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प्रिय पाठक गण,
सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे धैर्य जीवन का अंग, हम सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव, मान-अपमान, जय पराजय सभी आते ही हैं।
       ऐसा कोई मनुष्य नहीं, इसके जीवन में
संघर्ष ना रहा हो, जीवन का शुरुआती संघर्ष आपको आगे बढ़ाता है, धैर्य पूर्वक अपनी जीवन यात्रा को पूर्ण करें, उम्र के विविध पड़ाव अलग-अलग संकेत आपको प्रदान करते हैं।
   जैसे-जैसे आपकी उमर धीरे-धीरे बढ़ती है, मगर जीवन ऊर्जा घटती जाती है।
       अपने अनुभव से सीखे, वह धैर्य को हमेशा अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना ले। जब भी कोई निर्णय करें, सोच समझकर करें, परिदृश्य को पूर्ण ईमानदारी व धैर्य पूर्वक समझे, फिर कोई भी फैसला करें, 
जीवन में कई बार आप जो चाहते हैं, वह नहीं होता, इसके बाद भी अपना धैर्य बनाए रखे,
विपरीत समय में अगर आप धैर्य बनाए रखेंगे 
तो जीवन की कई उलझनों से आप बच सकते हैं, निर्णय करते समय अगर आप धैर्य पूर्वक चीजों को समझते हैं, तो यह आपके साथ ही
आपके साथ जो भी है, उन्हें भी मुश्किलों से उबरने में सहयोग प्राप्त होगा, जब आप धैर्य धारण करते हैं, तो कई चीजे स्वत: सुलझ जाती है।
     कोई भी मामला हो, जब आपके भीतर आंतरिक धैर्यता का गुण अगर आपने विकसित कर लिया है, तो आप उसे विषय से संबंधित जो भी बातें हैं, उन्हें ठीक ढंग से समझ सकते हैं, और उनका निराकरण निकाल सकते हैं, निराकरण करते समय आपका धैर्य व सूझबूझ दोनों ही काम आते हैं, निरंतर धैर्य धारण करने से आपके भीतर ऐसी क्षमता विकसित हो जाती है, जिससे आप स्थितियों को समझ कर फिर अपना कदम उठा सकते हैं। 
      इस प्रकार समस्या उत्पन्न होने पर हम निराकरण कर सकते हैं, समस्या कोई भी हो, 
सही ढंग से अगर हम समझे तो उसका निराकरण संभव है, किसी भी समस्या में आपकी संवाद की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है, आपसी संवाद द्वारा हम गलत फैमिलायों को दूर कर सकते हैं, और चीजों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
        जब हम धैर्यपूर्वक चीजों को समझते हैं,
तो हमारे पास उन सब बातों का जो हम करना चाहते हैं, रास्ता खुल जाता है, सभी पहलुओं को हम समझ पाते हैं, जीवन में 
सफलता व असफलता, दोनों ही आती है। 
           असफलता हमें और अधिक सिखाती है, हमारी स्वयं की क्षमता को और बेहतर करने की हमें शक्ति प्रदान करती है।
        जितना अधिक धैर्य हम में होगा, उतना ही हम बातों को ध्यान पूर्वक समझ कर उन्हें कर सकते हैं, आपसी संबंधों को भी हम एक मजबूत आधार प्रदान कर सकते है।
     जब हम पूर्णतया पारदर्शिता से अपनी बातों को रखते हैं, तो वह पारदर्शिता हमें सिखाती है, हम कैसे बातों को बेहतर ढंग से करें। 
        धैर्य वह कला है, जो हमारी बातों को हम कैसे पेश करें, उनका समाधान किस प्रकार निकाले, वह क्षमता हममें विकसित करती है।
विशेष:- धैर्य हमारा व्यक्तिगत गुण है, वह प्रतिकूल परिस्थितियों अगर उत्पन्न हो तो, 
उनका कैसे हम सामना करें, इसकी क्षमता हमें प्रदान करती है, निरंतर अगर हम धेर्य से कार्य करें, तो ऐसी जीवन की कोई भी समस्या नहीं है, जिसे हम सुलझा न सके। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      आज प्रवाह में मद् भागवत गीता का 
वर्तमान समय में क्या महत्व हैं,  इस बात पर हम चर्चा करेंगे। 
     भगवान श्रीकृष्ण के श्री मुख से निकली वाणी आज तो और भी प्रासंगिक है, यह आपको बताती है, कर्म के निर्धारण के बारे में।
      निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देती है, व अपने-अपने कर्म क्षेत्र में आप पूर्ण ईमानदारी से कार्यरत रहें, यह बोध प्रदान करती है।
     अपना जो भी कर्म हम कर रहे हैं, वह छोटा या बड़ा न होकर हम कितनी निष्ठा पूर्वक उस  कर्म को करते हैं, यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है। 
     इसका सरल निरूपण यह है, जो भी व्यक्ति जिस भी कार्य को कर रहा है, वह जितनी निष्ठा व लगन से उस कार्य को करेगा,
निश्चित ही उतने ही बेहतर परिणाम उसे प्राप्त  होंगे, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
    कर्म हमारा कैसा हो? जो भी कर्म हम करें,
उसका आधार केवल भौतिक मूल्य न होकर 
उसे कर्म को पूर्ण समर्पण भाव से करना, यह अधिक मूल्यवान है, इससे क्या होगा? आप उस कर्म को श्रृद्धा व रुचि पूर्ण तरीके से करेंगे तो उस कर्म में एक निखार आयेगा।
       श्रद्धा सहित किया गया कोई भी कार्य 
अपना प्रभाव बतलाता ही है, कर्म तो हमें करना ही है, पर जितनी निष्ठा पूर्वक हम अपना कार्य करेंगे, परिणाम बेहतर होते जायेंगे।
    मान लीजिये हम व्यापार करते हैं, तो हमारा व्यापार निष्ठा पूर्वक व ग्राहक की पूर्ण संतुष्टि होना चाहिये, अगर हम राजनेता है, 
तो समाज में किस प्रकार समाज की उत्तरोत्तर उन्नति हो,
समस्याओं का समाधान किस प्रकार कर सके सके, यह मूल भाव हमारे कर्म का होना चाहिये।
और अगर हम अध्यापक हैं, तो छात्र का सर्वांगीण विकास, यानी उसके व्यक्तित्व में 
क्या खूबियां हैं, उन्हें बताना व उसे उस  और प्रेरित करना, स्वयं का एक मुकाम समाज में बनाना व किस प्रकार सामाजिक व्यवस्था 
का वह अंग बने, ताकि जिससे सामाजिकता को और बढ़ावा मिले, यह उद्देश्य एक अध्यापक का होना चाहिये।
कुल मिलाकर जिस भी व्यक्ति का जो मूल कर्म है, पूर्ण ईमानदारी पूर्वक अगर हम समाज में करते हैं, तो बहुत सी समस्याएं अपने आप ही हल हो जायेगी।
        अगर ऐसा कोई भी अपने  जीवन में करता है, तो उसे परिणाम निश्चित ही अच्छे ही प्राप्त होंगे, क्योंकि किसी भी कर्म को आप जितनी निष्ठा से करते हैं, परिणाम उतने बेहतर होते जाते हैं।
     श्री भगवत गीता हमें यही सिखाती है, हम अपने कर्म को निष्ठा पूर्वक करें, जो भी कर्म हमने लिया है, या हमें प्राप्त हुआ है, ईमानदारी, निष्ठा व प्रसन्नता पूर्वक अपने कर्म को करें, निष्काम कर्म योग का यही सिद्धांत गीता हमें बताती है।
    जितनी सरल व्याख्या गीता जी में है, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, अपने कर्म को करिये, न कि दूसरे के कर्म की ओर हम देखें,
आपका जो भी कर्म है, वह पूर्ण ईमानदारी से करिये, यही गीता का मूल मंत्र है। 
विशेष:- अपने नित्य कर्म को पूर्ण ईमानदारी   व निष्ठा पूर्वक करना, इतना सरल संदेश हमें गीता जी प्रदान कर रही है, यह सभी के लिये उपयोगी व कालजयी ग्रंथ है, जिसे अगर हम सही तरीके से समझ जाये, तो फिर संशय की कोई बात ही नहीं उत्पन्न होती, अपने अपने कर्म को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से करने का संदेश गीता जी हमें प्रदान करती है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
            उम्मीद है आप सभी को मेरी यह वैचारिक शैली व यात्रा पसंद आ रही होगी,
विविध विषयों पर जो भी मेरी अनुभूति रही है,
उसे कलमबद्ध करने का एक छोटा सा प्रयास है ।
        आज का हमारा विषय है, सेहत, यानी व्यक्ति के पास सब साधन हो, पर सेहत अच्छी न हो, तो वह सब साधन भी फिर उसे व्यर्थ प्रतीत होते हैं, अच्छी सेहत के लिए हमें शारीरिक के साथ ही मानसिक ऊर्जा को भी बदलने का प्रयास करना चाहिये, क्योंकि शरीर की सेहत व मन की सेहत एक ही सिक्के के दोनों पहलू है, एक पुरानी कहावत भी है, " मन चंगा, तो कठौती में गंगा", यह केवल मात्र कहावत नहीं है, यह जीवन का असल सूत्र है, जो एक कहावत के माध्यम से हमें सारी बात बताता है। 
       और उद्धरण  हम लेते हैं, तो पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख हाथ में माया, तीजा सुख प्रभु की छाया, तो यहां भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, हमारे पास सबसे पहले अच्छा स्वास्थ्य हो, फिर भौतिक सुख सुविधा भी हो, तो प्रभु की कृपा तो अपने आप ही प्राप्त हो जाती है।
         सर्वप्रथम सेहत अगर हमारी अच्छी है, 
तो हम स्वयं तो भीतर- बाहर से ऊर्जावान होंगे, साथ ही भौतिक संसाधनों का हम उपयोग करने में समर्थ होंगे, फिर तीसरा जो सुख है, वह परमपिता की, ईश्वर की अनुकंपा, यह तीन किसी भी व्यक्ति के जीवन में है, तो मानो वह स्वर्ग में ही है। 
      अगर सेहत अच्छी है, तो आप अच्छा महसूस करेंगे, साथ ही भौतिक साधन पास में होने से आपको सांसारिक चिंता भी नहीं होगी,
तब इन दोनों के साथ तीसरा जो सेहत व मानसिक सेहत का राज है, इन दोनों के साथ है ,उस परमपिता परमेश्वर की कृपा।
      यह मेरी नजर में त्रिवेणी स्नान ही है, अगर यह तीन बातें किसी के भी जीवन में है, 
तो वह मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों ही प्रकार से समृद्ध है। 
         आंतरिक व बाह्य दोनों प्रकार की समृद्धि किसी के पास हो, तो फिर उसे ईश्वर की कृपा तो प्राप्त है ही, और इसके लिए हमें उन परमपिता का कृतज्ञ होना चाहिये, प्रभु का धन्यवाद, जिन्होंने हमें मानसिक, शारीरिक व भौतिक तीनों प्रकार से समृद्ध किया।
          यह त्रिवेणी स्नान ही है, जब इन तीनों का संगम जीवन में हो, तो फिर मनुष्य को और क्या चाहिए? 
         यही प्रार्थना है, आंतरिक समृद्धि ही हमें बाह्य समृद्धि प्रदान करती है, वस्तुतः यह एक ही सिक्के के दो पहलू है। 
         आज हमें भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, वह हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, पहले जितनी कारे नहीं थी, सभी के पास, 
अधिकतम लोगों के पास यह संसाधन उपलब्ध है। 
          मगर अच्छी सेहत इन सभी संसाधनों से ऊपर है, सेहत हमारी अगर अच्छी है, तभी हम बाकी सभी का जीवन में आनंद उठा सकते हैं, तो फिर आप क्या सोच रहे हैं? 
आज से ही इस त्रिवेणी में स्नान करना प्रारंभ करिये, मानसिक, शारीरिक व भौतिक, यह भी एक त्रिवेणी ही है। 
विशेष:- हम सभी के लिए अच्छी सेहत का मतलब केवल शारीरिक सेहत न होकर मानसिक भी हो, मानसिक व शारीरिक दोनों ही सेहत आवश्यक भी है, वह एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू है, जो हमारे जीवन में 
अगर संतुलन के रूप में है, तो तीसरा सुख प्रभु की कृपा हमारे जीवन में है ही, उनका नित्य सुमिरन उनकी अनन्य कृपा को हम याद करते रहे। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     आज हम हमारे समाज में जो विभिन्न विकृतियां देख रहे हैं, उसके मूल में हमारी जो संस्कृति है, उसे हमने हृदय से आत्मसात नहीं किया है, वहीं इसका मूल कारण है। 
          अगर हम जो कह रहे हैं, वही कर भी रहे है, तो हमें भयभीत होने का, विचलित होने का कोई भी कारण नहीं।
         जब हम वाणी से कुछ और कह रहे होते हैं, हमारे मन में कुछ और चल रहा होता है, हमारा आचरण कुछ और होता है, तब इन तीनों का ही आपसी सामंजस्य न होने से , जो हमारे आचरण में त्रुटि का निर्माण होता है,
वह हमारे व्यक्तित्व को भीतर से खंडित करता है। अगर हमारा मन ,वचन व कर्म तीनों में ही सामंजस्य अगर है, तो हम आंतरिक व बाह्य दोनों ही प्रकार से ऊर्जावान रहेंगे।
        हमारे आचरण व कर्म में अगर भिन्नता
हैं, तो वह हमारे व्यवहार द्वारा ही परिलक्षित   हो जायेगी।
       हम जितनी गहराई से हमारी संस्कृति का अध्ययन करेंगे, उतने ही अनमोल मोती हमें प्राप्त हो जायेंगे।
      गीताजी में भी भगवान श्रीकृष्ण जी ने 
भी कर्म योग को ही सबसे अधिक महत्व प्रदान किया है, विपरीत परिस्थितियों उत्पन्न होने पर भी जो व्यक्ति अपना आचरण नहीं बदलता, वह निश्चित ही श्रेय का भागी बनता है।
     हमें सर्वप्रथम अपने आचरण में दृढ़ता लाने का अभ्यास करना चाहिये, उसके पश्चात हम किसी और से उसे करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, या कह सकते हैं। 
             जितना- जितना हम अपने भीतर की और प्रवेश करते हैं , उतना ही अधिक हम अपने- आप को भी जान पाते हैं, आत्म कल्याण के लिये हमें अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों पर गहराई से नजर रखने की, अवलोकन की आवश्यकता है। जितना हम 
गृंथों का स्वयं अध्ययन करेंगे, हमारे प्रज्ञा चक्षु  खुलने लगेंगे, समय तो अपने काल क्रम से चल ही रहा है, हम कितने गतिमान होकर उससे कदम मिला पा रहे हैं।
        समय पर निर्णय करना व उस पर पूर्ण रुपेण अमल करना, यह उस परमात्मा की मंगल कृपा के बिना संभव ही नहीं है।
       हमें अपने जीवन में कुछ मूलभूत सिद्धांतों को अपनाना चाहिये।
      प्रथम, हम जिस भी घर में, परिवार से जुड़े हैं, कभी भी अपने आचरण से उसे परिवार का किसी भी प्रकार से अहित न हो। 
     द्वितीय, जीवन में हम जो भी व्यवहार या
संबंध बनाये, अपनी ओर से पुर्ण ईमानदार व कृतज्ञ रहे।
     तृतीय, समय, परिस्थितियों का सदैव पूर्ण सावधानीपूर्वक आकलन करें। 
    चतुर्थ, हम अपने निजी जीवन में परिवार के अतिरिक्त कुछ ऐसे संबंध अवश्य विकसित करें, बाली दो या चार संबंध हो, मगर वे इस प्रकार से हो, हम उन्हें व वे हमें किसी भी समय में पुकार सके, हम उनकी मदद को व वे
हमारी मदद को हमेशा तैयार रहे। 
     जीवन काल में मात्र अगर हम इन चार सूत्रों पर भी पूर्ण ईमानदारी से कार्य अगर करें, तो हमें कभी भी निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा। 
     बस ,हमें पूर्ण ईमानदारी से इन सूत्रों पर कार्य करना है। 
      इतना भी अगर हम कर सके तो वह परमात्मा सदैव हमारे साथ है ही, यह मानकर चलें।
    आंतरिक श्रद्धा व विश्वास के बल पर हम अनेक उपलब्धियां को हासिल कर सकते हैं। 
   नित्य निरंतर हम अपने कार्यों की समीक्षा अवश्य करें। 
    परमपिता परमेश्वर सब का कल्याण करें, 
सबके मानस में दिव्य प्रेरणा प्रदान करें।
विशेष:-  हम अपना जो भी नियत कर्म, इसका हमने स्वयं बीड़ा उठाया है, उसे पूर्ण सामर्थ्य से, ईमानदारी पूर्वक निभाने का प्रयास अवश्य करें, शीशा परमात्मा पर छोड़ दे, उसकी कृपा के पात्र बनकर रहे, जब भी अहंकार का प्रवेश हमारे मन में हो, उसे याद करें। वह मां से अहंकार को मिटाते चले, उसकी अनमोल कृपा को धारण करें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम। 



प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
उस परमपिता को भी मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, लयबद्धता, यह संपूर्ण सृष्टि एक दूसरे से लयबद्ध है, यहां कुछ भी अकारण नहीं होता, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक दूसरे पर निर्भर है, इसमें कोई स्थिर है ,व कोई चलता है, मगर उनका अनुपात तय है, सब अपनी-अपनी सीमाओं में अपना कार्य करते हैं, सूर्य नित्य प्रतिदिन जिस प्रकार से आता है, वह तय है, चंद्रमा 15 दिन बढ़ता है, 15 दिन  घटता है, से कृमश: हम शुक्ल पक्ष और कृष्ण के नाम से जानते हैं, इसी प्रकार मंगल ,बुध, राहू, केतु, गुरु, शुक्र 
इत्यादि सब ग्रह समय-समय पर अपना प्रभाव दिखलाते हैं, यह जो हमारा शरीर है, यह भी संपूर्ण ब्रह्मांड का एक छोटा सा अंश है, हम चाह कर भी ब्रह्मांड किसी गतिविधि से अलग नहीं हो सकते, यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक दूसरे से
ओत-प्रोत है, भले ही हमें इसकी लयबद्धता का पूर्ण ज्ञान न हो, मगर इसके अपने नियम है अवश्य, और  यह उन्हीं नियमों पर कार्य करता है।
     हम कितना भी प्रयत्न कर ले, वह ब्रह्मांड अपने हिसाब से ही कार्य करता है, कब किस समय क्या होना है, किस प्रकार से घटना है, वह सब हमारी सोच से भी परे है, कुछ विधान हम नहीं जानते, मगर वह होता उसी लयबद्धता से है, सृष्टि का यह कम आदिकाल से चलता आ रहा है, हमारा संपूर्ण शरीर भी इसी ब्रह्मांड का एक छोटा सा अंग है, अगर हम अपने शरीर पर ठीक ढंग से कार्य करें, तो चुकी हम इसी ब्रह्मांड का एक छोटा सा हिस्सा है, अगर हम अपने शरीर के परिचालन को सीख जायें तो हम स्वयं अपने आप को जानने लगेंगे, जैसे ही हम अपने भीतर की और अग्रसर होंगे, एक दिव्य चेतना हमारे भीतर घटती है, और वह हमें उस संपूर्ण ब्रह्मांड से एकाकार व लयबद्ध कर देती है,
जैसे ही हम उसे दिव्य चेतना के संपर्क में 
आते है, उसे सृष्टि की लय से हमारी लय मिल
जाती है, फिर सहज ही हमारे सारे कार्य होने 
लगते हैं।
अगर हम बहुत गौर से चीजों को समझें, तो जब हम कोई पुराना गीत संगीत सुनते हैं, तो हमें उसकी लयबद्धता का आभास होता है।
क्योंकि वह गीत अपनी संपूर्ण चेतना में रचे गये हैं। यह संपूर्ण संसार एक लयबद्धता के अनुसार ही कार्य करता है, हम चाह कर भी इसके नियमों को बदल नहीं सकते, यही इसकी खास बात है, तो कोशिश करिये हम इस लयबद्धता से एकाकार हो सके। आप और हम सभी कोशिश करें इससे तादात्म्य स्थापित कर सके।
विशेष:- हम चाहे ना चाहे, यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक नियम के तहत चलता है, इसकी अपनी लय है, इसका एक अपना तरीका है, जो प्राचीन वैज्ञानिक या ऋषि हुए, उन्होंने अपने गहन अनुसंधान से जो भी जाना वह हमें दिया। इस बारे में प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं, आप देखिये किस प्रकार वह अपने नियमों पर कार्य करती है, वह किसी से भी भेदभाव नहीं करती, और यही उसकी लयबद्धता है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, मेरी यह प्रवाह यात्रा आप सभी को कैसी लग रही है? कृपया अवश्य बताएं? इससे मेरा भी उत्साहवर्धन होगा।
        हम सभी उस परमपिता की ही संतान है, हम जब तक अपने मानस को परिवर्तित नहीं करते, तब तक आंतरिक शांति कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। 
       देवताओं को भी दुर्लभ ऐसा मनुष्य शरीर हम सभी को प्राप्त हुआ, हम किस प्रकार इसका उपयोग करते हैं, वहां हमारी मानसिकता पर ही सबसे अधिक निर्भर है। 
      संस्कृत में एक सूत्र वाक्य है "यत पिंडे तत् ब्रह्मांडे" , इसका
जो मूल अर्थ है, वह तो यही है, हमारा पिंड जो है, यानी यह शरीर 
ब्रह्मांड का ही लघु रूप है।
     जो हमारे शरीर में भीतर घट रहा है, मन में, विचार में, दरअसल वही बाहर भी घटेगा ही, सबके बीच में रहते हुए भी
अगर हम अपनी मूल चेतना को, विचार को दृढ़तापूर्वक, साहस से 
वह उसकी कृपा को मानकर धारण कर सके, तभी जीवन में बदलाव की प्रक्रिया की शुरुआत होगी।
    अंतर को बदले बिना हम कितने ही उपवास, तीर्थ, नाम-जप,
बाहृय आडंबर कितना भी कर ले, हम स्वयं इस बात को भली-भांति  जानते हैं, कि हम कहां पर सही हैं? कहां पर गलती कर रहे हैं? पर निजी स्वार्थवश  हम हमारी गलतियों पर पर्दा डाल देते हैं।
       हमारे साथ कई जन्मों के कर्म  चले आ रहे हैं, अब इस जन्म में हम कैसे युक्तिपूर्वक कर्म भोग को भोंगते है, यह विचारणीय है। 
हम सभी उस परम सत्ता के एक छोटे से अंश है। करने वाला व
करवाने वाला केवल एक वही है, उसके आगे नित्य नतमस्तक रहे, उसकी कृपा का अनुभव करें। 
        कोई बोध अगर भीतर गहरे कहीं जागृत हो रहा है, तो उसकी अनन्य कृपा समझे, मानो वह हमें दिशा -निर्देश दे रहा है,
इस मानव जीवन को जो अति बहुमूल्य है, हम संवारते जाये,
निखारते जाये, प्रयत्न करते रहें, वह परमात्मा अवश्य कृपा सागर है, उसके लिए समस्त सृष्टि एक समान है। 
    कण -कण में , हर क्षण में उसकी व्यापकता का दर्शन करें, 
अपनी अंतर्दृष्टि को पूर्ण जागृत करें, उसे पिता परमेश्वर का धन्यवाद करें, इतना श्रेष्ठ मानव जीवन हमें प्राप्त हुआ, उसकी कृपा को भीतर गहरे उतार ले, फिर देखें, कैसे सहज ही सब होने लगता है, पूर्ण आश्वस्त रहे, वह कभी कुछ विपरीत घटने ही नहीं देता, दृढ़ आस्थावान  रहे, अपने कर्म पर सजग दृष्टि रखें, कोशिश करें, जितना हमसे सध सके, उतना अपने जीवन को साध ले।
      जितना हम अंतर में भीतर आयेंगे, वह अंतर चक्षु हमें दिव्यता प्रदान करेंगे, जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी निरंतर अभ्यास द्वारा हम पा सकते है् ।
     अपनी दुर्बलताओं को छुपाये नहीं, उन्हें भी स्वीकार कर ले, अपने भीतर की अच्छाई को भी स्वीकार करें, उसकी कृपा को 
थाम ले, सुमिरन करते रहे, अनन्य भाव से, फिर आपका जीवन 
धीरे-धीरे रूपांतरित होने लगेगा, भीतर से जब रूपांतरण की शुरुआत हो जाती है, तब सहज ही सब कुछ सही दिशा की ओर चलने लगता है। 
विशेष:- भीतर से बदलाव अत्यंत आवश्यक है, हम हमारे स्वयं के कर्म पर दृष्टि अवश्य रखें, परमात्मा का नित्य चिंतन अवश्य करें,
उसका चिंतन हमें कई प्रकार के झंझावातों से बचाता है, नियम पूर्वक उसकी शरणागति में रहे, परम अहो भाव से नित्य उसका वंदन करते रहे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण, 
      सादर नमन, 
अभी वर्षा ऋतु का सुहाना मौसम चल रहा है, यह मौसम मन मे
नई उमंग वह ताजगी प्रदान करता है, वर्षा की रिमझिम फुहारे मानो मन को झंकृत करती है, मन आल्हादित हो उठता है।
        प्रातः काल अगर हम प्रतिदिन उठते हैं, अगर 4:00 से 6:00 के मध्य हम उठ जाते हैं, तो शाम तक या रात्रि तक
ऊर्जा बनी रहती है।
      प्रकृति का गूढ़ रहस्य यही है, उससे आप कितनी सुंदरता पूर्वक तादात्म्य  स्थापित कर पा रहे हैं, जितना आप सामंजस्य स्थापित करेंगे, जीवन आनंदमय होने लगेगा।
    प्रातः काल उठकर सैर करे, सूर्योदय देखें, पक्षियों का मधुर
कलरव सुने, यह सभी प्रकृति से अनुकूलतम सामंजस्य बिठाना ही
तो है।
    हमारी प्राचीन संस्कृति  में  प्रकृति के महत्व को ठीक से समझा गया है, तभी तो सारे तीर्थ स्थान, नदियों, पहाड़ों पर स्थित है, जहां प्रकृति अपने सुरम्य स्वरूप में विराजित होती है।
     प्रकृति का स्पर्श सबसे अनूठा स्पर्श है, शांति चित मन से जब
हम प्रकृति की छटा को निहारते हैं, अपने भीतर उस सौंदर्य को गहरे उतारे, उसका स्पर्श अनुभव करें, वह सदा ही आपके तन मन को झंकृत ही करेगा।
   जब हम देह से थक जाते हैं, विश्राम के लिये प्रकृति की मनोरम शरण को ग्रहण करते हैं, वह भी अपनी विशाल बांहें फैलाये मानो हमारा  स्वागत करती है।
    प्रकृति की सुंदरता व प्राकृतिक सौंदर्य, जिसमें कृत्रिमता का
समावेश न हो, हमें सहज ही आकर्षित करती है। प्राकृतिक सौंदर्य के पास हर दिन कुछ समय अवश्य बिताये, उसके सानिध्य में हमें
आंतरिक ऊर्जा प्राप्त होती है, नित्य, नियम पूर्वक प्रातःकाल उठे,
सैर पर जाने व प्रकृति के नियमित सानिध्य में अवश्य ही रहे।
     यह हमारे तन व मन दोनो को ही ऊर्जा प्रदान करता है। परम
पिता की बनाई यह सृष्टि परम अद्भुत है, उसे परमात्मा की बनाई सृष्टि का आनंद अनुभव करें, ताजगी से भरपूर रहें ।
    नित्य कोई मधुर संगीत अवश्य सुने, वह मधुर संगीत व दिव्यता हमें प्राप्त होती जायेगी। जितना हम संगीत व रागों के सानिध्य में रहेंगे, उतना ही जीवन का आनंद बढ़ता ही जायेगा। जीवन को
रसमय , आनंदमय बनाये, कृपामय बनाये, पक्षियों का मधुर 
कलरव हमें जीवन को आनंद पूर्वक जीने का उत्साह प्रदान करता है।
     संस्कृत में भी कई स्रोत है ऐसे हैं, जिनका ध्यान व लय पूर्वक  पाठ करने पर जो तरंगे बनती है, वह हमें अंदर तक झंकृत करती है। आनंदपूर्वक जीवन स्वयं भी जिये , औरों को भी प्रेरणा दें, व  नित्य ऊर्जावान बने रहकर जीवन का आनंद ले।
    प्रसन्नचित्त रहने का अभ्यास करें, अंतरात्मा से प्रभु का धन्यवाद करें, इतने सुंदर व शानदार जीवन के लिये अहो भाव से धन्यवाद करें।
      हम जितना प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करेंगे, उतना ही जीवन में आनंद बढ़ने लगेगा, आप सभी का मंगल हो, शुभ हो,
यही प्रार्थना।
     उसे प्रभु का नित्य निरंतर धन्यवाद करते रहें, स्वस्थ रहें, मस्त रहे। 
विशेष:- प्रकृति के नजदीक रहने का अभ्यास करें, सुबह जल्दी उठे, सैर करें, नित्य प्रभु के मंगलमय स्वरूप का हृदय में ध्यान करें, प्रकृति से सामंजस्य  बिठाने का प्रयास करें।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद 
जय भारत।


प्रिय पाठक गण,
        सादर वंदन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह की इस अनूठी यात्रा में आप सभी का स्वागत है। 
जीवन में हर दिन बसंत ऋतु  है, सदा खुश मिजाज  रहे , चीज जो घट रही है, उसके नियंता आप है ही नहीं, आप यह स्वीकार कर ले, हम तो निमित्त हैं, फिर देखिये, आपकी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो जायेगा, जीवन का जुझारूपन ही जीवन की असली ताकत है, नित्य प्रति प्रार्थना करें, विनय करें, हे परमात्मा 
आपकी बड़ी कृपा है। जैसे-जैसे हमारे दिन बीते, उसे पर हमारी आस्था और प्रगाढ़ होती जाए, सभी घटनाएं जो भी घट रही है या
घटेगी, वह सब पहले से ही तय है, हम सभी केवल निमित्त मात्र है, उसे परमपिता परमेश्वर के रचाये हुए किरदार है, बस हमें अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वाह करते जाना है, प्रकृति के इस अनूठेपन को जिसने भी सही तरीके से समझ लिया, उसने जीवन के हर पड़ाव को पूर्ण निश्चितता से  करना मानो सीख लिया है।
       नित्य ,नूतन हर दिन एक नई ऊर्जा व चेतना के साथ जीवन का प्रारंभ करिये, समझ लीजिये, आज का दिन ही है, उसे भरपूर ऊर्जा के साथ जीने की कोशिश करें, उसे ऊर्जा के स्पंदन को भीतर कहीं गहरे महसूस करें, हम सभी उसी परम चेतना के ही अंश है, मगर भौतिकवाद के अतिरिक्त भार ने मानो हमारे जीवन ऊर्जा को हमसे छीन लिया है, एक मासूम बच्चे की खिलखिलाहट  देखिये, पंछी का आकाश में मुक्त विचरण देखिये, नित्य सूर्योदय का दर्शन कीजिये, सूर्य भी तो रोज अपने पूर्ण सौंदर्य के साथ आता  है, प्रकृति में पक्षी मधुर कलरव करते हैं,  एक सामान्य सी गिलहरी देखिये, वह किस प्रकार अपनी पूर्ण ऊर्जा से इधर से उधर चहल कदमी करती है, पेड़ ,पौधे, वृक्ष यह सभी परमात्मा की जीवन ऊर्जा  से परिपूर्ण है।
       इसी प्रकार हम भी नित्य फूलों की तरह महके, उसकी खुशबू वह सौंदर्य को आत्मसात करें, तितलियों का उड़ना, स्वर -लहरियों का गुनगुनाना , मधुर गीतों को गाइये, यह जीवन भी एक मधुर सा गीत ही है, इसे गुनगुनाइये ।
   प्रतिदिन प्रार्थना करें, उसे परमेश्वर को धन्यवाद कहें, जिसने हमें यह सुंदर जीवन प्रदान किया है, इसका स्वयं भी आनंद उठायें व
औरों को भी इसके लिए प्रेरणा प्रदान करें।
     अंतरात्मा की आवाज सुने, उसे प्रभु की शरणागति में आये,
उसने आपके लिए जो विधान रच रखा है, होगा तो वही, बगैर चिंता किये अपने निजी कर्तव्य को पूरा करते रहें , अपनी भूमिका को समझें वह अपनी कदमताल जारी रखें,  नित्य नूतन, नित्य कृपा को जीवन में महसूस करें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जयभारत 
जय हिंद

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     हम आज प्रवाह में बात करेंगे ईश्वरीय कृपा पर,  उसकी कृपा बरसती है, अन्य शरणागत भाव से जब भी हम उसे पुकारते हैं, 
वह आज भी तत्क्षण उपस्थित होता है, जब हम पूर्ण भाव से उस
परमात्मा का चिन्तन करते हैं, तो वह भी हमारा चिंतन करता है, 
उसकी मौज में सदा रहे, संसार से अधिक आशा न करें, जो भी
संसार से प्राप्त हो रहा है, वह चाहे मान -सम्मान हो , चाहे वह अपमान हो, सभी को सम भाव से गृहण कर ले, शायद परमात्मा यही चाहता है, जब और कोई मार्ग नहीं सूझे, तब अनन्य शरणागति ही एकमात्र उत्तम उपाय है।
        उसकी कृपा को नित्य, निरंतर महसूस करें, वह सर्वदा है, सभी जगह है, सदा ही साथ में है। उसकी शरणागति से जीवन में 
जो प्राप्ति होती है, वह शब्दों में बयां नहीं की जा सकती है, परम अहो भाव से उसका चिंतन  व स्मरण करते रहे, आपके हित में जो भी होगा, वही वे करेंगे, परम अनन्य भाव से उनका मंगल चिंतन करें, अपने जो कर्तव्य-कर्म है, उन्हें पूर्ण सही ढंग से करने की कोशिश करें, उसकी कृपा व शरणागति को हमेशा याद रखें,
उसका चिंतन कभी भी विस्मृत हो।
       वह एक द्वार बंद करता है, तो दूसरा द्वार अवश्य खोलता है,
इस संसार -सागर को मात्र उसकी कृपा से ही  पार किया जा सकता है, अतः कोई भी शंका मन में न रखते हुए उसकी महिमा
का गुणगान करते हुवे परम अहो भाव से स्मरण करते हुए बगैर किसी विचलन के अपने नित्य कर्म को करते रहें।
     जो भी आपके हित में होगा, होगा बस वही, अपने माता-पिता, 
गुरुजनों व वरिष्टो का सम्मान करते हुए वह बराबरी वालों को छोटों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करते रहे, फिर जो भी होगा, वह केवल मंगल ही होगा। 
     उसकी अनन्य कृपा को जीवन में धारण करें, उसकी कृपा को भी हम तभी धारण कर सकते हैं, जब वह चाहता है, अन्यथा हमारा भाव भी उधर नहीं होगा। 
     उसने सब कुछ दिया, परम पिता का, इस सृष्टि का धन्यवाद
करें, हम सुबह स्वस्थ उठ रहे हैं, क्या यह उसकी कम कृपा है, 
नित्य प्रति  मंगल प्रार्थना प्रभु से अवश्य करें, सब अच्छा ही होगा, 
केवल मंगल ही होगा। 
 विशेष:- आपके जो भी मूल कर्तव्य  हैं, उनके परिपालन से ही आप उन तक पहुंच सकते हैं, उसका नित्य चिंतन, नित्य मनन करते हुए अपने कर्तव्यों को भी निभाते जाये, उनसे अपना मुख न मोड़ें, शेष भार उस परम पिता पर छोड़ दे, जो भी आपके लिये अनुकूल होगा, केवल वही होगा। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, समय व सबंध पर, दोनों ही हमारे जीवन में दो ऐसे स्तंभ है, जिन पर समस्त जीवन की इमारत खड़ी होती है, और इन दोनों का संतुलन साथ लेना ही जीवन की 
सफलता का मूल मंत्र है।
    हमें जीवन में समय का सही सदुपयोग करना आता है, तो हमारे सभी कार्य सुसंगठित हो जाते हैं, समय को यूं ही व्यर्थ करने वाला व्यक्ति ना तो संबंध निभा है, और नहीं स्वयं के जीवन को 
व्यवस्थित कर पाता है, जैसे-जैसे जीवन गति पकड़ता है, हमारी जिम्मेदारियां बढ़ती जाती है, ऐसे में समय का एक-एक क्षण बहुमूल्य हो जाता है, और तब हमारे संबंधों की परीक्षा भी 
आरंभ होती है, की क्या हम समय रहते अपने संबंधों को उचित
स्थान दे पा रहे या नहीं। हमें यह समझना होगा, की संबंध निभाने के लिए मात्र भौतिक उपस्थिति ही पर्याप्त नहीं होती, समय की गुणवत्ता, उसमें डूब कर दिया गया भाव , स्नेह व सहभागिता भी उसमें आवश्यक है। एक और यदि हम समय के पाबंद है, पर संबंधों में रुक्षता है, तो वह भी व्यर्थ है। और यदि संबंधों में हम 
भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, पर समय का नियोजन नहीं कर पाते, 
तब भी जीवन में अव्यवस्था जन्म लेती है, अपने दैनिक जीवन में 
हमें यह चिंतन करना चाहिये, क्या हम अपने निकटतम संबंधों को यथोचित समय दे पा रहे हैं? क्या हमारी दिनचर्या में कुछ क्षण ऐसे हैं, जो केवल आत्मीय संवाद, आत्मीय सानिध्य के लिये आरक्षित है? यदि नहीं तो वह संबंध धीरे-धीरे शुष्क होते जायेंगे, समय के इस तीव्र प्रवाह में संबंधों को जीवित रखने के लिये उनकी नियमित देखभाल आवश्यक है, संबंधों में संवाद, संवेदना और 
सहभागिता आवश्यक है। जो व्यक्ति समय का विवेक पूर्वक उपयोग करते हैं, और अपने प्रियजनों को उसका हिस्सा बनाते हैं,
वे न केवल व्यवस्थित जीवन जीते हैं, बल्कि आत्मिक रूप से भी संपन्न होते हैं।
विशेष:- समय के साथ-साथ संबंधों की मर्यादा रखें, क्योंकि जीवन में अगर समय चला जाये तो अवसर खो जाते हैं, और यदि संबंध टूट जाए तो भावनाओं का मूल्य समाप्त हो जाता है, दोनों की ही 
अपनी महत्ता है, कहां क्या आवश्यक है, विचार पूर्वक देखें।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद। 

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का हृदय से स्वागत है, एक बहुत पुराने गीत की पंक्तियां है," कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना" ,
    वैसे तो यह गीत अलग संदर्भ में है, पर देखा जाये तो जीवन
के हर क्षेत्र में यह लागू है,
   जो व्यक्ति सक्रिय होगा, उसकी प्रशंसा व आलोचना दोनों ही होगी, दोनों से ही बचकर समस्त भाव से जीवन को जीने का ढंग अगर हम सीख ले, आत्मसात कर ले, यही जिंदगी का सार तत्व है, आप जीवन में कितना ही अच्छा व बुद्धिमत्ता पूर्ण जीवन को जिये
कुछ लोग आपसे प्रसन्न कुछ नाराज हमेशा ही रहेंगे।
     तब आप क्या करेंगे? क्या आलोचना से घबरा जायेंगे या 
प्रशंसा आपको अभिमान से भर देगी , दोनों ही स्थितियां सही नहीं है, आपको तो अपना जो मूल कर्तव्य है, उस पर निरंतर कार्य करना ही है, आपको निरंतर प्रयास करते जाना है, केवल निरंतर प्रयास के द्वारा ही आप अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं। 
     जीवन में मूलभूत आवश्यकता है पूरी करने के बाद आपके पास जो भी समय बचता है, उसे पर आप अपने किसी भी शौक को जिंदा अवश्य रखें।
   उदाहरण के तौर पर जैसे बागवानी, पुस्तकें  पढ़ना, खेल, व्यायाम, सामाजिक मेलजोल, इनमें से या अन्य कोई भी ऐसी रुचि का क्षेत्र जो आपकी रचनात्मकता को बढ़ाता है, अवश्य रखें, यह आपके जीवन को एक सुंदर गति प्रदान करेगा। 
       जीवन आपका है, जिन आपको है, कुछ मूलभूत सिद्धांत जीवन में अवश्य बनाये, जीवन में कुछ अच्छे मित्र अवश्य बनाये,
जीवन एक लंबी चलने वाली प्रक्रिया है, मिलन सारिता बनाये रखें,
सभी से संवाद करते रहे, गलतफहमी को जीवन में कभी भी स्थान न दें, वह आपसी संवाद हीनता से उत्पन्न होती है। व्यावसायिक रिश्ते व सामाजिक रिश्ते, पारिवारिक रिश्ते इनमें अंतर अवश्य सीखें, तीनों ही अलग है।
       आप सभी से एक जैसा बर्ताव नहीं कर सकते, व्यापारिक रिश्ते अलग प्रकार के है, पारिवारिक रिश्ते अलग है, सामाजिक रिश्ते अलग है।
      यह त्रिस्तरीय व्यवस्था है, इसे सही तरह से समझे, तीनों ही आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसे सही तरह से समझे। 
    समय-समय पर क्या आवश्यक है, क्या नहीं, यह समझना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, समय अनुकूल क्या आवश्यक है, 
समय गति को समझ कर ही कार्य करें। 
    और फिर यह गीत हमेशा याद रखें, कुछ तो लोग कहेंगे, 
आप अच्छा करें तब भी, जिसका जो नजरिया है, वह उसके अनुसार ही  आपसे बर्ताव करता है। 
     मिलिये सबसे , सबके प्रति समभाव रखते, मगर आप जिनसे मिलते हैं, उनके व्यक्तित्व की भी गहरी परख रखें, अनुभव जो हमें जीवन से मिले हैं, व्यर्थ नहीं जाते हैं। अनुभव की गहराई से ही 
जीवन चलता है, रुकना नहीं है, पर सचेत अवश्य रहना है। जीवन में सचेत व सक्रिय रहिये, अपनी सोच पर निरंतर कार्य करते रहें। 

विशेष:-आप हर समय हर किसी को उपलब्ध नहीं हो सकते, आपका भी समय कीमती है, अपने समय की स्वयं भी कद्र करें,
तभी सामने वाला भी आपका समय की कद्र करेगा, कुछ तो लोग कहेंगे यह पंक्ति मैंने इसी संदर्भ में शीर्षक में लिखी है, अपना नियत कर्म ईमानदारी पूर्वक करते रहे। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     हम सभी सफर पर हैं, इस सफर की बस एक ही बात है, 
स्वीकार्यता, जीवन में हम सब कुछ जैसा चाहते हैं, वैसा नहीं होता है। परिस्थितियों बदलती रहती है, मित्र कुछ स्थायी हो सकते हैं,
मगर परिस्थिति सदा ही एक जैसी नहीं होती, बस अविराम बहते रहे। उसकी कृपा का नित्य अनुभव करें, मंगल कृपा को भूले नहीं।
       उसकी कृपा का नित्य अनुभव करें, कुछ हमारे हाथ में  है,
कुछ हमारे हाथ में नही, आंतरिक धैर्य बनाए रखें, जिसने भी धैर्य का दामन थाम लिया, अंततः वही जीवन सफर का आनंद उठाता है, धैर्य पूर्वक जीवन यात्रा को चलने दे, जहां पर धैर्य होगा, वही परिणाम सुखद होगा।
         परिस्थिति चाहे पक्ष में हो अथवा नहीं, अपनी यात्रा को 
निरंतर जारी रखें, अनुभव से बड़ा कोई शिक्षक नहीं, अनुभवों से सीखते जाये, जीवन- यात्रा एक बहुत ही सुन्दर प्रकिया है, बहते रहे, संघर्ष से घबराये नहीं, परिस्थितियों बदलती है, धैर्य का दामन किसी भी परिस्थिति में न छोड़ें, अनेक बार महसूस होगा, जिंदगी आखिर हमसे क्या चाहती है? अनेक प्रकार के विचार भी आते
रहते हैं, उन सब विचारों के होते हुए भी हमें कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर तो अडिग  होना ही पड़ता है।
       किसी भी परिस्थिति के उपस्थित होने पर भी उस परिस्थिति
 में अपना धैर्य बनाये रखें, वही जीवन का मूल मंत्र है।
       व्यक्ति आयेंगे, व्यक्ति जायेंगे, परिस्थितियों आयेंगी, परिस्थिति जायेगी, पर वह जो परमात्मा है, वह हमेशा आपके साथ ही है, ऐसा परम विश्वास रखें, जो उसकी मर्जी है, होता वही है, पूर्ण भरोसा रखकर जवन जिये।
      अविराम बहते रहे, जीवन की गति कभी भी अवरूद्ध नहीं होती, हम अपने मानस को जितना सशक्त करेंगे, उतने ही अच्छे
परिणाम हमें जीवन में प्राप्त होते रहेंगे, कभी भी अपने मन में 
निराशा का भाव न आने दें, आप जो भी अच्छा सोचते हैं, उस पर पूर्ण ईमानदारी पूर्वक कार्य करते रहे, जो भी लक्ष्य आपने बनाये हैं, उन लक्ष्यों के लिये अपनी पूरी ऊर्जा को लगा दें, अपनी आंतरिक ऊर्जा को कभी भी क्षीण न होने दें।
      जिंदगी में अवसर आते ही हैं, जो भी अवसर आपको मिलता है, उसे परमात्मा का उपहार मानकर स्वीकार  करे। अपने लक्ष्य पर निरंतर कार्य करें, समय आने पर सब सही दिशा में ही जायेगा।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, प्रवाह की  इस अद्भुत यात्रा में आप सभी का स्वागत है, यह नित्य ,निरंतर चलती रहे, विचारों की सुंदर ऊर्जा हर और प्रवाहित हो, यही मेरे प्रवाह को लिखने का मुख्य उद्देश्य है, इसमें कहां तक सफल हो सका हूं, यहसफल रहूंगा, यह तो परमात्मा ही जाने, अंतर मन से कोई प्रेरणा उठी, और ब्लॉग 
शुरू किया, यह आप सभी से आत्मिक संवाद है, आत्मा का सौंदर्य सदा ही है, वह काल के प्रभाव से भी मुक्त है।
       समस्त शक्ति जब हम एक ही और लगाते हैं, जो हमारी मूल विचारधारा है, तो वह प्रकृति भी सदा साथ देती है। अपने मूल स्वप्न पर कार्य करें, आपका अंतर्मन हमेशा कहता है, क्या करना है, क्या करना उचित है, हम सही बात को समझ नहीं पाते हैं अनदेखा  कर देते हैं।
       हमें अपने जीवन में जो भी स्वप्न हम देखते हैं, उसके लिये आवश्यक कदम जरूर उठायें, स्वप्नदर्शी बने, अच्छे स्वप्न देखें, उन पर पूर्ण ईमानदारी से कार्य करें, कोई भी स्वप्न जो हम देख रहे हैं,
वह पूरा होने में समय तो अवश्य लगता ही है, आंतरिक धैर्य रखें, 
जो भी आप स्वप्न देखते हैं, उसके बारे में ही कल्पना करें, बारंबार एक ही अच्छी कल्पना को हम देखते रहे,  उस पर दृढ़ता पूर्वक कार्य करें।
यह सृष्टि असंभव को भी संभव कर सकती है, प्रतिदिन अपने मूल स्वप्न को दोहरायें, इस दिशा में निरंतर चले, जो कि आपका आंतरिक स्वप्न है, परमेश्वर से प्रार्थना करें, वह आपको उन स्वप्नो की दिशा में ही ले जाये, जो आप देख रहे हैं। अगर हमारे मन में कोई भी स्वप्न है, जो हम देख रहे हैं, या देखते हैं, तो निश्चित ही हम उसे प्राप्त कर ही लेंगे।
      बगैर सपनों के जीवन का रस खत्म हो जाता है, पूर्ण उत्साह पूर्वक, लगनशीलता से कार्य करें, आपकी सफलता आपकी राह देख रही है, मगर एक छोटी सी शर्त यह है, पूर्ण ईमानदारी पूर्वक प्रयास अवश्य करते रहे, फिर उसे परमात्मा पर संपूर्ण भार छोड़ दें, निश्चित पूर्वक अपनी मंजिल की और बढे।
          सही दिशा में किए गए प्रयास कभी भी विफल नहीं होते हैं,
एक निश्चित समय अवधि के बाद वह अवश्य पूर्ण होते हैं, पूर्ण आशावादी रहे, जो भी करें, अपनी संपूर्ण सामर्थ्य से करें, ईश्वर अवश्य ही संकल्प बली लोगों का साथ देते है।
विशेष:-स्वप्नदर्शी बने, वह इसलिये क्योंकि वे स्वप्न आपके लिए ऊर्जा का कार्यकरेंगे, हमेशा सकारात्मक विचारधारा रखें व 
ऐसे सकारात्मक चिंतन को इतना प्रबल करें , आपका जीवन तो सही दिशा में ले ही जाये, जो आपके आसपास है, वह आपसे प्रेरणा प्राप्त  करें।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद।