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प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, लक्ष्मण रेखा पर, लक्ष्मण रेखा से मेरा तात्पर्य यह है, 
हर व्यक्ति, हर पद की एक मर्यादा या लक्ष्मण रेखा होती है, वह पार नहीं होना चाहिये।
      यह केवल प्राचीन काल में जैसा रामायण में घटनाक्रम आता है, लक्ष्मण जी सीता जी के लिये लक्ष्मण -रेखा का निर्माण करते हैं, पर मेरे विचार से यह लक्ष्मण रेखा समाज के हर वर्ग व हर व्यक्ति के लिए है, और जो उच्च पद पर हैं, उनके लिए इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि वे जैसा  करेंगे, वैसा ही और लोग भी  अनुसरण करेंगे, क्योंकि एक पुरानी कहावत भी है, "यथा राजा तथा प्रजा"
इसका यह अर्थ है जैसा राजा होगा, वैसे ही उसकी प्रजा होगी, यदि राजा स्वयं ही लक्ष्मण रेखा का ध्यान नहीं रखेंगे, उनकी मर्यादा का
उल्लंघन करेंगे, तो प्रजा से फिर वह कैसे उम्मीद रखते हैं, कि वह लक्ष्मण रेखा का पालन करेगी। 
            किसी भी कार्य को दूसरे से करवाने से पहले हमें स्वयं उस पर खरा उतरना पड़ता है, तभी हम दूसरों से भी उम्मीद रख सकते है 
समाज में हर वर्ग की, हर पद की हर व्यक्ति की अपनी अपनी मर्यादा या लक्ष्मण रेखा है, 
जो भी उसे पार करेगा, उसे उसका दंड भोगना ही होगा, यही अटल विधान है। 
     अतः हम सभी अपनी-अपनी मर्यादा व लक्ष्मण रेखा का पालन करें, तो जो समाज में इतनी अस्त -व्यस्त स्थिति का निर्माण हो रहा है, वह नहीं होगा, और समाज एक अच्छी स्थिति में  खड़ा होगा।
विशेष:-   अगर समाज में सभी अपनी-अपनी मर्यादा व लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखें, तो समाज में अपने आप एक सुखद स्थिति का निर्माण होगा, पर वर्तमान समय में हम सभी अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण करते नजर आ रहे हैं, और उसी का भुगतान 
हमें करना पड़ रहा है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, सवाल जवाब पर, आज हमारे देश की जो परिस्थिति है, 
वहां पर सवाल जवाब करना , यानी देश के खिलाफ हो जाना है, यह जो स्थिति है, यह किसी भी देश के उज्जवल भविष्य के लिये 
ठीक नहीं, कोई भी एक राजनीतिक दल या उस दल द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम, अगर उससे कोई असहमत है, तो वह उनसे सवाल-जवाब कर सके, इसी में प्रजातंत्र की खूबसूरती है, असली प्रजातांत्रिक देश वही है, 
जहां हम सरकार की आलोचना भी कर सके 
वह उसके सही फैसलों की प्रशंसा भी कर सके, उसके सरकार चलाने के तरीकों पर सवाल भी उठा सके, ओर सरकारे जो भी स्थिति हो, देश में उस समय,  वे उनका जवाब भी दे।
       असली प्रजातंत्र वही है, जहां हम अपने वैचारिक मतभेद को भी मुखरता से सामने 
रख सके, निश्चित ही उन सवालों का उद्देश्य 
हमारे देश की आर्थिक ,सामाजिक, राजनीतिक प्रगति से जुड़ा होना चाहिये, यही सच्चे लोकतंत्र की निशानी है, जो भी विपक्ष में है, उसे सरकार की स्वस्थ आलोचना का अधिकार होना ही चाहिए, सवाल जवाब 
जब तक चलते रहेंगे, उनका उत्तर प्राप्त होता रहेगा, इस देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी, जिस दिन आपका सवाल करने का अधिकार आपसे ले लिया जाये, या यह दबाव बनाया जाये, की जो भी वर्तमान सरकारें कर रही है ,उनका समर्थन करें, फिर चाहे उनकी दिशा सही हो अथवा नहीं। 
       क्या वर्तमान समय में कोई भी सरकार है, जो दावा कर सकती है, की सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का स्वरूप ले लिया है, निश्चित ही हम नागरिक भी इसके लिये दोषी है, जो इन बातों से समझौता कर लेते हैं, पर क्या जो भी सरकारे कार्य करती है उनकी कोई जवाबदारी नहीं, जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, या तो अधिकारी का विभाग बदल दिया जाता है,
या कुछ समय के लिये  बर्खास्त कर दिया जाता है, जब तक सरकारी घूस लेने वाले अधिकारी कर्मचारियों पर कठोर कार्यवाही 
नहीं करती, बदलाव आना संभव नहीं, पर यहां भी राजनीतिक दलों के अपने स्वार्थ जुड़े होते हैं, इसलिए कार्यवाही की बजाय बचाव के तरीके ढूंढ लिए जाते हैं। 
विशेष:- किसी भी देश की जनता को प्रजातांत्रिक प्रणाली  में यह अधिकार है, 
वह सवाल जवाब कर सके, और सरकारों का भी यह दायित्व है वह उनका जवाब दे, जब तक यह प्रक्रिया ठीक ढंग से चल रही है, तब तक  प्रजातंत्र सुरक्षित है। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे,  उम्मीद पर, 
उम्मीद यानी आशा, कुछ करने की, कुछ अच्छा होने की, सोचिए अगर उम्मीद ही न हो,
कि हमारा आने वाला कल आज से बेहतर होगा तो हमारे लिये फिर प्रेरणा का कार्य कौन करेगा।
जनता उम्मीद करती है नेता से, नेता उम्मीद करते हैं जनता से, माता-पिता उम्मीद करते हैं बच्चों से, बच्चे उम्मीद करते हैं अपने माता-पिता से, भक्त उम्मीद करते हैं भगवान से,
यानी सब कुछ परिदृश्य उम्मीद पर चल रहा है, तो उम्मीद ही है, जो हमारे सपनों में जान फूंकती है, हमारे प्रयासों को बल प्रदान करती 
है, अध्यापक को छात्रों से उम्मीद होती है, वहीं छात्रों को अध्यापक से, एक राष्ट्र को उम्मीद दूसरे राष्ट्र से, इस प्रकार संपूर्ण विश्व मैं सभी एक दूसरे से उम्मीद लगाए रहते हैं, और वह उम्मीद ही है, जो जीवन ऊर्जा हमें प्रदान करती रहती है, अगर जीवन में उम्मीद ना हो, 
तो फिर जीवन कैसा खाली हो जाएगा, बगैर किसी उम्मीद के हम किस दिशा में जाएंगे,
तो जीवन में उम्मीद का एक बहुत बड़ा योगदान है, वह हमारे सपनों को पुनर्जीवित करती है, उन्हें परवान चढ़ाती है , और इसी उम्मीद में हम भी कलम चलाते रहते हैं, कि किसी को हमारे विचार पढ़ने से कुछ नया प्राप्त होगा, तो इसी उम्मीद के साथ कि आप हमेशा हमारे लेख पढ़ते रहे , और अपनी उम्मीदों को जगाए रखें, उम्मीद है तो सब कुछ है।
विशेष:- हर व्यक्ति को अपने जीवन में कुछ विशेष करने की उम्मीद होती है, और यही उम्मीद से ताकत प्रदान करती है, जीवन में कुछ हासिल करने की, तो उम्मीद से भरपूर रहे, और उम्मीद रखें हमारा भी दिन आएगा। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद


प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, निर्धारण शब्द पर, यह शब्द लगता तो छोटा सा है, 
मगर इसके मायने गंभीर है।
       आज हमारा जो जीवन है,  वह किस प्रकार संचालित होगा, यह निर्धारण क्या हम स्वयं अपने विवेक से करते हैं, यह समाज, 
पुरानी परिपाटी या  विवशता, आर्थिक दबाव , कौन यह निर्धारण करेगा, हमारा जीवन किस दिशा में जाये, आज जो सामाजिक स्थिति है, इसमें हमारे सामने 
आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक परिपाटी को चलाना, स्वयं की उन्नति पर ध्यान देना,
कड़ी प्रतिस्पर्धा, हमारे ऊंचे सपने, समाज का बदलता परिवेश, निरंतर बदलते मूल्य, ऐसे बहुत सारे कारण है, जो हमारे जीवन के
संचालन में , उसका स्वरूप कैसा होगा,
यह निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम इनमें से किसी भी एक कारण को मुख्य नहीं मान सकते, हर एक कारण की 
अपना एक महत्व है, जो निर्धारण में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है, पिछले कुछ समय से समाज में आर्थिक आधार को एक महत्वपूर्ण कारक जरूर माना जा सकता है,
जो हमारे जीवन, पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक मूल्यों व व समाज में हमारे स्थान
का निर्धारण करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण 
कारक के रूप में सामने आता है, आज समाज में आर्थिक पहलू सबसे पहले देखा जाता है, वह उसके सामाजिक स्तर के निर्धारण का सबसे बड़ा पैमाना है।
       इस प्रकार हम देखते हैं, हमारा जीवन
केवल हम तय नहीं कर सकते, उसमें कई महत्वपूर्ण कारण ऐसे हैं, जो इस बात को निर्धारित करने में अपनी अपनी भूमिका 
निभाते हैं, और समाज में हमारी भूमिका 
हम किस प्रकार से बुद्धिमता पूर्वक अपने आप को स्थापित करते हैं, किस प्रकार 
संघर्ष करते हैं,  समाज में हमारी क्या भूमिका होगी, किस प्रकार का हमारा कद होगा, इसका निर्धारण होता है।
        आज संपूर्ण विश्व एक दूसरे के सहयोग से संचालित है, तकनीकी व आर्थिक सहयोग 
के लिए परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है, इस प्रकार संपूर्ण विश्व मैं जो भी आर्थिक, राजनीतिक गतिविधियां है, वह एक दूसरे के 
परस्पर सहयोग पर निर्भर है, विश्व में कोई
एक देश एक तरफा फैसला नहीं कर सकता, 
क्योंकि वह संपूर्ण विश्व से जुड़ा है, अतः इसका निर्धारण करने में विश्व  के समस्त देशो का
सहयोग व समर्थन भी चाहिये।
      इस प्रकार हम पाते हैं निर्धारण जो भी होता है, चाहे वह परिवार में हो, व्यक्तिगत जीवन में हो, देश में हो, विश्व में हो, परस्पर सहयोग की भूमिका सबसे अधिक है, जितना अच्छा समन्वय होगा, उतने बेहतर परिणाम होंगे। 
विशेष:- हमें जीवन में अपनी भूमिका का निर्धारण बहुत सोच समझ कर करना चाहिये,
क्योंकि इस पर हमारी उन्नति किस प्रकार होगी, यह तय होता है, बगैर किसी दबाव के 
स्वतंत्र रूप से हम यह निर्णय करें या निर्धारित करें , हमें किस भूमिका का निर्वाह करना है।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज हम प्रवाह में चर्चा करेंगे, छल पर,
छल, यानी किसी से कपट पूर्ण व्यवहार, 
किसी को धोखा देना, किसी को भी छलना
या धोखा देना मानवीय गरिमा की दृष्टि से भी उचित नहीं, मगर आज समाज में चारों और 
छल का ही वातावरण है, व्यक्ति सच बोलना ही नहीं चाहता, वह छल से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है, जबकि छल से प्राप्त की हुई कोई भी वस्तु, धन या पद अधिक देर तक कायम नहीं रहते, वे उसके हाथ से चले जाते हैं। कभी-कभी तो मनुष्य अपने आप से छल कर बैठता है, वह अपने आप को झूठा दिलासा प्रदान करता है, आगे बढ़ाने के 
 गलत रास्ते चुन लेता है, व पतन के मार्ग की
और चला जाता है, इस प्रकार वह अपने आप से ही छल करता है।
     छली व्यक्ति भले कुछ समय के लिए अपने आप को छल से आगे कर ले, मगर अंततः वह पराजित होता ही है, जब कोई हमें छले तो हमें कैसा लगेगा?   इसीलिए हमें जीवन में छल का प्रयोग नहीं करना चाहिए,
वरना उसका अंतिम परिणाम हमेशा दुखदायी होगा, जो भी हो स्पष्ट कहें, क्योंकि आखिरकार छल पकड़ा ही जाता है, और छली व कपटी व्यक्ति का कोई भी विश्वास नहीं करता, छल हमें अपनी अंतरात्मा में भी 
नैतिक रूप से पतन की ओर ले जाता है।
आप अगर इतिहास में भी देखें, तो छली व्यक्ति अधिकांश परास्त ही हुए हैं, उनका अंतिम हश्र हमेशा दुखद हुआ है, फिर हम क्यों न छल से दूर रहे ।
विशेष:- छल का परिणाम हमेशा ही बुरा होता है, इसलिए किसी को भी न छले, छल का अंतिम परिणाम हमेशा दुखदायी होता है वह हमें नैतिक पतन की और ले जाता है, इससे हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल होती है।
अतः जीवन में छल से दूर रहे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, यात्रा पर, 
यह शब्द सुनने में तो बड़ा छोटा लगता है,
मगर इसके कई मायने हैं, हम सभी का जीवन एक अनूठी यात्रा ही तो है, अपने संपूर्ण जीवन में हम निरंतर एक यात्रा ही तो कर रहे हैं, यात्रा हमारे अपने भीतर की भी हो सकती है, 
जिसे हम आंतरिक यात्रा कह सकते हैं। 
       मनुष्य अपने अनुभव को बढ़ाने के लिए,
जिज्ञासा के कारण अलग-अलग देशों की यात्रा करते हैं, वहां के परिवेश से व संस्कृति से रूबरू होते हैं। हमारी सबकी अपनी-अपनी यात्रा है, और सबके अपने-अपने अनुभव है। 
अपने जिज्ञासु स्वभाव के कारण मनुष्य शुरू से ही यात्रा करता रहा है, ऐसे जिज्ञासु स्वभाव के  कारण मनुष्य ने अंतरिक्ष यात्रा भी कर ली है, यात्रा कई प्रकार की है, धार्मिक यात्रा, आंतरिक यात्रा, अंतरिक्ष यात्रा, व विभिन्न खेल, जो खिलाड़ी खेलते हैं, उनके संबंध में एक देश से दूसरे देश में यात्रा, रेल यात्रा, बस यात्रा, जल यात्रा ऐसे विभिन्न स्वरूप यात्रा के हैं, यानी हमारे जीवन का हर पहलू किसी न किसी यात्रा से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, विभिन्न यात्राएं हमें विभिन्न दृष्टिकोण प्रदान करती है, जीवन के नए आयामों से परिचय कराती है, तो  हम जीवन के विभिन्न यात्रा -पडावो से गुजरे 
व जीवन का आनंद उठाएं। 
    हर यात्रा हमें कुछ सिखाती है, उससे सीखे,
नित्य नूतन यात्रा करते रहे, हमारे जीवन में एक आध्यात्मिक यात्रा भी होती है, जो मैं आंतरिक रहस्यो से परिचय कराती है।
    कुल मिलाकर मेरे कहने का तात्पर्य है, हम अपने जीवन में विभिन्न यात्रा पड़ावों से गुजरते हैं, उनसे सीखे, यात्राओं का आनंद लें।
विशेष:- हम सभी का जीवन विभिन्न यात्राओं का एक समावेश है, हमें विभिन्न यात्राओं से 
जीवन में गुजरना ही होता है, यात्राओं का आनंद ले, उनसे सीखे। यात्रा करते रहे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, भ्रष्टाचार पर, 
हमारे देश में कई सरकारों ने कार्य किया, 
नगर भ्रष्टाचार पर कोई भी सरकार लगाम नहीं लगा सकी, इसका सबसे बड़ा कारण यह है, भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार का रूप ले चुका
है, आप किसी भी सरकारी विभाग में कोई कार्य नियम से करने के लिए जायेंगे, तो भी वहां पर नियम से कार्य होना मुश्किल ही है, 
क्योंकि वहां बीच के लोग जो बैठे हैं, जो इस भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं, उनकी सहायता लिए बगैर हम अपना कोई कार्य करा ही नहीं सकते, सब कुछ नियम पूर्वक होने पर भी
आपको भ्रष्टाचार रूपी देवता पर चढ़ावा तो चढ़ाना हीं पड़ता है।
     विश्व के 180 देशों में भ्रष्टाचार की जो सूची हैं, उसमें भारत का स्थान अभी भी 
96  वे स्थान पर है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार ने देश को भीतर से जर्जर कर रखा है, इसके लिए हम सभी सामूहिक रूप से जवाबदार है, जब तक हम स्वयं इन बातों से समझौता करते रहेंगे, बदलाव संभव नहीं है, जनता जनार्दन ही अगर चाहे तो भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है, किसी भी प्रकार
के भ्रष्टाचार से समझौता न करें, ऐसा प्रण  सभी नागरिक ले ले, तब ही स्थिति में बदलाव आ सकता है, आईये, आज हम यह प्रण करें, 
ना तो स्वयं भ्रष्टाचार करेंगे, ऐसे लोगों का सहयोग करेंगे, अगर यह सब के भीतर भाव जाग उठे, वह ईमानदारी पूर्वक इस पर अमल
हो, तो अब भी तस्वीर बदल सकती है, अगर जनता अपनी पूर्ण इच्छा शक्ति से इस पर अमल करें, तभी यह संभव है। दिन पर दिन नहीं तो भ्रष्टाचार बढ़ता रहेगा, वह हम केवल देखते रहेंगे, जब तक हम आगे बढ़कर इसका मुकाबला नहीं करते, इसे हटाना संभव नहीं।
विशेष:-   जिस देश में भी भ्रष्टाचार होता है, देश भीतर से कमजोर हो जाता है, हमारे अपने देश के प्रति भी नैतिक जवाबदारी है,
वह हमें सचेत रहकर भ्रष्टाचार से मुकाबला
करना होगा, वरना भीतर ही भीतर भ्रष्टाचार 
दीमक की भांति इस देश को खोखला कर देगा , हम सभी का कर्तव्य है, हम जागे, जन जागरण के बिना इसका सफाया होना संभव नहीं। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, अनुभव पर, हम और आप अपने-अपने जीवन में विभिन्न अनुभवों से गुजरते हैं, और वे अनुभव हमें जिंदगी की सीख देते हैं, वह हमें सिखाते हैं, 
कब ,कहां ,कैसा कदम उठाना उपयुक्त है, 
जिंदगी के अनुभव से सभी सीखते हो, ऐसा जरूरी भी नहीं, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति उन अनुभवों से जरूर सबक सिखता है, जो उसे अपने जीवन में प्राप्त हुए, हमारे वृद्धजन, जिनके पास अनुभवों का भंडार होता है, हमें उनसे वार्तालाप करना चाहिए, वह जीवन में  जिन अनुभवों से गुजरे हैं, वह हमें उनसे जानना चाहिए, क्योंकि हम अपने अनुभव से सीखेंगे तो और अधिक समय लगेगा, इससे अच्छा तो यह है, हम अपने बुजुर्गों के अनुभव से सीखे, उनके अनुभव हमारे लिए मार्गदर्शन का कार्य कर सकते हैं, वे जिंदगी में जितने अनुभवों से गुजरे होते हैं, उतने हम नहीं,
क्योंकि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा 
उन अनुभवों का साक्षी रहा है, इसलिए हमें नियमित रूप से उनके संपर्क में रहना चाहिए, जो अपने अनुभवों से व बुजुर्गों के अनुभव से सीखता है, उनसे सबक प्राप्त करता है, 
वह अपने जीवन में ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होता है, जिंदगी के अनुभव वह शिक्षक है, जो हमें जिंदगी को जीने का पाठ पढ़ाते हैं, सबके अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं, मगर उन अनुभवों से हम सीखें।
विशेष:- अनुभव हमें जिंदगी जीना सिखाते हैं,
बशर्ते हम उन अनुभवों से सीखे, बुजुर्ग लोग 
अनुभवों की खान होते हैं, उनसे अपने जीवन में मार्गदर्शन अवश्य लें, जिससे आप अपने जीवन में निरंतर प्रगति की और अग्रसर हो। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, दृष्टिकोण पर, किसी भी विषय, कार्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण किस प्रकार का है, सकारात्मक, 
नकारात्मक या संतुलित, देखा जाये तो पूर्ण सकरात्मक या पूर्ण नकारात्मक, दोनों ही 
दृष्टिकोण की बजाय एक संतुलित दृष्टिकोण या नजरिया हमें किसी कार्य विषय के बारे में
एक सही दृष्टिकोण प्रदान करता है, क्योंकि तब हम केवल सकारात्मक या नकारात्मक 
दोनों ही पहलुओं को जब एक संतुलित दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हम एक बेहतर संभावना को जन्म देते हैं, क्योंकि जब हम दोनों पहलू देखते हैं, तो हम किसी भी कार्य या विषय को लेकर सही मंथन कर सकते हैं,
और जब हमारा नजरिया या दृष्टिकोण 
संतुलन वाला होगा, तो उसके परिणाम भी 
हमें उतने ही बेहतर प्राप्त होंगे।
         जब किसी भी विषय में हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक होगा, तो हम उसके हल के बारे में सोचेंगे, इसलिए निश्चित ही 
हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक दिशा में तो होना ही चाहिये, जब हम खेल के मैदान में उतरते हैं, तो हमें जीत की कल्पना के साथ ही उतरना चाहिये, लेकिन हमें सभी पहलुओं को ध्यान रखना चाहिये, एक किसान भी जब खेती करता है, तो सर्वप्रथम वह जमीन को सुधारता है, ऐसे ही जब भी हम किसी कार्य की शुरुआत करना हो, तो हमें भी हमारी  मनोभूमि को सबसे पहले सुधारना होगा,
उसमें अच्छे विचारों का हमें बीज बोना होगा,
मगर वह बीज भी तभी उत्पन्न होगा, जब जमीन अच्छी होगी, तो सर्वप्रथम तो हमें 
हमारे दृष्टिकोण में यह परिवर्तन लाना चाहिये,
स्थिति चाहे हमारे पक्ष में हो या विपक्ष में, हमें हमेशा एक सकारात्मक रूख के साथ ही उनका सामना करना चाहिये, क्योंकि सकारात्मक विचारधारा ही वह मनोभूमि है,
जहां अच्छे बीज पनप सकते हैं, व जब बीज अच्छे होंगे, जमीन अच्छी होगी, तो फसल तो निश्चित ही अच्छी होगी, मगर अच्छी फसल के लिए भी हमें समय-समय पर खरपतवार को हटाना होगा, तभी फसल श्रेष्ठ होगी। 
       इसी प्रकार किसी कार्य को करते समय भी सकारात्मक दृष्टिकोण से उसे शुरू करें, 
वह समय-समय पर जो नकारात्मकता नाम की खरपतवार आती है, उसे भी प्रयत्न करके हटाते जाए, ताकि हमें श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त हो।
विशेष:-  किसी भी विषय या कार्य के बारे में 
हमारा सकारात्मक दृष्टिकोण ही हमें औरों से अलग दिशा दे सकता है, क्योंकि जब हम सकारात्मक दृष्टि से सोचते हैं, तब हम परिणाम मूलक सोच की और अग्रसर होते हैं,
इसलिए दृष्टिकोण का जीवन में बड़ा ही महत्व है, व हमारा सकारात्मक दृष्टिकोण ही निरंतर हमें आगे की और ले जाता है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे सत्ता पर, 
सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए, सभी को
सत्ता चाहिए, यह एक छोटा सा शब्द है,
मगर इसके मायने बड़े है।
      जिस किसी के पास भी सत्ता आती है,
वह साथ में मद भी लाती है, जो सत्ता पाकर
मद में नहीं आता, वह बुद्धिमान है, मगर 
ऐसा होता नहीं है, कोई भी व्यक्ति जब सत्ता धारण करता है, तब  स्वाभाविक रूप से 
सत्ता का मद उसे आता ही है, जिन बातों के लिए पूर्व में आसीन सत्ताधारियों को कोसता 
था, सत्ता प्राप्ति के बाद वह भी उन्ही राहो पर चल पड़ता है, सत्ता का असर ही कुछ ऐसा है।
सत्ता प्राप्ति के बाद सत्ता का सदुपयोग होना चाहिए, मगर देखने में आता है, सत्ता प्राप्त होने के बाद वह भी अपनी पूर्ववर्ती सत्ताधारियों जैसा ही आचरण करने लगते हैं, 
जिन बातों के लिए उनकी आलोचना करते थे,
अब वह स्वयं भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं, और यह समाज के लिए बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, इसमें बदलाव तभी संभव है, जब स्वच्छ छवि वाले राजनेता, जिन्हें  सत्ता का मोह नहीं है, जो अच्छे कार्य के लिए संकल्पित है, जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हीं लोगों के हाथ में सत्ता 
 रहे, एक कहावत भी है, यथा "राजा तथा प्रजा" यानी जैसा शासक होगा, जैसी सत्ता होगी, उनके जैसा आचरण  होगा, जनता भी उनके ही पदचिन्हो पर चलेगी।
विशेष:- सत्ता का हमेशा सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं, क्योंकि समाज में जैसा शासक संदेश देता है, वह आचरण करता है, जनता भी वैसा ही करती है। सत्ता हमेशा विवेकशील लोगों के हाथों में होना चाहिए।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह में आज चर्चा का विषय है, सदाबहार
अभिनेता धर्मेंद्र जी का स्वर्गवास, 
        अभिनेता धर्मेंद्र ने शुरुआत से ही कड़ी मेहनत की, वे उसे दौर के अभिनेता थे, जब कई नामी सितारे उनके सामने थे, दिलीप कुमार, राज कपूर जैसे दिग्गज अभिनेता उनके सामने थे, उस समय जब शारीरिक गठन की और किसी अभिनेता का इतना ध्यान नहीं था, उन्होंने अपने शरीर पर भी पूरा ध्यान दिया, वे परदे पर बलशाली नजर आते थे, और इसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत थी,
वे अपनी जवानी के दिनों में बहुत ही खूबसूरत नजर आते थे, 
          उनकी फिल्म " फूल और पत्थर" जिसने भी देखी होगी, वह इस बात की गवाही देगा, उस दौर की लोकप्रियअभिनेत्री मीना कुमारी के साथ उनकी इस फिल्म में जोड़ी थी।
       कई अभिनेताओं के सामने होने के बाद भी अपने दमदार अभिनय, खूबसूरती व लगातार मेहनत की बदौलत उन्होंने फिल्मों में शिखर को छुआ, मगर इन सब के बीच उन्होंने अपने मूल व्यक्तित्व को, जो की एक जिंदादिल इंसान होने का था, उसे कभी नहीं गंवाया। 
         फिल्म शोले में जय- वीरू की जोड़ी के रूप में जो ऐतिहासिक फिल्म बनी, वह आज भी उस दौर की यादें ताजा कर देती है, और अपने दौर की बहुत सफलतम फिल्म थी, व आज भी है।
           वे सदाबहार अभिनेता रहे, उन्होंने गंभीर, चुलबुले, रोमांटिक, अल्हड़, आक्रामक 
अपने फिल्मों के सभी किरदारों को बड़ी ही खूबसूरती से निभाया।
          अपने संपूर्ण जीवन में  जो उनकी विशेषता रही, वह यह कि उन्होंने अभिनेता के तौर पर ही नहीं, एक विराट व्यक्तित्व के रूप में अपने आप को जिया। 
    उन्होंने दो विवाह किये, मगर फिर भी दोनों ही परिवारों के बीच सामंजस्य  बनाकर वह चले, उनका  व्यक्तित्व एक ऐसे रूप में हमारे सामने आता है, जो चकाचौंध की दुनिया में भी अपने मूल व्यक्तित्व को बरकरार रख सका, उनकी यही खूबी उन्हें अपने समकालीन अभिनेताओं से अलग एक मुकाम देती है। 
       वे अपनी उम्र के इस पड़ाव पर भी लगातार सक्रिय रहे, और उनकी लगातार सक्रियता ने  ही उन्हें उस पायदान पर पहुंचाया,
जहां से वे  हमेशा अपने चाहने वालों के चहेते बने रहेंगे।
       उन्होंने लगातार सक्रियता पूर्वक जीवन जी कर यह बताया की उम्र एक पड़ाव हो सकती है, मगर जिंदादिली वाला स्वभाव ही 
उनकी ताकत था, इतने बड़े मुकाम पर 
पहुंचने के बाद भी उनकी सरलता, सौम्यता व सादगी, उनका ठेठ ग्रामीण परिवेश, अपनी माटी से अंत तक लगाव उनकी शख्सियत में मानो चार चांद लगा देता है। 
             उनके निधन के साथ ही एक ऐसे सदाबहार अभिनेता कभी अंत हो गया, जो अपने निजी जीवन में भी बडे ही जिंदा दिल रहे, उनका निधन भले ही हो गया, मगर वे अपने चहेते दर्शकों के दिलों पर हमेशा राज करेंगे। 
           उन्हें सादर नमन, एक अभिनेता के रूप में आपने जो प्रसिद्धि हासिल की, लोगों
का स्नेह व प्यार पाया, वह बहुत ही कम लोगों के नसीब में होता है।
       पुनः ऐसे अभिनेता सदियों में होते हैं,
जिनका व्यक्तित्व भी इतना विराट हो, वह हमेशा अपनी माटी से जुड़े रहे, यही उनकी सबसे बड़ी खासियत भी थी, उन्होंने अपने पूरे परिवार को भी एकजूट रखा।
        ऐसे अभिनेता, जो हमेशा याद  रहेंगे,
अलविदा। 
  विशेष:- फिल्मी पर्दे पर ही नहीं, उन्होंने अपने निजी जीवन को भी पूर्ण गरिमा से जिया, बेशक ,उन्होंने दो विवाह किये, मगर दोनों ही रिश्तों को उन्होंने पूर्ण शिद्दत से निभाया, वे  एक शानदार अभिनेता और एक सदाबहार व्यक्तित्व के मालिक थे, सभी दर्शकों की ओर से उन्हें सादर नमन। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, वितरण पर, 
यानी किसी भी वस्तु या साधनों का वितरण
हम किस प्रकार करें, यह बहुत महत्वपूर्ण है। 
और अगर हमें यह सीखना है तो प्रकृति से बड़ा शिक्षक कोई नहीं, प्रकृति हमें सिखाती है की वितरण असमान रूप से न करके सभी के बीच समान रूप से किया जाये, उसकी मिसाल हम सूर्य , पृथ्वी, जल, वायु, आकाश
इन सभी से प्राप्त कर सकते हैं, यह सभी को समान रूप से उपलब्ध है, इनके वितरण में कोई असमानता नहीं है, कोई अमीर- गरीब,
ऊंच-नीच, अपना -पराया ऐसा कोई भी भेद नहीं है, जब प्रकृति ने इतनी सुंदर व्यवस्था हमें प्रदान की है, तो हम उससे यह क्यों नहीं सीखते, मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण उपलब्ध साधनों के वितरण में गड़बड़ी करता है, और असंतुलन को जन्म देता है, मनुष्य अपने स्वार्थ को परे  रख सके, तो बहुत सारी व्यवस्थाएं स्वयं सुचारू रूप से चलने लगेंगी,
जब साधनों के वितरण में असमानता उत्पन्न होती है, तो समाज में रोष उत्पन्न होता है, व
असमान वितरण के कारण सामाजिक संतुलन बिगड़ता है, इसकी जवाबदारी 
निश्चित रूप से सबसे अधिक राजनीतिक लोगों की है, मगर क्या उन्हें चुनकर हम ही लोग नहीं भेजते, तो हमारा चुनाव ऐसे राजनीतिक लोगों का होना चाहिए, जो 
निष्पक्ष व समान वितरण किस प्रकार हो,
वह व्यवस्था बनाने में सहायक हो, न कि
वह असमान वितरण में सहयोगी हो, अच्छी विचारधारा वाले लोगों को चुनने का जो अधिकार हमें प्रजातांत्रिक व्यवस्था ने दिया है,
हम उसका उपयोग सही राजनेताओं को चुनने में करे, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल के हो, मगर उनकी विचारधारा व कार्यशैली अच्छी होनी चाहिए, जो समाज में सही वितरण को , साधनों को किस प्रकार बांटा जाए, ताकि समाज के आधिकाधिक वर्ग तक 
समस्त साधन पहुंच सके, जितना समान रूप से समाज में वितरण होगा, उतना ही समाज
सशक्त होगा, वितरण प्रणाली इस प्रकार विकसित की जाए की जो समाज में पिछड़े व निम्न वर्ग के लोग हैं, वे भी  अपने स्वाभिमान के साथ मुख्यधारा में शामिल हो।
विशेष:- कोई भी समाज या देश उसके नागरिकों से बनता है, किसी भी देश राजनीतिक कार्यक्रम इस प्रकार के होने चाहिए, जो साधनों के समान वितरण की व्यवस्था सुनिश्चित कर सके, तभी समाज व देश सशक्त होगा, व मानवीय मूल्यों की भी
सुरक्षा होगी।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में मेरा विषय है, दिवंगत मशहूर शायर बशीर बद्र, उनकी शायरी की अपनी एक अलग पहचान है, जो जमीन से जुड़ी हुई शायरी की है, साधारण शब्दों में असाधारण बात कह देना, यह उनकी शायरी की विशेषता थी, उनका जाना उर्दू शायरी के लिये व साहित्य प्रेमियों के लिए एक ऐसा खालीपन है, जो कभी भरा नहीं जा सकता। 
       वे शायरी की महफिलों की शान हुआ करते थे, क्योंकि उनके द्वारा लिखी शायरी सीधे दिल को छूती थी, उन्होंने अपने द्वारा लिखी शायरी के द्वारा अवाम  में एक मुकाम हासिल किया था, उनकी शायरी में जीवन की तल्खी को भी उन्हें बड़ी शिद्दत से कहा है, नाराजगी को भी किस प्रकार से शायरी में तब्दील करना, उनकी शायरी रूह को छूने वाली शायरी थी, सीधे  व सरल शब्दों में 
अपनी बात कहने की जो उनकी कला थी, 
उसने उन्हें शायरी के जगत में एक विशिष्ट 
स्थान दिया, 
      व्यक्ति आते हैं, चले जाते हैं, मगर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो समाज पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाते हैं, उन्हें में से एक नाम 
है, शायर बशीर बद्र, वह भले ही शारीरिक रूप से चले गए हो, पर उनकी शायरी जनमानस हमेशा अपनी अमिट प्रभाव को कायम रखेगी, जनमानस क्या चाहता है, इस पर उनकी गहरी पकड़ थी, बड़े अदब से, 
अपने शब्दों को संवारना व उन्हें  अपनी कलम के जरिए लोगों तक पहुंचाना, उनकी शख्सियत हमेशा उनकी शायरी के जरिए 
हमें प्रेरणा देती रहेगी।
    साहित्यिक जगत के लिए यह एक दुःखद घटना है, जिसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो सकती, उन्हें दिल से सलाम।
विशेष:- शायर बशीर बद्र का इस प्रकार जाना जाना   समाज व साहित्य प्रेमियों के लिये एक ऐसा खालीपन है, जो शायद भरा न जा सके,
अपनी शायरी के बलबूते जनमानस पर जो अमिट प्रभाव उन्होंने डाला, वहां सदियों तक याद रखा जाएगा। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
          सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में विषय है जल ही जीवन, 
जल बिना हम अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, जल से ही पेड़ -पौधे, फसलें, जीव जंतु व  हम सभी को जीवन प्राप्त होता है।
      जल से ही हम फसलों को उगाते हैं, उनका पोषण करते हैं, संवर्धन करते हैं, जल के बिना हमारी फसले परिपक्व नहीं होती है,
बिना जल के हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते, हमारा सारा जीवन जल से जुड़ा हुआ है, हमें अपने स्वयं के लिये, पेड़ पौधों के लिए, पशु पक्षियों के लिए जल की आवश्यकता होती है, जल के द्वारा ही हम अपनी फसलों को सिंचित करते हैं, व हमें अनाज, फल व सब्जियों की प्राप्ति होती है।
        हमें अपने स्नान के लिए भी जल की जरूरत होती है, भोजन बनाने के लिए भी जल की जरूरत होती है, वह पीने के लिए भी हमें जल की जरूरत होती है, जल हमारे जीवन में इतना अधिक महत्वपूर्ण है, कि इसके बिना हम कुछ भी कार्य नहीं कर सकते,
पर क्या इतनी मूल्यवान वस्तु की हम कद्र करते हैं, उसे संभालते हैं या उसका अपव्यय करते हैं, जल जैसी महत्वपूर्ण वस्तु, जो हमारे जीवन के हर आयाम में हमें चाहिये, कोई शुभ कार्य भी करना हो, तो भी हमें जल चाहिये, हमें जल से आचमन करना होता है, विभिन्न धार्मिक क्रियाओं में भी जल की आवश्यकता होती है, जल के द्वारा हम पेड़ -पौधों को जीवन प्रदान करते हैं, बदले में वे पेड़- पौधे 
ऑक्सीजन के रूप में हमें जीवन देते हैं, इस प्रकार जल पेड़ पौधों के जीवित रहने में व हमारे जीवन के लिए भी बहुत उपयोगी है, 
अतः हमें जल को बहुत संभाल कर उसका उपयोग करना चाहिये, आने वाला जो समय है, वह जल संकट का हो सकता है, अगर हमने समय रहते जल स्रोतों का संरक्षण नहीं किया, व उसके दोहन में सावधानी नहीं रखी तो आने वाला समय विकराल हो सकता है, 
हमें अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिये, क्योंकि वृक्ष जहां पर अधिक होते हैं, वहां जो 
 बारिश का जल होता है, वह उसे आकर्षित करते हैं, व वहां पर भरपूर वर्षा होती है, इसी प्रकार हमें भूमिगत जल का भी संरक्षण करना चाहिये, वर्षा के जल के संरक्षण के उपाय भी हमें करने चाहिये, क्योंकि जल ही जीवन है। 
विशेष:- हम अपने जीवन की कल्पना बिना जल के नहीं कर सकते, जल हमारे जीवन में 
एक महत्वपूर्ण व जीवन का अनिवार्य अंग है, 
बिना जल के जीवन चल ही नहीं सकता, इसीलिए कहा गया है जल ही जीवन है, तो लिए अपने जीवन की हम रक्षा करें वह प्रणाली कि हम जल का सही उपयोग व संरक्षण करेंगे। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में मेरा विषय है, नीट एग्जाम, यह परीक्षा रद्द की गई है, क्योंकि इसके पेपर लीक हुए, पर  क्या इतने मात्र से सारी व्यवस्था सुधर जायेगी, इस भ्रष्टाचार की जड़ें बड़ी गहरी है, जब तक उन पर प्रहार नहीं किया जायेगा, तब तक इस प्रकार की घटनाएं होती रहेगी, अफसरों की मिली भगत के बगैर 
यह संभव ही नहीं, उनकी पहचान की जाये, व उन पर कड़ी कार्रवाई करते हुए तुरंत बर्खास्त किया जाए व आर्थिक रूप से भी दंडित किया जाये, केवल कुछ समय के लिए उन्हें अपनी जगह से हटा देना इसका इलाज नहीं, 
जब तक दोषियों को चिन्हित करके उन्हें सख्त से सख्त सजा नहीं मिलती, व उनमें भय पैदा नहीं होता, आगे भी ऐसी घटनाएं होती रहेगी, अब थोड़ा विचार करें उन प्रतियोगियो पर, जो दिन रात अथक परिश्रम करके इन परीक्षाओं की तैयारी में जुटे रहते हैं,
परीक्षा हो जाने के बाद इस प्रकार से इसे रद्द कर देना प्रशासन की विफलता ही कही जायेगी , कितनी मुश्किलों से हर व्यक्ति मानसिक व आर्थिक दबावों को झेलते हुए
इन परीक्षाओं की तैयारी में लगा होता है, 
सरकार की प्रशासनिक विफलता के कारण
यह स्थिति उत्पन्न हुई है, यह उन लाखों प्रतियोगियों के साथ कुठाराघात है, मानसिक रूप से फिर से इन परीक्षा की तैयारी करना 
इतना आसान भी नहीं होता, प्रशासनिक विफलता का दंश इन प्रतियोगियों को झेलना पड़ रहा है, जब तक अधिकारियों पर,  जो भी इनमें शामिल है, कड़ी से कड़ी कार्यवाही तुरंत नहीं की जाती, और कार्यवाही भी इतनी कड़ी होनी चाहिये, ताकि अगली बार कोई
ऐसा करने का दु:साहस न करें।
      यह प्रतिभागियों के साथ उनके परिजनों के लिए भी एक कठिन समय है, किस प्रकार 
उनके परिजन उनके लिए साधन जुटाते हैं, वे अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं, यह उनके लिए भी एक पीड़ा है, यह सब कुछ अचानक नहीं हो जाता है, 
इन सबके लिए जो भी दोषी है, उन पर कड़ी कार्यवाही व वह अगली बार ऐसा ना हो, यह भी देखना बहुत जरूरी है।
       निश्चित तौर पर प्रशासनिक विफलता तो है ही, हमारी सामाजिक व्यवस्था की विफलता भी है, ऐसे दोषी लोगों का समाज भी पूर्ण बहिष्कार करें, तभी इन लोगों को इसका एहसास होगा, जब सामाजिक रूप से बहिष्कार होगा, तब ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति में निश्चित ही कमी तो आएगी। 
राज्य सरकार व केद्र सरकार दोनों को इस मामले में ऐसा कठोर कानून बनाना चाहिए,
जिससे दोषी लोग किसी प्रकार से छूट न सके उन्हें दंड मिले ही, प्रशासनिक व सामाजिक दोनों
तरफ से दो तरफा प्रहार जब ऐसे लोगों पर होगा, तभी हम व्यवस्था में परिवर्तन कर सकते हैं। अगली बार ऐसा कुछ ना हो, इस और भी ध्यान देना आवश्यक है।
विशेष:- यह केवल प्रशासनिक विफलता ही नहीं, हमारी सामाजिक विफलता भी है, इस प्रकार के प्रकरणों में में लिप्त अधिकारियों व अन्य लोगों का जब सामाजिक बहिष्कार पूर्ण रूप से होगा, तब लोग ऐसा करने का साहस ही नहीं करेंगे,  प्रशासनिक स्तर पर 
व सामाजिक स्तर पर दोनों जगह से ऐसे 
लोगों को बहिष्कृत किया जाए, तभी तस्वीर बदलेगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
 प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, 4 मई को घोषित चुनाव परिणामों पर, जो परिणाम घोषित हुए हैं, उसमें मतदाताओं नेअलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलो
की जीत का मार्ग प्रशस्त किया है, मतदाताओं की परिपक्वता दिखी है, इसमें एक चीज बिल्कुल साफ हुई है, जो भी सत्ताधारी दल हैं,
वह अगर सही तरीके से काम करते हैं तो ही सत्ता में वापस आते हैं, जहां असम में जनता ने सत्ताधारी दल पर विश्वास जताया है, वह पांडिचेरी में भी सत्ताधारी दल जीता है, अन्य तीन राज्यों में सत्ताधारी दल सुशासन देने में विफल रहा, व जनता ने सत्ताधारी दल को  हराया है, तमिलनाडु में तो नई बनी पार्टी बहुमत के लगभग करीब हैं, यह लोकतंत्र में हमारी मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाता है, कि अगर उन्हें कहीं अच्छी संभावना नजर आती है, तो वह नए दलों को भी सत्ता प्रदान करने मे कोई चूक नहीं करते, इन चुनाव परिणामों ने एक एक बात तो यह साबित की है , जो भी राजनीतिक दल एकजुट होकर लड़े हैं, जिनका प्रबंधन अच्छा रहा है, वह विजयी  रहे हैं, केरल राज्य में कांग्रेस वाले गठबंधन की वापसी इसका उदाहरण है, वहीं कांग्रेस
असम और पश्चिम बंगाल में विफल रही है, 
वहीं तमिलनाडु में भी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सकी, जो भी दल प्रतिबद्ध होकर लड़े हैं,
उन्हें अच्छे परिणामों की प्राप्ति हुई हैं, खासकर इन चुनावो से यह संदेश गया है कोई भी राजनीति में अपराजेय नहीं है, समय आने पर मतदाता सबको सबक सीखा  ही देते हैं।
मतदाता अपने विवेक का पूर्ण इस्तेमाल करते हैं, यही भारतीय लोकतंत्र को और मजबूत बनाता है, यहां आज भी मतदाता राजा है,
यहां लोकतंत्र की जड़े गहरी एवं मजबूत है।
पुनः भारतीय मतदाताओं का विवेक से चयन करने के लिये आभार, एक जगह तमिलनाडु में नई राजनीति पार्टी को पूरा मौका देना, दूसरी और ममता बनर्जी की पराजय, केरल में कांग्रेस की वापसी, यह सब मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाते हैं, उन्होंने हर जगह स्थानीय तौर पर क्या अधिक ज्यादा जरूरी है उसे महत्व प्रदान किया।
विशेष:- भारतीय राजनीति एवं लोकतंत्र में 
व्यक्तिगत विशेषताएं भी लोगों को प्रभावित 
करती है, यह तमिलनाडु में विजयन का उदय दर्शाता है, लोकतंत्र और अधिक परिपक्व हो,
मतदाता और सजगता से निर्णय लें, यही उम्मीद। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज काफी दिनों बाद आपसे फिर रूबरू हो रहा हूं,
आज का मेरा विषय है, राजनीति, खासकर भारतीय राजनीति, आज पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने 
वाले हैं, संपूर्ण भारतीय जनमानस जो भारतीय राजनीति में रुचि रखते हैं, वे बड़ी उत्सुकता से परिणामों का इंतजार कर रहे हैं, 
पश्चिम बंगाल की और सब की निगाह सबसे अधिक होगी, वहां फिर ममता बनर्जी अपना जलवा बरकरार रखती है या फिर भारतीय जनता पार्टी की कोशिशें कामयाब होती है,
यह देखना बड़ा दिलचस्प रहेगा, पिछली बार भी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में लगा दी थी, पर वे ममता बनर्जी का विजय रथ नहीं रोक पाये, इस बार मुकाबला अधिक कड़ा लग रहा है, मगर जितना बंपर मतदान हुआ है, वह आखिरकार किस पक्ष में गया है, यह तो परिणाम ही तय करेंगे। 
         अगर ममता बनर्जी के पक्ष में मतदान हुआ, वे पुनः राज्य की मुख्यमंत्री बनती हैं,
तो विपक्षी दलों में भी उनका कद बढ़ेगा, इसके विपरीत अगर भारतीय जनता पार्टी 
कामयाब होती है, तो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के कद में अभिवृद्धि होगी।
        असम में भी मुकाबला बड़ा दिलचस्प है,
अगर वहां फिर भारतीय जनता पार्टी जीती तो
 मुख्यमंत्री हेमंत विश्वा का कद बढ़ेगा, वहीं अगर कांग्रेस जीती तरुण गोगोई का कद बढ़ेगा, मगर अभी तक संभावना भारतीय जनता पार्टी के जीतने की ही नजर आ रही है। 
    अब हम चलते हैं केरल की ओर, वहां पर अगर वाम मोर्चा जीतता है, तो यह उसकी नीतियों की जीत होगी, पर इस बार रुझान वहां कांग्रेस वाले गठबंधन के जीतने की नजर आ रहे हैं, अगर ऐसा होता है तो यह कांग्रेस पार्टी के लिये संजीवनी का काम करेगा,
देखते हैं मतदाता वर्तमान वाम मोर्चा की सरकार के काम से संतुष्ट है अथवा नहीं, 
यह चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे, फिर भी इस बार रुझान कांग्रेस वाले गठबंधन की जीत के अधिक नजर आते हैं। 
    अब हम बात करते हैं तमिलनाडु की, यहां द्रमुक  की सरकार है, यहां मुख्य दल दो ही है, दृमुक व अन्ना द्रमुक , बाकी दल  इनसे संयोजन करके ही वहां चुनाव लड़ते हैं, वहां पर अभिनेता विजयन की नई पार्टी भी कुछ प्रभाव डाल सकती है। यहां इस बार  अन्ना द्रमुक वाले गठबंधन की जीत के अधिक आसान नजर आ रहे हैं, यहां  का भी मुकाबला बड़ा दिलचस्प रहेगा।
     केंद्र शासित पांडिचेरी में भी चुनाव हो रहे हैं, यहां अभी भाजपा का शासन है, देखते हैं यहां ऊंट किस करवट बैठता है। यहां भी निश्चित रुझान किसी भी पार्टी के पक्ष में नजर नहीं आते।
     पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजा भारतीय राजनीति की दिशा को तय करेंगे, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी व तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल यह सभी को आईना बताने वाले होंगे , कि उनके कद में अभिवृद्धि हुई है या वे पीछे की और आये हैं।
यह मतदाताओं की परिपक्वता को भी बतायेंगे।
विशेष:-भारतीय राजनीति में हमेशा व्यक्तित्व के प्रति भी लगाव रहा है, उससे भी भारतीय राजनीति में मतदाताओं का रुख तय होता है,
मगर अब मतदाताओं को और अधिक परिपक्वता दिखाने की जरूरत है, जहां भी मूल विषयों पर आधारित मुद्दों पर मतदान करें, तभी भारतीय राजनीति में मतदाताओं की सही भूमिका तय होगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     आज का सामाजिक परिवेश किस प्रकार का निर्मित हुआ है, जहां पर युवा पीढ़ी के अपने सपने है, वे केवल भौतिकता की ओर आकर्षित है, शिष्टाचार व मूल्यों की सौगात, 
जिस समाज के द्वारा दी जाती है, वह भी  भ्रमित है।
      क्योंकि आज से 10 -15 वर्ष पूर्व का समाज हम देखें, तो नैतिक मूल्यों की कीमत थी, व्यक्ति धन किस प्रकार से कमा रहा है,
यह बहुत महत्वपूर्ण था। 
         विगत वर्षों में जो सामाजिक मूल्यों का पतन हुआ है, उसके लिये सभी वर्ग कुछ न कुछ रुप में समान दोषी है, इस स्थिति में सुधार किस प्रकार लाया जाया, यह गहन चिंतन का विषय है। 
       व्यक्तित्व विकास की शिक्षा हमें स्वयं उन जीवन मूल्यों पर जीना होती है, जिनकी हम अन्य व्यक्ति या ,परिवार से, समाज से अपेक्षा रखते हैं।
      सर्वप्रथम हमें स्वयं अपने ऊपर भी गौर करना होगा, जो सामान्यतः हम नहीं करते, 
दूसरे के दोषो को देखना सबसे आसान कार्य है, पर स्वयं के दोषों पर हमारी दृष्टि नहीं जाती।
       क्षरण मूल्यों का सभी और हुआ है, मात्र भौतिक उन्नति की और अगर समाज अग्रसर हो जाता है, तो जीवन मूल्यों की कीमत कम हो जाती है। 
        हमें संतुलित रूप से भौतिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु दृढ़ रहना होगा, पुरानी सभी परंपरा ठीक हो, व नई सारी गलत,
यह कहना भी उचित नहीं, कहां आवश्यक सुधार की आवश्यकता है, यह भी हमें देखना होगा। सब पुराना ठीक, सब नया खराब, 
इन दोनों के मध्य का का चुनाव, इन दोनों में जो उचित हो, समयानुकूल हो, उसे हम ग्रहण करे।
      वर्तमान की चुनौतियां और कठिन है, जब सब और से अनेक विचार चल रहे हो, तब मानसिक रूप से स्थिर चित्त होकर हमें हल तलाशना होगा, एक लेखक के नाते मैंने यह महसूस किया है कि नई पीढ़ी गैर- जवाबदार नहीं है, वरन वह अपने लक्ष्य के प्रति पहले से भी अधिक सजग है, मगर समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व है, यह बोध हमें नई पीढ़ी को अवश्य कराना चाहिये।
         समाज में कई प्रकार के विभिन्न मत-मतांतर, अनेक विचारधाराएं, अनेकों प्रकार की विविधता, इन सब में सामंजस्य  किस प्रकार हम वर्तमान समय में करें, यह बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य है, मगर यह किया जाना चाहिये।
     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है, अपने स्वयं के, परिवार के, समाज के उत्तरदायित्वों को किस प्रकार से निभाया जाये, यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। 
     मानवीय चेतना को अगर हम सकारात्मक  दिशा या चिंतन न दे सके, तो आने वाली भावी पीढ़ियां हमें इस बात के लिए उत्तरदायी ठहराएंगी  कि हममें इतनी समझ  नहीं थी, पर आप लोग तो समझदार व अनुभवी  थे। 
       आपने हमें सही मार्ग चयन हेतु प्रेरित क्यों नहीं किया। 
     हम अपने सीमित संसाधनों द्वारा भी, उनके कुशल उपयोग द्वारा सामाजिकता को, 
दायित्वों को निभा सकते हैं।
    संपूर्ण रूप से नई पीढ़ी को जवाब देह मानना अपनी जवाबदारी से चूकना है, उन्हें आवश्यकता व अधिकता का अंतर समझाने का मूल दायित्व हमारी वर्तमान पीढ़ी का है, जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते।
        साथ ही युवा साथियों से भी मेरी विनम्र अपील है, बुजुर्गों को कुछ समय अवश्य दें, 
उनके अनुभव आपके काम ही आयेंगे, उन्होंने काफी समय लोगों के बीच में जीवन बिताया है, जितनी गहरी समझ उनकी है, उतनी नई पीढ़ी की अभी नहीं, उनकी हर बात को महत्वहीन न माने, बुजुर्गों का अनुभव युवा पीढ़ी का जोश यह दोनों ही समाज के लिए एक सकारात्मकता का निर्माण करेंगे, तालमेल का जिम्मा निश्चित तौर से अनुभवी व्यक्ति का ही है, साथी बुजुर्गों से भी निवेदन 
वे भी युवा पीढ़ी के पक्ष को समझें, वर्तमान समय में तालमेल बहुत ही आवश्यक है। 
विशेष:- वर्तमान सामाजिक परिवेश अत्यंत ही विचित्र है, एक तरफ समाज में के अच्छे लोग हैं, जो निरंतर प्रयासरत हैं, दूसरी और कुछ लोग हैं, जो मात्र निंदा ही करते हैं, तो जो सामंजस्य बिठाने वाले लोग हैं, वह निश्चित ही श्रेष्ठ है, अत्यधिक महत्वाकांक्षा व अंतहीन दौड़, इनमें से हमें क्या चुनना है?  पुरातन व वर्तमान दोनों का आकलन  आवश्यक है,
हमारा वर्तमान हमारे कदम के अतिरिक्त 
आसपास के घटना चक्रों से भी प्रभावित तो होता है, पर आखिरकार चयन हमें ही करना होता है, हम क्या चाहते है?
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
     मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा है, जब वह अपना सफर करता है, तो उसे सर्वप्रथम वह परिवार, जिसमें वह पला बढ़ा, उसके पारिवारिक संस्कार, जो उसे प्राप्त हुए, उसकी परवरिश, उसके बाद उसका स्वयं का अपना
संघर्ष, यह सब उसकी जिंदगी में अनिवार्य आते ही है।
              इन सभी के बीच में परिवार की मान्यताएं, सामाजिक मान्यताएं, इन सबके बीच में व्यक्ति को उसकी नैसर्गिक  ऊर्जा जो प्राप्त हुई, परमात्मा से, वह या तो क्षीण होगी 
या उसमें वृद्धि होगी, अगर ऊर्जा क्षीण होती
हैं, तो निश्चित ही उसकी दिशा जिधर वह जा रहा है, सही नहीं है, और अगर उस ऊर्जा में अभिवृद्धि हुई है, तो वह सही दिशा की और जा रहा है। सवाल यह है कि हम अपने जीवन में इस सकारात्मकता का पता किस प्रकार करें , तो अपने आप को जांचे, अपना संपूर्ण जीवन आपने मातृ भोग-विलास में ही बिता दिया है, या अपने जीवन का इससे हटकर कुछ अलग उद्देश्य आपने तय किया है, जीवन की इस यात्रा में आपके सामने निश्चित ही कई पड़ाव आते हैं, तब आपको फैसला करना ही होते हैं, अन्य कोई भी उपाय नहीं होता, उस परिस्थिति में आप क्या फैसला कर रहे हैं, वह स्वविवेक, तात्कालिक परिस्थितियां, अनुकूलता, प्रतिकूलता सब कुछ हो सकता है, इस यात्रा में आपने जो निर्णय लिये है, वह दूरगामी  परिणामों को देखकर लिये है अथवा नहीं, अगर आपने अपने फैसले के दूरगामी परिणामों पर विचार किया है, तो निश्चित ही आपके फैसले सही होंगे, किसी भी निर्णय को लेने का बाद में क्या परिणाम उपस्थित होगा, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
         इसमें सबसे अधिक मूल्य आपके पारिवारिक संस्कारों का है, उन संस्कारों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका इसमें होती है, वर्तमान परिस्थितियों जो भी अच्छी या बुरी निर्मित हुई है, वह हमारे अपने फैसलों का ही परिणाम है, आगे भी आप जो फैसला गहरी समझ के आधार पर लेंगे, वह अधिकतम सही दिशा की और ही होगा। 
     हमारा जीवन केवल हमारा ना होकर परिवार ,समाज दोनों से जुड़ा हुआ है, हम परिवार व समाज की मात्र एक  इकाई है,
इसलिए हमारे फैसलों का दूरगामी परिणाम हमारे परिवार व समाज पर पड़ता ही है।
     हमें हमेशा कोई भी फैसला लेते समय तात्कालिक परिस्थितियां व दुरगामी  परिणाम 
दोनों का ही चिंतन करना चाहिये,  तात्कालिक व दीर्घकालिक फैसला आप अपने जीवन के अनुभव के आधार पर भी ले सकते हैं। 
      समयानुकूल निर्णय आपने कितने बुद्धिमत्ता पूर्वक लिये हैं, वही आपके जीवन के परिणाम बदलेगा। जो भी व्यक्ति अपने जीवन की शुरुआत में सही दिशा में संघर्ष करता है, वह अपनी बाद का समय सुखपूर्वक बिताता है, हमारे इसी जीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म या तो हमें ऊपर उठाते हैं या नीचे गिराते हैं, कोई अन्य इसके लिए कभी दोषी नहीं हो सकता। 
       अपनी दैनिक दिनचर्या का स्वयं आकलन अवश्य करते रहे, बिना किसी सोच विचार के जीवन रूपी नौका किधर जायेगी,
पता नहीं, अगर आपको दिशाबोध या ज्ञान नहीं हो रहा तो आप पुरानी कहावतों  का सहारा भी ले सकते हैं, क्योंकि वे काफी अनुभव के बाद ही बनाई हुई होती है, अथवा अनुभवी व्यक्तियों का मार्गदर्शन ले, किसी गुरु या ग्रंथ का आश्रय ले, स्वयं चिंतन भी करते रहे, जीवन को सही मूल्यों के साथ जीना, भले ही थोड़ी तात्कालिक परेशानी हमें उठानी पड़े, यही हमारे जीवन में सबसे अधिक आवश्यक है। 
विशेष:- हमारा, आपका सभी का जीवन एक यात्रा ही तो है, इस यात्रा में हमें कई साथी मिलेंगे, बिछड़ेंगे, पर अपना स्वयं का निर्णय, 
हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, यह हम स्वयं ही तय करते हैं, जिस प्रकार का हमारा सोच विचार होगा, उसी प्रकार की हमारी रणनीति भी होगी। जीवन कैसा जीना है, यह हमारे फैसलों पर ही निर्भर है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
            उम्मीद है आप सभी को मेरी यह वैचारिक शैली व यात्रा पसंद आ रही होगी,
विविध विषयों पर जो भी मेरी अनुभूति रही है,
उसे कलमबद्ध करने का एक छोटा सा प्रयास है ।
        आज का हमारा विषय है, सेहत, यानी व्यक्ति के पास सब साधन हो, पर सेहत अच्छी न हो, तो वह सब साधन भी फिर उसे व्यर्थ प्रतीत होते हैं, अच्छी सेहत के लिए हमें शारीरिक के साथ ही मानसिक ऊर्जा को भी बदलने का प्रयास करना चाहिये, क्योंकि शरीर की सेहत व मन की सेहत एक ही सिक्के के दोनों पहलू है, एक पुरानी कहावत भी है, " मन चंगा, तो कठौती में गंगा", यह केवल मात्र कहावत नहीं है, यह जीवन का असल सूत्र है, जो एक कहावत के माध्यम से हमें सारी बात बताता है। 
       और उद्धरण  हम लेते हैं, तो पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख हाथ में माया, तीजा सुख प्रभु की छाया, तो यहां भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, हमारे पास सबसे पहले अच्छा स्वास्थ्य हो, फिर भौतिक सुख सुविधा भी हो, तो प्रभु की कृपा तो अपने आप ही प्राप्त हो जाती है।
         सर्वप्रथम सेहत अगर हमारी अच्छी है, 
तो हम स्वयं तो भीतर- बाहर से ऊर्जावान होंगे, साथ ही भौतिक संसाधनों का हम उपयोग करने में समर्थ होंगे, फिर तीसरा जो सुख है, वह परमपिता की, ईश्वर की अनुकंपा, यह तीन किसी भी व्यक्ति के जीवन में है, तो मानो वह स्वर्ग में ही है। 
      अगर सेहत अच्छी है, तो आप अच्छा महसूस करेंगे, साथ ही भौतिक साधन पास में होने से आपको सांसारिक चिंता भी नहीं होगी,
तब इन दोनों के साथ तीसरा जो सेहत व मानसिक सेहत का राज है, इन दोनों के साथ है ,उस परमपिता परमेश्वर की कृपा।
      यह मेरी नजर में त्रिवेणी स्नान ही है, अगर यह तीन बातें किसी के भी जीवन में है, 
तो वह मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों ही प्रकार से समृद्ध है। 
         आंतरिक व बाह्य दोनों प्रकार की समृद्धि किसी के पास हो, तो फिर उसे ईश्वर की कृपा तो प्राप्त है ही, और इसके लिए हमें उन परमपिता का कृतज्ञ होना चाहिये, प्रभु का धन्यवाद, जिन्होंने हमें मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों प्रकार से समृद्ध किया।
          यह त्रिवेणी स्नान ही है, जब इन तीनों का संगम जीवन में हो, तो फिर मनुष्य को और क्या चाहिए? 
         यही प्रार्थना है, आंतरिक समृद्धि ही हमें बाह्य समृद्धि प्रदान करती है, वस्तुतः यह एक ही सिक्के के दो पहलू है। 
         आज हमें भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, वह हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, पहले जितनी कारे नहीं थी, सभी के पास, 
अधिकतम लोगों के पास यह संसाधन उपलब्ध है। 
          मगर अच्छी सेहत इन सभी संसाधनों से ऊपर है, सेहत हमारी अगर अच्छी है, तभी हम बाकी सभी का जीवन में आनंद उठा सकते हैं, तो फिर आप क्या सोच रहे हैं? 
आज से ही इस त्रिवेणी में स्नान करना प्रारंभ करिये, मानसिक, शारीरिक व भौतिक, यह भी एक त्रिवेणी ही है। 
विशेष:- हम सभी के लिए अच्छी सेहत का मतलब केवल शारीरिक सेहत न होकर मानसिक भी हो, मानसिक व शारीरिक दोनों ही सेहत आवश्यक भी है, वह एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू है, जो हमारे जीवन में 
अगर संतुलन के रूप में है, तो तीसरा सुख प्रभु की कृपा हमारे जीवन में है ही, उनका नित्य सुमिरन उनकी अनन्य कृपा को हम याद करते रहे। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।