो, तब तो हर कोई बाजी जीत ही जाता है, परंतु विपरीत परिस्थितियों हो, समय विषम हो, तब किस प्रकार से हम किसी भी समस्या का समाधान निकालते हैं, वहीं हमारी योग्यता का परिचय हमें देना होता है।
       जहां विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होने पर साधारण व्यक्ति उनसे हार मान लेते हैं, साधारण व्यक्तित्व के धनी वहीं से अपनी राहे तैयार कर लेते हैं, यानी कुल मिलाकर मेरा यह मानना है, परिस्थितियों चाहे कितनी भी विषम क्यों न हो, कोई ना कोई द्वार तो अवश्य होता है, बस वही हमें पूर्ण धैर्य से खोजना होता है, 
कैसे हम अपनी समस्या के विभिन्न पहलुओं की जांच करते हैं, उन्हें में उसका समाधान भी छिपा होता है। 
       कोशिश करते रहे, कोई भी समस्या हो,  विषमता में समता हम किस प्रकार से 
स्थापित करें, यही हमारी योग्यता का पता हमें चलता है। 
        सामान्य स्थिति व विषम परिस्थिति में अंतर तो निश्चित होता है, पर धैर्य पूर्वक अगर हम स्थितियों का आकलन अगर हम करते हैं,
तो उन्हें विषम परिस्थितियों में ही हमें मार्ग भी मिल जाता है। 
      विषम से विषम परिस्थिति भी हो, अगर हम धैर्य रखें तो हमें समझ में आता है, की समस्या को हम किस प्रकार सुलझा पायेंगे।
      परिस्थितियों विषम भी हो, तो भी कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलता ही है, सूझबूझ व धैर्य पूर्वक अवलोकन से हमें राह मिल ही जाती है। प्रतिकूलता में अनुकूलता या विषमता में समता हम कैसे स्थापित करें, 
प्रयास करते रहने पर हम उसमें कामयाब हो सकतें हैं।
     अगर हमारे व्यक्तित्व में यह खूबी है, तो उसका हमें पता भी होना चाहिये वह समय आने पर हम उसका किस प्रकार से स्थितियों को अपने पक्ष में करें, जिस किसी का नुकसान भी ना हो वह हमारा कार्य भी सिद्ध हो जाये।
       यह जीवन में अनुभव द्वारा ही सीखा जा सकता है, बुद्धिमान मनुष्य परिस्थितियों का सही आकलन करते हैं, वह फिर निर्णय करते हैं। 
      जहां सभी हार मान जाते हैं, एक कुशल रणनीतिकार वहीं से अपनी जीत को तय करते हैं। साहसिक व दूरदर्शी बने, समय अनुकूल क्या उचित है, यह अध्ययन करें, राह स्वयं ही निकल जाती है। विषमता में समता को जो खोज लेता है, वह अपनी राहें बनाना जानता है।
विशेष:-  विषमता में समता को देख लेना, किस प्रकार से हल निकलेगा, वह हमारे व्यक्तित्व की दुरंदेशी को बताता है, परिस्थितियों से हारे नहीं , वरन् उनसे जूझने का आंतरिक सामर्थ्य अपने आप में उत्पन्न करें, विषमता में समता का अभ्यास करें, उसमें पारंगत होने पर आपके हल दूसरों से भी जल्दी होंगे, क्योंकि आपने एक ही समस्या के विविध पक्षों को भली भांति समझ कर फिर निर्णय लिया है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे धैर्य जीवन का अंग, हम सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव, मान-अपमान, जय पराजय सभी आते ही हैं।
       ऐसा कोई मनुष्य नहीं, इसके जीवन में
संघर्ष ना रहा हो, जीवन का शुरुआती संघर्ष आपको आगे बढ़ाता है, धैर्य पूर्वक अपनी जीवन यात्रा को पूर्ण करें, उम्र के विविध पड़ाव अलग-अलग संकेत आपको प्रदान करते हैं।
   जैसे-जैसे आपकी उमर धीरे-धीरे बढ़ती है, मगर जीवन ऊर्जा घटती जाती है।
       अपने अनुभव से सीखे, वह धैर्य को हमेशा अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना ले। जब भी कोई निर्णय करें, सोच समझकर करें, परिदृश्य को पूर्ण ईमानदारी व धैर्य पूर्वक समझे, फिर कोई भी फैसला करें, 
जीवन में कई बार आप जो चाहते हैं, वह नहीं होता, इसके बाद भी अपना धैर्य बनाए रखे,
विपरीत समय में अगर आप धैर्य बनाए रखेंगे 
तो जीवन की कई उलझनों से आप बच सकते हैं, निर्णय करते समय अगर आप धैर्य पूर्वक चीजों को समझते हैं, तो यह आपके साथ ही
आपके साथ जो भी है, उन्हें भी मुश्किलों से उबरने में सहयोग प्राप्त होगा, जब आप धैर्य धारण करते हैं, तो कई चीजे स्वत: सुलझ जाती है।
     कोई भी मामला हो, जब आपके भीतर आंतरिक धैर्यता का गुण अगर आपने विकसित कर लिया है, तो आप उसे विषय से संबंधित जो भी बातें हैं, उन्हें ठीक ढंग से समझ सकते हैं, और उनका निराकरण निकाल सकते हैं, निराकरण करते समय आपका धैर्य व सूझबूझ दोनों ही काम आते हैं, निरंतर धैर्य धारण करने से आपके भीतर ऐसी क्षमता विकसित हो जाती है, जिससे आप स्थितियों को समझ कर फिर अपना कदम उठा सकते हैं। 
      इस प्रकार समस्या उत्पन्न होने पर हम निराकरण कर सकते हैं, समस्या कोई भी हो, 
सही ढंग से अगर हम समझे तो उसका निराकरण संभव है, किसी भी समस्या में आपकी संवाद की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है, आपसी संवाद द्वारा हम गलत फैमिलायों को दूर कर सकते हैं, और चीजों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
        जब हम धैर्यपूर्वक चीजों को समझते हैं,
तो हमारे पास उन सब बातों का जो हम करना चाहते हैं, रास्ता खुल जाता है, सभी पहलुओं को हम समझ पाते हैं, जीवन में 
सफलता व असफलता, दोनों ही आती है। 
           असफलता हमें और अधिक सिखाती है, हमारी स्वयं की क्षमता को और बेहतर करने की हमें शक्ति प्रदान करती है।
        जितना अधिक धैर्य हम में होगा, उतना ही हम बातों को ध्यान पूर्वक समझ कर उन्हें कर सकते हैं, आपसी संबंधों को भी हम एक मजबूत आधार प्रदान कर सकते है।
     जब हम पूर्णतया पारदर्शिता से अपनी बातों को रखते हैं, तो वह पारदर्शिता हमें सिखाती है, हम कैसे बातों को बेहतर ढंग से करें। 
        धैर्य वह कला है, जो हमारी बातों को हम कैसे पेश करें, उनका समाधान किस प्रकार निकाले, वह क्षमता हममें विकसित करती है।
विशेष:- धैर्य हमारा व्यक्तिगत गुण है, वह प्रतिकूल परिस्थितियों अगर उत्पन्न हो तो, 
उनका कैसे हम सामना करें, इसकी क्षमता हमें प्रदान करती है, निरंतर अगर हम धेर्य से कार्य करें, तो ऐसी जीवन की कोई भी समस्या नहीं है, जिसे हम सुलझा न सके। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम , 
    आज हम बात करेंगे, सजगता ही बचाव है,
अगर हम पूर्ण रूप से सजग है, तो हमें मालूम होता है, कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं, वह कितना महत्वपूर्ण है व उसे किस प्रकार से 
किया जाये।
       सजग रहकर हम सारी परिस्थितियां  ठीक प्रकार से समझ सकते हैं। आंतरिक सजगता हमें क्या कर्म करना है, क्या नहीं? 
यह बोध प्रदान करती है, व बाहृय  सजगता हमें व्यवहार कुशल बनाती है।
      इस प्रकार हमारे जीवन में दोनों ही प्रकार की सजगता अगर बराबर है, तो परिणाम निश्चित ही सुंदर होंगे।
      हम अपने कार्य के प्रति पूर्ण सजग रहें,
व जीवन का आपका कौन सा चरण है, अगर आप जीवन के प्रारंभिक चरण में है, 
तो शुरुआत से ही सजग रहकर अपनी भूमिका तय करिये, आपका जीवन आपका स्वयं का है, उसके परिणाम आपको ही प्राप्त होंगे, अन्य किसी को नहीं।
     अगर जीवन की शुरुआत में ही आपके पास लक्ष्य स्पष्ट है, तो आपने जीवन की सही शुरुआत प्रारंभ कर दी है, अस्पष्ट नजरिया हमारी उन्नति को रोकता है, अपनी स्वयं की रुचि कौन से क्षेत्र में है, हमें वही कार्य शुरुआत से करना चाहिये।
        शुरुआती जीवन में अगर अपने लक्ष्य को ध्यान में रखा, तो सफलता आपकी राह देख ही रही है, अगर किसी कारणवश आप जीवन के प्रारंभिक चरण में लक्ष्य तय नहीं कर पाये, आप जीवन के मध्य चरण में है, तो अपनी गतिविधियों को स्वयं जांचे, कहां चुक हो रही है, धैर्य पूर्वक कोई एक दिशा में आप कार्य करें, नहीं तो प्रारंभिक चरण में तो आप सजग नहीं रहे, जीवन के मध्य चरण में आप सजग अवश्य हो जाये, व अपने जीवन की रूपरेखा आप समझे, एक ही दिशा में कार्य करें, जीवन के प्रारंभिक चरण को खोने के बाद मध्य चरण में कोई गलती ना करे, अभी भी समय पूर्ण रूप से आपके हाथों से नहीं निकला है। 
     जीवन का प्रारंभिक व मध्य चरण अगर आप सजगता पूर्वक संपन्न करते हैं, तो अंतिम चरण में आपको इतनी चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं है, जीवन में सजग रहें।
सजगता ही बचाव है, नित्य प्रति प्रभु कृपा का
भी सुमिरण करते रहे, वह परमपिता सबका कल्याण ही करता है, उसकी शरण में रहकर अपने जीवन के समस्त कार्यों को संपन्न करें। 
अगर आपने प्रारंभिक व मध्य चरण सफलतापूर्वक पार कर लिया है, तो आपका अंतिम चरण प्रभु की कृपा से उत्तम ही होगा। 
प्रारंभिक व मध्य चरण के बाद ही जीवन का उत्तरार्ध आता है, अगर हमारे प्रारंभिक व मध्य के फैसले सजगतापूर्वक किये गये है, तो हमारे पूर्व में किया गये अच्छे कार्य व फैसले हमारा रक्षण करेंगे, जीवन के उत्तरार्ध में प्रभु की ओर धीरे-धीरे हम बढ़ते रहे, उसकी असीम अनुकंपा को अनुभव करें।
     सजग रहे, सरल रहे, आत्म बोध बनाये रखें, धैर्य पूर्वक अपना रास्ता तय करें, मंजिल की और कदम बढ़ाते रहे।
विशेष:- कोई भी फैसला जब हम करें, जीवन के सारे पहलुओं को देखने के बाद ही निर्णय करें, दूरगामी परिणामों को देखकर किसी भी कदम को बढ़ाये, धर्म ग्रंथ का अध्ययन करें , पुस्तकें पढ़ें, अनुभवी लोगों से मिले, उनके जीवन के अनुभवों को सुने, सजग रहे, परिवर्तनों को ध्यान पूर्वक देखें।
आपकाअपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।   

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
     मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा है, जब वह अपना सफर करता है, तो उसे सर्वप्रथम वह परिवार, जिसमें वह पला बढ़ा, उसके पारिवारिक संस्कार, जो उसे प्राप्त हुए, उसकी परवरिश, उसके बाद उसका स्वयं का अपना
संघर्ष, यह सब उसकी जिंदगी में अनिवार्य आते ही है।
              इन सभी के बीच में परिवार की मान्यताएं, सामाजिक मान्यताएं, इन सबके बीच में व्यक्ति को उसकी नैसर्गिक  ऊर्जा जो प्राप्त हुई, परमात्मा से, वह या तो क्षीण होगी 
या उसमें वृद्धि होगी, अगर ऊर्जा क्षीण होती
हैं, तो निश्चित ही उसकी दिशा जिधर वह जा रहा है, सही नहीं है, और अगर उस ऊर्जा में अभिवृद्धि हुई है, तो वह सही दिशा की और जा रहा है। सवाल यह है कि हम अपने जीवन में इस सकारात्मकता का पता किस प्रकार करें , तो अपने आप को जांचे, अपना संपूर्ण जीवन आपने मातृ भोग-विलास में ही बिता दिया है, या अपने जीवन का इससे हटकर कुछ अलग उद्देश्य आपने तय किया है, जीवन की इस यात्रा में आपके सामने निश्चित ही कई पड़ाव आते हैं, तब आपको फैसला करना ही होते हैं, अन्य कोई भी उपाय नहीं होता, उस परिस्थिति में आप क्या फैसला कर रहे हैं, वह स्वविवेक, तात्कालिक परिस्थितियां, अनुकूलता, प्रतिकूलता सब कुछ हो सकता है, इस यात्रा में आपने जो निर्णय लिये है, वह दूरगामी  परिणामों को देखकर लिये है अथवा नहीं, अगर आपने अपने फैसले के दूरगामी परिणामों पर विचार किया है, तो निश्चित ही आपके फैसले सही होंगे, किसी भी निर्णय को लेने का बाद में क्या परिणाम उपस्थित होगा, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
         इसमें सबसे अधिक मूल्य आपके पारिवारिक संस्कारों का है, उन संस्कारों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका इसमें होती है, वर्तमान परिस्थितियों जो भी अच्छी या बुरी निर्मित हुई है, वह हमारे अपने फैसलों का ही परिणाम है, आगे भी आप जो फैसला गहरी समझ के आधार पर लेंगे, वह अधिकतम सही दिशा की और ही होगा। 
     हमारा जीवन केवल हमारा ना होकर परिवार ,समाज दोनों से जुड़ा हुआ है, हम परिवार व समाज की मात्र एक  इकाई है,
इसलिए हमारे फैसलों का दूरगामी परिणाम हमारे परिवार व समाज पर पड़ता ही है।
     हमें हमेशा कोई भी फैसला लेते समय तात्कालिक परिस्थितियां व दुरगामी  परिणाम 
दोनों का ही चिंतन करना चाहिये,  तात्कालिक व दीर्घकालिक फैसला आप अपने जीवन के अनुभव के आधार पर भी ले सकते हैं। 
      समयानुकूल निर्णय आपने कितने बुद्धिमत्ता पूर्वक लिये हैं, वही आपके जीवन के परिणाम बदलेगा। जो भी व्यक्ति अपने जीवन की शुरुआत में सही दिशा में संघर्ष करता है, वह अपनी बाद का समय सुखपूर्वक बिताता है, हमारे इसी जीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म या तो हमें ऊपर उठाते हैं या नीचे गिराते हैं, कोई अन्य इसके लिए कभी दोषी नहीं हो सकता। 
       अपनी दैनिक दिनचर्या का स्वयं आकलन अवश्य करते रहे, बिना किसी सोच विचार के जीवन रूपी नौका किधर जायेगी,
पता नहीं, अगर आपको दिशाबोध या ज्ञान नहीं हो रहा तो आप पुरानी कहावतों  का सहारा भी ले सकते हैं, क्योंकि वे काफी अनुभव के बाद ही बनाई हुई होती है, अथवा अनुभवी व्यक्तियों का मार्गदर्शन ले, किसी गुरु या ग्रंथ का आश्रय ले, स्वयं चिंतन भी करते रहे, जीवन को सही मूल्यों के साथ जीना, भले ही थोड़ी तात्कालिक परेशानी हमें उठानी पड़े, यही हमारे जीवन में सबसे अधिक आवश्यक है। 
विशेष:- हमारा, आपका सभी का जीवन एक यात्रा ही तो है, इस यात्रा में हमें कई साथी मिलेंगे, बिछड़ेंगे, पर अपना स्वयं का निर्णय, 
हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, यह हम स्वयं ही तय करते हैं, जिस प्रकार का हमारा सोच विचार होगा, उसी प्रकार की हमारी रणनीति भी होगी। जीवन कैसा जीना है, यह हमारे फैसलों पर ही निर्भर है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
            उम्मीद है आप सभी को मेरी यह वैचारिक शैली व यात्रा पसंद आ रही होगी,
विविध विषयों पर जो भी मेरी अनुभूति रही है,
उसे कलमबद्ध करने का एक छोटा सा प्रयास है ।
        आज का हमारा विषय है, सेहत, यानी व्यक्ति के पास सब साधन हो, पर सेहत अच्छी न हो, तो वह सब साधन भी फिर उसे व्यर्थ प्रतीत होते हैं, अच्छी सेहत के लिए हमें शारीरिक के साथ ही मानसिक ऊर्जा को भी बदलने का प्रयास करना चाहिये, क्योंकि शरीर की सेहत व मन की सेहत एक ही सिक्के के दोनों पहलू है, एक पुरानी कहावत भी है, " मन चंगा, तो कठौती में गंगा", यह केवल मात्र कहावत नहीं है, यह जीवन का असल सूत्र है, जो एक कहावत के माध्यम से हमें सारी बात बताता है। 
       और उद्धरण  हम लेते हैं, तो पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख हाथ में माया, तीजा सुख प्रभु की छाया, तो यहां भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, हमारे पास सबसे पहले अच्छा स्वास्थ्य हो, फिर भौतिक सुख सुविधा भी हो, तो प्रभु की कृपा तो अपने आप ही प्राप्त हो जाती है।
         सर्वप्रथम सेहत अगर हमारी अच्छी है, 
तो हम स्वयं तो भीतर- बाहर से ऊर्जावान होंगे, साथ ही भौतिक संसाधनों का हम उपयोग करने में समर्थ होंगे, फिर तीसरा जो सुख है, वह परमपिता की, ईश्वर की अनुकंपा, यह तीन किसी भी व्यक्ति के जीवन में है, तो मानो वह स्वर्ग में ही है। 
      अगर सेहत अच्छी है, तो आप अच्छा महसूस करेंगे, साथ ही भौतिक साधन पास में होने से आपको सांसारिक चिंता भी नहीं होगी,
तब इन दोनों के साथ तीसरा जो सेहत व मानसिक सेहत का राज है, इन दोनों के साथ है ,उस परमपिता परमेश्वर की कृपा।
      यह मेरी नजर में त्रिवेणी स्नान ही है, अगर यह तीन बातें किसी के भी जीवन में है, 
तो वह मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों ही प्रकार से समृद्ध है। 
         आंतरिक व बाह्य दोनों प्रकार की समृद्धि किसी के पास हो, तो फिर उसे ईश्वर की कृपा तो प्राप्त है ही, और इसके लिए हमें उन परमपिता का कृतज्ञ होना चाहिये, प्रभु का धन्यवाद, जिन्होंने हमें मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों प्रकार से समृद्ध किया।
          यह त्रिवेणी स्नान ही है, जब इन तीनों का संगम जीवन में हो, तो फिर मनुष्य को और क्या चाहिए? 
         यही प्रार्थना है, आंतरिक समृद्धि ही हमें बाह्य समृद्धि प्रदान करती है, वस्तुतः यह एक ही सिक्के के दो पहलू है। 
         आज हमें भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, वह हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, पहले जितनी कारे नहीं थी, सभी के पास, 
अधिकतम लोगों के पास यह संसाधन उपलब्ध है। 
          मगर अच्छी सेहत इन सभी संसाधनों से ऊपर है, सेहत हमारी अगर अच्छी है, तभी हम बाकी सभी का जीवन में आनंद उठा सकते हैं, तो फिर आप क्या सोच रहे हैं? 
आज से ही इस त्रिवेणी में स्नान करना प्रारंभ करिये, मानसिक, शारीरिक व भौतिक, यह भी एक त्रिवेणी ही है। 
विशेष:- हम सभी के लिए अच्छी सेहत का मतलब केवल शारीरिक सेहत न होकर मानसिक भी हो, मानसिक व शारीरिक दोनों ही सेहत आवश्यक भी है, वह एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू है, जो हमारे जीवन में 
अगर संतुलन के रूप में है, तो तीसरा सुख प्रभु की कृपा हमारे जीवन में है ही, उनका नित्य सुमिरन उनकी अनन्य कृपा को हम याद करते रहे। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, स्वाभिमान पर, स्वभाव+अभिमान, इन दो शब्दों से मिलकर यह बना है, जो भी प्रकृति से हमें 
प्राप्त हुआ, वही सत्य है।
      स्वाभिमान, यानी अपनी मूल प्रवृत्ति या
प्रकृति जो हमें ईश्वर ने प्रदान की है, वही हमारा स्वभाव है, या स्वाभिमान भी है।
        सभी की अपनी- अपनी आदतें होती हैं,
मगर एक बात अगर हम गहराई पूर्वक विचार करें , तो वह यह है, कि मानवीय करुणा से 
ओत-प्रोत होना, मनुष्य होना यह हम कभी न भूलें।
        हमारा जो भी स्वभाव है, स्वाभिमान है, 
वह ऐसा हो, जिससे हमारे आत्म सम्मान को 
भी ठेस न पहुंचे, साथ ही अन्य के भी आत्म सम्मान को हम ठेस न लगायें।
       मनुष्य की मूल प्रकृति यह रही है, कोई उसे पहचाने, जाने, उसकी लोकप्रियता हो,
यह एक ऐसी ख्वाहिश है, जो सभी के अंतर्मन में बसी होती है।
         अपनी मौलिक विशेषताओं को हमें
पहचानना चाहिये व पूर्ण ईमानदारी से उस
पर कार्य करें, अगर हममें कोई भी हुनर है, 
तो उसे हमें लगातार, निरंतर अभ्यास के द्वारा 
हम किसी भी विधा में शीर्ष पर जा सकते हैं। 
हम सभी के जीवन में उतार- चढ़ाव, जय पराजय, हानि -लाभ, सभी आते ही हैं, मगर अपने अच्छे समय में हम बिल्कुल शांतचित्त होकर उसका आनंद उठायें, व विपरीत समय होने पर भी धैर्य बनाए रखें। 
      अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को 
कभी भी नीचा न होने दे, हम जीवन में जो भी कर रहे होते हैं, वह कोई और भले ही नहीं जानता हो, हम स्वयं तो जानते ही हैं।
    जैसे ही हम अपनी विशेषताओ पर सही तरीके से कार्य करना सीख जाते हैं, जीवन को सही अर्थों में हम जीना ही सीखने है।
    जीवन का हर पल आनंदमय व खुशनुमा ही है, मगर उसके लिए हमें बाह्य जगत के साथ अपने आंतरिक जगत यानी अपने मनोभावों पर भी कार्य करना होंगा।
     शांतचित्त  से हम सब घटनाक्रम जो हमारे जीवन में घटित हुए हैं, कुछ में तो हमारी मर्जी शामिल होती है, कुछ में नही।
       अगर प्रकृति ने हमें सामंजस्यता का गुण
प्रदान किया है, तो हमें आगे बढ़कर नेतृत्व करना ही चाहिये, क्योंकि यह गुण आपके नेतृत्व की क्षमता को प्रदर्शित करता है।
        इसी प्रकार हम अपने स्वभाव के अनुसार अगर अपनी जीवन शैली को ढालते 
हैं, तो हमें जीवन में प्रतिकूल भी अनुकूल जाना पड़ेगा। 
       अपने निजी स्वभाव को समझकर फिर उस पर पूर्ण रूप से , दृढ़ता पूर्वक अगर हम अमल करते हैं, तो हमें कामयाबी भी प्राप्त
होगी, व अपनी पहचान को हम अपने उस
गुण की बदौलत ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। 
       धन हमें भौतिक सुख सुविधाएं तो प्रदान कर सकता है, मगर हमारा आंतरिक वैभव हमारी असली पूंजी है।
       भौतिक व आध्यात्मिक  दोनों ही पहलू जरूरी भी है। 
      सबके अनुभव अपने हैं, समस्याएं भी अलग-अलग है, मगर अपने स्वभाव को समझकर हम अपने कार्य को अगर करते हैं,
और अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते हैं, धैर्य पूर्वक हम उनका सामना करते हैं, चीजों को वास्तविक रूप से किस प्रकार घटेगी ,देखते हैं, तो आपकी कामयाबी की राह पक्की है। 
विशेष:- हम सभी को ईश्वर ने कोई न कोई मौलिक विशेषता प्रदान की है, और उसी मौलिक विशेषता को हम पहचाने व पूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करें, आपका 
स्वाभिमान भी सुरक्षित रहेगा, कामयाबी  भी प्राप्त होगी, अपने लक्ष्यों के प्रति ईमानदार रहे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदेमातरम्।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
 आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, स्पंदन या तरंग पर, यह एक सूक्ष्म विज्ञान है, स्पंदन यानी किसी भी जगह या मनुष्य के भीतर या वहां पर वातावरण में जो भी स्पंदन या तरंगे विद्यमान है, वह किस प्रकार की है।
       सकारात्मक ऊर्जा है या नकारात्मक ऊर्जा है, किस प्रकार के स्पंदन वातावरण में व्याप्त है, यह निष्कर्ष ध्वनि जो वहां पर है, भले ही वह सूक्ष्म रूप में ही क्यों न हो, उस वातावरण की ऊर्जा को बदलने की अचूक सामर्थ्य रखती है। 
     जब साधारण रूप से कहे शब्दों का हमारे ऊपर प्रभाव होता है, तो सूक्ष्म ऊर्जा जो किसी भी वातावरण में है, वहां की ऊर्जा को नकारात्मक या सकारात्मक कर सकती है। 
      यह एक गहरे शोध का विषय है, पर सामान्य रूप से भी बातचीत द्वारा हम कौन सी ऊर्जा उत्पन्न कर रहे हैं, व अगर मौन भी है, तो कौन से स्पंदन हमारे भीतर चल रहे है,
हमारे भीतर सूक्ष्म तरंगे तो चल ही रही है, 
उन्ही तरंगों को हम किस प्रकार से सकारात्मक तरंगों में परिवर्तित करें, यही हमारा प्राचीन विज्ञान व दर्शन हमें बताता है। 
      आंतरिक ऊर्जा का परिवर्तन हम शनै शनै हमारे अभ्यास द्वारा कर सकते हैं, इसे हम विज्ञान या कला दोनों ही कह सकते हैं, यह दोनों का समन्वय है।
       इसे हम परा विज्ञान भी कह सकते हैं, कोई भी मंदिर या स्थान एक दिन में सिद्ध स्थल नहीं बन जाते हैं, वहां पर निरंतर पूजा -पाठ, 
हवन, आरती आदि नियमित किये जाते हैं,
जिससे वहां का वातावरण ऊर्जामय  हो जाता है, यही प्रक्रिया अगर हम अपने घरों में दोहराते हैं, तो घरों की ऊर्जा भी जो है, वह संतुलित होने लगती है। 
      निरंतर चलने वाली यह प्रक्रिया किसी भी स्थान या वस्तु या अपने आसपास के वातावरण को बदलने की एक अद्भुत सामर्थ्य रखती है, इस विज्ञान से हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षि भली भांति परिचित थे, भारतीय संस्कृति की गहराई को अगर हमें वास्तव में समझना है, तो हमें सूक्ष्म तरंगों पर कार्य करना होगा, हम स्वयं भी निरंतर अभ्यास द्वारा अपने  आप को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर सकतेहैं, हमारा शरीर कई प्रकार की ऊर्जाओं का एक जोड़ है, जब हमारा जन्म हुआ, उस समय जब हम मां के गर्भ में थे, तब जो ऊर्जा हमारे 
भीतर बन रही थी, बाद में जब जन्म हुआ तो हमारे आसपास भी भिन्न ऊर्जा वाले व्यक्ति, 
वस्तु के संपर्क में हम आते हैं, अपने जीवन काल के दौरान हम कई प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही ऊर्जाओं के मध्य अपना जीवन जीते हैं।
      हम अपनी आंतरिक ऊर्जा को तो निश्चित ही परिवर्तित कर सकते हैं, यह हमारे स्वयं के नियंत्रण में है, परंतु बाह्य ऊर्जा जो वातावरण से, परिवेश से, अनेक अन्य विचारों से, हमारे आसपास घट रही है, उस पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं होता। 
    हमारा जीवन व यह शरीर स्पंदनो को समझता है, यह समस्त ब्रह्मांड एक स्पंदन है, 
इसमें सभी प्रकार की ऊर्जा है, हम उनमें से किस ऊर्जा से संपर्क स्थापित करते हैं, या करना चाहते हैं, हम उसे ही जाने- अनजाने में आकर्षित करते हैं, बस यही समस्त ब्रह्मांड का सूक्ष्म व विराट दोनों ही स्वरुप है।
      सूक्ष्म से विराट, विराट से सूक्ष्म, हम इस ऊर्जा को किस प्रकार से देखते हैं, यह हमारी अपनी दृष्टि भी हो सकती है।
      प्राचीन महर्षियो ने गहरे शोध के बाद कई बातों को स्थापित किया, हो सकता , हम उन रहस्यो से परिचित नहीं है, पर सत्य है या असत्य, यह तो हमें निरंतर उस चेतना से जुड़ने पर ही प्राप्त हो सकता है।
          मगर स्पंदन की जो भाषा है, आप किसी के लिए भी आंतरिक रूप से अच्छा या बुरा जो भी भीतर से सोचते हैं, वह अंततः कार्य करता तो है।
        इतना तो मैंने स्पंदनों पर कार्य करने के बाद महसूस किया है, सूक्ष्म में जो चलता है, 
अंत में वहीं घटता है, क्योंकि उसके बीज हमारे भीतर विद्यमान थे, व उन्हें  उचित वातावरण अगर हमने प्रदान किया, तो वे निश्चित ही एक समय बाद  वे प्रस्फुटित होंगे 
ही।
         मेरा यह आलेख आप सभी को पसंद आयेगा, ऐसा मेरा मानना है, जो भी मैंने आंतरिक रूप से महसूस किया है, वही मैंने 
शब्दों के रूप में लिखा है। 
    आप सभी का दिन मंगलमय  व ऊर्जा पूर्ण हो, सभी के जीवन में समृद्धि आंतरिक व बाह्य दोनों ही प्रकार की, भौतिक व आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समृद्धि जीवन में बढ़े।
       सूक्ष्म स्पंदनों के साथ हम  इस लेख को आज विराम देते हैं, शेष फिर ।
     विशेष:- स्पंदन हम चाहे या न चाहे, अपना कार्य करते ही है, परिवार से ,व हमारे जन्म से 
जो भी हमें प्राप्त हुआ, पूर्व जन्म, इस जन्म वह आगे अभी हम क्या कर रहैं हैं? कितने प्रकार के विभिन्न स्पंदनों के मध्य हमारी यह
जीवन यात्रा चल रही है, किन स्पंदनों की और हम आकर्षित हो रहे है, कुछ तो हमारे हाथ में
हैं, कुछ हमारे हाथ नहीं भी है, इस प्रकार यह एक मिला-जुला स्वरूप है। 
      वैसे गहरी आत्म शक्ति द्वारा हम अपने पूरे जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं, अगर हम इसे सही रूप में समझ सके तब। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद, 
वंदे मातरम्।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      हम सभी उस विराट के अंश है, हम चाहे अथवा न चाहे, माने अथवा न माने, कुछ चीजें हमारे हाथ में है, कुछ नहीं। 
      यहीं पर हमें श्रीमद् भागवत गीता को सही अर्थों में समझने की आवश्यकता है।
     यहां भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से इसकी व्याख्या करते हैं, वह कर्म की महत्ता को समझाते व कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए 
श्रीमद् भागवत गीता में स्पष्ट घोषणा करते हैं,
की स्वधर्म का पालन हीं सबसे अधिक उत्तम धर्म है, न कि पर धर्म का।
     स्पष्ट रूप से वे कहते हैं, कि आपका जो भी कर्म है, वह गुण दोष से युक्त हो सकता है, 
जैसे अग्नि में धुंआ, सूर्य में अत्यधिक ताप,
जो भी गुण धर्म जिस भी वस्तु या जीव के है,
वे स्वाभाविक है। 
      यहां पर मनुष्य योनि सर्वोपरि इसलिये कही गई है, कि वह विवेकपूर्ण ढंग से अपने जीवन को जी सकता है, उसे किस प्रकार का जीवन जीना है, वह यह तय कर सकता है, 
मनुष्य में कई प्रकार की पूर्व जन्म से प्राप्त धारणाएं व इस जन्म के कर्म सभी का फल उसे प्राप्त होता ही है। 
    निज कर्तव्य को भगवान  श्रीकृष्ण सर्वोपरि  मानते हैं, फिर भी वह गीता जी में 
तीन मार्ग निष्काम कर्म मार्ग, सांख्य योग व भक्ति योग तीनों का ही विवेचन करते हैं, तीनों ही मार्ग मुझ तक आते हैं, यह वह स्पष्ट वर्णन करते हैं, परंतु आपका स्वभाव किसके अधिक अनुकूल है, वह मार्ग आपके लिए श्रेष्ठ है, कर्म सिद्धांत को  सर्वश्रेष्ठ घोषित इसलिये करते हैं,
क्योंकि यह सबसे सरलतम सिद्धांत है, कोई भी जीव कर्म करे बिना रह ही नहीं सकता, तो उन्होंने निज कर्तव्य को श्रेष्ठ कहा।
      इसकी सही व्याख्या हम इस प्रकार कर सकते हैं, जैसे कोई इंजीनियर है, कोई डॉक्टर है, कोई राजनेता है, अध्यापक है, विद्यार्थी है, 
धर्म का उपदेशक है, तब जो भी उसका निज कर्तव्य जो उसने चुना है, या प्रारब्ध वश उसे प्राप्त हुआ है, उसे पूर्ण निष्ठा व मनोयोग पूर्वक वह करें। 
         इतने मात्र से भी हम अपने जीवन में संतुलन ला सकते हैं, व ईश्वरीय कृपा के पात्र बन सकते हैं।
       गीता में निज  कर्तव्य को वे सर्वोपरि मानते हैं, व इसी और वह जगत को प्रेरित करते हैं, क्योंकि यह बड़ा ही सरल व सुलभ मार्ग है, इसमें साधारण शब्दों में गहरी बात कही गई है, इतनी सरलतम व्याख्या भी अगर हम नहीं समझ पाये तो फिर इसमें भगवान का भी क्या दोष?  वे तो सदैव प्राणी मात्र के हित का ही चिंतन करते हैं।
         फिर वे सांख्य योग का भी वर्णन करते हैं, पर वे उसमें कहते हैं व्यक्ति को अपनी अहंकार भाव का व देह के अभिमान का भी 
पूर्णतः त्याग करना होगा, यह मार्ग थोड़ा कठिन होने से वह कर्मयोग को ज्यादा सहज मानते हैं, एक और भक्तिमार्ग का भी विवेचन में करते हैं, वह कहते हैं, तू जो कुछ भी करता है, वह मेरे अर्पण कर दे, नित्य मेरे नाम का
सुमिरन करते जा, नित्य उनका सुमिरन करने से फिर धीरे-धीरे भाव शुद्ध होने लगेंगे, और यह भक्तिमार्ग से भी संभव है।
      आपका चित्त व शरीर किस प्रकार से बना है, इन तीनों मार्ग में से आपके स्वभाव 
के अनुसार आपको कौन सा मार्ग अधिक अनुकूल प्रतीत होता है, वह आप अपना सकते हैं, मार्ग तीनों ही सही है, पर भगवान  श्री कृष्ण ने निष्काम कर्मयोग को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया, उन्होंने निज कर्म जो आपने चुना है, या  प्रारब्ध वंश आपको प्राप्त हुआ है, उसे आप पूर्ण ईमानदारी व निष्ठापूर्वक करें, बस यही श्री कृष्ण जी का 
संदेश है, और यह कालजयी है, सदा शाश्वत है।
     भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, आप अपना  कर्म निष्ठा पूर्वक करें वह उसके फल का भार मुझ पर छोड़ दे, अपने अहं भाव का त्याग करें,
चाहे वह कर्मयोग, सांख्य योग, भक्ति योग 
किसी भी माध्यम से हो, निज कर्तव्य को 
निष्ठापूर्वक करने की बात कहता है। 
     हमें इसी जीवन में ईश्वर का सामीप्य प्राप्त हो सकता है, अगर हम  निष्काम भाव से कार्य करने की प्रेरणा श्रीमद्भगवतगीता से प्राप्त करें। यह एक कालजयी  ग्रंथ है, और बहुत ही सरल ,सहज रूप में कर्म सिद्धांत की इसमें व्याख्या की गई है। 
    निज  कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक करना ही इसका मुख्य संदेश है।
विशेष:- अपने-अपने कर्म को पूर्ण निष्ठा व
ईमानदारी पूर्वक हम करें, अहंकार भाव का त्याग करें, समर्पण व निष्ठापूर्वक अपने कार्य को करें, बस इतने मात्र से भी आप उनकी कृपा के पात्र बन सकते हैं, अपने कर्तव्य को करें व परिणाम की चिंता उस प्रभु पर छोड़ 
 दे, यही गीता -सार है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदेमातरम्।

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, गरिमा यानी कि हर व्यक्ति का आदर, हर वह वस्तु भी जो हमें प्राप्त है, जो भी साधन हमें प्राप्त है, उनके प्रति  आदरयुक्त होना, उन्हें सम्मान प्रदान करना, समय अगर अच्छा चल रहा है, तो पूर्ण गरिमा व विनम्रता से उसका भी सम्मान करें, 
विपरीत समय का भी गरिमा पूर्ण तरीके से स्वागत करें, इसका कारण यह है कि विपरीत समय हमें सिखाता है, विपरीत समय हमें संघर्ष का मूल्य बताता है,  तो उसे भी गरिमा हम प्रदान करें, विपरीत समय ही वह समय काल है, जब आपका व्यक्तित्व निखर रहा था, समय के संघर्ष से। 
     तपे बिना तो स्वर्ण में भी निखार नहीं आता, जो व्यक्ति जितने विविध अनुभव व कठिनाइयों से गुजरता है, वह उनसे सीख प्राप्त करता है।
      सीढ़ी दर सीढ़ी उसकी यात्रा चलती है,
वह उस यात्रा को अपनी बुद्धिमत्ता, जिजीविषा व अथक परिश्रम द्वारा सार्थक बनाता है।
       कोई भी व्यक्ति एक दिन में महामानव नहीं बनता, यह एक निरंतर चलने वाली यात्रा है।
    हम सभी ईश्वरीय शक्तियों के मालिक हैं,
पर हम उनका सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग, जो भी इन शक्तियों का स्वयं के लिये, परिवार के लिये, समाज के लिये 
सदुपयोग करता है, अंततः वही विचारधारा ही उसे उस प्रकार के कर्म की और प्रेरित करती 
हैं, व धीरे-धीरे वह अपनी उस यात्रा को वहां 
तक ले जाता है, जिसके लिये आखिरकार उसका जन्म हुआ है, वह प्रेरणा उसे भीतर से प्राप्त होने लगती है। 
      यह सब अनायास नहीं होता, आंतरिक प्रज्ञा जब मनुष्य की जागृत हो जातीं है, तो वह गरिमामय जीवन स्वयं तो जीता ही है, अन्य सभी के लिये भी प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। 
     शब्दों की भी गरिमा है, हम क्या सोच रहे
हैं? उसके पीछे का हमारा मूल हेतु क्या है?
क्या वह किसी के हित की भावना से प्रेरित है, या अहित के भाव से, जब भी हमारा हेतु स्वयं का स्वार्थ न होकर परमार्थ की शक्ति से प्रेरित होता है, हम भीतर से शक्ति युक्त होते हैं। 
     हमारी शक्ति व सामर्थ्य अगर हम स्वयं के, परिवार के वह समाज के संवर्धन में लगा रहे हैं, तो निश्चित इसके दूरगामी  परिणाम आपकी गरिमा में वृद्धि करेंगे।
        यह यात्रा कोई सामान्य यात्रा नहीं है, यह मानव के मानवीय परिष्कार की एक अद्भुत यात्रा है, जो भी अपने जीवन काल में यह तथ्य समझ जाता है, वह फिर अपने आप उस यात्रा की और खींचा चला जाता है।
       कोई अज्ञात शक्ति आपको प्रेरणा भीतर से प्रदान करती जाती है, मार्ग प्रशस्त करती जाती है, और आप अपने पथ पर आगे बढ़ने लगते हैं। कोई तो ऐसी शक्ति अवश्य ही  इस संपूर्ण ब्रह्मांड में विद्यमान हैं, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन कर रही है। 
      हम और आप केवल निमित्त होकर अपनी अपनी भूमिकाओं का निर्वहन भर कर रहे हैं।
    यह कितनी कुशलता पूर्वक व गरिमामय  तरीके से हम कर पाते है , वही हमारी व सभी की यात्रा है, भीतर से बाहर की और, अंतः प्रेरणा से, स्वप्रेरणा से जागृति की और। 
       अपनी गरिमा सदैव बनाये रखें, कोई विपरीत भी आपसे जा रहा हो, जाने दे, कोई अनुकूल भी है, तो भी ज्यादा गर्व न करें। 
     दोनों ही स्थितियों में शांत चित्त रहे, व अपने मौलिक स्वभाव, जो प्रकृति ने आपको प्रदान किया है, दयामय, क्षमाशील, उसे धारण करके रखें। 
      जीवन में अनुकूलता-प्रतिकूलता, यश-अप यश, मान-अपमान यह सभी अवसर आयेंगे ही, पर अपने मूल मार्ग से विचलित न होना ही अपनी गरिमा बनाये रखना है।
विशेष:- हर क्षण आपकी परीक्षा की घड़ी है, आप उसमें क्या करते हैं? वह आपकी स्वयं की ही चुनी हुई राह है, अक्सर कामयाबी की राह बड़ी व बाधाओं से भरी होती है, चुनौतियों से परिपूर्ण होती है, मानवीय जीवन की गरिमा उन चुनौती पूर्ण स्थितियों को स्वीकार कर
उन्हें अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग जब हम मान लेते हैं, तो वे चुनौतियां ही हमें गरिमा प्रदान करने लगती है, पूर्ण साहस से उनका सामना करें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन,
   आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह में हम आज बात करेंगे, व्यवहार- कुशलता पर, हम दैनिक जीवन में अपना कार्य करते हुए क्या किसी का धन्यवाद या
कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं?
     जो भी इस समाज से, सृष्टि से, हमें प्रेम,
स्नेह, आदर प्राप्त हुआ है, हम उसके पात्र तब तक ही है, जब तक हमारे व्यवहार में विनम्रता व शिष्टता दोनों ही है। हमारे अपने व्यवहार से हमारे व्यवहार का बोध होता है, अन्य का नहीं।
       इसीलिए कहीं व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा पाकर
अपने व्यवहार को अगर मर्यादित नहीं रख पाते हैं, तो फिर उनका वह  अमर्यादित व्यवहार देर-सवेर उन्हें ही नुकसान पहुंचाएगा। 
        एक व्यवहार कुशल व्यक्तित्व के हम मालिक बने, इसके लिए हमें अपने भीतर कुछ गुणों को विकसित करना होगा।
      हास्य बोध , एक ऐसी कला है, जो सभी को पसंद आती है, हमें यह कला अगर मिली है, तो इसका सही दिशा में प्रयोग हमें करना चाहिये।
      मगर हास्य बोध इस प्रकार का हो, किसी को ठेस पहुंचाये बगैर हम अपनी बात हास-परिहास  में कैसे कहें, गंभीरता व हास्य बोध दोनों ही आवश्यक है, परंतु हर समय गंभीरता से हम एक बोझिल व्यक्तित्व के स्वामी बन 
जायेंगे। हास्य -रस का जीवन में प्रयोग हमारे व्यक्तित्व में एक विशिष्टता हमें प्रदान करता है। 
        शब्दों का चयन हमारा कैसा है? क्या हम अपने शब्दों से किसी को आहत तो नहीं कर रहे । अगर कोई हमसे आहत होता है, 
तो  हमें हमारे व्यवहार में सुधार करने की गुंजाइश है। 
       मिलनसार व हंसमुख व्यक्तित्व के मालिक किसी भी सभा में उर्जा उत्पन्न कर सकते हैं, हास्य किस प्रकार का हो, जिससे वातावरण में प्रफुल्लता फैले, हास्य जीवन में तनाव को भी काम करता है, हमारे शब्दों का चयन जितना अच्छा होगा, हमारी वाणी का प्रभाव उतना ही बढ़ेगा। 
     जब हम बातचीत करते हैं, तो एक सधा हुआ व्यवहार हमें करना चाहिये, व्यवहार कुशलता का ज्ञान हमें कई प्रकार की असुविधाजनक परिस्थितियों से बाहर ला सकता है।
      हमारा जो भी व्यवहार है, वह पलटता अवश्य है, शब्दों की मर्यादाओं का ध्यान रखें 
व सार्वजनिक जीवन में अपने आचरण को, 
वाणी व आचरण दोनों में सही तालमेल  रखें,
आप वाणी व  आचरण में जितना सही
तालमेल रख पाते हैं, वह आपको किसी भी क्षेत्र में आगे करता है। वाणी का प्रयोग हमेशा सोच- समझ कर, संतुलित करने का प्रयास हमें करना चाहिये।
      सार्वजनिक समारोह में अत्यधिक गंभीरता हमें नहीं रखनी चाहिये, सहज, सरल
व आत्मीयता पूर्ण व्यवहार हमें सभी से करना चाहिये।
     अपनी ओर से कभी भी अपशब्दों का प्रयोग हमें नहीं करना चाहिये, यह आपके व्यक्तित्व की गरिमा को गिराता है। 
      सभ्यता पूर्वक बात करने से हमारे व्यक्तित्व का प्रभाव बढ़ता है। अहंकार को जितना अपने जीवन से हम हटायेंगे, उतना ही व्यक्तित्व हमारा प्रखर होगा, अपने व्यवहार में एक संतुलन हमेशा रखें, क्योंकि आपका व्यवहार ही आपके जीवन में आगे ले जाता है।
        व्यक्तित्व के कई पहलुओं पर में से एक वाणी का प्रयोग भी है, जितना कुशलता पूर्वक हम इसका उपयोग करेंगे, उतना ही जीवन में हमें लाभ प्राप्त होगा। 
 विशेष:- व्यवहार- कुशल बने, किस प्रकार से हमें अपनी स्वयं की गरिमा को रखना है, वह हमें अपने व्यवहार से ही बताना होता है, शब्दों की गरिमा हमेशा बनाये रखें, व्यवहार कुशल अवश्य बने, मगर हमें इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं रहना चाहिये, हमारे व्यवहार कुशलता का कोई अनुचित लाभ उठायें।
आपकाअपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम



 

प्रिय पाठक गण,
   सागर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज मेरा विषय है, उम्मीद से ऊर्जा,
अगर मनुष्य के जीवन में उम्मीद या कहे, आशा खत्म हो जाये, निराशा घर कर ले, तो फिर मनुष्य अपने किसी भी कर्म को आखिर
क्यों करेगा? 
       भले ही उसकी वह उम्मीदें पूरी हो ना हो, यह एक अलग बात है, मगर मनुष्य मात्र को अपने जीवन में आगे बढ़ने का हौसला उम्मीद प्रदान करती है, व्यक्ति अपनी आंतरिक ऊर्जा क अगर सही उपयोग कर सके, जो उसका यह जीवन है, वही पूर्ण सुखमय हो सकता है,
       स्वर्ग नरक की सारी परिकल्पनाएं हमारे अपने मस्तिष्क की उपज है, यह हमें  जीवन के वास्तविक लक्ष्यों से दूर करती है, हमें भ्रमित करती है।
         स्वर्ग हमें इसी जीवन में प्राप्त है ही, 
मगर हम स्वयं ही उसे अनदेखा किये हुए हैं।
    अगर हमारे मन में आनंद व प्रफुल्लिता हर समय बनी रहती है, हम किसी भी परिस्थिति में हमारे भीतर की ऊर्जा को नष्ट नहीं होने देते, सदा ऊर्जावान रहकर अपने लक्ष्य की
और चलते रहते हैं, तो यह ब्रह्मांड स्वयं ही आपकी सहायता को तत्पर है। 
       आप आशावादी रहे, निरंतर सकारात्मक चिंतन को ही जीवन में स्थान दें, आप पायेंगे,
हर और से आपको सकारात्मक संदेश ही प्राप्त हो रहे हैं, आप प्रगति के नित्य नये सोपानों को छु पा रहे हैं, जब भी हम किसी बड़े कार्य को करने का मानस बनाते हैं, तो सर्वप्रथम हम अवचेतन में उसके बीज बो रहे होते हैं, अतः जब हम विचार को भी अपने भीतर प्रवेश दे, वह सकारात्मक विचार ही हो,
क्योंकि जो आप अपने भीतर बो रहे हैं, अंततः समय आने पर आपको उसकी ही फसल काटना है, विचारों को जब आप अपने भीतर स्थान दें, तो वह विचार, शुद्ध , पवित्र, आंतरिक ऊर्जा से युक्त होना चाहिये।
          इसलिये अपने मन में कभी भी हीन विचारों को स्थान प्रदान न करें, पूर्ण आशावादी रहे, सकारात्मक प्रयत्न सदैव करते रहे, अपनी आंतरिक ऊर्जा शक्ति पर कभी भी संदेह न करें। 
      हम सभी इतनी अधिक सामर्थ्य अपने भीतर रखते हैं, जिसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, सकारात्मक रहे, नित्य सुंदर भाव व
विचारों से आप परिपूर्ण रहे, अपनी आंतरिक सामर्थ्य को जगाये, आप अपने इसी जीवन में
चमत्कारिक परिणाम प्राप्त करने लगेंगे। 
           समय कभी भी बदलता नहीं, आपको अपने अवचेतन व स्वयं को बदलना होता है,
परिकल्पना हमेशा बड़े स्वप्नों की करें, क्योंकि जो भी निरंतर आपके भीतर चल रहा है, अंततः वह एक दिन घटेगा अवश्य, उसे घटने से कोई भी नहीं रोक सकता।
    अच्छे स्वप्न देखें, जब आप विचार अच्छा आगे बढ़ने का, मन में प्रस्कफुटित करोगे,
तभी तो यह संपूर्ण ब्रह्मांड आपकी सहायता करेगा। 
        मन के भीतर जो भी विविध विचार है,
उनमें से श्रेष्ठतम विचार कौन सा है?  उसे निरंतर दोहराये, कुछ दिनों में आप पायेंगे ,
आपकी पूरी दुनिया बदल रही है। 
       आंतरिक विचारों को शुद्ध व प्रेरणा पूर्ण बनाये , प्रसन्न चित्त रहे  , अपना स्वयं का
अवलोकन करें, कहां पर चूक हुई, सुधारते रहे, यह ब्रह्मांड की शक्तियां आपकी सहायता करना चाहती है, पर आप उन शक्तियों से जुड़िये है तो सहीं।
         आंतरिक ऊर्जा को बदले बगैर हम बाह्य ऊर्जा को सकारात्मक कैसे कर सकते हैं? 
       सबसे पहले अपने मानस पर कार्य करें, 
उसे निर्देश दें, सब कुछ संभव है, इस प्रकार के सकारात्मक विचार निरंतर अपने भीतर प्रवाहित होने दे, एक दिन यह सकारात्मक ऊर्जा ही आपको शिखर पर पहुंचा देगी, परिकल्पना सदैव शुभ करे, जब आप शुभ की परिकल्पना करते हैं, तो भीतर एक विचार उत्पन्न कर रहे होते हैं, इसलिए सबसे पहले अपने आप को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाये 
ऐसा करते ही आप पायेंगे, यह ब्रह्मांड की शक्तियां तो सदैव आपके साथ ही थी।
     आपके भीतर जो विचारों की श्रृंखला है,
उन्हें सदैव सकारात्मक विचारों से परिपूर्ण 
करते रहे, अंततः वही सकारात्मक ऊर्जा आपके लिए मार्ग प्रशस्त करेगी।
विशेष:- सर्वप्रथम जीवन में सदैव हर परिस्थिति में सकारात्मक रहे, परिकल्पना तो हम सकारात्मक कर ही सकते हैं, सदैव अच्छी व बेहतर परिकल्पना ही करें, क्योंकि जो आप अपने भीतर बो रहे होते हैं, आखिरकार फसल तो उसकी ही आप काटेंगे, इसलिये अच्छे व शुभ विचारों को स्थान दें, आप जो भी विचार कर रहे होते हैं, आकर्षित उसे ही करेंगे, निरंतर सकारात्मक रहे, प्रयास करते रहे , सफलता आपके कदम चूम रही है, यह भरोसा रखें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम्।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में आप सभी का स्वागत है।आज हम बात करेंगे उम्मीद व वास्तविकता में क्या अंतर है? 
       कोई भी इंसान में अगर कल कुछ बेहतर होगा, इसकी उम्मीद कायम है, तो वह जीवन में कभी भी निराश नहीं होंगा, अगर उम्मीदे  कायम है, तो वह उम्मीद के सहारे कुछ न कुछ
प्रयत्न अवश्य करेगा व कामयाब भी होगा। 
       अगर जीवन में उम्मीद ही न हो, तो मनुष्य फिर क्यों अपनी भाग -दौड़ करेगा, वह तो निष्क्रिय हो जायेगा ।
      निष्क्रिय हो जाने पर तो वह कुछ भी नहीं पा सकेगा, पर उम्मीद के साथ-साथ आप वास्तविक धरातल पर हम क्या कर सकते है?
 यह हमेशा देखें। 
         उम्मीद जीवन में आशा व उत्साह का संचार करती है, वह हमें अपने स्वप्नों पर खरा उतरने के लिए प्रेरित करती है, हमें अनिवार्य जीवनी शक्ति प्रदान करती है, जीवन संघर्ष में हमारी सहायक होती है।
       भिन्न-भिन्न प्रकार की विचारधारा, भिन्न लोग, अलग-अलग परिस्थितियां, इन सबसे अगर हम रूबरू होते हैं, तो वह कौन सी शक्ति है? जो हमारे मनोबल को अत्यंत विपरीत समय में भी साहस प्रदान करती है।
तो वह उस परमपिता की कृपा ही है, जो हमारा मार्गदर्शन करती है, उनकी मंगल कृपा से हम परिस्थितियां विपरीत होने पर भी साहस करते हैं, वह फिर जो भी हमारा लक्ष्य 
हो, उसे पाते है।
       जीवन में हमें भौतिकता,आध्यात्मिकता, 
व्यावहारिकता, मनोवैज्ञानिक पहलू, वास्तविकता में क्या हो रहा है? इन सब पर अपनी पैनी दृष्टि रखना चाहिये?
     अंतर्मन में सदैव मंगल का भाव रखते हुए 
वर्तमान परिस्थितियों को सही ढंग से समझते हुए हम प्रयास करते रहें, यही केवल हमारे हाथों में है। 
      निरंतर प्रयास जब हम किसी भी एक दिशा में करते हैं, तो हमें सफलता प्राप्त हो जाती है। 
           नित्य ,निरंतर उस परमात्मा का अवश्य सुमिरन करते रहे, वही हमें सब और से शक्ति व सामर्थ्य को प्रदान करने वाला है।
       विपरीत समय में साहस देने वाला व अपनी शरण में रखने वाला है।
     सभी को हृदय से प्रणाम करें, अपने भावों को नित्य शुद्ध करते रहें,  समय से जो भी घटेगा, वह घटेगा ही, उसे हम रोक भी नहीं सकते।
     पर्याप्त केवल इतना है, प्रयास करें, जो भी लक्ष्य आपने हाथों में लिया है,  वास्तविकता में उसमें क्या हो सकता है?
क्या हम बेहतर कर सकते हैं? इस और हमारा निरंतर ध्यान हो।
      उम्मीद कभी-कभी टूट भी जाती है, मगर निराश न हो, एक राह अगर बंद हो, तो दूसरी अवश्य ही खुलती है।
     विनम्रता को हमेशा धारण करने का प्रयास करते रहे, अपने संकल्पों में दृढ़ निश्चयी रहे, 
 जो भी बाधाएं हैं, युक्ति युक्त तरीके से उनका सामना करें, सफलता आपकी राह देख रही है। 
     अपने लक्ष्य पर पूर्ण ध्यान व समर्पण ही
हमें उसे पूर्ण करने की सामर्थ्य प्रदान करता है।
    समय -गति को समझ कर फैसले करते रहे, परमपिता की मंगल कृपा शरण रहकर चले, फिर कुछ विपरीत घटेगा ही नहीं, 
विपरीतता भी अनुकूलता में परिवर्तित होने लगेगी। 
     नित्य- निरंतर समीक्षा करते रहे, अपने प्रयासों को गति दें , परमात्मा सदैव अपनी अनुकंपा हम सभी पर बरसा रहे हैं, उनके अभेद्य दृष्टि से कुछ भी नहीं छिपा है, वे  ही तारणहार है।
      लक्ष्य जो भी चुने, उसमें निरंतरता अवश्य बनाये रखें।
विशेष:-  परिस्थितियों जीवन में हमेशा परिवर्तित होगी ही, कभी अनुकूल होंगी ,कभी प्रतिकूल होगी , कभी सहज होगी, कभी हम चाह कर भी उसे अनुकूल न कर सकेंगे। 
   मगर अपने प्रयासों की निरंतरता अवश्य बनाये रखें, वास्तविक परिस्थितियों अनुकूल हो या प्रतिकूल, उम्मीद कभी भी ना छोड़े, निरंतर प्रयासरत अवश्य रहे। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में 
आप सभी का स्वागत है।
      आज हम बात करेंगे, मनुष्य की अपार क्षमताओं के बारे में, हर मनुष्य को अपने-अपने जीवन में परमात्मा ने समान अवसर दिये, फिर क्या कारण है? कोई हमें सफल होता दिखता है, कोई असफल। 
        अगर हम विश्लेषण करे तो पायेंगे, कोई भी व्यक्ति, जो अपने जीवन में सफलता का शिखर छूना चाहता है, तो सबसे प्रथम तो उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है? 
      जब तक यह वह स्वयं तय नहीं करता, कोई और भी किस प्रकार से उसकी मदद करेगा?
      प्रथम संवाद हम अपने आप से करें, 
हमने क्या लक्ष्य तय किया? और जो भी लक्ष्य तय किया कितनी ईमानदारी व पारदर्शिता से हम कार्य कर रहे हैं? कौन क्या कर रहा है? 
इससे विचलित न हो?
        आप अपने परिदृश्य में, परिवेश में, आपके पास जो भी साधन उपलब्ध है, उनसे आप कितना युक्तियुक्त सही इस्तेमाल उन साधनों का करते हैं। 
             हम सभी की सोच व समझ अलग-अलग होती है, मगर हम एक बड़े परिप्रेक्ष्य में अगर  समझे, तो हम पाएंगे, मानव में अपार क्षमता होती है, मगर वह अपनी क्षमताओं का कितना बेहतर इस्तेमाल करता है, उसका लक्ष्य क्या है?
       अगर हम पूर्ण ईमानदारी पूर्वक किसी भी लक्ष्य को धारण करते हैं, तो फिर उसे पाने का प्रयास भी अवश्य ही करेंगे।
      हम सभी को जीवन में हमेशा ही दुविधा 
यह होती है, हम अपने वास्तविक लक्ष्य  व जमीनी हकीकत दोनों का सही समन्वय नहीं कर पाते।
     हमें जीवन में दो प्रकार के  लक्ष्यों  को लेकर चलना चाहिये, यह मैं मेरे निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं, हो सकता है आपका मत इससे भिन्न हो।
       आप कितने भी अच्छे इंसान हो, जमीनी हकीकत, वास्तविक स्थितियों को कभी भी 
नजर अंदाज नहीं करें। 
     वर्तमान समय को सही तरीके से परखे, 
सबसे अधिक महत्वपूर्ण आपको क्या लगता है ,अपनी परिस्थितियों अनुसार उस पर विचार करें व फिर उस पर कार्य करें।
      जीवन में दो लक्ष्य यानी आध्यात्मिकता व भौतिकता दोनों का उचित संतुलन जीवन में अवश्य करें, मात्र आध्यात्मिक हो जाने से आप गृहस्थ जीवन में है, आपका कार्य नहीं हो सकता, भौतिकता की और अधिक झुकाव होने से भी आप मानसिक रूप से परेशान हो सकते है, जीवन में इन दोनों ही लक्ष्यों को समान रूप से महत्व प्रदान करें।
       और हम मात्र आध्यात्मिक उन्नति पर ध्यान देंगे तो हमें मानसिक शांति तो प्राप्त  होगी, मगर केवल उससे जीवन यापन नहीं हो सकता, यहां पर हमें भौतिक साधनों व धन की आवश्यकता होगी, वहां पर वे ही कार्य  करेंगे, जब तक हम दोनों को समान महत्व नहीं प्रदान करते, हम हमेशा तकलीफ में होंगे।
      वर्तमान समय में भौतिकता का ही बोलबाला है, तो हमें भौतिक साधन तो जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये 
जुटाना हीं होंगे।
        अब हम देखते हैं, जीवन का आध्यात्मिक पक्ष, तो हमें आंतरिक शांति जीवन में किसी की मदद करके ही प्राप्त होंगी, हम अपना जीवन यापन करने के 
साथ -साथ किस प्रकार से अन्य लोगों की बेहतरी के लिये भी कार्य कर सकते हैं, वह आपके आध्यात्मिक पक्ष को मजबूती प्रदान करता है।
     हमें अपने जीवन में दोनों ही पक्षों में संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है। 
    किसी भी एक का आवश्यकता से अधिक होना हमें परेशान कर सकता है, अतः एक संतुलित मार्ग अपनाना आवश्यक है।
     जीवन में अपने मूल लक्ष्यों को पहचाने ,
आपके भीतर से क्या अधिक प्रिय है? आप किन बातों में सुकून या शांति महसूस करते हैं, उन पर अपने जीवन में कार्य अवश्य करिये।
    हम सभी यात्री हैं, जिंदगी एक सुंदर सा सफर है, अवरोधों से कभी न घबराये, वे अवरोध ही आपकी ताकत भी है, उनसे धैर्य पूर्वक हम पार पाये।
    लक्ष्यों को पहचाने, हम सभी अपार क्षमताओं के मालिक हैं, जब हम अपनी संपूर्ण ऊर्जा किसी भी लक्ष्य पर लगाते हैं, 
तो निश्चित ही परिणाम आपके ही पक्ष में होंगे। 
      भीतर से कोई चीज आपको बारंबार पुकार रही है, तो समझिये, आपकी चेतना आपसे क्या कह रही है? 
 विशेष:- हमें स्वयं अपनी अपार क्षमताओं को पहचानना होगा, स्वयं का आकलन करें, हमारी जो भी विशेषता है, वह क्या है? उस गुण -विशेष पर अपना कार्य करें, निश्चित ही हम सभी में अपार संभावनाएं छुपी हुई है, 
बस हमें अपना लक्ष्य ठीक ढंग से पहचानना
 है, व संपूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करना है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी का दिन मंगलमय हो, विगत 2 से 3 दिन पूर्व  की स्थानीय घटना, जो की इंदौर की है।
     यहां एक घटनाक्रम में निगम कर्मियों द्वारा एक अभियान चलाया जा रहा था, जो की संपत्ति कर की वसूली से संबंधित था।
       इंदौर की राजनीति यहां के मुखर राजनेताओं का एक नया नेतृत्व तैयार कर रही है, कतिपय तत्वों को राजनेताओं की मुखरता रास नहीं आती है, जबकि राजनेताओं को, चाहे वह किसी भी दल के प्रतिनिधि क्यों ना हो?   वे जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए उनकी बात अवश्य ही सुनी जानी चाहिये, साथ ही निगम कर्मियों को भी चाहिये वह अपनी अभद्र भाषा पर लगाम लगाये, यह हमारे इंदौर शहर की परंपरा नहीं है, मामला चाहे जो भी हो, पर  स्वस्थ संवाद ही इसका समाधान है।
     निगम कर्मियों व राजनेता के बीच जो टकराव उत्पन्न हुआ, बहुत बेहद दुखद है, इसकी कड़ी शब्दों में निंदा की जाना चाहिये,
इसका मुख्य कारण यह है, राजनेता किसी भी दल से हो, आखिरकार वे जनता द्वारा चुने गये
प्रतिनिधि होते हैं, उनकी बात को निश्चित  ही सुना जाना चाहिये, एक प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते हमारी भी यह जवाबदारी बनती है, 
इस प्रकार के घटनाक्रम पर हम मुखर होकर बोले। 
    संवाद ही इसका एकमात्र हल होना चाहिये, निगम कर्मियों, राजनेताओं से निवेदन है, इससे हमारे इंदौर शहर की स्वस्थ परंपरा को भी ठेस पहुंचती है, हमारा इंदौर शहर राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा शक्ति, निगम कर्मियों  और जनता के सहयोग से ही स्वच्छता में पहले पायदान पर बना रहा है, इस बात का उल्लेख में इसलिए कर रहा हूं, इंदौर शहर चेतना के तौर पर एक जीवंत शहर है,
            मां  अहिल्या की पावन नगरी इंदौर, 
यहां के राजनेता व नागरिक, दोनों ही जागरुक है, व शहर हित में हमेशा सजग रहते हैं।
       इस घटनाक्रम में गलती किसकी है, यह तो पूर्ण तहकीकात का विषय है, मगर यह घटनाक्रम हमारे शहर के मिजाज से मेल नहीं खाता, यहां हमेशा समन्वय की परंपरा रही है।
        राजनेताओं पर दुर्भावना पूर्ण अभद्र व्यवहार की निंदा समवेत स्वर में की जानी चाहिये, तभी हम एक स्वस्थ राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकते हैं, पक्ष या विपक्ष की इसमें कोई बात नहीं, जनता द्वारा चुने  प्रतिनिधियों से ही जब इस प्रकार से व्यवहार किया जा रहा है , तब इंदौर के रहवासियों का भी फर्ज है, वह राजनेताओं के साथ खड़ा हो,
अन्यथा   कल से कौन व्यक्ति राजनीति में आना चाहेगा, वह अपने परिवार को छोड़कर 
दिन रात समाज की उन्नति के बारे में सोचता है, कार्य करता है, अपने परिवार को क्षति पहुंचा कर कौन व्यक्ति फिर राजनीति में आयेगा।
     मुझे पूर्ण विश्वास है, इस सारे मामले में जन प्रतिनिधि , जनता व निगम कर्मियों के बीच स्वस्थ संवाद द्वारा इसका हल निकाला जाना चाहिये, किसी भी कदम को उठाने से पहले तीनों ही पक्षों के बीच में एक समन्वय बने, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति ना हो, इस सारे घटनाक्रम में जनता भी एक पक्ष है, क्योंकि वह भी जब किसी राजनेता को चुनती है, तो वह उसकी सक्रियता के कारण ही चुनती है, जब जनता ने उन्हें अपना वोट देकर सशक्त बनाया है, तो निगम कर्मियों का भी यह दायित्व बनता है, राजनीतिक नेतृत्व व जनता दोनों  ही पक्षों कोअनदेखा न करें।
     तीनों ही पक्ष मिल-बैठकर इसे सुलझाये,
यही हमारे इंदौर शहर की गरिमा के अनुरूप
भी होगा।
     निष्पक्ष नजरिये  से सभी पक्षों को बैठकर इस मामले को सुलझाना चाहिये,
   एक जागरूक व प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते मैंने यह प्रतिक्रिया दी है, अगर मेरी भाषा 
से किसी को कोई ठेस पहुंची हो, तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी भी हूं, पर पुनः  निवेदन है, मां अहिल्या की पावन नगरी का यह मिजाज नहीं है। यहां संस्कृति व समन्वय की एक सशक्त विचारधारा है, जो कायम रहना चाहिये।

आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सागर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह की इस मंगल में यात्रा में आप सभी का स्वागत है, हम सभी किसी न किसी रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिस समय हमारा जन्म होता है, हम नहीं जानते कहां पर होगा?
मृत्यु कब होगी, यह भी हम नहीं जानते ?
       हम जिस भी जगह जन्म लेते हैं, जिस परिवार में, हमारा प्रथम उत्तरदायित्व उस परिवार के प्रति है, फिर जहां हम पले-बढ़े, उसे जन्मभूमि की बेहतरी के लिये हम क्या कर सकते हैं?
       किस प्रकार से सामाजिक वातावरण में हम समरसता का संचार कर सकते हैं, यह दिशाबोध हमें होना आवश्यक है।
       जननी, जन्मभूमि, इन दोनों का ही ऋण हम चाह कर भी नहीं उतार सकते।
     हम कितना भी कर ले, माता-पिता व जन्मभूमि के ऋण से हम कभी मुक्त नहीं हो 
सकते।
      हमें अपने कर्म से कुल का गौरव बढ़ाना चाहिये, परिवार की मान मर्यादा का हमें ख्याल रखना चाहिये, परिवार की मान मर्यादा का मान-सम्मान , वह किस प्रकार के हमारे कर्म द्वारा समाज में कुल का मान बढ़े।
         यह हमारा प्रयास होना चाहिये, नित्य-निरंतर हमारे प्रयास द्वारा किस प्रकार से कुल की ख्याति में अभिवृद्धि हो, यही प्रयास हमें कर देना चाहिये।
     रिश्ते कुछ प्रकृति से हमें प्राप्त होते है, जैसे माता-पिता, भाई, बहनें वह अन्य जोभ  परिवार में रिश्ते हैं।
    कुछ हम स्वयं चुनते हैं, हम अपनी ओर से सदैव ही प्रयास करें, जो भी रिश्ते हम स्वयं 
अपनी मर्जी से चुनते है, उनमें हम पारदर्शिता पूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दे, छल- कपट से दूर रहे, तभी हम मानवीय रिश्तों की खुशबू को बरकरार रख सकते हैं। 
      जहां पर निश्छल भाव होगा, वहां पर स्वमेव ही परमात्मा की उपस्थिति होगी, नित्य प्रति मंगल की हम कामना करते रहे, हमारे कर्म की दिशा भी वही हो।
          हमारी संस्कृति की मूल ताकत जो है,
वह है ,इसकी मानवीय संवेदना, जो भी मानवीय संवेदनाये है, वे ही हमें मनुष्य बनाती 
 है, मानव बनाती है।
         इस प्रकार हम अपने जीवन को परिवार वह समाज के लिए जिये, सामाजिक सद्भाव को प्राथमिकता हमेशा दें, निरंतर चेतनायुक्त रहे। 
       उसे परमात्मा की असीम अनुकंपा को सदैव अपनायें, उसे धन्यवाद प्रेषित करें। 
        अहो भाव से वंदना करें, अपने कर्तव्यों को ईमानदारी पूर्वक निभाये।
      शेष परमात्मा स्वयं देखेंगे, इस सुंदर भाव के साथ हम अपना जीवन उल्लासपूर्वक उसकी कृपा में व्यतीत करें, हम सभी पर, आप सभी पर ईश्वर की अनुकंपा सदैव रहे।
          नीर-क्षीर, विवेक को अपने जीवन में
स्थान दे, अपने जीवन की डोर को उस ईश्वर के हाथों में सौंप दे, फिर वह कल्याण ही करेंगे।
      एक निश्चित कालखंड हम सभी को प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करें, हम किस प्रकार से उसे व्यतीत करते हैं, वही हमारे भविष्य का निर्माण करती है, वर्तमान में रहे,
रिश्तों की नाजुक डोर को संभाले रखें, समाज में अपने अच्छे कर्मों द्वारा हम पूजित होते हैं,
स्वकर्म हमारा जो भी है, उसे पुर्ण ईमानदारी मानदारी से हम करें , साथ ही औरों को भी जो हमारे आसपास है, इसकी प्रेरणा प्रदान करें। 
विशेष:- समाज में हम जो भी दे रहे हैं, वही हमें प्राप्त होता है, हम अगर अशांति दे रहे हैं, तो हमें बदले में अशांति ही प्राप्त होगी, अगर हम समरसता,शांति सद्भाव प्रदान कर रहे हैं, तो हमें बदले में वही प्राप्त होगी, शांत चित्त होकर हम चीजों को समझें, जीवन एक निरंतर चलने वाली लंबी प्रक्रिया है, जीवन जटिल होता नहीं, बहुत सरल होता हैं, अहो भाव से उसे जिसमें, परमात्मा को धन्यवाद दें, 
इतना सुंदर जीवन उसने हमें प्रदान किया।





प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
 आज प्रवाह में मेरा विषय है, गरिमापूर्ण जीवन, हम सभी का जीवन अनेक प्रकार के उतार-चढ़ाव से गुजरता है, कई बार कोई हमारा अपमान भी कर देता है, उस समय भी अगर हम अपने धैर्य को कायम रख सके, तो हम मानवीय गरिमा को छू लेंगे, आज के समय में सबसे बड़ा महत्व वाणी का ही है, हम अपनी वाणी से क्या कहते हैं, उस पर अमल करने की कितनी कोशिश करते हैं,
यह अधिक महत्वपूर्ण है, माना कि हम अपने जीवन में सभी की आकांक्षाओं पर खरे नहीं उतर सकते, मगर विनम्रता पूर्वक हम किसी कार्य के लिए मना भी कर सकते हैं, जो संभव नहीं हो, 
हमारी विवेकशीलता पर बहुत सी बातें बनती व बिगड़ती है,
हमें वार्तालाप करते समय यह बोध तो अवश्य होना ही चाहिये।
        जीवन एक दिन में पूरा नहीं होता, हमें अपने दैनिक जीवन में वार्तालाप की महत्ता को समझना चाहिये, आप अपनी जगह  कितने भी सही हो, अगर वार्तालाप का गुण आप में नहीं है तो समस्या और अधिक बढ  सकती है, हम प्रतिदिन अपने दैनिक जीवन में बहुत-सी बातें सीखते भी हैं, कई बार हम वार्तालाप की महत्ता को अनदेखा कर देते हैं, हमें  वार्तालाप करते समय 
सामने वाले को भी सुनना होता है।
         कई बार हमें आपसी वार्तालाप में बहुत ही सावधानी रखने की जरूरत होती है, जब हम वार्तालाप करते हैं, तब सुना भी जाना चाहिये वह बोला भी जाना चाहिये, कभी भी संवाद एक तरफा नहीं हो सकता, एक तरफा संवाद होने पर वह अपना अर्थ ही खो देगा, जो अपने वार्तालाप की महत्ता को सही तरीके से समझते
हैं, वह कभी भी अपने मूल से हटते नहीं है।
        हम अपने जीवन में चाहे कितनी ही उपलब्धियां हासिल कर ले, मगर अगर हमारी वाणी सही नहीं है, तो वह वाणी हमारे सारे कार्य बिगाड़ भी सकती है, आपका वार्तालाप जितनी कुशलतापूर्वक होगा, उतना ही वह असर कारक भी होगा, हमें यह भी देखना होता है की जिससे हम वार्तालाप कर रहे हैं, हम उनके बराबरी के स्तर पर जाकर उनसे वार्तालाप करें, तभी कुछ सही 
नतीजे की संभावना होती है, जीवन तो हम सभी जी ही रहे हैं , मगर अपनी गरिमा को जितना संभव हो सके, हमें बचाना चाहिये
विशेष:- गरिमा पूर्ण जीवन जीने के लिये हमें साधनों के साथ
         व्यवहार कुशलता का ज्ञान होना भी आवश्यक है, गरिमा पूर्ण जीवन जीने के लिये हमें साधनों के अलावा कुछ अच्छे वह मजबूत रिश्ते भी चाहिये।
आपकाअपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद
प्रिय पाठक गण,
        सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम संवाद करेंगे, अविनाशी सत्ता पर, यानी जिसका कभी भी विनाश नहीं होता है।
      प्रिय बंधुओ, उस एक ही परम सत्ता के हम सभी अंश हैं, 
व उसकी ही झलक हम सब में है, वह अपने विभिन्न रुपों में
हम सभी में विराजमान है, यहां तक की जड़ चेतन यह सारा ब्रह्मांड उसकीअविनाशी सत्ता का ही परिचय देता है, व्यक्तित्व आते हैं, चले जाते हैं, प्रकृति उनको जो भी कार्य सौपती है, वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा से उसका निर्वाह करते जाते हैं। 
       यह पृथ्वी ऐसे महापुरुषों व व्यक्तित्व को समय-समय पर जन्म देती है, ऐसी दिव्य विभूतियां इस देश में सदा से विद्यमान रही है, अभी भी विद्यमान है, व भविष्य में भी ऐसी दिव्य विभूतियों का जन्म इस धरा पर होता रहेगा। 
     भारत भूमि, वह भूमि है, जहां मनुष्य अपने जन्म से ही उसका स्पर्श पा लेता है, यहां की धरा में ,माटी में कुछ ऐसा है, जो विलक्षण है, जो यहां की माटी में है वह कही और नहीं है।
     यह दिव्य चेतना को जागृत करने वाली भारत भूमि है, इसकी दिव्यता को हम तभी महसूस कर पायेंगे, जब हम इस माटी से गहरे जुड़ेंगे।
      हम सभी जन्म मरण के चक्र से गुजरते हैं, मगर जन्म व मरण के बीच का जो समय है, वह अत्यंत अनमोल है, आप उस समय- चक्र को किस प्रकार व्यतीत करते हैं।
    उस अविनाशी परमात्मा की कृपा को कितना अपने जीवन में अनुभूत कर पाते हैं, उतना ही जीवन आपका आंतरिक शांति से
भर उठेगा, जब तक हम अपने जीवन को करते हुए कर्तव्य- कर्म जो भी हमारा है, उस पथ को स्वीकार कर उस पथ पर निर्विकार हृदय से हम कार्य करते हैं, तो बाकी सारा कार्य अविनाशी सत्ता ही कर रही है, जो हमें दृश्य रूप में तो नहीं दिखती, मगर अदृश्य में वही सारा संचालित कर रही है।
       जीवन का जो आनंद है, वह अपने कर्तव्यों को पूर्ण श्रद्धापूर्वक करने में ही निहित है, जब हम पूर्ण समर्पण से अपने कर्तव्य को निभाते हैं, तो शेष कार्य वह परम सत्ता स्वयं ही पूर्ण कर देती है।
       हम सभी इस सत्ता के छोटे से अंश है, वह परम सत्ता सभी को समान ऊर्जा प्रदान करती है, कोई भेद वह नहीं करती, दृष्टि भेद तो हम करते हैं।
     वह अविनाशी इस प्रकार से है, जन्म और मृत्यु जो हो रही है, 
वह हमारे इस देह की होती है, इसके अंदर जो चेतन सत्ता है, वह कभी भी नष्ट नहीं होती, वह केवल रूपांतरित होती है। 
     हमारा जो शरीर है, वह मृत ही है, अगर उसमें ईश्वर की दी हुई ऊर्जा नहीं हो, जब इस देह से वह ऊर्जा प्रयाण कर जाती है, तो यह देह भी किसी कार्य की नहीं होती, यह शरीर उस ऊर्जा के बिना निष्प्राण हो जाता है।
    फिर भी चेतन सत्ता तो सूक्ष्म है, व्यक्ति के देह त्यागने के बाद भी जो सूक्ष्म ऊर्जा कार्य कर रही है, वह  है उसकी मूल ऊर्जा, जो वह अपने जीवन चक्र में जीवन को जीते हुए बनाकर गया है। 
      एक अच्छे व्यक्ति की ऊर्जा उसकी मृत्यु उपरांत भी कार्य करती है, हम किसी सद्गुणी   व्यक्तित्व  के अगर संपर्क में रहे हैं  , तो उनकी मृत्यु उपरांत भी हमें वह अपनी ऊर्जा शक्ति का बोध कराते हैं।
     यही उस अविनाशी की परम सत्ता का सत्य है, जो तीनों कालों में सत्य हैं।
विशेष:- आप चाहे ना चाहे, माने या न माने, वह अविनाशी सत्ता ही इस पूरे ब्रह्मांड  का संचालन कर रही है। उसकी कृपा दृष्टि से ही सब संभव होता है, अन्य कोई मार्ग है ही नहीं।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद


प्रिय पाठक गण,
          सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    अपने-अपने निज कर्म में जो भी समत्भाव  से प्रतिष्ठित है,
जिनमें न राग है, न द्वेष है, मानो वह प्रत्येक व्यक्ति श्री कृष्ण की शरण में ही है।
        जब कोई भी व्यक्ति राग  व द्वेष दोनों से ही परे होकर 
अपने करते हुए पथ पर अविचल भाव से बढ़ते जाते हैं, वे भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों का पथ प्रदर्शन करते हुए बढ़ते जाते हैं, तब वह मनुष्य इस संसार में रहता हुआ भी मानव परमात्मा के निकट ही है। 
      सम बुद्धि प्राप्त योगी राह में आने वाली बाधाओं से विचलित नहीं होता है, क्योंकि उसने परमात्मा का आश्रय ग्रहण कर लिया 
हैं, फिर वह संसार में सभी का आश्रय त्याग कर अपने निज कर्तव्यों को ईश्वरीय कृपा से पूर्ण कर लेता है।
     उसके मार्ग की समस्त बाधाएं ही मानो उसका मार्ग प्रशस्त करते हए चलती है, जो सत्य- पथ का अनुसरण करते हैं, वह भयभीत नहीं होते, कोई उन्हें डिगा नहीं सकता।
       भगवान श्रीकृष्ण गीताजी में स्पष्ट रूप से यह उद्घोषणा कर रहे हैं। 
      वे अपने निज कर्तव्य में स्थित रहने की बात कर रहे हैं, जो भी व्यक्ति अपने निज कर्तव्य को ईमानदारी से पूर्ण करता है, वह परमपिता परमेश्वर समस्त प्रकार की बाधाओं को हटाता जाता है।
आंतरिक दृढ़ता से जो परिपूर्ण होते हैं, वह परमपिता का आश्रय ग्रहण करते हुए समस्त प्रकार से अपने निज कर्तव्य को पूर्ण करते हुए परम पद के अधिकारी हो जाते हैं। 
        उनके जीवन में आत्म प्रकाश हो जाने से फिर वह समस्त प्रकार के मोह को त्याग कर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य शरण में हो जाते है। जिनकी शरणागति मात्र समस्त संशयो को हटाने 
वाली है। उन परमपिता को अनन्य भाव से नमन करते हुए हम अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहे, अपने आचरण में दृढ़ता बनाए रखें, अविचल  होकर अपने मार्ग पर हम बढ़ते जाये , मार्ग की बाधाओं का स्वत: ही शमन होने लगेगा।
       जिस किसी पर भी भगवान की अनन्य कृपा होती है, यत्र तत्र, सर्वत्र उसकी जयकार होती ही है, समस्त प्रकार के  आश्रय छोड़कर  श्रीकृष्ण शरणागति को जो ग्रहण कर लेते हैं।
     सहस्त्रों सूर्यो सी प्रबल उसकी ऊर्जा होती है, वह अपने पथ पर बढ़ते जाते हैं, भक्ति भाव उनके हृदय में गहरा होता है, श्री कृष्ण की शरण में जो होकर चलते हैं। 
      वे अपने समस्त कर्मों को उनके अर्पण कर देते हैं , वह भय व शोक को इसी जीवन में छोड़कर उनकी अनन्य शरणागति को प्राप्त कर समस्त बाधाओं को पार कर लेते हैं।
     अपने पथ को स्वयं चुनते हैं, बाधाओ को हटाकर युद्ध में, संग्राम में विजय को प्राप्त करते हैं। 
         अन्य शरणागति का आश्रय ग्रहण करने वाले समस्त प्रकार की शंकाओं का निवारण कर लेते हैं।
       किसी कारणवश अगर वह मार्ग का अनुसरण मोहवश नहीं कर पाते , तो वह पतन को प्राप्त हो जाते हैं। भयमुक्त होकर इस संसार सागर में वे विचरण करते हैं।
विशेष:- आपका अपना जो भी मूल कर्तव्य है, वह अपनी संपूर्ण ईमानदारी से करिये, शेष उस प्रभु पर छोड़ दीजिये। सत्यमेव जयते। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद।