युवा वर्ग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
युवा वर्ग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रिय पाठक गण,
सादर वंदन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज हम प्रवाह में चर्चा करेंगे, गुरु पूर्णिमा पर, हम सभी के जीवन में गुरु की आवश्यकता , मार्गदर्शन हमें हमेशा चाहिये,
जीवन में प्रथम गुरु हमारी मां होती है, जो हमें निस्वार्थ भाव से कर्तव्य पालन की शिक्षा हमें प्रदान करती है, गुरु की महिमा हम वर्णन नहीं कर सकते, उनकी महिमा अगम अपार है, जो हमारी समझ से परे है, गुरु जो कुछ भी करते हैं, उसमें शिष्य का हित ही छुपा रहता है, वे सब विधि से शिष्य का कल्याण ही करते हैं ।
     जिनके जीवन में कोई गुरु नहीं, उन्हें अगर मार्गदर्शन प्राप्त करना हो, तो श्री कृष्ण भगवान से  प्रार्थना कर उनकी गुरु रूप में वंदना करना चाहिये, जिन्होंने हमें गीता जैसा 
अद्भुत ग्रन्थ प्रदान किया, जिसमें उन्होंने निष्काम कर्म योग की शिक्षा प्रदान की, श्री कृष्ण भगवान के जैसा गुरु मिलना बड़े ही सौभाग्य की बात है, क्योंकि उनकी जो शिक्षाएं है, वे लौकिक व पारलौकिक दोनों ही प्रकार की है, जीवन संघर्ष मे वे हमें अपने कर्तव्य का पालन करना सीखाते हैं, व शठे शाठ्यम की अद्भुत नीति का भी हमें पाठ पढ़ाते हैं, वे बताते हैं, की सभी जगह केवल सीधेपन से कार्य नहीं चलता है, समय अनुसार हमें अपनी नीति को लागू करना चाहिये, कब कहां क्या उपयोगी है, इसका हमें पूर्ण अवलोकन के बाद कदम उठाना चाहिये,
ऐसी अद्भुत शिक्षा प्रदान करने वाले केवल श्रीकृष्ण ही है, इसीलिए तो उनके लिए कहा गया है, श्री कृष्ण वंदे जगतगुरु।
     एक और उनके जैसा प्रेमी गुरु मिलना मुश्किल है, जो शरण में जाने पर आपके सारे अपराधों को क्षमा कर देता है, व अपने हृदय से लगा लेता है। श्री कृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व ही अद्भुत है। कई कठिनाइयों से घिरे होने पर भी वे सत्य मार्ग नहीं छोड़ते , अपनी विशिष्ट शैली से वे सब को प्रभावित करते हैं, जो जिस रूप में उनको भजना चाहता है, वह उस रूप में उसे उपलब्ध है, यह उन्होंने अपने विराट स्वरूप द्वारा भी बतलाया है। 
विशेष:- गुरु महिमा का हम कितना भी वर्णन करें, नहीं कर सकते, वह हमेशा शिष्य के हित को सबसे ऊपर रखते हैं, उसके कल्याण का मार्ग किसमें छुपा है, इस और उसे प्रेरित करते हैं, इस संबंध में दोहा भी है, गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, एकाग्रता पर, 
सुनने में व कहने में तो यह छोटा सा शब्द लगता है, मगर जब हम किसी भी विषय पर एकाग्र होते हैं, एक की दिशा की और चलते हैं, वह भी अपनी संपूर्ण एकाग्रता के साथ,
तो हमें आश्चर्यजनक परिणाम देखने को प्राप्त होते हैं। जब हम किसी एक विषय पर अपनी  संपूर्ण एकाग्रता के साथ कार्य करते हैं , तो हमें उसी एकाग्रता के कारण जो परिणाम प्राप्त होता है, वह अन्य लोगों की तुलना में कहीं बेहतर होता है, आप जितनी एकाग्रता से किसी भी विषय पर कार्य करेंगे, चाहे वह आपकी पढ़ाई हो, व्यापार हो, आपकी कोई अभिरुचि हो, कला या साहित्य का विषय हो,
जितनी एकाग्रतापूर्वक आप कार्य करेंगे,
उतने ही शानदार परिणाम  प्राप्त होंगे,
एक ही प्रतियोगिता में कई खिलाड़ी भाग लेते हैं,  परंतु जो संपूर्ण एकाग्रतापूर्वक अपने संपूर्ण कौशल को उस समय प्रदर्शित करता है, एकाग्रतापूर्वक उस समय प्रदर्शन करता है,
उसके परिणाम अन्य लोगों से कहीं बेहतर होते हैं। 
        आपकी कोई कला जिसका आप
एकाग्रता पूर्वक  अभ्यास करते हैं, निरंतरता 
रखते हैं, तो आप अपने निरंतर अभ्यास व
एकाग्रता के कारण उस कला में निपुण हो 
सकते हैं, व शीर्ष स्थान भी प्राप्त कर सकते हैं। दरअसल सारा खेल आपकी एकाग्रता का है। 
विशेष:- जितनी एकाग्रता से आप अपना कोई भी कार्य करेंगे, उसमें सफलता की संभावनाएं उतनी ही अधिक होगी, कोई भी कला या खेल, अगर आप शीर्ष स्थान हासिल करना 
चाहते हैं, तो निरंतर एकाग्रता पूर्वक आपको 
अपने प्रयास जारी रखना होंगे।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आशा है आप सभी को मेरा यह ब्लॉग पसंद आ रहा होगा, मैंने अपनी ओर से संपूर्ण कोशिश की है, कि मैं विविध विषयों का इसमें समावेश कर सकूं, कहां तक सफल रहा, यह तो आप पर निर्भर है, आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे , प्रतिफल पर, हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, हमें हमारे कर्म का प्रतिफल अवश्य मिलता है, तो हम किस प्रकार के कर्म करें, ताकि उन कर्मों को करने का जो प्रतिफल हमें प्राप्त हो, वह सुखद हो, इसके लिए हमारे कर्मों का चयन इस प्रकार होना चाहिए, हम जो भी कर्म करें,
उससे हमें लाभ अवश्य हो, मगर उससे किसी की हानि न हो, हम एक संतुलन के रूप में
हमारे प्रत्येक कर्म को करें, ताकि जो भी प्रतिफल हो, वह अच्छा हो, साथ ही हम हमारे साथ-साथ समाज के लिए भी कुछ ऐसा कार्य अवश्य करें, जिससे समाज को लाभ पहुंचे, 
अगर समाज आपसे लाभान्वित होता है, तो समाज की सकारात्मक ऊर्जा आपकी और 
प्रतिफल के रूप में आपको प्राप्त होंगी।
     हमें हमारा कर्म तो अच्छी दिशा मैं रखना ही है, साथ ही जो लोग हमसे जुड़ें है, वे चाहे परिवार के हो या समाज की, उन्हें भी अच्छी दिशा में प्रेरित करना, यह भी एक पुण्य का कार्य है, क्योंकि जब अधिकतम सकारात्मक ऊर्जा एक साथ सही दिशा की ओर जाएगी, 
तो उसका प्रतिफल भी उतना ही उत्तम हमें प्राप्त  होगा।
विशेष:- हम कर्म करते समय यह सावधानी अवश्य रखें, कि हम जो भी कर्म कर रहे हैं,
उससे हमें लाभ हो, मगर किसी को हानि न हो, एक संतुलित दृष्टिकोण से हम अपना कर्म करें, तो फिर उसका अच्छा प्रतिफल ही हमें प्राप्त होगा। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, लक्ष्मण रेखा पर, लक्ष्मण रेखा से मेरा तात्पर्य यह है, 
हर व्यक्ति, हर पद की एक मर्यादा या लक्ष्मण रेखा होती है, वह पार नहीं होना चाहिये।
      यह केवल प्राचीन काल में जैसा रामायण में घटनाक्रम आता है, लक्ष्मण जी सीता जी के लिये लक्ष्मण -रेखा का निर्माण करते हैं, पर मेरे विचार से यह लक्ष्मण रेखा समाज के हर वर्ग व हर व्यक्ति के लिए है, और जो उच्च पद पर हैं, उनके लिए इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि वे जैसा  करेंगे, वैसा ही और लोग भी  अनुसरण करेंगे, क्योंकि एक पुरानी कहावत भी है, "यथा राजा तथा प्रजा"
इसका यह अर्थ है जैसा राजा होगा, वैसे ही उसकी प्रजा होगी, यदि राजा स्वयं ही लक्ष्मण रेखा का ध्यान नहीं रखेंगे, उनकी मर्यादा का
उल्लंघन करेंगे, तो प्रजा से फिर वह कैसे उम्मीद रखते हैं, कि वह लक्ष्मण रेखा का पालन करेगी। 
            किसी भी कार्य को दूसरे से करवाने से पहले हमें स्वयं उस पर खरा उतरना पड़ता है, तभी हम दूसरों से भी उम्मीद रख सकते है 
समाज में हर वर्ग की, हर पद की हर व्यक्ति की अपनी अपनी मर्यादा या लक्ष्मण रेखा है, 
जो भी उसे पार करेगा, उसे उसका दंड भोगना ही होगा, यही अटल विधान है। 
     अतः हम सभी अपनी-अपनी मर्यादा व लक्ष्मण रेखा का पालन करें, तो जो समाज में इतनी अस्त -व्यस्त स्थिति का निर्माण हो रहा है, वह नहीं होगा, और समाज एक अच्छी स्थिति में  खड़ा होगा।
विशेष:-   अगर समाज में सभी अपनी-अपनी मर्यादा व लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखें, तो समाज में अपने आप एक सुखद स्थिति का निर्माण होगा, पर वर्तमान समय में हम सभी अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण करते नजर आ रहे हैं, और उसी का भुगतान 
हमें करना पड़ रहा है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   मुझे पूर्ण उम्मीद है, विभिन्न विषयों पर किया गया यह वार्तालाप आपको पसंद आ रहा होगा, इसी श्रृंखला में हम चर्चा करेंगे,
आकर्षण शब्द पर, मनुष्य का स्वाभाविक रूप से प्रकृति के प्रति आकर्षण रहा है, तभी आप पाएंगे कि जितने भी मंदिर या सिद्ध स्थल हमें देखने को मिलेंगे, वह प्रकृति के अत्यंत निकट देखने को मिलेंगे, सौंदर्य के प्रति भी मनुष्य का आकर्षण शुरुआत से ही रहा है भगवान के मंदिर भी इसीलिए आकर्षक स्वरूप में बनाए जाते हैं, ताकि वहां हमारा मन रम सके, इसके अलावा मनुष्य का आकर्षण उन चीजों के प्रति अधिक होता है, 
जिनसे वह अनभिज्ञ होता है, या जिन्हें  वह नहीं जानता है।
        विभिन्न कलाओं व संगीत के प्रति भी
आकर्षण मनुष्य का  स्वाभाविक रूप से रहा है, जो हमें पुराने मंदिर व इमारतों के निर्माण में हमें देखने को प्राप्त होता है।
      इसी प्रकार आज के समय में एक और आकर्षक है, वह है सत्ता  का आकर्षण,
आज हर व्यक्ति सत्ता से जुड़ा रहना चाहता है, उसका आकर्षण उसे खींचता है।
     इसके अलावा खेल व सिनेमा भी मनुष्य के आकर्षण के केंद्र रहे हैं, विभिन्न खेल गतिविधियां ,जो संचालित हो रही है, वह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। ऐसे ही विभिन्न 
वस्तुओं, खेलों व ऐसी कोई चीज, जिज्ञासा, 
जो कुछ नया हमारे सामने लाती है, उसके प्रति भी हमारा आकर्षण स्वाभाविक रूप से होता है। 
विशेष:- मनुष्य का आकर्षण कला, विज्ञान, 
प्रकृति के सहज सौंदर्य की और शुरुआत से ही रहा है, और वे विभिन्न विषय, जो कोई नई जानकारी उपलब्ध कराते हैं, उनके प्रति भी 
हमारा स्वाभाविक आकर्षण होता है। 
          आकर्षक एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, 
और यह मनुष्य मात्र में घटित होती है। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम,
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, उत्तरदायित्व पर, आज सभी और जो सबसे बड़ी खामी हमें देखने को मिलती है, वह है अपने उत्तरदायित्व से हर व्यक्ति, जो उस उत्तरदायित्व को निभाता हैं, जो उसे दिया गया है, उसका वह सही ढंग से निर्वाह नहीं करता, और इसका परिणाम यह होता है, कि हमें जो अपेक्षित परिणाम प्राप्त होना चाहिये, वह नहीं प्राप्त होते। 
   सोचिए ,अगर एक भी दिन प्रकृति अपने मूल उत्तरदायित्व का निर्वहन करने से इनकार कर दे, तो त्राहि-त्राहि मच जाएगी, फिर उसी प्रकृति से निर्मित हम अपने उत्तरदायित्व को क्यों नहीं निभाते। 
      अगर समाज में हर व्यक्ति, हर वर्ग अपने अपने उत्तरदायित्व का सही ढंग से निर्वाह करें, तो कई समस्याएं खड़ी ही नहीं होगी। 
आज देश में हम शिक्षा के क्षेत्र को ही देखें, 
अगर वह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती, उसको चलाने वाले अपने उत्तरदायित्व का सही निर्वहन करते, तो जो यह देश में अभी 
शिक्षा के संबंध में जो एक गिरावट देखने को मिली है, परीक्षा के पेपर के पेपर लीक हो रहे हैं, किसी को अपने उत्तरदायित्व का भान ही नहीं, सभी व्यक्ति अपने अपने मूल उत्तरदायित्व से भागना चाहते हैं, और उसका खामियाजा सारे समाज को भुगतना पड़ता है, 
नेता अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं करते, और खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है, इसी प्रकार हम किसी भी वर्ग को 
ले, जैसे व्यापारी अगर अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन सही ढंग से नहीं करते, तो खामियाजा ग्राहक को भुगतना पड़ता है। अगर समाज के सभी वर्ग अध्यापक, इंजीनियर, राजनेता, शिक्षक, व्यापारी, डॉक्टर  व अन्य जो भी वर्ग है, वह सभी अपना अपना उत्तरदायित्व अगर संपूर्ण ईमानदारी से निभाए, तो संपूर्ण समाज उन्नति की ओर अग्रसर होगा।
विशेष:- कोई भी समाज तब  उन्नति की और अग्रसर तभी होता है, जब  समाज  में अपने कर्तव्य  के प्रति उत्तरदायी लोग अपने उत्तरदायित्व का सही ढंग से निर्वहन करते हैं।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    मुझे उम्मीद है, विभिन्न विषयों पर यह जो मेरा आपसे वार्तालाप है, यह आपको पसंद आ रहा होगा, इसी श्रृंखला में अब हम आज बात करेंगे, नियति पर, अगर हम इस शब्द पर गौर करें, तो इस शब्द का जो अर्थ है, वह नियत से बना नियति, यानी हमारी नियत, हमारी सोच,  जिस प्रकार की हमारी नियत या सोच होगी, अंततः वही हमारी नियति होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं, हम जो भी करते हैं, उसके पीछे हमारी वास्तविक मंशा क्या है? हमें आखिर परिणाम उसी का प्राप्त होता है, 
तो अगर हम हमारी नियत सही रखें, व अपने कार्यो को भी उसी अनुरूप करें, तो हमारी नियति निश्चित ही अच्छे परिणाम देने वाली होगी, देर सवेर हमें अंततः अपने ही कर्मों का परिणाम पलट कर वापस मिलता है, स्वर्ग नरक और कहीं नहीं,  इसी जगह पर ही है, जो जैसा बोयेगा, अंततः वही फसल उसे काटना भी होगी, तो जिसकी जैसी नियत, वैसी उसकी नियति, यह अटल है, इसमें कोई फेर बदल की गुंजाइश नहीं, यह तो विधि का अटल विधान है, जो अंततः घटता ही है, मगर हम अपनी अल्प बुद्धि के कारण यह समझ नहीं पाते हैं, कि हमारी नियत ही हमारी नियति का निर्धारण करती है, तो हमें अच्छी नियत रखते हुए हमेशा अच्छे कर्मों की ओर अग्रसर होना चाहिए, परिणाम भले ही देर से प्राप्त हो, मगर वह अच्छे होंगे। 
विशेष:- हमारी नियत या हमारी सोच जिस प्रकार की होंगी, वैसा ही हमारा आचरण भी होगा, और जैसा हमारा आचरण होगा, उसी के अनुरूप हमें परिणाम प्राप्त होंगे, और वही हमारी नियति भी होगी। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, सवाल जवाब पर, आज हमारे देश की जो परिस्थिति है, 
वहां पर सवाल जवाब करना , यानी देश के खिलाफ हो जाना है, यह जो स्थिति है, यह किसी भी देश के उज्जवल भविष्य के लिये 
ठीक नहीं, कोई भी एक राजनीतिक दल या उस दल द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम, अगर उससे कोई असहमत है, तो वह उनसे सवाल-जवाब कर सके, इसी में प्रजातंत्र की खूबसूरती है, असली प्रजातांत्रिक देश वही है, 
जहां हम सरकार की आलोचना भी कर सके 
वह उसके सही फैसलों की प्रशंसा भी कर सके, उसके सरकार चलाने के तरीकों पर सवाल भी उठा सके, ओर सरकारे जो भी स्थिति हो, देश में उस समय,  वे उनका जवाब भी दे।
       असली प्रजातंत्र वही है, जहां हम अपने वैचारिक मतभेद को भी मुखरता से सामने 
रख सके, निश्चित ही उन सवालों का उद्देश्य 
हमारे देश की आर्थिक ,सामाजिक, राजनीतिक प्रगति से जुड़ा होना चाहिये, यही सच्चे लोकतंत्र की निशानी है, जो भी विपक्ष में है, उसे सरकार की स्वस्थ आलोचना का अधिकार होना ही चाहिए, सवाल जवाब 
जब तक चलते रहेंगे, उनका उत्तर प्राप्त होता रहेगा, इस देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी, जिस दिन आपका सवाल करने का अधिकार आपसे ले लिया जाये, या यह दबाव बनाया जाये, की जो भी वर्तमान सरकारें कर रही है ,उनका समर्थन करें, फिर चाहे उनकी दिशा सही हो अथवा नहीं। 
       क्या वर्तमान समय में कोई भी सरकार है, जो दावा कर सकती है, की सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का स्वरूप ले लिया है, निश्चित ही हम नागरिक भी इसके लिये दोषी है, जो इन बातों से समझौता कर लेते हैं, पर क्या जो भी सरकारे कार्य करती है उनकी कोई जवाबदारी नहीं, जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, या तो अधिकारी का विभाग बदल दिया जाता है,
या कुछ समय के लिये  बर्खास्त कर दिया जाता है, जब तक सरकारी घूस लेने वाले अधिकारी कर्मचारियों पर कठोर कार्यवाही 
नहीं करती, बदलाव आना संभव नहीं, पर यहां भी राजनीतिक दलों के अपने स्वार्थ जुड़े होते हैं, इसलिए कार्यवाही की बजाय बचाव के तरीके ढूंढ लिए जाते हैं। 
विशेष:- किसी भी देश की जनता को प्रजातांत्रिक प्रणाली  में यह अधिकार है, 
वह सवाल जवाब कर सके, और सरकारों का भी यह दायित्व है वह उनका जवाब दे, जब तक यह प्रक्रिया ठीक ढंग से चल रही है, तब तक  प्रजातंत्र सुरक्षित है। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे स्मृति पर, 
स्मृति यानी यादें, कुछ भूली-बिसरी, कुछ बचपन की, स्कूल की, बाल सखाओं की,
इस तरह अनेक प्रकार की स्मृतियां हमारे मस्तिष्क में हमेशा समाहित रहती हैं, ईश्वर का दिया यह ऐसा उपहार है, पुरानी अच्छी स्मृतियां हमें पूर्ण करो ताजा कर देती है, अगर हम विचार करें, किस प्रकार  पुरानी यादें भी 
हमारे मस्तिष्क में सुरक्षित रहती है।
        जैसे ही हम किसी पुरानी स्मृति को 
याद करते हैं, एक चलचित्र की भांति सब कुछ हमारे सामने पुनः आ जाता है, जैसे अभी की ही घटना हो, कितने भी काल पुरानी स्मृति हो, जैसे ही हम उसे याद करते हैं, हमारे सामने सजीव हो उठती है।
        लेकिन स्मृतियां तो स्मृतियो
 है, पर वह हमें पुनः उस दौर  में ले जाती है,
जहां से हम गुजरे थे, ये हमारे हाथ में है,हम
किन स्मृतियों को संजोना चाहते हैं, किन्हें भूलना चाहते हैं, कुछ खुशनुमा होती है, कुछ दुखद होती है, पर यह मानवीय स्वभाव है, 
वह हमेशा पुरानी स्मृतियों की और चल देता 
 हैं, हमेशा बचपन की यादें एक मधुर स्मृति के रूप में हमारे सामने होती है, तब हमारे मन में कोई छल कपट नहीं होता, वे स्मृतियां हमेशा हमारे मन में एक खुशनुमा अहसास पैदा कर देती है, मानव मन हमेशा से सुखद स्मृतियों को संजोये रखना चाहता है।
         हमारे जीवन में अनेक प्रसंग ऐसे होते हैं, जिनकी स्मृतियां हमें हमेशा प्रेरणा प्रदान करती है, हर व्यक्ति के जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी स्मृतियां भी 
उन्हें बल प्रदान करती है, हमेशा मधुर व सरल व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हमेशा हमारी मधुर स्मृतियों का एक हिस्सा होते हैं, जो हमें आज भी जब हम उन्हें याद करते हैं, हम तरो- ताजा हो उठते हैं। 
         स्मृतियां हमारे जीवन में अपना प्रभाव 
छोड़ती ही है, हम अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाएं, जब भी हम किसी की स्मृति का हिस्सा
हो, वह एक सुखद एहसास उसके जीवन में हो, यही हमारे जीवन की सार्थकता भी है।
मधुर स्मृतियों को हम जीवन में संजोये।
 विशेष:- हम अपना जीवन इस प्रकार जिये,
जब भी हम किसी की स्मृति में हो, उसे एक मधुर अहसास हो, ऐसे व्यक्तित्व के रूप में
अपना जीवन जिये, जिसे हर व्यक्ति अपनी स्मृति में रखना चाहता हो।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, अपेक्षा पर, 
अपेक्षा यानी किसी से कोई आशा या उम्मीद, 
यह शब्द लगता तो छोटा सा है, मगर इसका प्रभाव बहुत ही गहरा है, हम सभी का जीवन 
जो हम जीते हैं, कहीं ना कहीं हम किसी से
कोई ना कोई अपेक्षा तो रखते हैं। 
      और यह स्वाभाविक भी है, हर कोई जो भी जीवन में कार्य करता है, उस कार्य के फल स्वरुप कुछ पाने की अपेक्षा भी रखता है, यह और बात हैं, वह  अपेक्षा पूरी हो भी सकती है,
नहीं भी।
       माता-पिता हमेशा अपनी संतान से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह अपने जीवन मे उनसे भी अधिक अभिवृद्धि को प्राप्त  हो, वह अपने जीवन में वह मुकाम हासिल करें, जो वे नहीं कर पाए, और यह अपेक्षा पूर्ण रूप से स्वाभाविक भी है, इसमें कोई संशय नहीं।
        ऐसे ही किसी भी देश के खिलाड़ियों से 
वहां के नागरिक यह अपेक्षा करते हैं, वह अपने खेल से स्वयं का व देश का नाम रोशन
करें , और जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, 
तो सभी को बड़ा दुख होता है।
         तो आप सभी ने देखा की अपेक्षा शब्द तो बड़ा छोटा सा है, मगर इसका प्रभाव बहुत 
गहरा है, नेताओं से नागरिकों को यह अपेक्षा होती है, वह उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे, इस प्रकार हम पाएंगे की हर व्यक्ति को, हर वर्ग को किसी ने किसी से कुछ अपेक्षाएं होती है, हर संबंध आपसे कुछ अपेक्षा चाहता है, और वह पूरी न होने पर 
वह आपसे नाराज भी हो सकता है, संबंध तोड़ भी सकता है, तो अपेक्षा करें, कि हम जीवन में किसी से अत्यधिक अपेक्षा ना करें, 
स्वाभाविक रूप से जो घटे, उसे हम जीवन में स्वीकार करें, और मैं भी इसी अपेक्षा के साथ, कि मेरे लेखों द्वारा समाज में कोई रचनात्मक परिवर्तन आए, सभी खुले मन से सोच सके, 
वार्तालाप कर सके, इसी अपेक्षा से मैं भी लेख लिखता हूं।
विशेष:- जीवन में दूसरों से अपेक्षा करना स्वाभाविक है, मगर क्या हम भी दूसरों की अपेक्षा पर उतने ही खरे उतरते हैं, अगर नहीं, 
तो हम उनसे यह अपेक्षा क्यों करते हैं? हमें सहज रूप से चीजों को स्वीकार करना चाहिए। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।


प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे,  उम्मीद पर, 
उम्मीद यानी आशा, कुछ करने की, कुछ अच्छा होने की, सोचिए अगर उम्मीद ही न हो,
कि हमारा आने वाला कल आज से बेहतर होगा तो हमारे लिये फिर प्रेरणा का कार्य कौन करेगा।
जनता उम्मीद करती है नेता से, नेता उम्मीद करते हैं जनता से, माता-पिता उम्मीद करते हैं बच्चों से, बच्चे उम्मीद करते हैं अपने माता-पिता से, भक्त उम्मीद करते हैं भगवान से,
यानी सब कुछ परिदृश्य उम्मीद पर चल रहा है, तो उम्मीद ही है, जो हमारे सपनों में जान फूंकती है, हमारे प्रयासों को बल प्रदान करती 
है, अध्यापक को छात्रों से उम्मीद होती है, वहीं छात्रों को अध्यापक से, एक राष्ट्र को उम्मीद दूसरे राष्ट्र से, इस प्रकार संपूर्ण विश्व मैं सभी एक दूसरे से उम्मीद लगाए रहते हैं, और वह उम्मीद ही है, जो जीवन ऊर्जा हमें प्रदान करती रहती है, अगर जीवन में उम्मीद ना हो, 
तो फिर जीवन कैसा खाली हो जाएगा, बगैर किसी उम्मीद के हम किस दिशा में जाएंगे,
तो जीवन में उम्मीद का एक बहुत बड़ा योगदान है, वह हमारे सपनों को पुनर्जीवित करती है, उन्हें परवान चढ़ाती है , और इसी उम्मीद में हम भी कलम चलाते रहते हैं, कि किसी को हमारे विचार पढ़ने से कुछ नया प्राप्त होगा, तो इसी उम्मीद के साथ कि आप हमेशा हमारे लेख पढ़ते रहे , और अपनी उम्मीदों को जगाए रखें, उम्मीद है तो सब कुछ है।
विशेष:- हर व्यक्ति को अपने जीवन में कुछ विशेष करने की उम्मीद होती है, और यही उम्मीद से ताकत प्रदान करती है, जीवन में कुछ हासिल करने की, तो उम्मीद से भरपूर रहे, और उम्मीद रखें हमारा भी दिन आएगा। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद


प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, निर्धारण शब्द पर, यह शब्द लगता तो छोटा सा है, 
मगर इसके मायने गंभीर है।
       आज हमारा जो जीवन है,  वह किस प्रकार संचालित होगा, यह निर्धारण क्या हम स्वयं अपने विवेक से करते हैं, यह समाज, 
पुरानी परिपाटी या  विवशता, आर्थिक दबाव , कौन यह निर्धारण करेगा, हमारा जीवन किस दिशा में जाये, आज जो सामाजिक स्थिति है, इसमें हमारे सामने 
आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक परिपाटी को चलाना, स्वयं की उन्नति पर ध्यान देना,
कड़ी प्रतिस्पर्धा, हमारे ऊंचे सपने, समाज का बदलता परिवेश, निरंतर बदलते मूल्य, ऐसे बहुत सारे कारण है, जो हमारे जीवन के
संचालन में , उसका स्वरूप कैसा होगा,
यह निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम इनमें से किसी भी एक कारण को मुख्य नहीं मान सकते, हर एक कारण की 
अपना एक महत्व है, जो निर्धारण में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है, पिछले कुछ समय से समाज में आर्थिक आधार को एक महत्वपूर्ण कारक जरूर माना जा सकता है,
जो हमारे जीवन, पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक मूल्यों व व समाज में हमारे स्थान
का निर्धारण करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण 
कारक के रूप में सामने आता है, आज समाज में आर्थिक पहलू सबसे पहले देखा जाता है, वह उसके सामाजिक स्तर के निर्धारण का सबसे बड़ा पैमाना है।
       इस प्रकार हम देखते हैं, हमारा जीवन
केवल हम तय नहीं कर सकते, उसमें कई महत्वपूर्ण कारण ऐसे हैं, जो इस बात को निर्धारित करने में अपनी अपनी भूमिका 
निभाते हैं, और समाज में हमारी भूमिका 
हम किस प्रकार से बुद्धिमता पूर्वक अपने आप को स्थापित करते हैं, किस प्रकार 
संघर्ष करते हैं,  समाज में हमारी क्या भूमिका होगी, किस प्रकार का हमारा कद होगा, इसका निर्धारण होता है।
        आज संपूर्ण विश्व एक दूसरे के सहयोग से संचालित है, तकनीकी व आर्थिक सहयोग 
के लिए परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है, इस प्रकार संपूर्ण विश्व मैं जो भी आर्थिक, राजनीतिक गतिविधियां है, वह एक दूसरे के 
परस्पर सहयोग पर निर्भर है, विश्व में कोई
एक देश एक तरफा फैसला नहीं कर सकता, 
क्योंकि वह संपूर्ण विश्व से जुड़ा है, अतः इसका निर्धारण करने में विश्व  के समस्त देशो का
सहयोग व समर्थन भी चाहिये।
      इस प्रकार हम पाते हैं निर्धारण जो भी होता है, चाहे वह परिवार में हो, व्यक्तिगत जीवन में हो, देश में हो, विश्व में हो, परस्पर सहयोग की भूमिका सबसे अधिक है, जितना अच्छा समन्वय होगा, उतने बेहतर परिणाम होंगे। 
विशेष:- हमें जीवन में अपनी भूमिका का निर्धारण बहुत सोच समझ कर करना चाहिये,
क्योंकि इस पर हमारी उन्नति किस प्रकार होगी, यह तय होता है, बगैर किसी दबाव के 
स्वतंत्र रूप से हम यह निर्णय करें या निर्धारित करें , हमें किस भूमिका का निर्वाह करना है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिया पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, सुविधा पर, 
आज का मनुष्य सुविधा भोगी बन चुका है, 
अत्यधिक सुविधा के कारण वह आलसी बनता जा रहा है, और श्रम से दूर रहने के कारण उसका स्वास्थ्य भी  बिगड़ता जा रहा है।
जीवन में मनुष्य की मूलभूत सुविधा रोटी, कपड़ा और मकान है, पर आज हमारे देश में
कई लोग  मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है, वहीं दूसरी और ऐसा वर्ग भी है, जो विलासिता की सुविधाओं से  परिपूर्ण है,
इनके पास आलीशान जीवन जीने की सभी सुविधाएं मौजूद हैं।
        आज एक तरफ देश में कई लोगों को मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है, जो की एक सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है,
स्वास्थ्य संबंधी, शिक्षा संबंधी सुविधा उपलब्ध कराना हर सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र  में सरकारी स्कूलों की स्थिति दयनीय है, व सरकारी अस्पतालों की भी स्थिति कुछ अधिक अच्छी नहीं कही जा सकती, जबकि यह मूलभूत आवश्यकता व सुविधाओं में से एक है।
      एक और बात विचारणीय है, हमें जितनी अधिक सुविधा प्राप्त होती है, उतने ही हम और सुविधाओं की उम्मीद लगा बैठते हैं,
आज विज्ञान के कारण हम  कई ऐसी सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना ही नहीं की थी, इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण मोबाइल है, हम आज मोबाइल से पूरी दुनिया से वार्तालाप व संपर्क कर सकते हैं, कोई सी भी जानकारी हम मोबाइल के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं, किसी प्रकार का आर्थिक लेनदेन भी हम
मोबाइल से कर सकते हैं, हम सूचना का आदान-प्रदान कर सकते हैं, क्या  कुछ वर्षों पहले यह संभव था, यह वैज्ञानिक क्रांति के कारण संभव हुआ। 
विशेष:- अत्यधिक सुविधा हमें निष्क्रिय कर देती है, हमें उतनी ही सुविधाओं को उपभोग करना चाहिए, जितनी हमारे लिए आवश्यक है, वरना स्वास्थ्य संबंधी समस्या हमें हो सकती है, अत्यधिक सुविधा जुटाने के फिर में हम कर्ज का शिकार हो सकते है।
आपका अपना,
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज हम प्रवाह में चर्चा करेंगे, छल पर,
छल, यानी किसी से कपट पूर्ण व्यवहार, 
किसी को धोखा देना, किसी को भी छलना
या धोखा देना मानवीय गरिमा की दृष्टि से भी उचित नहीं, मगर आज समाज में चारों और 
छल का ही वातावरण है, व्यक्ति सच बोलना ही नहीं चाहता, वह छल से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है, जबकि छल से प्राप्त की हुई कोई भी वस्तु, धन या पद अधिक देर तक कायम नहीं रहते, वे उसके हाथ से चले जाते हैं। कभी-कभी तो मनुष्य अपने आप से छल कर बैठता है, वह अपने आप को झूठा दिलासा प्रदान करता है, आगे बढ़ाने के 
 गलत रास्ते चुन लेता है, व पतन के मार्ग की
और चला जाता है, इस प्रकार वह अपने आप से ही छल करता है।
     छली व्यक्ति भले कुछ समय के लिए अपने आप को छल से आगे कर ले, मगर अंततः वह पराजित होता ही है, जब कोई हमें छले तो हमें कैसा लगेगा?   इसीलिए हमें जीवन में छल का प्रयोग नहीं करना चाहिए,
वरना उसका अंतिम परिणाम हमेशा दुखदायी होगा, जो भी हो स्पष्ट कहें, क्योंकि आखिरकार छल पकड़ा ही जाता है, और छली व कपटी व्यक्ति का कोई भी विश्वास नहीं करता, छल हमें अपनी अंतरात्मा में भी 
नैतिक रूप से पतन की ओर ले जाता है।
आप अगर इतिहास में भी देखें, तो छली व्यक्ति अधिकांश परास्त ही हुए हैं, उनका अंतिम हश्र हमेशा दुखद हुआ है, फिर हम क्यों न छल से दूर रहे ।
विशेष:- छल का परिणाम हमेशा ही बुरा होता है, इसलिए किसी को भी न छले, छल का अंतिम परिणाम हमेशा दुखदायी होता है वह हमें नैतिक पतन की और ले जाता है, इससे हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल होती है।
अतः जीवन में छल से दूर रहे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, यात्रा पर, 
यह शब्द सुनने में तो बड़ा छोटा लगता है,
मगर इसके कई मायने हैं, हम सभी का जीवन एक अनूठी यात्रा ही तो है, अपने संपूर्ण जीवन में हम निरंतर एक यात्रा ही तो कर रहे हैं, यात्रा हमारे अपने भीतर की भी हो सकती है, 
जिसे हम आंतरिक यात्रा कह सकते हैं। 
       मनुष्य अपने अनुभव को बढ़ाने के लिए,
जिज्ञासा के कारण अलग-अलग देशों की यात्रा करते हैं, वहां के परिवेश से व संस्कृति से रूबरू होते हैं। हमारी सबकी अपनी-अपनी यात्रा है, और सबके अपने-अपने अनुभव है। 
अपने जिज्ञासु स्वभाव के कारण मनुष्य शुरू से ही यात्रा करता रहा है, ऐसे जिज्ञासु स्वभाव के  कारण मनुष्य ने अंतरिक्ष यात्रा भी कर ली है, यात्रा कई प्रकार की है, धार्मिक यात्रा, आंतरिक यात्रा, अंतरिक्ष यात्रा, व विभिन्न खेल, जो खिलाड़ी खेलते हैं, उनके संबंध में एक देश से दूसरे देश में यात्रा, रेल यात्रा, बस यात्रा, जल यात्रा ऐसे विभिन्न स्वरूप यात्रा के हैं, यानी हमारे जीवन का हर पहलू किसी न किसी यात्रा से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, विभिन्न यात्राएं हमें विभिन्न दृष्टिकोण प्रदान करती है, जीवन के नए आयामों से परिचय कराती है, तो  हम जीवन के विभिन्न यात्रा -पडावो से गुजरे 
व जीवन का आनंद उठाएं। 
    हर यात्रा हमें कुछ सिखाती है, उससे सीखे,
नित्य नूतन यात्रा करते रहे, हमारे जीवन में एक आध्यात्मिक यात्रा भी होती है, जो मैं आंतरिक रहस्यो से परिचय कराती है।
    कुल मिलाकर मेरे कहने का तात्पर्य है, हम अपने जीवन में विभिन्न यात्रा पड़ावों से गुजरते हैं, उनसे सीखे, यात्राओं का आनंद लें।
विशेष:- हम सभी का जीवन विभिन्न यात्राओं का एक समावेश है, हमें विभिन्न यात्राओं से 
जीवन में गुजरना ही होता है, यात्राओं का आनंद ले, उनसे सीखे। यात्रा करते रहे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, प्रतिकूलता पर, जीवन में हर समय अनुकूलता ही हो, यह संभव नहीं, लेकिन प्रतिकूलता हमें जीवन में अधिक सिखाती है, अनुकूल स्थिति में तो हर कोई अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है, मगर जब स्थितियां  प्रतिकूल हो, तब संघर्ष अधिक बढ़ जाता है, लेकिन वही संघर्ष हमें और अधिक निखारता भी है, इसलिए जीवन में 
प्रतिकूलताओं का स्वागत करें, वे आपके जीवन में आती ही इसलिए है, ताकि आप उनसे संघर्ष कर अपने आप को और निखार  सके, उदाहरण के तौर पर हम किसी खेल का उदाहरण  लेते हैं, जो खिलाड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता
है, उसकी ही जय- जयकार   होती है।
         जो व्यक्ति अपने जीवन में जितनी प्रति कूल स्थितियों का सामना करता है, उसके जीवन में अधिक संघर्ष के कारण सफलताएं भी और अधिक हासिल होती है, और प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष के कारण 
आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है।
      इतिहास गवाह है, जो भी प्रतिकूलताओं से घबराते नहीं, वही अपने जीवन में इतिहास रचते हैं, जितनी अधिक प्रतिकूल स्थितियों का सामना हम करेंगे, उतना ही संघर्ष भी बढ़ेगा, 
और संघर्ष बढ़ने के कारण हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ेगा, प्रतिकूल परिस्थितियों हमारा  व्यक्तित्व गढ़ने आती है, इसलिए 
प्रतिकूल परिस्थितियों का स्वागत करें व
जीवन में उपलब्धियो के लिए तैयार रहें।
       अनुकूल परिस्थितियों में तो हर कोई लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों होने पर भी हारता नहीं, दुनिया 
उसी की जयकार करती है, आप पाएंगे 
जो भी व्यक्ति अपने जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों से जितना अधिक गुजरा है,
उसके हिस्से में सफलताएं भी उतनी ही अधिक होती है। हम क्रिकेट का उदाहरण लेते
है, जब सब बल्लेबाज कम रन बनाते हैं, तब प्रतिकूल परिस्थितियों में जो बल्लेबाज अच्छे रन बनाता है, उसी की वाहवाही होती है।
और वह धीरे-धीरे प्रतिकूल परिस्थितियों में रन बनाने  के कारण सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज के रूप में स्थापित होता जाता है। ऐसा ही हमारा जीवन भी है, जितनी प्रतिकूलताओं का हम सामना करेंगे, उतनी ही सर्वश्रेष्ठ हमारी उपलब्धियां भी होगी।
विशेष:- प्रतिकूलता हमें जीवन में सिखाने के लिए आती है, इसलिए उनका हृदय से स्वागत करें, क्योंकि आपके जीवन में निखार लाने के लिए आई है, जितनी अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों होगी, संघर्ष भी उतना ही होगा 
और उपलब्धियां भी फिर वैसी ही होगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, भ्रष्टाचार पर, 
हमारे देश में कई सरकारों ने कार्य किया, 
नगर भ्रष्टाचार पर कोई भी सरकार लगाम नहीं लगा सकी, इसका सबसे बड़ा कारण यह है, भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार का रूप ले चुका
है, आप किसी भी सरकारी विभाग में कोई कार्य नियम से करने के लिए जायेंगे, तो भी वहां पर नियम से कार्य होना मुश्किल ही है, 
क्योंकि वहां बीच के लोग जो बैठे हैं, जो इस भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं, उनकी सहायता लिए बगैर हम अपना कोई कार्य करा ही नहीं सकते, सब कुछ नियम पूर्वक होने पर भी
आपको भ्रष्टाचार रूपी देवता पर चढ़ावा तो चढ़ाना हीं पड़ता है।
     विश्व के 180 देशों में भ्रष्टाचार की जो सूची हैं, उसमें भारत का स्थान अभी भी 
96  वे स्थान पर है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार ने देश को भीतर से जर्जर कर रखा है, इसके लिए हम सभी सामूहिक रूप से जवाबदार है, जब तक हम स्वयं इन बातों से समझौता करते रहेंगे, बदलाव संभव नहीं है, जनता जनार्दन ही अगर चाहे तो भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है, किसी भी प्रकार
के भ्रष्टाचार से समझौता न करें, ऐसा प्रण  सभी नागरिक ले ले, तब ही स्थिति में बदलाव आ सकता है, आईये, आज हम यह प्रण करें, 
ना तो स्वयं भ्रष्टाचार करेंगे, ऐसे लोगों का सहयोग करेंगे, अगर यह सब के भीतर भाव जाग उठे, वह ईमानदारी पूर्वक इस पर अमल
हो, तो अब भी तस्वीर बदल सकती है, अगर जनता अपनी पूर्ण इच्छा शक्ति से इस पर अमल करें, तभी यह संभव है। दिन पर दिन नहीं तो भ्रष्टाचार बढ़ता रहेगा, वह हम केवल देखते रहेंगे, जब तक हम आगे बढ़कर इसका मुकाबला नहीं करते, इसे हटाना संभव नहीं।
विशेष:-   जिस देश में भी भ्रष्टाचार होता है, देश भीतर से कमजोर हो जाता है, हमारे अपने देश के प्रति भी नैतिक जवाबदारी है,
वह हमें सचेत रहकर भ्रष्टाचार से मुकाबला
करना होगा, वरना भीतर ही भीतर भ्रष्टाचार 
दीमक की भांति इस देश को खोखला कर देगा , हम सभी का कर्तव्य है, हम जागे, जन जागरण के बिना इसका सफाया होना संभव नहीं। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, अनुभव पर, हम और आप अपने-अपने जीवन में विभिन्न अनुभवों से गुजरते हैं, और वे अनुभव हमें जिंदगी की सीख देते हैं, वह हमें सिखाते हैं, 
कब ,कहां ,कैसा कदम उठाना उपयुक्त है, 
जिंदगी के अनुभव से सभी सीखते हो, ऐसा जरूरी भी नहीं, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति उन अनुभवों से जरूर सबक सिखता है, जो उसे अपने जीवन में प्राप्त हुए, हमारे वृद्धजन, जिनके पास अनुभवों का भंडार होता है, हमें उनसे वार्तालाप करना चाहिए, वह जीवन में  जिन अनुभवों से गुजरे हैं, वह हमें उनसे जानना चाहिए, क्योंकि हम अपने अनुभव से सीखेंगे तो और अधिक समय लगेगा, इससे अच्छा तो यह है, हम अपने बुजुर्गों के अनुभव से सीखे, उनके अनुभव हमारे लिए मार्गदर्शन का कार्य कर सकते हैं, वे जिंदगी में जितने अनुभवों से गुजरे होते हैं, उतने हम नहीं,
क्योंकि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा 
उन अनुभवों का साक्षी रहा है, इसलिए हमें नियमित रूप से उनके संपर्क में रहना चाहिए, जो अपने अनुभवों से व बुजुर्गों के अनुभव से सीखता है, उनसे सबक प्राप्त करता है, 
वह अपने जीवन में ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होता है, जिंदगी के अनुभव वह शिक्षक है, जो हमें जिंदगी को जीने का पाठ पढ़ाते हैं, सबके अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं, मगर उन अनुभवों से हम सीखें।
विशेष:- अनुभव हमें जिंदगी जीना सिखाते हैं,
बशर्ते हम उन अनुभवों से सीखे, बुजुर्ग लोग 
अनुभवों की खान होते हैं, उनसे अपने जीवन में मार्गदर्शन अवश्य लें, जिससे आप अपने जीवन में निरंतर प्रगति की और अग्रसर हो। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, दृष्टिकोण पर, किसी भी विषय, कार्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण किस प्रकार का है, सकारात्मक, 
नकारात्मक या संतुलित, देखा जाये तो पूर्ण सकरात्मक या पूर्ण नकारात्मक, दोनों ही 
दृष्टिकोण की बजाय एक संतुलित दृष्टिकोण या नजरिया हमें किसी कार्य विषय के बारे में
एक सही दृष्टिकोण प्रदान करता है, क्योंकि तब हम केवल सकारात्मक या नकारात्मक 
दोनों ही पहलुओं को जब एक संतुलित दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हम एक बेहतर संभावना को जन्म देते हैं, क्योंकि जब हम दोनों पहलू देखते हैं, तो हम किसी भी कार्य या विषय को लेकर सही मंथन कर सकते हैं,
और जब हमारा नजरिया या दृष्टिकोण 
संतुलन वाला होगा, तो उसके परिणाम भी 
हमें उतने ही बेहतर प्राप्त होंगे।
         जब किसी भी विषय में हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक होगा, तो हम उसके हल के बारे में सोचेंगे, इसलिए निश्चित ही 
हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक दिशा में तो होना ही चाहिये, जब हम खेल के मैदान में उतरते हैं, तो हमें जीत की कल्पना के साथ ही उतरना चाहिये, लेकिन हमें सभी पहलुओं को ध्यान रखना चाहिये, एक किसान भी जब खेती करता है, तो सर्वप्रथम वह जमीन को सुधारता है, ऐसे ही जब भी हम किसी कार्य की शुरुआत करना हो, तो हमें भी हमारी  मनोभूमि को सबसे पहले सुधारना होगा,
उसमें अच्छे विचारों का हमें बीज बोना होगा,
मगर वह बीज भी तभी उत्पन्न होगा, जब जमीन अच्छी होगी, तो सर्वप्रथम तो हमें 
हमारे दृष्टिकोण में यह परिवर्तन लाना चाहिये,
स्थिति चाहे हमारे पक्ष में हो या विपक्ष में, हमें हमेशा एक सकारात्मक रूख के साथ ही उनका सामना करना चाहिये, क्योंकि सकारात्मक विचारधारा ही वह मनोभूमि है,
जहां अच्छे बीज पनप सकते हैं, व जब बीज अच्छे होंगे, जमीन अच्छी होगी, तो फसल तो निश्चित ही अच्छी होगी, मगर अच्छी फसल के लिए भी हमें समय-समय पर खरपतवार को हटाना होगा, तभी फसल श्रेष्ठ होगी। 
       इसी प्रकार किसी कार्य को करते समय भी सकारात्मक दृष्टिकोण से उसे शुरू करें, 
वह समय-समय पर जो नकारात्मकता नाम की खरपतवार आती है, उसे भी प्रयत्न करके हटाते जाए, ताकि हमें श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त हो।
विशेष:-  किसी भी विषय या कार्य के बारे में 
हमारा सकारात्मक दृष्टिकोण ही हमें औरों से अलग दिशा दे सकता है, क्योंकि जब हम सकारात्मक दृष्टि से सोचते हैं, तब हम परिणाम मूलक सोच की और अग्रसर होते हैं,
इसलिए दृष्टिकोण का जीवन में बड़ा ही महत्व है, व हमारा सकारात्मक दृष्टिकोण ही निरंतर हमें आगे की और ले जाता है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हमारा विषय है ,आवरण 
हम जैसे हैं, उस पर हम एक आवरण चढ़ा लेते हैं, और धीरे-धीरे उन आवरणों की संख्या
इतनी अधिक हो जाती है, हम अपना मूल स्वरूप ही खो बैठते हैं, हम जैसे हैं, जो भी हमें प्रकृति से प्राप्त है, उसे उसी मूल रूप में रखना हमारा कर्तव्य है, मगर शायद आज का दौर प्रस्तुतीकरण का दौर है, आपमें भले उतनी काबिलियत ना हो, पर उस पर आवरण तो चढ़ा ही सकते हैं, एक या दो आवरण हो, 
तब तक तो ठीक है, मगर जब आवरण की परतें इतनी अधिक हो जाए कि सत्य ही समझ नहीं आये, तो हमें फिर से एक बार 
यह समझना होगा, सत्य छिपता नहीं, भले ही उस पर कितने भी असत्य के आवरण चढ़ा दिये
 जाये, मगर वर्तमान परिदृश्य मैं अगर हम समाज को देखें, तो चहूं और एक ही प्रकार
का वातावरण है, किस प्रकार हम ऐसा प्रस्तुतीकरण करें कि हमारी खामियां तो 
नजर ही नहीं आये, हमारा ऊपरी आवरण 
इतना प्रभावशाली हो, कोई व्यक्ति  हमारा सही व्यक्तित्व जान ही न सके, जो हम आवरण में लपेटकर पेश कर दे, बस वही सच नजर आये, यह विकृति समाज में, राजनीतिक दलों में व संपूर्ण समाज के विभिन्न वर्गों में 
तेजी से व्याप्त हो गई है, हम किसी के भी व्यक्तित्व का सही आकलन ही नहीं कर पाते, क्योंकि आवरणों की परत ही इतनी चढ़ी हुई है, जिसमें सब कुछ धुंधला नजर आता है। 
समाज में व्याप्त यह जो परिवर्तन है, वह सामाजिक हित में तो कतई उचित नहीं है,
सच आखिरकार कितनी भी परतो में हो, सामने आता ही है, इसलिए आवरण कितना जरूरी है, यह अवश्य समझे, अनावश्यक रूप से इसका जो दुरुपयोग हो रहा है, उससे हमें सावधान रहने की जरूरत है। 
विशेष:- आज हर व्यक्ति इतने आवरण में कैद है, कि उसका मूल व्यक्तित्व या स्वरूप 
जो प्रकृति ने उसे प्रदान किया है, आवरणों 
की परतो ने समाज में एक अस्वस्थ परंपरा को जन्म दे दिया है, जहां बिना आवरण के कोई सामने आना ही नहीं चाहता, और यह समाज के लिए घातक है, कोशिश करें आवरण की आवश्यकता जितनी उचित हो, 
केवल उतनी मात्रा में ही उसका प्रयोग करें। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।