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प्रिय पाठकगण,
सादर नमन, 

आपका दिन शुभ व मंगलमय हो,  ईश्वर आप सभी को समृद्धि प्रदान करें। इन्हीं शुभ भावो के साथ अंतर्यात्रा भाग 9 प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा करता हूं कि मेरी अंतर्यात्रा कि यह श्रृंखला आपको अवश्य पसंद आ रही होगी।

अंतर्यात्रा में आज मेरी चर्चा का विषय है " युवा मानस व उनके सपने ", आज के युवा दिग्भ्रमित नहीं है बल्कि वह और अधिक आक्रामक व गति से आगे बढ़ाना चाहते हैं,  इसके लिए वह कड़ी से कड़ी मेहनत कर अपना मुकाम पाना चाहते हैं। आज के प्रतिस्पर्धा वाले माहौल में यह अनिवार्य भी है।

युवा मानस अपने लक्ष्य को लेकर अधिक सावधान व सजक हैं,  जरूरत है उन्हें तराशते रहने की। हर युवा मन की अपनी महत्वकांक्षाएं व सपने होते हैं,  उनकी प्रतिभा को पहचान कर उसे सही दिशा प्रदान करना भी हम लोगों के कर्तव्यों में से एक है।

निरंतरता व दृढ़ता यह दो मूल्य हमें भावी पीढ़ी को देना होंगे,  उन्हें बताना होगा कि जो भी लक्ष्य उन्होंने बनाया है उसमें उन्हें निरंतर प्रयास जारी रखने होंगे,  तब ही वह अपनी मंजिल के नजदीक हो सकते हैं। केवल कोरी कल्पना से ही मंजिल तक पहुंचना संभव नहीं,  इस दिशा में आपका संपूर्ण प्रयास भी आवश्यक है।

हम और आप सभी से मिलकर ही इस संपूर्ण समाज का निर्माण होता है,  यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि युवा अपने भीतर के उत्साह को खत्म ना होने दें व निरंतर उर्जावान रहकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें। आशा है आप सभी इस बात से सहमत होंगे कि आज का युवा महत्वकांक्षी है परंतु निरंतरता व सदा उत्साह हमें उनमे बनाए रखना होगा।

विशेष = अपने प्रयासों में संपूर्ण उर्जावान रह कर ही अपने लक्ष्य को पाया जा सकता है। निरंतरता ही सफलता की कुंजी है,  यह बात हमें युवा मानस को प्रदान करना होगी।

                                                                                                                                                            आपका अपना, 
                                                                                                                                                             सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद, 
सादर नमन।

आपका दिन शुभ व मंगलमय हो,  ईश्वर सभी का कल्याण करें इसी सुंदर भाव के साथ अंतर्यात्रा भाग 8 में आज चर्चा का विषय है विचार,  जो विचार हमारे मन मस्तिष्क में सबसे अधिक बार दोहराया जाता है,  वह अंततः कर्म रूप में सामने आ जाता है। विचारों का चयन सावधानीपूर्वक करें क्योंकि आप अपने अंतर्मन में जिन विचारों के बीच डालेंगे वह देर सवेरे प्रस्फुटित अवश्य होगे। 

प्रथम विचार हमारे मन में अनगिनत आते ही रहते हैं,  उनमें से कोई ऐसे तीन या चार विचार जो आपको अपनी जीवन चर्या के अनुकूल जान पड़ते हैं,  उन्हें अपनाएं जैसे सुबह जल्दी उठने का अभ्यास,  उस समय आप के जो भी इष्ट हो उनके सुमिरन का अभ्यास,  प्रार्थना केवल अपने लिए ही नहीं संपूर्ण विश्व के लिए कीजिए क्योंकि आप भी उसी विराट विश्व का छोटा सा अंश है।

दैनिक जीवन में वाणी में मधुरता का हृदय से प्रभु के निकट रहने का अभ्यास,  सुबह जल्दी उठकर प्रात काल की सैर पर जाना,  पेड़-पौधों वृक्षों के पास कुछ समय बिताना,  अपने परिवार के साथ कुछ समय बिताना,  इस प्रकार आपको अपने स्वभाव के जो भी अनुकूल लगते हैं उन्हें अपना कर देखिए।

आपके जीवन में एक चमत्कारिक परिवर्तन आने लगेगा शुरुआत में थोड़ा सा कठिन लग सकता है, पर आप थोड़ी दृढ़तापूर्वक इन्हे अपना कर देखिए और आंतरिक परिवर्तन को महसूस करें।

उस परमपिता ने हम सभी को समय एक सही प्रदान किया है,  केवल नजरिया बदलो नजारे बदल जाएंगे,  सकारात्मक रहे,  व्यस्त रहें,  स्वस्थ रहें,  थोड़ी आंतरिक मौज में रहने का अभ्यास करें। 

विशेष = धीरे धीरे ही सही जीवन जीने के कुछ सूत्र अवश्य तैयार करें,  इन सूत्रों में आर्थिक,  सामाजिक,  वैचारिक,  व्यवसायिक स्वास्थ्य,  परिवार आदि सभी से जुड़े सूत्रों की माला बनाते जाए,  आपको जीवन एक सही दिशा में जैसे ही चलने लगेगा आप स्वयं को ऊर्जावान महसूस कर पाएंगे।

                                                                                                                                                            आपका अपना,
                                                                                                                                                              सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद,  
सादर नमन, 
आपका दिन शुभ व मंगलमय हो। 

ईश्वर की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रहे,  इसी मंगलमय कामना के साथ अंतर्यात्रा भाग साथ में आज चर्चा करेंगे,  यह चर्चा कुछ अलग प्रकार की होगी।

हमारा सबसे पहला कर्तव्य स्वयं के प्रति,  फिर परिवार के प्रति,  क्रमशः सीढी दर सीढी चलना चाहिए यदि हम स्वयं के प्रति ही  जागरुक नहीं है,  तो क्या किसी और को जागरुक कर सकेंगे,  इसीलिए सर्वप्रथम सभी परिस्तिथियों के प्रति स्वयं चेतनशील होना ही आपकी उन्नति की प्रथम शर्त है।

अगर हम चिंतनशील व मननशील होंगे तभी तो हम सभी से सजग रह कर व्यवहार कर सकेंगे,  यहां समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है की सभी व्यक्तियों का व्यक्तित्व अलग प्रकार का होता है उसे पहचान कर ही हम तदनुरूप आचरण कर सकेंगे,  व्यावहारिक जगत में यही ठीक है,  कोई व्यक्ति तामसिक प्रवृत्ति का है,  उसके आचरण से यह समझ में आ जाएगा। उसे तत्व रूप में उसके तामस स्वभाव को जानकर उसी अनुरूप ही व्यवहार करना उचित होगा अन्यथा आप इस बात को समझ न आने के कारण  परेशानी में आ जाएगे। तमोगुणी रजोगुणी व सत्वगुणी का अंतर व्यावहारिक कार्य जगत में समझना होगा,  तभी हम बखूबी इस बात को समझ कर अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए सही दिशा में निर्णय ले सकेंगे।

दैनंदिन जीवन में हम कई लोगों से बात करते हैं,  दरअसल उनकी बातचीत से ही उनके रूप को जानकर वैसा आचरण कर पाएंगे,  सभी से एक जैसा व्यवहार कर पाना संभव नहीं व व्यवहारिक भी नहीं। हमें अपना आंतरिक भाव शुद्ध रखते हुए आचरण करना चाहिए,  पर सामने वाले व्यक्ति की मनोवृत्ति को भी समझना आवश्यक है जैसे संस्कृत में सूत्र है शठे शाठ्यम जैसे को तैसा,  हमें इसे अपने व्यवहारिक अनुभव में समझना चाहिए।

विशेष = अपने अंतर में उस भाव को स्पष्ट समझने का प्रयास करें,  व्यावहारिक जगत में अपना मानस शुद्ध रखें पर सामने वाले के व्यवहार को भी नजरअंदाज न करते हुए आचरण करें,  अन्यथा आप संकट में आ सकते हैं।

                                                                                                                                                             आपका अपना,   
                                                                                                                                                              सुनील शर्मा।
प्रिय पाठकगण, 
सादर नमन,
आपका दिन शुभ व मंगलमय हो,  ईश्वर कृपा सदैव बनी रहे।

अंतर्यात्रा में आज चर्चा करेंगे " व्यक्तिगत गरिमा " विषय पर,  आज का समय जितना जल्दबाजी का होता जा रहा है,  उसमें व्यक्तिगत गरिमा या सम्मान जो हमें अपने आपसी सम्बन्धो में करना चाहिए,  उसकी गरिमा टूटने लगी है और यह एक सामाजिक क्षति है। जब हम पारस्परिक व्यवहार में सामने वाले की गरिमा व सम्मान को बनाए रखते हैं,  तब वह भी निश्चित ही आपका अपमान नहीं करेगा।

यह सामाजिक नियम लगता तो बड़ा ही छोटा सा है,  पर इसमें जीवन को जीने का एक सफल सूत्र हम मान सकते हैं। कल्पना करें आपके पास हीरे जवाहरात,  धन दौलत सब है पर साथ में अहंकार है। दूसरी और आपके पास यह चीजें तो है पर आपके पास सामाजिकता व वाणी की विनम्रता है तो वाणी की विनम्रता निश्चित ही आप को एक अलग गरिमामय उपस्थिति प्रदान करती है। 

कई बार व्यक्ति बहुत बुद्धिमान होते हैं पर अहंकार उन्हें आगे नहीं बढ़ने देता,  जो व्यक्ति अपने अहंकार को जीतने में समर्थ हो जाता है,  ईश्वर उसी व्यक्ति या व्यक्तित्व में अपने परम सत्ता के साथ विराजमान होते हैं। 

हमारा सुक्ष्म अहंकार कब हमारे बीच आकर उपस्थित हो जाता है,  हमें पता ही नहीं चलता। जो भी व्यक्ति अपने चिंतन द्वारा उसे पराजित कर देता है,  वह अपनी दैदिव्यमान गरिमा को प्राप्त कर उस ईश्वरीय सत्ता के बीच जा खड़ा होता है। उसकी आंतरिक शक्तियां जागृत हो कर उसे चेतना अवस्था में रखती है व स्थूल व सूक्ष्म दोनों ही में ही देख पाने में समर्थ होने लगता है। 

जो भी अपने व्यक्तिगत गुणों को तराशता जाता है,  वह निश्चित ही एक गरिमामय आभा अपने भीतर प्रकट कर लेता है, उसके संसर्ग में आने वाले प्राणी भी फिर प्राणवान हो जाते हैं। 

एक सकारात्मक ऊर्जा - पिंड का निर्माण हमारी विचार श्रंखला से ही प्रारम्भ होता है अथवा हमें वैचारिकता पर अवश्य ध्यान देना चाहिए,  आपके मानस - मन में चल रहे विचार वैसी ही ऊर्जा की ओर आप को खींच कर ले जाते हैं। अतः सतर्कता पूर्वक अपने आप को दिशा दें।

विशेष = भारतीय परंपरा में अभिवादन की एक श्रेष्ठता है बुजुर्गों को चरण स्पर्श,  बराबर वालों को प्रणाम,  बच्चों को स्नेह हमारी  भारतीय परंपरा का एक विशिष्ट अंग है। कृपया अपनी जड़ों से जुड़े रहें।  

                                                                                                                                                          आपका अपना,
                                                                                                                                                            सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद, 
आपका दिन शुभ व मंगलमय हो।

अंतः प्रेरणा जो हमारे भीतर से उठती है,  जिसे हम अवचेतन भी कह सकते हैं। चेतन व अवचेतन,  कभी-कभी अवचेतन मन चेतन से भी शक्तिशाली हो जाता है।

अतः अपने भीतर उठ रहे सभी विचारों की शृंखला चलने अवश्य दे,  पर उनके साथ कोई भी छेड़खानी न करते हुए  शांत चित्त इन सभी विचारों को जाने जो आपके भीतर उठ रहे है। द्वितीय क्रम में उनमें से अनावश्यक व आवश्यक दो श्रेणियों में विभाजन करें। क्या आप की परिस्थिति से वह मेल खाते विचार हैं। पूर्ण रूप से अपने विचारों को जानने का पूर्ण ईमानदारी से प्रयत्न करें। फिर उन विचारों पर अमल करने के बाद परिणामों का अध्ययन करें। याद रखिए आपका कोई सा भी कर्म  विचार से ही प्रारंभ होता है,  वह मूर्त रुप बाद में लेता है। सोच विचार कर अपने विचारों को गढ़े। 

जीवन जीने की एक निश्चित प्रक्रिया अपनाएं,  इसमें आपका समय संयोजन, आर्थिक संयोजन,  वैचारिक संयोजन तीनों का सम्मिश्रण हो। आज के समय में आर्थिक पहलू भी एक आवश्यक अनिवार्य घटक है। जिस प्रकार से सामाजिक वातावरण निर्मित हो रहा है। राजनेता व समाज दोनों ही अपना संयम व धैर्य खो रहे हैं। इस बात की महत्ता और बढ़ जाती है क्योंकि साधन तो अल्प है और कार्य अधिक। विचारशील होकर ही आप अपनी सामर्थ्य को क्रमशः बढ़ा सकते हैं।

समस्याओं के निराकरण हेतू पूर्ण सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर उनका हल निकालने का प्रयास करें,  आप अवश्य सफल होंगे।  साहसी बने,  विचारवान बने,  बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय ले,  आप के मार्ग की कठिनाइयां धीरे-धीरे कम होने लगेगी। आप व्यापार के क्षेत्र में हो या नौकरी के क्षेत्र में पूर्ण सजग होकर निर्णय ले। 

विशेष = परिस्थितियों का संपूर्ण अवलोकन करने के उपरांत निर्णय ले,  आप निश्चित ही सही निर्णय की ओर अग्रसर होंगे। 

                                                                                                                                                               आपका अपना,
                                                                                                                                                                 सुनील शर्मा।
प्रिय पाठकगण,
सादर नमन।

नवरात्रि पर्व शुरू होने वाला है,  आज प्रवाह में बात करते हैं नारी शक्ति पर,  समाज में अगर नारी ना हो तो कल्पना करिए यह समाज किस दिशा व दशा में होगा।

एक नारी,  स्त्री,  एक मां,  पत्नी,  बहन इस प्रकार एक ही नारी कितने रूपों में अपने परिवार की सेवा करती है। इसके पीछे उसका निजी स्वार्थ कुछ भी नहीं होता है,  वह तो निस्वार्थ भाव से परिवार की सेवा करती है व उसे खुशहाल व समृद्ध बनाती है , इन सब के पीछे उसकी कितनी तपस्या व प्यार छुपा होता है।

एक अनजान परिवार में विवाह के बाद जब वह कदम रखती है,  उस परिवार में पति के स्नेह से सिंचित होकर वह परिवार के वंश वर्धन में सहायक बनती है,  परिवार में अन्य सदस्यों से तालमेल बनाती है,  वह अपने हित के लिए कुछ भी नहीं चाहती है। हां,  वह अपना मान सम्मान अवश्य चाहती है,  उसकी गरिमा को कोई ठेस ना पहुंचाएं,  इतना उसे अवश्य चाहिए और सही मायनों में वह इसकी हकदार होती है।

मां के रूप में वह बच्चों को वात्सल्य प्रदान करती है तो पत्नी बन कर पति के साथ हर सुख दुख में सहचरी की भूमिका का निर्वाह करती है,  पति के विपरीत समय में उसे हौसला प्रदान करती है। आत्मसम्मान हर स्त्री का अधिकार है,  हमारे शास्त्रों में स्पष्ट रुप से नारी की महत्ता का गुणगान किया गया है।

जहां नारी की पूजा अर्थात उन्हें सम्मान प्रदान किया जाता है,  वहां पर देवता भी रमण करते हैं अर्थात वहां पर देवता का या  दिव्यता का वास होता है,  इस तरह अपने आप में  शक्तिस्वरूपा ही तो है,  वह कही सरस्वती,  कहीं लक्ष्मी तो कही मां काली के रूप में है,  उसकी दिव्य सत्ता हमारे इर्द-गिर्द फैली हुई है,  बस आवश्यकता हमें उसे सही रूप में समझने की है।

इस देश में नारी शक्ति के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं,  वर्तमान में भी लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन नारी हैं,  वह स्त्री शक्ति के सशक्त उदाहरण के रुप में हमारे सामने है। माननीय सुमित्रा महाजन,  सुषमा स्वराज जी,  हमारे इंदौर शहर की महापौर मालिनी गौड़ जी,  भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा जी,  भूतपूर्व राष्ट्रपति पद पर रही प्रतिभा पाटिल जी,  यह नारी शक्ति की प्रतीक वर्तमान समय की वह महिलाएं है,  जो अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से वहाँ तक पहुंची है।

हमारी संस्कृति विरासत हमें सिखाती है,  नारी केवल भोग्या नहीं वरन वह पूज्या है। वह उसके निस्वार्थ रूप में परिवार को समाज की सेवा के कारण पूजनीय है। 

आप अपने अनुभव में भी पाएंगे की मां बच्चों को उनकी गलतियों पर माफ कर देती है क्योंकि वह स्नेहिल स्वभाव की होती है,  पुरुष या पिता थोड़े यथार्थवादी व कठोर होते हैं। इस प्रकार से हम पाते हैं कि मानवीय सभ्यता में निश्चित ही उनका स्थान सर्वोपरि होना चाहिए।

विशेष = नारी के कई रुप है मां,  बहन,  सास,  बहू, बेटी इस प्रकार नारी अपनी अनेक भूमिका का निर्वाह कुशलतापूर्वक करती है।  अतः नवरात्रि जो नारी शक्ति के नौ रूपों से हमारा परिचय कराती है,  आइए उन नौ रूपों में हम उनकी आराधना करें व अपने आपको धन्य करें।

                                                                                                                                                            आपका अपना, 
                                                                                                                                                             सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक गण, 
सादर नमन।

आप सभी को हिंदी दिवस पर अनेकानेक शुभकामनाएं,  आपका जीवन समृद्ध हो,  आज आप से चर्चा करेंगे हिंदी की आज के समय आवश्यकता पर,  आज सामाजिक परिवेश में बड़ी ही तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है,  तब तो हिंदी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। चाहे आप इसके महत्व को नकारे  व अंग्रेजी भाषा को अधिक सम्मान दें किन्तु इससे हिंदी भाषा का महत्व कम नहीं हो जाता।  

हिंदी गीत पहले रचे गए थे, पर आज भी जब हम सुनते हैं,  तब उनकी अमरता का सुंदर सा ऐहसास ( यह शब्द भले ही उर्दू या फ़ारसी का हो मुझे स्वयं ठीक से नहीं पता ) होता है लेकिन यही तो हिंदी की गरिमा है कि वह अन्य भाषा व उनके शब्दों को भी बड़ी आसानी से आत्मसात कर लेती है। आज जो समाज में शब्दों का महत्व कम हो रहा है,  सामाजिक जागृति के उपाय के बाद भी लोगों में अंधविश्वास है,  तब हमें और अधिक गहराई पूर्वक भाषा की ताकत को हृदय से महसूस करना होगा। 

हमारी मातृ भाषा,  राष्ट्रभाषा हमारे अपने भावों की अभिव्यक्ति का सबसे सुंदर माध्यम होती है,  आप अपनी मातृभाषा में जितने सुंदर ढंग से अपने आप को अभिव्यक्त कर पाते हैं,  अन्य भाषा में नहीं,  तो आइए हम अपने देश को प्रेम करते हुए इस माटी का कर्ज चुकाते हुए हिंदी की सेवा करें। उसे अपने बोलने का अभिव्यक्ति का माध्यम बनाएं,  गर्व से कहें व दोहराये यह पंक्तियां "हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा" मेरे प्यारे हिंदुस्तान में रहने वाले सभी प्रकार के  विभिन्न मतों को मानने वालों से भी यह राष्ट्र उतना ही प्रेम करता है जितना की हिंदी भाषा के लिए,  हमें अपनी मातृभाषा पर अवश्य गौरव होना चाहिए साथ ही अन्य भाषाओं का भी आदर करना चाहिए। 

आज संपूर्ण विश्व में एक समावेशी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है,  पर अपनी परंपराएं जो सुंदर हैं,  उनका पालन करना व इसमें समय के साथ इसमें जो विकृतिया आ गई है,  उन्हें दूर करना भी हमारे सामाजिक कर्तव्यो में से एक हैं।
आनंद में डूब कर हम समवेत स्वर से जनगणमन गाएंगे जन गण मन अधिनायक जय है भारत का भाग्य विधाता है,  इन पंक्तियों में जन गण मन इन तीनों की जो कल्याण की कामना करता है वही सच्चा भारतीय है।  

आइये जन गण मन की कल्पना को हम सामूहिक रुप से राष्ट्र के हित की कामना करते हुए जो भी जहां पर कार्यरत है पूर्ण संकल्प से ईमानदारी से कार्य करते हुए इस राष्ट्र को ऊंचाइयों के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करें। हमारी परंपरा " सर्वे भवंतु सुखिन,  सर्वे संतु निरामया,  सर्वे भद्राणि पश्यंतु,  मां कश्चित् दुःख भाग भवेत्।" की रही है। ऐसी सुंदर भावोवाली स्वस्थ विचार वाली संस्कृति का हम सम्मान करें व राष्ट्र की कीर्ति में अपना योगदान दें। जय हिंद,  जय भारत।                                                     
विशेष = आप पाठकों का स्नेहा वह इसे पढ़ना ही मेरे लिए इसे लिखने का प्रेरणा स्त्रोत है इसी आशा सहित आप सभी का हृदय से आभार।                                                                                                                                                        

                                                                                                                                                             आपका अपना, 
                                                                                                                                                              सुनील शर्मा। 
प्रिय पाठक वृंद, 
सादर नमन।

आपका दिन शुभ व मंगलमय हो। 



अंतर्यात्रा भाग चार में वर्तमान परिदृश्य में हम सचेतन रहकर ही कार्य करें यह अत्यावश्यक है। शब्द "अति " पर ध्यान पूर्वक अधिक जोर देने से मेरा तात्पर्य यह कि हम भारतीय संस्कृति का केवल बखान ही नहीं करते रहें,  वरन मूल्यों से सीख कर हम स्वयं एक आदर्श रूप में अपने आप को जब तक भीतर से प्रस्तुत नहीं करते अंतर में उन भावों से नहीं जुड़ते,  तब तक हमारे व्यक्तित्व का रूपांतरण नहीं हो सकता।

हमें हमारे लक्ष्यों का पता होना चाहिए,  इसके लिए हमें सर्व प्रथम अपने प्राथमिक,  आवश्यक,  आर्थिक,  सामाजिक व आर्थिक सभी मूल्यों का समावेश करना होगा। जिस भी समाज व विश्व में हम रहते हैं उसके प्रति एक सकारात्मक चिंतन के साथ हम जुड़े व क्या समाज के हित में है,  वे बातें पूर्ण निडरता के साथ कहने का साहस हमारे मन में हो।

हम संकल्प बली बने,  इस प्रकार असहाय से मूक दर्शक ना बने रहकर हमें समाज में सभी बातों पर संवाद की परंपरा को कायम रखना चाहिए। जहां पर आपसी संवाद खत्म हो जाता है,  वहां पर फिर विवाद की स्थिति निर्मित होती है। जीवंत संवाद स्वयं से,  घर में सभी से व समाज में,  समाज हित में जो जरुरी हो वह बोलने में कभी अभी परहेज ना करें।

यह हमारा दायित्व है कि आज  जब समाज में चारों ओर हाहाकार सा मचा है। हम कुछ समय रुक कर हमारी सांस्कृतिक विरासत पर अवश्य गौर करें,  यह हमें हमारा आत्मबोध  कराती हैं 

विशेष = स्वयं को जागृत करें,  विवेकवान बने,  सभी परिस्थितियों का अध्ययन करें,  अपने सामर्थ्य को देखें व फिर पूर्ण मनोयोग से अपने लक्ष्य की ओर बढ़े। 

                                                                                                                                                      आपका अपना, 
                                                                                                                                                        सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद,
सादर नमन,

इस बार समसामयिक में राम रहीम पर जो फैसला आया है,  उसके बाद उनके अनुयायियों ने जो तांडव मचाया है वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है,  ऐसे भक्त जिनके रूप में एक उन्माद फैला दिया जाता  हैं,  ऐसे हिंसक उन्माद कि देश में कतई जगह नहीं होनी चाहिए।

पुनः सभी बुद्धिजीवी नागरिक,  राजनेता,  संत,  सच्चे समाज सेवक, सजग  युवा ऐसी घटना का समर्थन ना करें,  हम समाज में रहते हैं। ऐसी चीजों से पूर्ण शक्ति से निपटना चाहिए,  कानून को हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं है।

देश की इस वर्तमान व्यवस्था के लिए मेरे विचार से अधिकतर इस देश में जिस प्रकार भीड़ का खेल खेला जाता है,  अनुयायियों की भीड़ लगाई जाती है,  वह इन सभी चीजों के लिए उत्तरदायी है।

किसी भी कीमत पर देश में इन घटनाओं का होना आहत करता है,  यह सब बगैर चेतना के जीवन को जीने का नतीजा है। हमें ईश्वर ने संपूर्ण चेतना व विवेक प्रदान किया है,  देश के युवाओं से मेरा विशेष तौर पर निवेदन,  धर्म के नाम पर धर्मांधता से बचें,  धर्म का मूल स्वरुप तो दया,  सहयोग,  आपसी भाईचारा ही है।

कट्टरपंथी लोगों को किसी भी कीमत पर इन चीजों से रोकना चाहिए,  प्रशासनिक अधिकारियों व राजनेताओं से विनम्र निवेदन अपनी आतंरिक चेतना को जागृत करें,  देश हित में कृपया इन सब पर ईमानदारी व स्वविवेक से फैसला करें।
आम जनता से अनुरोध धर्म व धर्मांधता का अंतर समझे,  यह देश संपूर्ण विश्व को शांति का संदेश देता है,  मानवता सिखाता है।  आखिर मनुष्य होना ही कितनी बड़ी बात है,  इतना अनमोल जीवन पाकर अगर हम व्यर्थ की बातों में क्यों अपना समय नष्ट करते हैं।

न्यूज़ चैनलों व अखबारों से आग्रह वह देश की जनता को बताने के साथ ही इस बात के लिए प्रेरित करें कि इन घटनाओं को सनसनी न बनाएं वरन जनता को प्रेरित व जागरूक करें कि इन घटनाओं के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करे,  उन्माद का फैलाव ना करें,  साथ ही राज्य व केंद्र सरकार सभी सूचनाएं प्राप्त होने के बाद क्या कार्यवाही कर रही थी,  यह भी समझ से परे है।

विशेष = जनता से आग्रह धर्म व धर्म के नाम पर उन्माद से बचें।  संतो से व जागरुक बुद्धिजीवियों से निवेदन,  सधी हुई प्रतिक्रिया दे। जनता को  ऐसे नकली संतो से सावधान करे,  जिन्होंने  केवल विलासिता के आश्रम बना रखे हैं,  उनके प्रति जनता को सच्चे संत जागरूक करें। सभी राजनीतिक नेताओं से निवेदन इस पर सख्ती से कार्यवाही का समर्थन राजनीतिक पूर्वाग्रह को  छोड़कर करे। यह राष्ट्र की अस्मिता का सवाल है।

                                                                                                                                                            आपका अपना, 
                                                                                                                                                             सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद, 
सादर नमन, 

आपका दिन शुभ व मंगलमय हो, इन्ही सुंदर भावों के साथ इस लेख की शुरुआत कर रहा हूं।
आज अंतर्यात्रा के भाग तीन में हम बात करेंगे कि किस प्रकार से हम हमारा आंतरिक रुपांतरण करें। बाह्य रूप में हम सुंदर वस्त्र पहनकर सज्जित हो जाते हैं पर वैचारिक सौंदर्य जो भी भीतर चल रहा होता है,  वह अंततः आपके मूल व्यक्तित्व का परिचायक होता है। 







मानवीय गुणों में धैर्यशाली होना एक प्रमुख गुण है। जो मनुष्य धैर्यवान होता है,  वह अपनी मंजिल को अवश्य पाता है। जीवन में सफलता के लिए एक सूत्र है धैर्य,  दूसरा महत्वपूर्ण सूत्र है समय संयम,  तीसरा महत्वपूर्ण सूत्र हैं वाणी संयम, चौथा सूत्र अर्थ संयम, पाँचवा सूत्र है परिस्थितियों का सूझ-बूझ पूर्वावलोकन व उसके बाद अपनी रणनीति का निर्धारण। 

इन पाँच सूत्रों का सटीक परिपालन करते जाएंगे तो आप देखेंगे की आपके व्यक्तित्व,  कृतित्व व आर्थिक तीनों ही जगह पर आप महत्वपूर्ण उपलब्धि को हासिल कर लेंगे। 

इन सबके अलावा छठा सूत्र है समाज में अच्छे विचारों का प्रचार प्रसार,  यह एक सामाजिक प्रतिबद्धता के नाते अवश्य करें। इससे आपकी आंतरिक ऊर्जा में अभिवृद्धि होगी, बनते कोशिश सभी के साथ सहयोग का बर्ताव करें,  ईश्वर निश्चित ही आपको आंतरिक व बाह्य दोनों ही समृद्धि से नवाजेगा। मेरे लेख में कुछ शब्द उर्दू या फारसी के भी हो सकते हैं पर मैं अपने मन्तव्य की गहराई को समझता हूं कि आप सभी तक  सरलतम रूप में पहुंचा सकूँ।  

पुनः आप सभी को धन्यवाद,  जो भी मेरे लेख पढ़ रहे हैं उन्हें भी शत-शत नमन। आप सभी का जीवन समृद्धि से भरपूर हो।

                                                                                                                                                                आपका अपना, 
                                                                                                                                                                  सुनील शर्मा।
प्रिय पाठक वृंद,                   
सादर नमन,                      
                 
सर्वप्रथम आप सभी का दिन शुभ व मंगलमय हो,  इन्हीं भाव के साथ आगे अंतर्यात्रा का द्वितीय भाग आप सभी के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं,  मां सरस्वती की अनुकंपा व  गुरुवर के आशीर्वाद से ही इन लेखों को लिख पाता हूं।
आप सभी का आशीर्वाद व आप जो भी मेरे लेख पढ़ रहे हैं,  वह सभी पाठकगण मेरी शक्ति है,  वह मुझे प्रेरणा प्रदान करते हैं कि आगे से आगे और लेख लिख सकूं। पुनः विषय पर आते हैं,  अंतर्यात्रा प्रथम में अपने आप को, अपने लक्ष्य को पहचानने की बात कही थी। 


आइए विचार श्रंखला को आगे बढ़ाते हैं,  सोचे मानव जीवन जो हमें प्राप्त हुआ है,  वह कितना सुंदर है क्या आपने चिड़िया को चहचहाते सुना है,  तितलियां कैसे उन्मुक्त भाव से पुष्प के मकरंद का पान करती है,  क्या कभी हमने वन्यजीवों का अध्ययन  किया है,  जब इन वन्यजीवों की भी पूर्ति हुआ करती है,  क्या ईश्वर या प्रकृति इन्हे इनका अंश प्रदान नहीं करती,   फिर क्यों मानव हो कर भी हम मनुष्यता का इतना सा भी पाठ नहीं सीख पाते हैं कि लौटकर तो वही आता है,  जो हम प्रदान करते हैं।
प्रकृति के इस अनूठे रहस्य को समझने के लिए हम एक उदाहरण से समझना होगा जैसे एक बीज में ही वृक्ष छुपा है वैसे ही हम सभी में बीज रूप में कहीं ना कहीं मानव व महामानव बनने की पूर्णता विद्यमान है। आवश्यकता हमारे भीतर के उन सोए हुए स्पंदनों को जगाने की,  उस परमपिता से प्रार्थना करने की कि वह मनुष्य मात्र में उसके देवत्व को जगा दे। देव कौन है,  जो देते हैं तो हम भी देव बने,  उसका अनुसरण करें।
विचार से,  भाव से,  धन से जिस प्रकार भी हो अच्छे भाव संवर्धन को जीवन में स्थान देना प्रारंभ करें। शुरुआत में आपको यह प्रक्रिया थोड़ी सी कठिन अवश्य लगेगी क्योंकि हमारा लालच इस प्रक्रिया में बाधा बनकर उपस्थित होता है।
रुक कर अपने आप को पुनः देखें कहां-कहां हमसे जन्मदिन जीवन में चूक हो रही है। समय को खोना उन चूको में से सबसे बड़ी चूक है। गया हुआ कल लौटाने की क्षमता किसी में भी नहीं है।आत्मावलोकन प्रारंभ करें,  जीवन को एक व्यवस्था प्रदान करें यदि आपका जीवन एक व्यवस्थित क्रम से चलता है तो आप तो खुश रहेंगे। आपके साथ रहने वाले भी खुश रहेंगे,  अस्तव्यस्त विचार व जीवन शैली हमें भी अस्तव्यस्त कर देती है।  
पुनः जो भी मेरे लेख पढ़ रहे हैं युवा,  बुजुर्ग,  प्रशासनिक,  अधिकारी,  राजनेता,  बुद्धिजीवी सभी से विनम्र निवेदन है,  बगैर किसी पूर्वाग्रह के मेरे लेखों को पढ़े व विचार अवश्य करें।
समाज को हमारी देन क्या है,  प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जो हो रहा है,  उसके प्रति क्या हमारी सतर्क दृष्टि है अथवा नहीं। क्या संस्कृति की जड़े हम अनजाने में ही कमजोर तो नहीं कर रहे हैं।
भावी पीढ़ी को हमारी संस्कृति के मूल भाव "सर्वे भवंतु सुखिना,  सर्वे संतु निरामया,  सर्वे भद्राणि पश्यंतु,  मां कश्चित् दुख भाग भवेत।" से उनका परिचय कराना हमारा कर्त्तव्य नहीं हैं,  उन्हें धन के अलावा एक अच्छा विश्व नागरिक बनने के लिए प्रेरणा प्रदान करना हमारा दायित्व नहीं है।
शेष अगली कड़ी में।  

विशेष = अंतर्यात्रा के इस धारा प्रवाह लेख में मेरा जो भी ज्ञान,  निजी अनुभव व हमारी सांस्कृतिक ग्रंथों से जो मुझे अनुभूति होती है,  वह आप सभी को पहुंचाना मुझे समाज के प्रति मेरा नैतिक दायित्व जान पड़ता है। आप भी जब अंतर्यात्रा करेंगे,  जीवन के मूल उद्देश्य से आप अवश्य परिचित हो जाएंगे। पुनः धन्यवाद आप सभी पाठक गणों का,  अभिवादन सभी का जो मुझे निरंतर ब्लॉक पर पढ़ रहे हैं।

                                                                                                                                                                     आपका अपना,  
                                                                                                                                                                      सुनील शर्मा। 




प्रिय पाठक वृंद,
समसामयिक में इस बार अरविंद केजरीवाल ने जिस प्रकार का साहसिक फैसला दिल्ली में अपनी सरकार चलाते हुए लिया है,  वह प्रशंसनीय है। वहां पर उन्होंने महंगी शिक्षा के ऊपर एक जबरदस्त प्रहार करते हुए मनमानी फीस लेने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए जिस प्रकार से उपराज्यपाल जी से मंजूरी ली है वह बधाई के पात्र हैं,  साथ ही उपराज्यपाल जी द्वारा भी इस प्रकार की कार्यवाही हेतु सहमति प्रदान करना निश्चित की बड़ा ही शुभ संकेत है।
                                            हमें अरविंद केजरीवाल जी की को इस मायने में वाकई अन्य राजनेताओं से अलग श्रेणी में रख सकते हैं। वह आक्रामक स्वभाव के जरूर है पर उनमें निर्णय लेने का जो माद्दा है,  वही उन्हें अन्य नेताओं से अलग कतार में खड़ा करता है। बगैर राजनीतिक पूर्वाग्रह के देखें तो अन्य राजनेताओं से इस मामले में वे अलग है। वह त्वरित कार्रवाई करना पसंद करते हैं,  इससे उनके कई आलोचक व विरोधी भी है परंतु सही फैसला या गलत फैसला ही सही उसके लिए जिस साहस  की जरूरत होती वह उनमें है।
                                           आज की राजनीति जिस प्रकार के स्तर पर है वहां ऐसे मुखर राजनेता आवश्यक भी है। इस देश की जनता भी बधाई की पात्र हैं,  जो समय आने पर अपना सही चुनाव करती है,  यही तो इस देश के लोकतंत्र और जनतंत्र की खासियत है। आशा है मामला सुप्रीम कोर्ट भी अगर गया तो न्यायालय जनता के हक में फैसला देगा। बहुत समय बाद देश की राजनीति में कोई अच्छा कदम देखने को मिला है वरना आरोप-प्रत्यारोप के सिवाय देश में हो क्या रहा है।
                                           केजरीवाल जी को ऐसे साहसिक कदम हेतु बधाई। शिक्षा सस्ती उपलब्ध होगी तो बहुत सारे भ्रष्टाचार पर वैसे ही अंकुश लग जाएगा क्योंकि आज भी देश में महंगी शिक्षा के कारण कई व्यक्ति अपने बच्चों को चाहते हुए भी  उच्च शिक्षा प्रदान नहीं कर पाते हैं।

विशेष = ऐसे क्रांतिकारी कदम की उम्मीद अब देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से भी है,  क्या उन्हें अभी तक इस बात का संज्ञान नहीं हो पा रहा है कि महंगी शिक्षा भ्रष्टाचार  के मूल कारणों में से एक है।
                                                                                                                                                       आपका अपना, 
                                                                                                                                                         सुनील शर्मा।