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प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
  आप सभी को मंगल प्रणाम, 
हर मनुष्य के पास बुद्धि अवश्य होती है, वह अपना हित किस कार्य में है, यह वह भलीभांति जानता है, जो वह इस बात को जानता है, वह उसे किस प्रकार से जानता है, 
उसे हम बाह्य दृष्टि कह सकते हैं, जो हम जगत में, संसार में कैसे हम व्यवहारकुशल हो,
किस प्रकार से अपनी वाणी का प्रयोग  करें,
बुद्धि का प्रयोग करें, यह हमें बताती है, बाह्य जगत में, सांसारिक जगत में कैसा हम व्यवहार करें, इसका हमें बोध कराती है, यह तो हुई हमारी बाह्य दृष्टि। 
              अब हम आंतरिक दृष्टि की बात करते हैं, हमारे अपने गुण दोष क्या है? उसे और हमें जागृति प्रदान करती है, हर मनुष्य गुण दोषयुक्त ही है, मगर अपने स्वयं के गुण दोष पहचान कर गुणों से किस प्रकार हम कार्य करें, दोषों का हम किस प्रकार से परिमार्जन करें, अपने स्वयं को किस प्रकार से हम परिष्कृत करें, यह गुण हममें आंतरिक चेतना विकसित करने पर बढ़ते हैं।
      हमें जीवन में बाह्य दष्टि, जिससे हम जगत को जाने वह अंतर्दृष्टि जिससे हम स्वयं को भी जाने, इन दोनों का ही बोध होना परम आवश्यक है, या यह कह सकते है, हमारे पास दोनों ही दृष्टियां अगर है, तो हम तुलनात्मक अध्ययन द्वारा कहां किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, कहां पर बोलना है? कहां नहीं, यह समझ आने लगेगा। 
         जीवन को जीने के लिए हमें अंतर्दृष्टि व
बाह्य दृष्टि दोनों के ही उचित संतुलन की कला
का निरंतर अभ्यास करना होगा, तभी हम धीरे-धीरे साम्यावस्था को प्राप्त हो सकते हैं,
यानी हमारी धीरे-धीरे समदृष्टि विकसित होने से हम दोनों ही प्रकार के व्यवहार मे निपुणता 
प्राप्त कर सकते हैं।
         जगत में हमें व्यवहारिक कला में निपुण होना पड़ेगा वह अपनी स्वयं की आंतरिक
समृद्धि के लिये हमें अपनी आंतरिक दृष्टि को
विकसित करना होगा।
     हम सामान्य जीवन जीते हुए भी जब इन 
दोनों का संतुलन करना सीख गये, तो जीवन की जो कला है, किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, यह हमें ज्ञात हो जायेगा।
     क्रमशः हम आंतरिक दृष्टि व बाह्य दष्टि 
दोनों में उचित संतुलन रखते हुए इस संसार सागर की यात्रा को इन दोनों ही समानांतर पटरियों पर अपने जीवन रूपी रेलगाड़ी को 
चलाने की कला को सीख पायेंगे।
       जितना हमारा अभ्यास बढ़ेगा, हम परिपक्व होते जायेंगे, जीवन के संतुलन को साधते जायेंगे , उतना ही हमारा व्यक्तित्व भी निखरेगा, इस प्रकार हम अंतर्दृष्टि का विकास
करके आंतरिक अनुभूति व शांति को प्राप्त कर पायेंगे वह बाह्य जगत को देखने व घटनाक्रमों को ठीक ढ़ंग से समझने की कला को सीख जायेंगे।
विशेष:- अंतर्दृष्टि विकसित होने पर हमारा अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली होगा, वह बाह्य दृष्टि विकसित होने पर हमें व्यवहारिक कुशलता का ज्ञान होगा, और जीवन में दोनों की ही हमें आवश्यकता पड़ती है, इति शुभम भवतू ।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है, नव वर्ष शुरू हो गया है,
नवीन संकल्पों को हम गढ़े, और विषम परिस्थितियों में हम कैसे संतुलन स्थापित करें, यह सीखने का प्रयास करें। 
         अनुकूल परिस्थितियों हो, तब तो हर कोई बाजी जीत ही जाता है, परंतु विपरीत परिस्थितियों हो, समय विषम हो, तब किस प्रकार से हम किसी भी समस्या का समाधान निकालते हैं, वहीं हमारी योग्यता का परिचय हमें देना होता है।
       जहां विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होने पर साधारण व्यक्ति उनसे हार मान लेते हैं, साधारण व्यक्तित्व के धनी वहीं से अपनी राहे तैयार कर लेते हैं, यानी कुल मिलाकर मेरा यह मानना है, परिस्थितियों चाहे कितनी भी विषम क्यों न हो, कोई ना कोई द्वार तो अवश्य होता है, बस वही हमें पूर्ण धैर्य से खोजना होता है, 
कैसे हम अपनी समस्या के विभिन्न पहलुओं की जांच करते हैं, उन्हें में उसका समाधान भी छिपा होता है। 
       कोशिश करते रहे, कोई भी समस्या हो,  विषमता में समता हम किस प्रकार से 
स्थापित करें, यही हमारी योग्यता का पता हमें चलता है। 
        सामान्य स्थिति व विषम परिस्थिति में अंतर तो निश्चित होता है, पर धैर्य पूर्वक अगर हम स्थितियों का आकलन अगर हम करते हैं,
तो उन्हें विषम परिस्थितियों में ही हमें मार्ग भी मिल जाता है। 
      विषम से विषम परिस्थिति भी हो, अगर हम धैर्य रखें तो हमें समझ में आता है, की समस्या को हम किस प्रकार सुलझा पायेंगे।
      परिस्थितियों विषम भी हो, तो भी कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलता ही है, सूझबूझ व धैर्य पूर्वक अवलोकन से हमें राह मिल ही जाती है। प्रतिकूलता में अनुकूलता या विषमता में समता हम कैसे स्थापित करें, 
प्रयास करते रहने पर हम उसमें कामयाब हो सकतें हैं।
     अगर हमारे व्यक्तित्व में यह खूबी है, तो उसका हमें पता भी होना चाहिये वह समय आने पर हम उसका किस प्रकार से स्थितियों को अपने पक्ष में करें, जिस किसी का नुकसान भी ना हो वह हमारा कार्य भी सिद्ध हो जाये।
       यह जीवन में अनुभव द्वारा ही सीखा जा सकता है, बुद्धिमान मनुष्य परिस्थितियों का सही आकलन करते हैं, वह फिर निर्णय करते हैं। 
      जहां सभी हार मान जाते हैं, एक कुशल रणनीतिकार वहीं से अपनी जीत को तय करते हैं। साहसिक व दूरदर्शी बने, समय अनुकूल क्या उचित है, यह अध्ययन करें, राह स्वयं ही निकल जाती है। विषमता में समता को जो खोज लेता है, वह अपनी राहें बनाना जानता है।
विशेष:-  विषमता में समता को देख लेना, किस प्रकार से हल निकलेगा, वह हमारे व्यक्तित्व की दुरंदेशी को बताता है, परिस्थितियों से हारे नहीं , वरन् उनसे जूझने का आंतरिक सामर्थ्य अपने आप में उत्पन्न करें, विषमता में समता का अभ्यास करें, उसमें पारंगत होने पर आपके हल दूसरों से भी जल्दी होंगे, क्योंकि आपने एक ही समस्या के विविध पक्षों को भली भांति समझ कर फिर निर्णय लिया है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     आज का सामाजिक परिवेश किस प्रकार का निर्मित हुआ है, जहां पर युवा पीढ़ी के अपने सपने है, वे केवल भौतिकता की ओर आकर्षित है, शिष्टाचार व मूल्यों की सौगात, 
जिस समाज के द्वारा दी जाती है, वह भी  भ्रमित है।
      क्योंकि आज से 10 -15 वर्ष पूर्व का समाज हम देखें, तो नैतिक मूल्यों की कीमत थी, व्यक्ति धन किस प्रकार से कमा रहा है,
यह बहुत महत्वपूर्ण था। 
         विगत वर्षों में जो सामाजिक मूल्यों का पतन हुआ है, उसके लिये सभी वर्ग कुछ न कुछ रुप में समान दोषी है, इस स्थिति में सुधार किस प्रकार लाया जाया, यह गहन चिंतन का विषय है। 
       व्यक्तित्व विकास की शिक्षा हमें स्वयं उन जीवन मूल्यों पर जीना होती है, जिनकी हम अन्य व्यक्ति या ,परिवार से, समाज से अपेक्षा रखते हैं।
      सर्वप्रथम हमें स्वयं अपने ऊपर भी गौर करना होगा, जो सामान्यतः हम नहीं करते, 
दूसरे के दोषो को देखना सबसे आसान कार्य है, पर स्वयं के दोषों पर हमारी दृष्टि नहीं जाती।
       क्षरण मूल्यों का सभी और हुआ है, मात्र भौतिक उन्नति की और अगर समाज अग्रसर हो जाता है, तो जीवन मूल्यों की कीमत कम हो जाती है। 
        हमें संतुलित रूप से भौतिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु दृढ़ रहना होगा, पुरानी सभी परंपरा ठीक हो, व नई सारी गलत,
यह कहना भी उचित नहीं, कहां आवश्यक सुधार की आवश्यकता है, यह भी हमें देखना होगा। सब पुराना ठीक, सब नया खराब, 
इन दोनों के मध्य का का चुनाव, इन दोनों में जो उचित हो, समयानुकूल हो, उसे हम ग्रहण करे।
      वर्तमान की चुनौतियां और कठिन है, जब सब और से अनेक विचार चल रहे हो, तब मानसिक रूप से स्थिर चित्त होकर हमें हल तलाशना होगा, एक लेखक के नाते मैंने यह महसूस किया है कि नई पीढ़ी गैर- जवाबदार नहीं है, वरन वह अपने लक्ष्य के प्रति पहले से भी अधिक सजग है, मगर समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व है, यह बोध हमें नई पीढ़ी को अवश्य कराना चाहिये।
         समाज में कई प्रकार के विभिन्न मत-मतांतर, अनेक विचारधाराएं, अनेकों प्रकार की विविधता, इन सब में सामंजस्य  किस प्रकार हम वर्तमान समय में करें, यह बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य है, मगर यह किया जाना चाहिये।
     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है, अपने स्वयं के, परिवार के, समाज के उत्तरदायित्वों को किस प्रकार से निभाया जाये, यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। 
     मानवीय चेतना को अगर हम सकारात्मक  दिशा या चिंतन न दे सके, तो आने वाली भावी पीढ़ियां हमें इस बात के लिए उत्तरदायी ठहराएंगी  कि हममें इतनी समझ  नहीं थी, पर आप लोग तो समझदार व अनुभवी  थे। 
       आपने हमें सही मार्ग चयन हेतु प्रेरित क्यों नहीं किया। 
     हम अपने सीमित संसाधनों द्वारा भी, उनके कुशल उपयोग द्वारा सामाजिकता को, 
दायित्वों को निभा सकते हैं।
    संपूर्ण रूप से नई पीढ़ी को जवाब देह मानना अपनी जवाबदारी से चूकना है, उन्हें आवश्यकता व अधिकता का अंतर समझाने का मूल दायित्व हमारी वर्तमान पीढ़ी का है, जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते।
        साथ ही युवा साथियों से भी मेरी विनम्र अपील है, बुजुर्गों को कुछ समय अवश्य दें, 
उनके अनुभव आपके काम ही आयेंगे, उन्होंने काफी समय लोगों के बीच में जीवन बिताया है, जितनी गहरी समझ उनकी है, उतनी नई पीढ़ी की अभी नहीं, उनकी हर बात को महत्वहीन न माने, बुजुर्गों का अनुभव युवा पीढ़ी का जोश यह दोनों ही समाज के लिए एक सकारात्मकता का निर्माण करेंगे, तालमेल का जिम्मा निश्चित तौर से अनुभवी व्यक्ति का ही है, साथी बुजुर्गों से भी निवेदन 
वे भी युवा पीढ़ी के पक्ष को समझें, वर्तमान समय में तालमेल बहुत ही आवश्यक है। 
विशेष:- वर्तमान सामाजिक परिवेश अत्यंत ही विचित्र है, एक तरफ समाज में के अच्छे लोग हैं, जो निरंतर प्रयासरत हैं, दूसरी और कुछ लोग हैं, जो मात्र निंदा ही करते हैं, तो जो सामंजस्य बिठाने वाले लोग हैं, वह निश्चित ही श्रेष्ठ है, अत्यधिक महत्वाकांक्षा व अंतहीन दौड़, इनमें से हमें क्या चुनना है?  पुरातन व वर्तमान दोनों का आकलन  आवश्यक है,
हमारा वर्तमान हमारे कदम के अतिरिक्त 
आसपास के घटना चक्रों से भी प्रभावित तो होता है, पर आखिरकार चयन हमें ही करना होता है, हम क्या चाहते है?
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
     मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा है, जब वह अपना सफर करता है, तो उसे सर्वप्रथम वह परिवार, जिसमें वह पला बढ़ा, उसके पारिवारिक संस्कार, जो उसे प्राप्त हुए, उसकी परवरिश, उसके बाद उसका स्वयं का अपना
संघर्ष, यह सब उसकी जिंदगी में अनिवार्य आते ही है।
              इन सभी के बीच में परिवार की मान्यताएं, सामाजिक मान्यताएं, इन सबके बीच में व्यक्ति को उसकी नैसर्गिक  ऊर्जा जो प्राप्त हुई, परमात्मा से, वह या तो क्षीण होगी 
या उसमें वृद्धि होगी, अगर ऊर्जा क्षीण होती
हैं, तो निश्चित ही उसकी दिशा जिधर वह जा रहा है, सही नहीं है, और अगर उस ऊर्जा में अभिवृद्धि हुई है, तो वह सही दिशा की और जा रहा है। सवाल यह है कि हम अपने जीवन में इस सकारात्मकता का पता किस प्रकार करें , तो अपने आप को जांचे, अपना संपूर्ण जीवन आपने मातृ भोग-विलास में ही बिता दिया है, या अपने जीवन का इससे हटकर कुछ अलग उद्देश्य आपने तय किया है, जीवन की इस यात्रा में आपके सामने निश्चित ही कई पड़ाव आते हैं, तब आपको फैसला करना ही होते हैं, अन्य कोई भी उपाय नहीं होता, उस परिस्थिति में आप क्या फैसला कर रहे हैं, वह स्वविवेक, तात्कालिक परिस्थितियां, अनुकूलता, प्रतिकूलता सब कुछ हो सकता है, इस यात्रा में आपने जो निर्णय लिये है, वह दूरगामी  परिणामों को देखकर लिये है अथवा नहीं, अगर आपने अपने फैसले के दूरगामी परिणामों पर विचार किया है, तो निश्चित ही आपके फैसले सही होंगे, किसी भी निर्णय को लेने का बाद में क्या परिणाम उपस्थित होगा, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
         इसमें सबसे अधिक मूल्य आपके पारिवारिक संस्कारों का है, उन संस्कारों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका इसमें होती है, वर्तमान परिस्थितियों जो भी अच्छी या बुरी निर्मित हुई है, वह हमारे अपने फैसलों का ही परिणाम है, आगे भी आप जो फैसला गहरी समझ के आधार पर लेंगे, वह अधिकतम सही दिशा की और ही होगा। 
     हमारा जीवन केवल हमारा ना होकर परिवार ,समाज दोनों से जुड़ा हुआ है, हम परिवार व समाज की मात्र एक  इकाई है,
इसलिए हमारे फैसलों का दूरगामी परिणाम हमारे परिवार व समाज पर पड़ता ही है।
     हमें हमेशा कोई भी फैसला लेते समय तात्कालिक परिस्थितियां व दुरगामी  परिणाम 
दोनों का ही चिंतन करना चाहिये,  तात्कालिक व दीर्घकालिक फैसला आप अपने जीवन के अनुभव के आधार पर भी ले सकते हैं। 
      समयानुकूल निर्णय आपने कितने बुद्धिमत्ता पूर्वक लिये हैं, वही आपके जीवन के परिणाम बदलेगा। जो भी व्यक्ति अपने जीवन की शुरुआत में सही दिशा में संघर्ष करता है, वह अपनी बाद का समय सुखपूर्वक बिताता है, हमारे इसी जीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म या तो हमें ऊपर उठाते हैं या नीचे गिराते हैं, कोई अन्य इसके लिए कभी दोषी नहीं हो सकता। 
       अपनी दैनिक दिनचर्या का स्वयं आकलन अवश्य करते रहे, बिना किसी सोच विचार के जीवन रूपी नौका किधर जायेगी,
पता नहीं, अगर आपको दिशाबोध या ज्ञान नहीं हो रहा तो आप पुरानी कहावतों  का सहारा भी ले सकते हैं, क्योंकि वे काफी अनुभव के बाद ही बनाई हुई होती है, अथवा अनुभवी व्यक्तियों का मार्गदर्शन ले, किसी गुरु या ग्रंथ का आश्रय ले, स्वयं चिंतन भी करते रहे, जीवन को सही मूल्यों के साथ जीना, भले ही थोड़ी तात्कालिक परेशानी हमें उठानी पड़े, यही हमारे जीवन में सबसे अधिक आवश्यक है। 
विशेष:- हमारा, आपका सभी का जीवन एक यात्रा ही तो है, इस यात्रा में हमें कई साथी मिलेंगे, बिछड़ेंगे, पर अपना स्वयं का निर्णय, 
हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, यह हम स्वयं ही तय करते हैं, जिस प्रकार का हमारा सोच विचार होगा, उसी प्रकार की हमारी रणनीति भी होगी। जीवन कैसा जीना है, यह हमारे फैसलों पर ही निर्भर है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, कालजयी ग्रंथ गीता जी पर, कालजयी  इसलिये कह रहा हूं, विचार पूर्वक जब हम मंथन करते हैं, तो पाते हैं, कितने साधारण शब्दों में भगवान  श्रीकृष्ण श्रीमद् भागवत गीता में कर्म की व्याख्या करते हैं, वे स्पष्ट रूप से कहते है,
स्वधर्म ही सबसे उत्तम है।
      यानी आपने जो भी कर्म करने का बीड़ा उठाया है, यह जीवन में आजीविका के लिये भी आप जो कर्म कर रहे हैं, उसे पुर्ण ईमानदारी व निष्ठा पूर्वक हम करें, वे निष्काम कर्मयोग को सबसे अधिक महत्व प्रदान  करते हैं, अपना जो भी कार्य है, वह पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी पूर्वक आप करें शेष फल ईश्वर के ऊपर छोड़ दे, इतने साधारण शब्दों मैं इतनी गहरी बात गीताजी में कही गई है। 
     वह कर्तव्य पथ से हटने की बात कभी नहीं कहते, बल्कि पूर्ण ईमानदारी से, दृढ़तापूर्वक अपने कर्म पथ पर डटे रहने की बात करते हैं, उन्होंने निज कर्म को श्रेष्ठ माना 
हैं, आप कोई सा भी कर्म आजीविका के लिये भी जो अपना रहे हैं, पूर्ण निष्ठा पूर्वक आप करें, अब निष्काम कर्म हम किस प्रकार करें,
हर करम में कुछ ना कुछ भाव जुड़ ही जाता है, कभी हम कोई सामाजिक कार्य करते हैं,
तो हमारी ख्याति का, गरिमा का भाव, हमारी पछ परख, यह जुड़ जाता है, भगवान श्रीकृष्ण इस भाव से भी ऊपर उठकर सहज भाव से कर्म करने की बात कहते हैं, वे कर्म तो करने की कहते हैं, मगर कर्म फल में आसक्ति का त्याग करने की बात करते हैं, क्योंकि जैसे ही हम कर्म में  आसक्ति उत्पन्न करते है, हम कर्म बंधन की ओर बढ़ जाते हैं। 
    कर्म तो हमें वही करना है, मगर उसे कर्म के फल में जो हमारी आसक्ति है, बस उसका  हमें त्याग कर देना है, इस आसक्ति का मानसिक रूप से, भीतर से त्याग हम कर देते
हैं, तो कर्म करते हुए भी हम कर्म बंधन के भार से मुक्त हो जाते हैं।
       नि:स्पृह भाव से, इस कर्म को जो हम कर रहे है, हम करते रहे, बगैर स्वार्थ के, इतना सुंदर संदेश गीताजी हमें प्रदान करती है। 
     वह हमें कर्म से हटाती नहीं, कर्म बंधन से हटाने का मार्ग बताती है, अपना कर्तव्य  मानकर हम यह जीवन  जीवन की गतिविधियां उनके प्रति समर्पण भाव से कर दें, शेष परमात्मा पर छोड़ दे, यही समत्व भाव 
भगवान श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं। 
        स्व- अनुशासन का पाठ हमें  भगवत गीता में प्राप्त होता है, हमें अपने दोषो पर कार्य करना चाहिये, हमने जो भी कर्म अपनाया है, कहीं हम उससे विमुख तो नहीं हो रहे, उसे पूर्ण ईमानदारी से हम करें, यही गीता जी का सार है। 
        यह एक अद्भुत ग्रंथ है, जो किसी वर्ग- विशेष , संप्रदाय से न जुड़ा होकर आपको अपने जीवन मैं किस प्रकार जीना चाहिये,
जीवन पद्धति का विकास करने के लिये इस ग्रंथ का मनन व चिंतन अवश्य करना चाहिये,
यह सभी के लिये एक बहु उपयोगी ग्रंथ है,
इसमें किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई बात ना कह कर कर्म की महत्ता को दर्शाया गया है।
        ऐसे सर्वश्रेष्ठ मानव मात्र को शिक्षा प्रदान करने वाले, चेतन प्रदान करने वाले, अद्भुत ग्रंथ श्रीमद् भागवत गीता वह उनके नायक श्री कृष्ण जी को सादर वंदन। 
      श्री मद्भागवत  गीता हर दौर में पठनीय,
मनन करने योग्य, चेतन को जागृत करने वाला ग्रंथ है, जो उनकी शरणागति होकर अपना कार्य करते हैं, निसंदेह वह इस जीवन में 
अपने स्वकर्म को करते हुए ऊंचाई को पाते हैं।
   ऐसे अद्भुत व कालजी ग्रंथ को बारंबार प्रणाम, जो हमें दिशा प्रदान करता है, अंधकार से प्रकाश की और, चेतना को जागृत करने वाला अनुपम यह ग्रंथ है।
विशेष:- हम अपना स्वकर्म पूर्ण ईमानदारी से व निष्काम भाव से करें, शेष परमात्मा पर छोड़ दे, बस यही संदेश है, गीता जी का, सरल व सहज रूप में वह कहते हैं, आपका जो भी कर्म है, वह पूर्ण निष्ठा पूर्वक आप करें, इसी में आपका कल्याण निहित है, ऐसे ग्रंथ को एक बार अवश्य आप पढ़ें, मनन करें, यही विनय।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम। 



प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, स्वाभिमान पर, स्वभाव+अभिमान, इन दो शब्दों से मिलकर यह बना है, जो भी प्रकृति से हमें 
प्राप्त हुआ, वही सत्य है।
      स्वाभिमान, यानी अपनी मूल प्रवृत्ति या
प्रकृति जो हमें ईश्वर ने प्रदान की है, वही हमारा स्वभाव है, या स्वाभिमान भी है।
        सभी की अपनी- अपनी आदतें होती हैं,
मगर एक बात अगर हम गहराई पूर्वक विचार करें , तो वह यह है, कि मानवीय करुणा से 
ओत-प्रोत होना, मनुष्य होना यह हम कभी न भूलें।
        हमारा जो भी स्वभाव है, स्वाभिमान है, 
वह ऐसा हो, जिससे हमारे आत्म सम्मान को 
भी ठेस न पहुंचे, साथ ही अन्य के भी आत्म सम्मान को हम ठेस न लगायें।
       मनुष्य की मूल प्रकृति यह रही है, कोई उसे पहचाने, जाने, उसकी लोकप्रियता हो,
यह एक ऐसी ख्वाहिश है, जो सभी के अंतर्मन में बसी होती है।
         अपनी मौलिक विशेषताओं को हमें
पहचानना चाहिये व पूर्ण ईमानदारी से उस
पर कार्य करें, अगर हममें कोई भी हुनर है, 
तो उसे हमें लगातार, निरंतर अभ्यास के द्वारा 
हम किसी भी विधा में शीर्ष पर जा सकते हैं। 
हम सभी के जीवन में उतार- चढ़ाव, जय पराजय, हानि -लाभ, सभी आते ही हैं, मगर अपने अच्छे समय में हम बिल्कुल शांतचित्त होकर उसका आनंद उठायें, व विपरीत समय होने पर भी धैर्य बनाए रखें। 
      अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को 
कभी भी नीचा न होने दे, हम जीवन में जो भी कर रहे होते हैं, वह कोई और भले ही नहीं जानता हो, हम स्वयं तो जानते ही हैं।
    जैसे ही हम अपनी विशेषताओ पर सही तरीके से कार्य करना सीख जाते हैं, जीवन को सही अर्थों में हम जीना ही सीखने है।
    जीवन का हर पल आनंदमय व खुशनुमा ही है, मगर उसके लिए हमें बाह्य जगत के साथ अपने आंतरिक जगत यानी अपने मनोभावों पर भी कार्य करना होंगा।
     शांतचित्त  से हम सब घटनाक्रम जो हमारे जीवन में घटित हुए हैं, कुछ में तो हमारी मर्जी शामिल होती है, कुछ में नही।
       अगर प्रकृति ने हमें सामंजस्यता का गुण
प्रदान किया है, तो हमें आगे बढ़कर नेतृत्व करना ही चाहिये, क्योंकि यह गुण आपके नेतृत्व की क्षमता को प्रदर्शित करता है।
        इसी प्रकार हम अपने स्वभाव के अनुसार अगर अपनी जीवन शैली को ढालते 
हैं, तो हमें जीवन में प्रतिकूल भी अनुकूल जाना पड़ेगा। 
       अपने निजी स्वभाव को समझकर फिर उस पर पूर्ण रूप से , दृढ़ता पूर्वक अगर हम अमल करते हैं, तो हमें कामयाबी भी प्राप्त
होगी, व अपनी पहचान को हम अपने उस
गुण की बदौलत ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। 
       धन हमें भौतिक सुख सुविधाएं तो प्रदान कर सकता है, मगर हमारा आंतरिक वैभव हमारी असली पूंजी है।
       भौतिक व आध्यात्मिक  दोनों ही पहलू जरूरी भी है। 
      सबके अनुभव अपने हैं, समस्याएं भी अलग-अलग है, मगर अपने स्वभाव को समझकर हम अपने कार्य को अगर करते हैं,
और अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते हैं, धैर्य पूर्वक हम उनका सामना करते हैं, चीजों को वास्तविक रूप से किस प्रकार घटेगी ,देखते हैं, तो आपकी कामयाबी की राह पक्की है। 
विशेष:- हम सभी को ईश्वर ने कोई न कोई मौलिक विशेषता प्रदान की है, और उसी मौलिक विशेषता को हम पहचाने व पूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करें, आपका 
स्वाभिमान भी सुरक्षित रहेगा, कामयाबी  भी प्राप्त होगी, अपने लक्ष्यों के प्रति ईमानदार रहे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदेमातरम्।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
 आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, स्पंदन या तरंग पर, यह एक सूक्ष्म विज्ञान है, स्पंदन यानी किसी भी जगह या मनुष्य के भीतर या वहां पर वातावरण में जो भी स्पंदन या तरंगे विद्यमान है, वह किस प्रकार की है।
       सकारात्मक ऊर्जा है या नकारात्मक ऊर्जा है, किस प्रकार के स्पंदन वातावरण में व्याप्त है, यह निष्कर्ष ध्वनि जो वहां पर है, भले ही वह सूक्ष्म रूप में ही क्यों न हो, उस वातावरण की ऊर्जा को बदलने की अचूक सामर्थ्य रखती है। 
     जब साधारण रूप से कहे शब्दों का हमारे ऊपर प्रभाव होता है, तो सूक्ष्म ऊर्जा जो किसी भी वातावरण में है, वहां की ऊर्जा को नकारात्मक या सकारात्मक कर सकती है। 
      यह एक गहरे शोध का विषय है, पर सामान्य रूप से भी बातचीत द्वारा हम कौन सी ऊर्जा उत्पन्न कर रहे हैं, व अगर मौन भी है, तो कौन से स्पंदन हमारे भीतर चल रहे है,
हमारे भीतर सूक्ष्म तरंगे तो चल ही रही है, 
उन्ही तरंगों को हम किस प्रकार से सकारात्मक तरंगों में परिवर्तित करें, यही हमारा प्राचीन विज्ञान व दर्शन हमें बताता है। 
      आंतरिक ऊर्जा का परिवर्तन हम शनै शनै हमारे अभ्यास द्वारा कर सकते हैं, इसे हम विज्ञान या कला दोनों ही कह सकते हैं, यह दोनों का समन्वय है।
       इसे हम परा विज्ञान भी कह सकते हैं, कोई भी मंदिर या स्थान एक दिन में सिद्ध स्थल नहीं बन जाते हैं, वहां पर निरंतर पूजा -पाठ, 
हवन, आरती आदि नियमित किये जाते हैं,
जिससे वहां का वातावरण ऊर्जामय  हो जाता है, यही प्रक्रिया अगर हम अपने घरों में दोहराते हैं, तो घरों की ऊर्जा भी जो है, वह संतुलित होने लगती है। 
      निरंतर चलने वाली यह प्रक्रिया किसी भी स्थान या वस्तु या अपने आसपास के वातावरण को बदलने की एक अद्भुत सामर्थ्य रखती है, इस विज्ञान से हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षि भली भांति परिचित थे, भारतीय संस्कृति की गहराई को अगर हमें वास्तव में समझना है, तो हमें सूक्ष्म तरंगों पर कार्य करना होगा, हम स्वयं भी निरंतर अभ्यास द्वारा अपने  आप को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर सकतेहैं, हमारा शरीर कई प्रकार की ऊर्जाओं का एक जोड़ है, जब हमारा जन्म हुआ, उस समय जब हम मां के गर्भ में थे, तब जो ऊर्जा हमारे 
भीतर बन रही थी, बाद में जब जन्म हुआ तो हमारे आसपास भी भिन्न ऊर्जा वाले व्यक्ति, 
वस्तु के संपर्क में हम आते हैं, अपने जीवन काल के दौरान हम कई प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही ऊर्जाओं के मध्य अपना जीवन जीते हैं।
      हम अपनी आंतरिक ऊर्जा को तो निश्चित ही परिवर्तित कर सकते हैं, यह हमारे स्वयं के नियंत्रण में है, परंतु बाह्य ऊर्जा जो वातावरण से, परिवेश से, अनेक अन्य विचारों से, हमारे आसपास घट रही है, उस पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं होता। 
    हमारा जीवन व यह शरीर स्पंदनो को समझता है, यह समस्त ब्रह्मांड एक स्पंदन है, 
इसमें सभी प्रकार की ऊर्जा है, हम उनमें से किस ऊर्जा से संपर्क स्थापित करते हैं, या करना चाहते हैं, हम उसे ही जाने- अनजाने में आकर्षित करते हैं, बस यही समस्त ब्रह्मांड का सूक्ष्म व विराट दोनों ही स्वरुप है।
      सूक्ष्म से विराट, विराट से सूक्ष्म, हम इस ऊर्जा को किस प्रकार से देखते हैं, यह हमारी अपनी दृष्टि भी हो सकती है।
      प्राचीन महर्षियो ने गहरे शोध के बाद कई बातों को स्थापित किया, हो सकता , हम उन रहस्यो से परिचित नहीं है, पर सत्य है या असत्य, यह तो हमें निरंतर उस चेतना से जुड़ने पर ही प्राप्त हो सकता है।
          मगर स्पंदन की जो भाषा है, आप किसी के लिए भी आंतरिक रूप से अच्छा या बुरा जो भी भीतर से सोचते हैं, वह अंततः कार्य करता तो है।
        इतना तो मैंने स्पंदनों पर कार्य करने के बाद महसूस किया है, सूक्ष्म में जो चलता है, 
अंत में वहीं घटता है, क्योंकि उसके बीज हमारे भीतर विद्यमान थे, व उन्हें  उचित वातावरण अगर हमने प्रदान किया, तो वे निश्चित ही एक समय बाद  वे प्रस्फुटित होंगे 
ही।
         मेरा यह आलेख आप सभी को पसंद आयेगा, ऐसा मेरा मानना है, जो भी मैंने आंतरिक रूप से महसूस किया है, वही मैंने 
शब्दों के रूप में लिखा है। 
    आप सभी का दिन मंगलमय  व ऊर्जा पूर्ण हो, सभी के जीवन में समृद्धि आंतरिक व बाह्य दोनों ही प्रकार की, भौतिक व आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समृद्धि जीवन में बढ़े।
       सूक्ष्म स्पंदनों के साथ हम  इस लेख को आज विराम देते हैं, शेष फिर ।
     विशेष:- स्पंदन हम चाहे या न चाहे, अपना कार्य करते ही है, परिवार से ,व हमारे जन्म से 
जो भी हमें प्राप्त हुआ, पूर्व जन्म, इस जन्म वह आगे अभी हम क्या कर रहैं हैं? कितने प्रकार के विभिन्न स्पंदनों के मध्य हमारी यह
जीवन यात्रा चल रही है, किन स्पंदनों की और हम आकर्षित हो रहे है, कुछ तो हमारे हाथ में
हैं, कुछ हमारे हाथ नहीं भी है, इस प्रकार यह एक मिला-जुला स्वरूप है। 
      वैसे गहरी आत्म शक्ति द्वारा हम अपने पूरे जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं, अगर हम इसे सही रूप में समझ सके तब। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद, 
वंदे मातरम्।

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, गरिमा यानी कि हर व्यक्ति का आदर, हर वह वस्तु भी जो हमें प्राप्त है, जो भी साधन हमें प्राप्त है, उनके प्रति  आदरयुक्त होना, उन्हें सम्मान प्रदान करना, समय अगर अच्छा चल रहा है, तो पूर्ण गरिमा व विनम्रता से उसका भी सम्मान करें, 
विपरीत समय का भी गरिमा पूर्ण तरीके से स्वागत करें, इसका कारण यह है कि विपरीत समय हमें सिखाता है, विपरीत समय हमें संघर्ष का मूल्य बताता है,  तो उसे भी गरिमा हम प्रदान करें, विपरीत समय ही वह समय काल है, जब आपका व्यक्तित्व निखर रहा था, समय के संघर्ष से। 
     तपे बिना तो स्वर्ण में भी निखार नहीं आता, जो व्यक्ति जितने विविध अनुभव व कठिनाइयों से गुजरता है, वह उनसे सीख प्राप्त करता है।
      सीढ़ी दर सीढ़ी उसकी यात्रा चलती है,
वह उस यात्रा को अपनी बुद्धिमत्ता, जिजीविषा व अथक परिश्रम द्वारा सार्थक बनाता है।
       कोई भी व्यक्ति एक दिन में महामानव नहीं बनता, यह एक निरंतर चलने वाली यात्रा है।
    हम सभी ईश्वरीय शक्तियों के मालिक हैं,
पर हम उनका सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग, जो भी इन शक्तियों का स्वयं के लिये, परिवार के लिये, समाज के लिये 
सदुपयोग करता है, अंततः वही विचारधारा ही उसे उस प्रकार के कर्म की और प्रेरित करती 
हैं, व धीरे-धीरे वह अपनी उस यात्रा को वहां 
तक ले जाता है, जिसके लिये आखिरकार उसका जन्म हुआ है, वह प्रेरणा उसे भीतर से प्राप्त होने लगती है। 
      यह सब अनायास नहीं होता, आंतरिक प्रज्ञा जब मनुष्य की जागृत हो जातीं है, तो वह गरिमामय जीवन स्वयं तो जीता ही है, अन्य सभी के लिये भी प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। 
     शब्दों की भी गरिमा है, हम क्या सोच रहे
हैं? उसके पीछे का हमारा मूल हेतु क्या है?
क्या वह किसी के हित की भावना से प्रेरित है, या अहित के भाव से, जब भी हमारा हेतु स्वयं का स्वार्थ न होकर परमार्थ की शक्ति से प्रेरित होता है, हम भीतर से शक्ति युक्त होते हैं। 
     हमारी शक्ति व सामर्थ्य अगर हम स्वयं के, परिवार के वह समाज के संवर्धन में लगा रहे हैं, तो निश्चित इसके दूरगामी  परिणाम आपकी गरिमा में वृद्धि करेंगे।
        यह यात्रा कोई सामान्य यात्रा नहीं है, यह मानव के मानवीय परिष्कार की एक अद्भुत यात्रा है, जो भी अपने जीवन काल में यह तथ्य समझ जाता है, वह फिर अपने आप उस यात्रा की और खींचा चला जाता है।
       कोई अज्ञात शक्ति आपको प्रेरणा भीतर से प्रदान करती जाती है, मार्ग प्रशस्त करती जाती है, और आप अपने पथ पर आगे बढ़ने लगते हैं। कोई तो ऐसी शक्ति अवश्य ही  इस संपूर्ण ब्रह्मांड में विद्यमान हैं, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन कर रही है। 
      हम और आप केवल निमित्त होकर अपनी अपनी भूमिकाओं का निर्वहन भर कर रहे हैं।
    यह कितनी कुशलता पूर्वक व गरिमामय  तरीके से हम कर पाते है , वही हमारी व सभी की यात्रा है, भीतर से बाहर की और, अंतः प्रेरणा से, स्वप्रेरणा से जागृति की और। 
       अपनी गरिमा सदैव बनाये रखें, कोई विपरीत भी आपसे जा रहा हो, जाने दे, कोई अनुकूल भी है, तो भी ज्यादा गर्व न करें। 
     दोनों ही स्थितियों में शांत चित्त रहे, व अपने मौलिक स्वभाव, जो प्रकृति ने आपको प्रदान किया है, दयामय, क्षमाशील, उसे धारण करके रखें। 
      जीवन में अनुकूलता-प्रतिकूलता, यश-अप यश, मान-अपमान यह सभी अवसर आयेंगे ही, पर अपने मूल मार्ग से विचलित न होना ही अपनी गरिमा बनाये रखना है।
विशेष:- हर क्षण आपकी परीक्षा की घड़ी है, आप उसमें क्या करते हैं? वह आपकी स्वयं की ही चुनी हुई राह है, अक्सर कामयाबी की राह बड़ी व बाधाओं से भरी होती है, चुनौतियों से परिपूर्ण होती है, मानवीय जीवन की गरिमा उन चुनौती पूर्ण स्थितियों को स्वीकार कर
उन्हें अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग जब हम मान लेते हैं, तो वे चुनौतियां ही हमें गरिमा प्रदान करने लगती है, पूर्ण साहस से उनका सामना करें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
        हम हमारे सभी कार्य करते हुए भी अपनी आंतरिक शांति को बनाए रख सकते है, धीमे-धीमे हम अपने कदम मजबूती से बढ़ाते जाएं, जीवन में समन्वय की कला जिसे भी आ गई, फिर उसके लिए कोई भी कार्य इस जगत में, संसार में कठिन नहीं है, जो निरंतर जगरुक है, अपने भीतर व बाहर दोनों ही क्रिया कलापों में  पूर्ण होशपूर्वक अपने जीवन के निर्णयों को करता है, परिस्थितियों का सही तरीके से अध्ययन करता है, भूतकाल में की गई गलतियों से सबक सीखता है, वर्तमान क्षण में सही निर्णय को करता है, अपने आसपास घट रहे परिदृश्य का सावधानी पूर्वक जो अध्ययन- मनन करता है,
वह अपने इसी जीवन काल में समस्त उपलब्धियों को हासिल करता जाता है।
   दृढ़ निश्चय से बढ़कर जीवन में कुछ भी अधिक मूल्यवान नहीं है, मगर वह दृढ़ निश्चय, संकल्प अपनी स्वयं की आंतरिक शांति, घर में शांति व समाज में शांति किस प्रकार स्थापित हो?   किस प्रकार से हम समन्वय करे, कि स्वयं का, हमारे घर का, जहां हम रहते हैं, उस स्थान का व समाज का, इन सब बातों के बीच में आप कितना बेहतर तालमेल बिठा पाते हैं, उन सभी से कितनी खूबसूरती से समन्वय बिठा पाते हैं, जैसे-जैसे आप परिपक्व होंगे,
जीवन के अनुभव बढ़ने लगेंगे, और वही जीवन के जो निजी अनुभव है, वही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है, भौतिक धन हमें एक बार प्राप्त होने पर वह कितने समय हमारे हाथ में  रहेगा, यह हमें भी पता नहीं होता है। 
     अगर आप किसी भी कला में माहिर हो या कोई ऐसा कर्म आप कर रहे हैं, जिसे आपने अपने जीवन में समय दिया है, तो वह कला आपके लिए वरदान है, क्योंकि वह आपकी ऐसी निजी संपत्ति है, जिसे आपने वर्षों की मेहनत के फल स्वरुप पाया है। 
       समाज के भीतर जो भी बुजुर्ग है, वे अपने अनुभवों की परिपक्वता के कारण 
आदरणीय व पूजनीय है, व हर परिस्थिति से जो उनके जीवन काल में उपस्थित हुई, उसका उन्होंने किस प्रकार धैर्य पूर्वक सामना किया, 
वह हमें इसका ज्ञान दे सकते हैं। जीवन में मात्र भौतिकता ,मात्र आध्यात्मिकता या केवल सामाजिक संबंध, यह तीनों ही अपने आप में अपूर्ण है, जब तक इन तीनों का सही तरीके से समन्वय हम अपने जीवन में नहीं करते, हम सही परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते। 
        भौतिक साधन जीवन यापन के लिये,
आध्यात्मिक ऊर्जा हमें चेतनायुक्त रखने के लिये, सामाजिक सौहार्दपूर्ण संबंध हमें सामाजिक ऊर्जा से, सकारात्मक ऊर्जा से युक्त करते हैं, हम जितना इन बातों को गहराई से समझते हैं, उतना ही हमारा जीवन शांतिपूर्ण ढंग से चलने लगता है। 
      और स्वयं का अनुशासन इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो भी व्यक्ति स्व अनुशासन का पालन करता है, वह अधिकतम उपलब्धियां को अपने इसी जीवन काल में प्राप्त कर सकता है।
         एक बार अपनी जीवन यात्रा में जो भी आप कर रहे हैं, सही तरीके से समझने का ईमानदार प्रयास आप अवश्य करें, आपके जीवन की दिशा एक सकारात्मकता की और जब बढ़ती है, तब आप अपना स्वयं तो सुधार करते ही हैं, कई अन्य लोगों के लिए मजबूत प्रेरणास्त्रोत भी आप बन जाते हैं।
      जितना हम गहन अध्ययन करेंगे, हमारे जीवन को उतना ही बेहतर हम कर पायेंगे,
इसमें तनिक भी संदेह नहीं, तो इस प्रकार तीन प्रकार की ऊर्जा, भौतिक, आध्यात्मिक, 
सामाजिक इस त्रिवेणी को हम अपने जीवन में स्थान दें, आपको फिर किसी अन्य त्रिवेणी स्नान की आवश्यकता ही महसूस नहीं होगी। 
      अगर इन तीनों का सही समन्वय आपने अपने जीवन में जिया है, व उस पर ईमानदारी पूर्वक आप चले हैं, तो आपका वर्तमान व भविष्य दोनों ही उज्जवल है।
     मानस में मंथन लगातार हम करते रहे, 
स्वयं का, जितना हम मंथन करेंगे, उतने ही अधिक मोती हमें प्राप्त होंगे।
विशेष:- अपने जीवन में अपने अनुभव, बुजुर्गों के अनुभव, स्वयं कुछ नया सीखने की ललक 
व युवा वर्ग से बेहतर तालमेल, अगर हम यह  50 से 70 वर्ष के बीच का जो समय है, वह जो उम्र के इस दौर से गुजर रहे हैं, वे यह कर पाये तो शेष जीवन बेहतरीन अंदाज में जीते हुए इस संसार से प्रयाण करेंगे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
 
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन,
     आप सभी को मंगल प्रणाम, 
          आज प्रवाह में हम बात करेंगे भूत, वर्तमान ,व भविष्य।
      क्या हम हमारे भूतकाल को जो बीत गया, उसे बदल सकते हैं, उत्तर होगा नहीं,
तब हम भूतकाल में जो भी घटित हुआ है, 
उससे केवल हम सबक ले सकते हैं, उसके अलावा उसका और तो कोई भी औचित्य नहीं हैं।
     वर्तमान जो समय है, केवल वही हमारा है, वर्तमान में हम जो भी करेंगे, भविष्य का निर्माण उसी से होगा।
      उपयुक्त क्या होगा?  हम वर्तमान समय में पूर्ण सजग रहे व उस पर संपूर्ण ध्यान दें, तभी हम हमारे भविष्य को सही कर सकते हैं।        भूतकाल से हम सबक सीखें, वर्तमान में रहे, भविष्य दृष्टा बने, आगे से आगे क्या घटनाक्रम घटेगे, व आज हम जो भी कर रहे हैं, निश्चित ही हमारे भविष्य का निर्माण उसी से होगा। 
      भविष्य निर्माण के लिए आवश्यक है, कि हम वर्तमान में पूर्ण सजग रहकर भविष्य की और दृष्टि रखें। 
       अपने सपनों को चुने, फिर उन पर पूर्ण ईमानदारी, स्पष्ट नीति व धैर्य पूर्वक हम आगे बढ़े, भूतकाल को बदला नहीं जा सकता, मगर वर्तमान समय का सही उपयोग हम अगर करते हैं, तो भविष्य निश्चित ही हमारा सुखद व सुदृढ़ होगा।
    इस प्रकार हम अपने जीवन को व्यवस्थित क्रम से आगे से आगे लेकर जाये।
     आजकल आधुनिक साधनों का सही प्रयोग करके हम समय व श्रम दोनों की ही बचत कर सकते हैं, धन,समय, व श्रम इन तीनों का सही उपयोग हम करें, समय भी धन है, उसे हम सही जगह नियोजित करेंगे तो हमें बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे।
        परिश्रम से कभी  न घबराये, हमारा परिश्रम ही हमें आगे कर सकता है, अन्य कोई भी  उपाय जीवन में नहीं। जितना अधिक हम योजना बद्ध तरीके से कार्य करेंगे, उतने ही आश्चर्यजनक परिणाम हमें प्राप्त होंगे।
       व्यवहारिक नियमों को जीवन में स्थान दें, आपका व्यवहार ही आपको आगे ले जाता है, 
विनम्रता पूर्वक व्यवहार करें। 
       विनम्रता वह आभूषण है, जो हमें सफलता के शिखर पर लेकर जा सकता है,उसे कभी भी न खोये, वह आपके मूल 
व्यक्तित्व की पूंजी है।
     आशावादी रहे, अपनी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करें, धीरे-धीरे, लेकिन किसी भी कार्य 
में परिणाम आने में समय तो लगता है। 
    धैर्य पूर्वक अपनी यात्रा को जारी रखें, 
निरंतरता बनाये रखें।
    आंतरिक शक्ति व सामर्थ्य, जो की सबसे 
अधिक महत्वपूर्ण है, उसे अपनी ताकत बनाये, दृढ़ इच्छा शक्ति को धारण करें,
अंततः आप सभी बाधाओं को पार करते हुए 
आपने जो भी लक्ष्य लिया है, उस लक्ष्य पर अपना पूर्ण ध्यान केंद्रित करें, दिशा भ्रमित न
हो। क्या करना है? उसे भीतर बराबर दोहराते रहें, जब आप बारंबार किसी एक तथ्य या
वस्तु या विषय के बारे में सोचते हैं, तो यह बह्मांड आपको उन लोगों से मिलायेगा व आप प्रगति के पथ पर अग्रसर हो जायेंगे।
      आपका जो भी मुख्य लक्ष्य है, वह आपकी स्वयं की स्थिति के अनुसार सबसे बेहतर आप क्या कर सकते हैं? ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित होने से आप फिर उस दिशा में ,
आपने जो भी लक्ष्य लिया है, उसे करने की कोशिश करेंगे, व आप उस लक्ष्य के अधिकतम नजदीक भी होंगे।
      जीवन में स्वप्न जरूर देखें, क्योंकि वह आपके लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं, विचलित न हो, धैर्य पूर्वक अपने लक्ष्य को पार करें। 
विशेष:- भूतकाल से सबक प्राप्त करें, वर्तमान में रहे, वर्तमान में आप किस प्रकार से कार्य करें, जिससे आपके उज्जवल भविष्य का निर्माण हो, बस यही इसका सारांश है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम बात करेंगे युवा वर्ग व समाज। 
       आज समाज में जो विकृति सबसे अधिक उत्पन्न हो रही है, वह है बगैर किसी 
प्रयास के उपलब्धियां को पाने की चाह। 
   एक अजीब सी मृगतृष्णा में हमारा समाज आज है, नैतिक मूल्यों की जो गिरावट आज समाज में देखी जा रही है, वह युवा वर्ग को भी प्रभावित करती है। 
     सृष्टि में सब कुछ नियमानुकूल ही प्राप्त होता है, संघर्ष करने पर ही हमें प्रतिफल प्राप्त होते हैं, सबसे पहले मेरी युवा वर्ग से अपील है, वह पहले अपनी आदत को अवश्य बदले, 
अगर वह सामाजिक रूप से सक्रिय नहीं है, 
लोगों से मिलता जुलता नहीं है, तो सर्वप्रथम समाज में सक्रियता की आदत डालें, इसके साथ ही अच्छे साहित्य का अध्ययन अवश्य करें , अपनी अभिरुचि को किताबों या कोई भी कार्य, जो उसे भीतर से सुकून प्रदान करता है, उसे जीवन में अवश्य अपनाये।

       हम जैसा भी सोचते हैं, आखिरकार हम उस दिशा में फिर कर्म भी करते हैं , व हमारे कर्म की दिशा सही होने पर परिणाम भी अच्छे ही प्राप्त होंगे। 
     युवा वर्ग को चेतना युक्त आचरण करना चाहिये, आज का समय कठिनतम प्रतिस्पर्धा का दौर है, तब तो युवाओं को और अधिक संकल्पबद्ध होकर सही दिशा में सक्रिय होना होगा, सदैव प्रयासरत रहे। 
     जीवन में अपने से जो भी अनुभवी लोग हैं, उनके पास कुछ समय अवश्य बिताये, उनके अनुभव हमेशा ही आपको कुछ बेहतर दिशा दे  पायेंगे।
      उनके अनुभव व वर्तमान की चुनौतियां, 
जो निश्चित ही उनके समग्र अनुभव से मेल नहीं भी रखती हो, मगर फिर भी अनुभव तो अनुभव ही होता है, लोगों की परख करना भी उनसे सीखे। 
        जीवन में कोई ना कोई लक्ष्य अवश्य रखें, जो आपके भीतर से प्रेरणा प्रदान करें, फिर उस लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपने आप को समर्पित कर दें।
      युवा ही आने वाले समय में इस देश के 
कर्ण धार है, उनमें सही दिशा बोध हो, इसके लिए समाज को  भी जागरूक  होना  चाहिये,  युवाओं का मार्गदर्शन करना चाहिये, उनमें सामाजिक व नैतिक मूल्यों के प्रति आस्था उत्पन्न करना, यह भी हमारा सामाजिक दायित्व है। 
      इस समय वर्तमान काल में युवा वर्ग धन प्राप्ति व भौतिक साधनों की प्राप्ति हेतु तो सजग है, व उन्हें प्राप्त भी कर लेता है, मगर मात्र भौतिक उन्नति की और ध्यान होने से 
मानवीय जीवन के अन्य पक्ष सामाजिकता, 
स्नेह व आध्यात्मिक चिंतन के अभाव में वह सब कुछ पास में होते हुए भी भीतर से एक रिक्तता का अनुभव करता है, पर इन सभी में उसका भी क्या दोष है? आज हम हमारी सामाजिक व्यवस्था को देखें, तो कथनी व करनी में जो अंतर है, वह अंतर ही वह जब देखता है, तो उसके भीतर एक आक्रोश का जन्म होता है। 
     हमारे सामाजिक मूल्यों का धराशायी होना न केवल हमारे लिये बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए भी अत्यंत घातक है, इस और ध्यान देने की आवश्यकता है, हम सभी उसी परमपिता के एक छोटे से अंश है, शांति की तलाश हम बाह्य साधनों में करते हैं, जबकि आंतरिक शांति हमेशा हमारे भीतर ही विद्यमान होती है। 
      युवा वर्ग को भौतिक व आध्यात्मिक जीवन के इन दोनों ही पहलुओं को समझना होगा, यह मानो एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू है, मगर अनिवार्य भी है। 
      युवा वर्ग समाज का एक अंग है, अगर वह आध्यात्मिक ऊर्जा से संपन्न न हुआ, तो सभी साधन होते हुए भी सामाजिक मूल्यों के अभाव में वह आंतरिक अतृप्ति का अनुभव हमेशा करेगा, व भीतर आंतरिक अशांति होने पर बाह्य साधनों की प्रचुरता भी उसे वह नहीं दे पायेगी।
     उन्हें जीवन का संतुलन किस प्रकार वह करें, यह अनिवार्यतः सीखना ही होगा, हम सब समाज में रहते हैं, समाज से ही हम प्राप्त करते हैं, व समाज में ही हम सभी से मिलते हैं, व अपनी व्यवहार कुशलता के बल पर हम समाज में अपना स्थान बना लेते हैं, इसी 
व्यवहार कुशलता का अभाव हम युवा वर्ग में आज देखते है।
          उनके भीतर दायित्व बोध को जगाना,
कि हम समाज में रहते हैं, तो अपने साथ-साथ समाज के प्रति जो हमारा कर्तव्य है, वह भी हम करते रहे, प्रथम तो हम जीवन में कृतज्ञता को धारण करें, उस परमात्मा को धन्यवाद दें, 
इस सृष्टि में, हमारे आसपास, परिवार व समाज के जो व्यक्ति हैं, उनके पति हृदय से कृतज्ञ हो, यही कृतज्ञता का भाव हमें  आंतरिक शक्ति  व शांति दोनों ही प्रदान करता है। 
       समाज में युवाओं को जुड़ना चाहिये,
समाज कल्याण मे ही हमारा भी कल्याण निहित है, छिपा है, यह समझ हमें युवा वर्ग में समाज के प्रति विकसित करनी होगी। 
      जब हम समाज से कुछ ले रहे हैं, तो हमारा यह कर्तव्य बनता है, हम समाज को भी कुछ दे, कृतज्ञता पूर्वक , अहोभाव से उनका धन्यवाद करें।
       जीवन तो जीना ही है, मगर हम जीवन को किस प्रकार से, प्रज्ञा पूर्वक जिये, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 
      युवा वर्ग के भीतर हमें एक उत्साह का भाव, कृतज्ञता का भाव जगाना होगा, युवा पीढ़ी को दिशा बोध प्रदान करना , सामाजिक दायित्व भी हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग है, उसकी कभी अनदेखी न करें। 
विशेष:- युवा वर्ग को मात्र भौतिक साधनों से परिपूर्ण कर देना ही शिक्षा का व समाज का उद्देश्य नहीं होना चाहिये, उसका सर्वांगीण विकास, यानी उसके व्यक्तित्व का विकास 
वह भी एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है, उन्हें सामाजिक परिवेश में किस प्रकार से रहना है, 
समाज में आना-जाना, वह करते हुए  कर्तव्य कर्मों को भी निभाना, जो सामाजिक व्यवस्था का एक अनिवार्य अंग है, समाज के प्रति   कृतज्ञता का होना, यह युवा वर्ग के चरित्र का एक अनिवार्य अंग होना चाहिये।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद, 
जय भारत, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    देश में बिहार चुनाव पर चर्चा चल रही है,
एक बात जो राजनीति में देखने को मिल रही है, वह है व्यर्थ का धन प्रदर्शन व बाहुबल का
प्रदर्शन, बिहार राज्य क्या देश से अलग है?
    जो बिहार की अस्मिता के नाम पर लड़ा जा रहा है, यह तो भावनात्मक शोषण है, कभी महाराष्ट्र में भाषा के नाम पर, बिहार में बिहारी अस्मिता के नाम पर, इस तरह तो भारत देश विखंडन की राह पर चलेगा। 
     सभी पक्ष विपक्ष के राजनीतिक दल क्या अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा में देश को पीछे करेंगे। 
   इतने सालों बाद भी देश में कई ऐसे मुद्दे हैं,
जो बहुत ही गौर करने लायक है, हां, पर प्रशांत किशोर जी का यह कथन की बिहार में अभी तक तरक्की जिस तरीके से होना चाहिए थी, वह नहीं हुई, स्थानीय रोजगार और शिक्षा पर कार्य नहीं हुआ, वह सही है, पर इसके लिए राजनीतिक दल सभी चाहे वह पक्ष में हो या विपक्ष में ,दोषी तो है। 
     देश में राजनीतिक दलों को भी एक सर्वमान्य नियमों को अपनाना चाहिए, जो भी कार्य देश हित में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो, उन्हें महत्व प्रदान करना चाहिए। 
जब तक देश में एक सर्वमान्य नीति जो भी इस देश के संपूर्ण हित में हो, नहीं तय की जाती, देश में अभी भी सुधार की गुंजाइश है। 
     वर्तमान समय में राजनीतिक परिदृश्य में 
जो आरोप व प्रत्यारोप लगाए जाते हैं, क्या हमें उनसे कोई दिशा प्राप्त हो रही है? 
      शिक्षा, रेलवे, डाक सेवाएं, बैंकिंग यह ऐसे विभाग है, जिन पर सरकार का नियंत्रण होना जरूरी है। 
   हर किसी विभाग का निजीकरण होने से जो सरकार का नियंत्रण है ,वह समाप्त होता है, और यह स्थिति देश हित में उचित नहीं कहीं जा सकती। 
     स्थानीय रोजगारों को प्रथमिकता, व्यवसाय में छोटे, घरेलू व मंजुले उद्योगों को प्रोत्साहन जरूरी है। 
     देश में संसाधनों की कमी नहीं है, नेतृत्व   वर्तमान में  क्या सबसे बेहतर हो सकता है? 
उस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है,
आज देश में राजनीति में दिखावे पर जितना खर्चा किया जाता है, उतना ही अगर संसाधनों का सही प्रयोग करने पर किया जाये, तो तस्वीर कुछ और हो सकती है।
     भारतीय राजनीति का एक अलग परिवेश है, अलग-अलग प्रांत, उनकी अलग समस्याएं, जब तक स्थानीय समस्याओं का सही समाधान नहीं निकाला जाता, उन्हें प्राथमिकता नहीं प्रदान की जाती, तब तक दिक्कतें आती ही रहेंगी।
   बिहार में पहली बार राजनीतिक मैदान में उतरे श्री प्रशांत किशोर जी ने "जन-सुराज"
के माध्यम से जो सवाल उठाये हैं, वह निश्चित ही प्रासंगिक तो लगते हैं, अब देखना यह है जनता कितना उनका समर्थन करती है, वैसे भी बिहार क्रांतिकारी परिवर्तनों का गढ़ है, किसी समय श्री  जयप्रकाश नारायण ने भी यही से राजनीतिक बदलाव की शुरुआत की थी, जब आपातकाल के बाद उन्होंने जनता दल का गठन किया था, अब फिर वैसी ही बदलाव की आहट बिहार में सुनाई देने लगी हैं। इस समय श्री प्रशांत किशोर जी ने जान स्वराज के माध्यम से जिन विषयों को जन सुराज के माध्यम से उठाया है, वह निश्चित ही जनता को झकझोरते  तो है, मगर उनकी है बातें जनता के वोटो के रूप में तब्दील कैसे होगी, यह एक देखने लायक बात है, वैसे हमारे देश की जनता कई बार चौंकाने वाले फैसले करती रही है, और इस मामले में जनता निसंदेही कई राजनीतिक दलों के
अनुमानो को ध्वस्त कर चुकी है, अगर जनता ने परिवर्तन का मन बना लिया है, तो प्रशांत किशोर जी की जीत तय है, मगर क्या जनता बदलाव का मूड बना चुकी है, और अगर बदलाव का मूड बना भी है तो क्या वह जन सुराज के पक्ष में है, इन सब बातों का पता तो बिहार चुनाव पूर्ण होने के बाद जब परिणाम आएंगे तभी  पता चलेगा, अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
       सभी राजनीतिक दल जो नई-नई घोषणाएं जनता को पैसा बांटने की करते हैं, वह स्वस्थ लोकतंत्र की दृष्टि से तो कतई उचित नहीं है, एक तरीके से यह तो अपरोक्ष रूप  से वोटो की खरीदी ही है, मतदाता को जागरूक होना होगा, उसे प्रलोभनों से दूर रहकर जो सही स्थिति है और जो सही समाज हित में होना चाहिये, वही फैसला करना चाहिये।
      अगर देश में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराया जाये तो इस प्रकार के
प्रलोभनो की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
    देश की जनता को भी समझना चाहिये,
हमारा कीमती मत बिकाऊ नहीं है, आत्म सम्मान व स्वाभिमान के साथ खड़े होने के लिए यह जरूरी भी है। 
    स्वस्थ प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिये हमें स्वरोजगार वह स्थान स्तर पर क्या अच्छा हो सकता है, इस और ध्यान देने की आवश्यकता है।
      यही देश के मतदाताओं से उम्मीद है, अगर जनता सही तरीके से इस चीज को समझ जाये तो इस बार बिहार में हमें बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। और इस समय देश में इसकी जरूरत भी है, स्थानीय स्तर पर अगर रोजगार के सही अवसर उत्पन्न किया जाये तो फिर बिहार क्या किसी भी प्रदेश में वहां के लोगों को बाहर नहीं जाना पड़ेगा। 
विशेष‌ - भारतीय राजनीति एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, जनता को भी चाहिए कि वह सही परिपेक्ष्य में चीजों को देखे व समझे,
अब एक पुनर्निर्माण की और हम अग्रसर हो, 
और इसके लिए जरूरी भी है कि बदलाव अवश्य हो।







प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
            आप सभी को मंगल प्रणाम, प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में आप सभी का हृदय से स्वागत।
      आज हम बात करेंगे, आत्म शक्ति पर, हमारी आत्म शक्ति ही, हमें संघर्ष जीवन के जो भी हमारे सामने उपस्थित होते हैं, उन संघर्षों 
 में हमें विजय श्री प्रदान करते हैं, स्थितियां चाहे कितनी ही प्रतिकूल ही क्यों न हो, प्रबल आत्मविश्वास हमें उन सभी से पार करता है, 
            प्रबल आत्क्तिमविश्वास द्वारा ही हम परिस्थितियों का सामना करते हैं, अपनी आंतरिक शक्ति को हम कभी भी क्षीण न होने दे, वह आत्म शक्ति ही हमें समझ प्रदान करती है, धैर्यता देती है।
       अनुकूल परिस्थितियों सदैव नहीं होती, 
प्रतिकूल परिस्थितियों भी सदैव नहीं होती,
अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियां जायेगी, समय ने जो लिख रखा है, वह तो अवश्य घटेगा, घटनाक्रमों से विचलित न होते हुए अपने प्रयासों में निरंतरता बनाये रखें।
          बुद्धि पूर्वक, श्रद्धा पूर्वक, मनोयोग से हर पहलू को हम देखें, जांचे, परखे, फिर हम आगे बढ़े, व्यवधान कोई भी हो, अधिक समय तक वह रहने वाला नहीं, किसी भी निर्णय को लेने से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार करें, तो हम निर्णय ले सकेंगे। 
     अगर हमारी दिशा सही है, तो प्रयत्न करते रहने पर हमें परिणाम अवश्य प्राप्त होंगे।
  कर्म की गति बड़ी ही गहन हैं, आप और हम कई बातों का निर्धारण नहीं कर सकते, कई कर्म सूक्ष्म होते है, कई कर्म हम जानते ही नहीं, सही है अथवा नहीं?    फिर भी हम कर देते हैं, इस प्रकार हम काल व परिस्थितियों के आधीन होते हैं, कई बार हमें सब पता होता है, पर हम विरोध करने की स्थिति में नहीं होते हैं।
     इस कलि- काल में केवल नाम सुमिरन ही हमें समस्त प्रकार के तापों से मुक्त कर सकता है, अन्य कोई भी उपाय है ही नहीं।
     भगवान  का नाम सुमिरन करने पर हम आंतरिक रूप से जागृत होते हैं, हमारे द्वारा 
फिर  कोई गलत आचरण नहीं होगा ,
क्योंकि परमात्मा का नित्य सुमिरन हमें धीरे-धीरे सही मार्ग की और ले जाता हैं, जिससे हमारा जीवन-पथ आलोकित होने लगता है।
        जिनकी कृपा मात्र से अनेकों प्रकार के
संकट स्वमेव हटने लगते हैं, परमात्मा हमें स्वयं प्रेरित करने लगता है, वह अपने भक्तों पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं, जो आंतरिक भाव से प्रभु से जुड़ जाता है, उसकी सारी समस्याएं फिर प्रभु स्वयं हल करने लगते हैं, निस्वार्थ भाव से उनका सुमिरन अत्यंत ही मंगलकारी होने लगता है।
      नित्यप्रति उनकी मंगल शरण में रहने से फिर सब मंगल ही होगा , ऐसे परमेश्वर की हम नित्य शरणागति हो, उनका परम वंदन करते रहे। अपने नित्य कर्तव्य कर्मों को करते हुए भी हम उनका लीला गान करते रहे, यही एकमात्र मंगल उपाय है, जो हमें हर प्रकार के दोषो से रहित करता जाता है।
         हमारे सारे कर्म उसकी मंगल कृपा से भस्म हो जाते हैं, जीवन हैं, तब तक हमें जीना तो होगा ही, युक्ति युक्त तरीके से, उनकी मंगलमय शरणागति होकर रहे, उनके मंगल आश्रय में  रहे।
       जो भी घटे, वह उनकी असीम अनुकंपा से घटे, मंगल हो या अमंगल, जो भी प्रभु की इच्छा हो, वह हो, ऐसी अनन्य शरणागति भाव से जीवन की  डोर हम उनसे बांध ले।
       आत्मबोध हो जाने पर फिर हम चाहे गृहस्थाश्रम में हो, अपने निजी कर्म को करें,
कहीं भी रहे, परम कृपा शरण  में रहे।
    नित्य उनकी मंगलमय कृपा का अनुसरण करते रहे। 
     नित्यं ध्यायंते योगिन:, योगी  जन  जिनको नित्य भजते हैं, भक्तजन जिनकी कृपा का सदैव अनुभव करते हैं, कर्मयोगी अपने कर्म द्वारा जिनका मंगलमय आचमन करते हैं,
इस प्रकार इस संसार सागर को पार करने में हम सक्षम नहीं, उनकी मंगल कृपा का नित्य अनुभव करते रहे, सांसों में वह बसा है, हर क्षण उसका मंगल सुमिरन चलने दे।
       परमात्मा का सुमिरन करते रहें, उसकी कृपा सदैव बरस रही है। 
विशेष:- अपनी आंतरिक आत्म शक्ति को कभी भी क्षीण न होने दे, संसार में जो भी सफल हुआ है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो,
उसकी मंगलमय कृपा आधार बिना कुछ संभव ही नहीं है, परमेश्वर आप सभी पर कृपा करें, हम सभी चाहे या ना चाहे, उसके आधीन है, जो भी घटे, वह मंगल ही घटे, यही मंगल कामना। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद, 
जय भारत, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में आप सभी का स्वागत है।आज हम बात करेंगे उम्मीद व वास्तविकता में क्या अंतर है? 
       कोई भी इंसान में अगर कल कुछ बेहतर होगा, इसकी उम्मीद कायम है, तो वह जीवन में कभी भी निराश नहीं होंगा, अगर उम्मीदे  कायम है, तो वह उम्मीद के सहारे कुछ न कुछ
प्रयत्न अवश्य करेगा व कामयाब भी होगा। 
       अगर जीवन में उम्मीद ही न हो, तो मनुष्य फिर क्यों अपनी भाग -दौड़ करेगा, वह तो निष्क्रिय हो जायेगा ।
      निष्क्रिय हो जाने पर तो वह कुछ भी नहीं पा सकेगा, पर उम्मीद के साथ-साथ आप वास्तविक धरातल पर हम क्या कर सकते है?
 यह हमेशा देखें। 
         उम्मीद जीवन में आशा व उत्साह का संचार करती है, वह हमें अपने स्वप्नों पर खरा उतरने के लिए प्रेरित करती है, हमें अनिवार्य जीवनी शक्ति प्रदान करती है, जीवन संघर्ष में हमारी सहायक होती है।
       भिन्न-भिन्न प्रकार की विचारधारा, भिन्न लोग, अलग-अलग परिस्थितियां, इन सबसे अगर हम रूबरू होते हैं, तो वह कौन सी शक्ति है? जो हमारे मनोबल को अत्यंत विपरीत समय में भी साहस प्रदान करती है।
तो वह उस परमपिता की कृपा ही है, जो हमारा मार्गदर्शन करती है, उनकी मंगल कृपा से हम परिस्थितियां विपरीत होने पर भी साहस करते हैं, वह फिर जो भी हमारा लक्ष्य 
हो, उसे पाते है।
       जीवन में हमें भौतिकता,आध्यात्मिकता, 
व्यावहारिकता, मनोवैज्ञानिक पहलू, वास्तविकता में क्या हो रहा है? इन सब पर अपनी पैनी दृष्टि रखना चाहिये?
     अंतर्मन में सदैव मंगल का भाव रखते हुए 
वर्तमान परिस्थितियों को सही ढंग से समझते हुए हम प्रयास करते रहें, यही केवल हमारे हाथों में है। 
      निरंतर प्रयास जब हम किसी भी एक दिशा में करते हैं, तो हमें सफलता प्राप्त हो जाती है। 
           नित्य ,निरंतर उस परमात्मा का अवश्य सुमिरन करते रहे, वही हमें सब और से शक्ति व सामर्थ्य को प्रदान करने वाला है।
       विपरीत समय में साहस देने वाला व अपनी शरण में रखने वाला है।
     सभी को हृदय से प्रणाम करें, अपने भावों को नित्य शुद्ध करते रहें,  समय से जो भी घटेगा, वह घटेगा ही, उसे हम रोक भी नहीं सकते।
     पर्याप्त केवल इतना है, प्रयास करें, जो भी लक्ष्य आपने हाथों में लिया है,  वास्तविकता में उसमें क्या हो सकता है?
क्या हम बेहतर कर सकते हैं? इस और हमारा निरंतर ध्यान हो।
      उम्मीद कभी-कभी टूट भी जाती है, मगर निराश न हो, एक राह अगर बंद हो, तो दूसरी अवश्य ही खुलती है।
     विनम्रता को हमेशा धारण करने का प्रयास करते रहे, अपने संकल्पों में दृढ़ निश्चयी रहे, 
 जो भी बाधाएं हैं, युक्ति युक्त तरीके से उनका सामना करें, सफलता आपकी राह देख रही है। 
     अपने लक्ष्य पर पूर्ण ध्यान व समर्पण ही
हमें उसे पूर्ण करने की सामर्थ्य प्रदान करता है।
    समय -गति को समझ कर फैसले करते रहे, परमपिता की मंगल कृपा शरण रहकर चले, फिर कुछ विपरीत घटेगा ही नहीं, 
विपरीतता भी अनुकूलता में परिवर्तित होने लगेगी। 
     नित्य- निरंतर समीक्षा करते रहे, अपने प्रयासों को गति दें , परमात्मा सदैव अपनी अनुकंपा हम सभी पर बरसा रहे हैं, उनके अभेद्य दृष्टि से कुछ भी नहीं छिपा है, वे  ही तारणहार है।
      लक्ष्य जो भी चुने, उसमें निरंतरता अवश्य बनाये रखें।
विशेष:-  परिस्थितियों जीवन में हमेशा परिवर्तित होगी ही, कभी अनुकूल होंगी ,कभी प्रतिकूल होगी , कभी सहज होगी, कभी हम चाह कर भी उसे अनुकूल न कर सकेंगे। 
   मगर अपने प्रयासों की निरंतरता अवश्य बनाये रखें, वास्तविक परिस्थितियों अनुकूल हो या प्रतिकूल, उम्मीद कभी भी ना छोड़े, निरंतर प्रयासरत अवश्य रहे। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में 
आप सभी का स्वागत है।
      आज हम बात करेंगे, मनुष्य की अपार क्षमताओं के बारे में, हर मनुष्य को अपने-अपने जीवन में परमात्मा ने समान अवसर दिये, फिर क्या कारण है? कोई हमें सफल होता दिखता है, कोई असफल। 
        अगर हम विश्लेषण करे तो पायेंगे, कोई भी व्यक्ति, जो अपने जीवन में सफलता का शिखर छूना चाहता है, तो सबसे प्रथम तो उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है? 
      जब तक यह वह स्वयं तय नहीं करता, कोई और भी किस प्रकार से उसकी मदद करेगा?
      प्रथम संवाद हम अपने आप से करें, 
हमने क्या लक्ष्य तय किया? और जो भी लक्ष्य तय किया कितनी ईमानदारी व पारदर्शिता से हम कार्य कर रहे हैं? कौन क्या कर रहा है? 
इससे विचलित न हो?
        आप अपने परिदृश्य में, परिवेश में, आपके पास जो भी साधन उपलब्ध है, उनसे आप कितना युक्तियुक्त सही इस्तेमाल उन साधनों का करते हैं। 
             हम सभी की सोच व समझ अलग-अलग होती है, मगर हम एक बड़े परिप्रेक्ष्य में अगर  समझे, तो हम पाएंगे, मानव में अपार क्षमता होती है, मगर वह अपनी क्षमताओं का कितना बेहतर इस्तेमाल करता है, उसका लक्ष्य क्या है?
       अगर हम पूर्ण ईमानदारी पूर्वक किसी भी लक्ष्य को धारण करते हैं, तो फिर उसे पाने का प्रयास भी अवश्य ही करेंगे।
      हम सभी को जीवन में हमेशा ही दुविधा 
यह होती है, हम अपने वास्तविक लक्ष्य  व जमीनी हकीकत दोनों का सही समन्वय नहीं कर पाते।
     हमें जीवन में दो प्रकार के  लक्ष्यों  को लेकर चलना चाहिये, यह मैं मेरे निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं, हो सकता है आपका मत इससे भिन्न हो।
       आप कितने भी अच्छे इंसान हो, जमीनी हकीकत, वास्तविक स्थितियों को कभी भी 
नजर अंदाज नहीं करें। 
     वर्तमान समय को सही तरीके से परखे, 
सबसे अधिक महत्वपूर्ण आपको क्या लगता है ,अपनी परिस्थितियों अनुसार उस पर विचार करें व फिर उस पर कार्य करें।
      जीवन में दो लक्ष्य यानी आध्यात्मिकता व भौतिकता दोनों का उचित संतुलन जीवन में अवश्य करें, मात्र आध्यात्मिक हो जाने से आप गृहस्थ जीवन में है, आपका कार्य नहीं हो सकता, भौतिकता की और अधिक झुकाव होने से भी आप मानसिक रूप से परेशान हो सकते है, जीवन में इन दोनों ही लक्ष्यों को समान रूप से महत्व प्रदान करें।
       और हम मात्र आध्यात्मिक उन्नति पर ध्यान देंगे तो हमें मानसिक शांति तो प्राप्त  होगी, मगर केवल उससे जीवन यापन नहीं हो सकता, यहां पर हमें भौतिक साधनों व धन की आवश्यकता होगी, वहां पर वे ही कार्य  करेंगे, जब तक हम दोनों को समान महत्व नहीं प्रदान करते, हम हमेशा तकलीफ में होंगे।
      वर्तमान समय में भौतिकता का ही बोलबाला है, तो हमें भौतिक साधन तो जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये 
जुटाना हीं होंगे।
        अब हम देखते हैं, जीवन का आध्यात्मिक पक्ष, तो हमें आंतरिक शांति जीवन में किसी की मदद करके ही प्राप्त होंगी, हम अपना जीवन यापन करने के 
साथ -साथ किस प्रकार से अन्य लोगों की बेहतरी के लिये भी कार्य कर सकते हैं, वह आपके आध्यात्मिक पक्ष को मजबूती प्रदान करता है।
     हमें अपने जीवन में दोनों ही पक्षों में संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है। 
    किसी भी एक का आवश्यकता से अधिक होना हमें परेशान कर सकता है, अतः एक संतुलित मार्ग अपनाना आवश्यक है।
     जीवन में अपने मूल लक्ष्यों को पहचाने ,
आपके भीतर से क्या अधिक प्रिय है? आप किन बातों में सुकून या शांति महसूस करते हैं, उन पर अपने जीवन में कार्य अवश्य करिये।
    हम सभी यात्री हैं, जिंदगी एक सुंदर सा सफर है, अवरोधों से कभी न घबराये, वे अवरोध ही आपकी ताकत भी है, उनसे धैर्य पूर्वक हम पार पाये।
    लक्ष्यों को पहचाने, हम सभी अपार क्षमताओं के मालिक हैं, जब हम अपनी संपूर्ण ऊर्जा किसी भी लक्ष्य पर लगाते हैं, 
तो निश्चित ही परिणाम आपके ही पक्ष में होंगे। 
      भीतर से कोई चीज आपको बारंबार पुकार रही है, तो समझिये, आपकी चेतना आपसे क्या कह रही है? 
 विशेष:- हमें स्वयं अपनी अपार क्षमताओं को पहचानना होगा, स्वयं का आकलन करें, हमारी जो भी विशेषता है, वह क्या है? उस गुण -विशेष पर अपना कार्य करें, निश्चित ही हम सभी में अपार संभावनाएं छुपी हुई है, 
बस हमें अपना लक्ष्य ठीक ढंग से पहचानना
 है, व संपूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करना है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।


प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह की इस मंगलमय व अद्भुत यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
       हम सभी उसी एक परमपिता के अंश है,
माया के आवरण के कारण हम यह समझ नहीं पाते हैं, भौतिक सुख सुविधाओं की अत्यधिक चमक वह बहुलता ने मानो हमारे भीतर की शुद्धता भीतर तक नष्ट कर दिया है,
इस विश्व में हम सभी किसी न किसी रूप में 
एक दूसरे पर आश्रित है, यह संपूर्ण ब्रह्मांड भी एक दूसरे से सहयोग करता हुआ चालित हैं,
यही परम सत्य है, जिसे हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपने अर्थबोध द्वारा जान लिया था, फिर सर्वसाधारण के लिये उन्होंने उसे रहस्य को ग्रंथो व पुराणों में विभिन्न श्रुतियों के माध्यम से कहा।
      परंतु जो ऋषि या मनीषी उसके मूल स्वरूप को जान गये, उनकी बातों को बाद में अपनी बातें मिलकर इसका मूल स्वरूप बदल दिया गया, और यहीं से मनुष्य का चातुर्य, जो वह करना चाहता है, उसे किस प्रकार से मोड़ना है, वह करने लगता है। 
    यह सृष्टि अनंत काल से अपने ही स्वाभाविक नियमों पर ही कार्य करती आ रही है, इसमें तनिक भी संशय  नहीं है।
     भौतिक आवरण अधिक गहरा होने से हम उसे तथ्य को स्पर्श ही नहीं कर पाते हैं, जो की परम चेतना से आबद्ध है।
       कथन भी है सत्यम, शिवम, सुंदरम 
सत्य ही शिव है, और शिव ही सुंदर है।, 
     उसकी कृपा के विविध रूप हमें प्रकृति की उदारता में देखने को मिलते हैं, कैसे वह सहज रूप से सभी का पोषण करती है, किसी से भी भेदभाव नहीं करती। 
      यही तो उसका परम रहस्य है, वह इसका आशय जो भीतरी गहराई में जाकर समझ जाता है, वह इस संसार सागर को जीता हुआ भी इसमें लिप्त नहीं होता, उस परम आश्रय  की शरण में  वह अपना जीवन चलाने लगता है।
        वह समान रूप से सभी का भरण पोषण करता है, वही अविनाशी सत्ता, जिसका कभी भी विनाश नहीं होता, युगों युगों से स्वचालित होकर सब की रक्षा कर रही है। 
       आंतरिक शांति हमें तभी प्राप्त हो सकती है, जब हम उसके परम आश्रय के भीतर चलते हैं, अपने हदय में  उस अविनाशी सत्ता 
को जिसने भी स्थान प्रदान किया, फिर उस परमात्मा के द्वारा वह निमित्त बन जाता है, और फिर उसके द्वारा वहीं घटता है ,जो वह चाहता है, हम सभी एक निमित्त हैं, कौन कब, कहां ,क्या भूमिका निभायेगा, वह तय करने 
वाला भी है, और प्रेरणा प्रदान करने वाला भी। 
     क्या कारण है?  हम चाह कर भी वह नहीं कर सकते जो हम चाहते हैं, हम वही करते हैं जो वह चाहता है, यह बहुत ही सूक्ष्म भेद है,
कुछ तो ऐसा अवश्य है, जो हम सभी की समझ के बाहर है। 
      हम जन्म लेते हैं, एक दिन मृत्यु को प्राप्त होते हैं, मगर इन सब के मध्य का जो जीवनकाल है, वह हमारा अपना है, हम उसे किस प्रकार गुजारते हैं, इस पर ही हमारे भविष्य की नींव है। 
      बुद्धिमानी पूर्वक जगत को हम कैसे जिये,
जब हम यह कला जान लेते हैं, तो हमारे बहुत सारे संशय स्वयं चिन्ह भिन्न हो जाते हैं।
       कोई भी कर्म एक दिन में पूर्ण नहीं होता, एक लंबी प्रक्रिया होती है, उसके उपरांत ही कुछ घटता है, उसके आरंभिक बीज तो हमारे अवचेतन मन में पहले से ही पढ़ चुके होते हैं, जैसे-जैसे हमारी आंतरिक चेतना जागृत होती है, हमें भीतर से आंतरिक शांति का अनुभव होने लगता है। 
       भौतिक संसाधनों का कब, कैसा , कहां क्या उपयोग करना है, भावनात्मक रूप से कब हमें प्रभावित होना है? यह हमारी समझ में आने लगता है, और यह समझ में आ जाना भी उनकी कृपा का ही एक रूप है, जिसे जितने सही रूप में हम समझते जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन आसान होने लगता है, जीवन की जो भी गांठे हैं, वह सुलझने  लगती है, धीरे-धीरे हम महाप्रयाण की ओर बढ़ने लगते हैं।
     शनै- शनै हम परमात्मा की कृपा को जीवन में अनुभव करने लगते हैं, उसकी कृपाल के हम पात्र बन जाते हैं, फिर वह जो भी भूमिका हमें प्रदान करें। 
विशेष:- हम सभी उसी के परम आश्रय में है,
           उसकी कृपा के बिना जीवन में कुछ घटता ही नहीं, बस हम उसकी कृपा के पात्र बने रहे, बस यही विनय हम करते रहे, फिर जो भी होगा, वह उसकी कृपा से ही घटेगा।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।



प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी का दिन मंगलमय हो, विगत 2 से 3 दिन पूर्व  की स्थानीय घटना, जो की इंदौर की है।
     यहां एक घटनाक्रम में निगम कर्मियों द्वारा एक अभियान चलाया जा रहा था, जो की संपत्ति कर की वसूली से संबंधित था।
       इंदौर की राजनीति यहां के मुखर राजनेताओं का एक नया नेतृत्व तैयार कर रही है, कतिपय तत्वों को राजनेताओं की मुखरता रास नहीं आती है, जबकि राजनेताओं को, चाहे वह किसी भी दल के प्रतिनिधि क्यों ना हो?   वे जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए उनकी बात अवश्य ही सुनी जानी चाहिये, साथ ही निगम कर्मियों को भी चाहिये वह अपनी अभद्र भाषा पर लगाम लगाये, यह हमारे इंदौर शहर की परंपरा नहीं है, मामला चाहे जो भी हो, पर  स्वस्थ संवाद ही इसका समाधान है।
     निगम कर्मियों व राजनेता के बीच जो टकराव उत्पन्न हुआ, बहुत बेहद दुखद है, इसकी कड़ी शब्दों में निंदा की जाना चाहिये,
इसका मुख्य कारण यह है, राजनेता किसी भी दल से हो, आखिरकार वे जनता द्वारा चुने गये
प्रतिनिधि होते हैं, उनकी बात को निश्चित  ही सुना जाना चाहिये, एक प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते हमारी भी यह जवाबदारी बनती है, 
इस प्रकार के घटनाक्रम पर हम मुखर होकर बोले। 
    संवाद ही इसका एकमात्र हल होना चाहिये, निगम कर्मियों, राजनेताओं से निवेदन है, इससे हमारे इंदौर शहर की स्वस्थ परंपरा को भी ठेस पहुंचती है, हमारा इंदौर शहर राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा शक्ति, निगम कर्मियों  और जनता के सहयोग से ही स्वच्छता में पहले पायदान पर बना रहा है, इस बात का उल्लेख में इसलिए कर रहा हूं, इंदौर शहर चेतना के तौर पर एक जीवंत शहर है,
            मां  अहिल्या की पावन नगरी इंदौर, 
यहां के राजनेता व नागरिक, दोनों ही जागरुक है, व शहर हित में हमेशा सजग रहते हैं।
       इस घटनाक्रम में गलती किसकी है, यह तो पूर्ण तहकीकात का विषय है, मगर यह घटनाक्रम हमारे शहर के मिजाज से मेल नहीं खाता, यहां हमेशा समन्वय की परंपरा रही है।
        राजनेताओं पर दुर्भावना पूर्ण अभद्र व्यवहार की निंदा समवेत स्वर में की जानी चाहिये, तभी हम एक स्वस्थ राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकते हैं, पक्ष या विपक्ष की इसमें कोई बात नहीं, जनता द्वारा चुने  प्रतिनिधियों से ही जब इस प्रकार से व्यवहार किया जा रहा है , तब इंदौर के रहवासियों का भी फर्ज है, वह राजनेताओं के साथ खड़ा हो,
अन्यथा   कल से कौन व्यक्ति राजनीति में आना चाहेगा, वह अपने परिवार को छोड़कर 
दिन रात समाज की उन्नति के बारे में सोचता है, कार्य करता है, अपने परिवार को क्षति पहुंचा कर कौन व्यक्ति फिर राजनीति में आयेगा।
     मुझे पूर्ण विश्वास है, इस सारे मामले में जन प्रतिनिधि , जनता व निगम कर्मियों के बीच स्वस्थ संवाद द्वारा इसका हल निकाला जाना चाहिये, किसी भी कदम को उठाने से पहले तीनों ही पक्षों के बीच में एक समन्वय बने, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति ना हो, इस सारे घटनाक्रम में जनता भी एक पक्ष है, क्योंकि वह भी जब किसी राजनेता को चुनती है, तो वह उसकी सक्रियता के कारण ही चुनती है, जब जनता ने उन्हें अपना वोट देकर सशक्त बनाया है, तो निगम कर्मियों का भी यह दायित्व बनता है, राजनीतिक नेतृत्व व जनता दोनों  ही पक्षों कोअनदेखा न करें।
     तीनों ही पक्ष मिल-बैठकर इसे सुलझाये,
यही हमारे इंदौर शहर की गरिमा के अनुरूप
भी होगा।
     निष्पक्ष नजरिये  से सभी पक्षों को बैठकर इस मामले को सुलझाना चाहिये,
   एक जागरूक व प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते मैंने यह प्रतिक्रिया दी है, अगर मेरी भाषा 
से किसी को कोई ठेस पहुंची हो, तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी भी हूं, पर पुनः  निवेदन है, मां अहिल्या की पावन नगरी का यह मिजाज नहीं है। यहां संस्कृति व समन्वय की एक सशक्त विचारधारा है, जो कायम रहना चाहिये।

आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
    सागर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह की इस मंगल में यात्रा में आप सभी का स्वागत है, हम सभी किसी न किसी रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिस समय हमारा जन्म होता है, हम नहीं जानते कहां पर होगा?
मृत्यु कब होगी, यह भी हम नहीं जानते ?
       हम जिस भी जगह जन्म लेते हैं, जिस परिवार में, हमारा प्रथम उत्तरदायित्व उस परिवार के प्रति है, फिर जहां हम पले-बढ़े, उसे जन्मभूमि की बेहतरी के लिये हम क्या कर सकते हैं?
       किस प्रकार से सामाजिक वातावरण में हम समरसता का संचार कर सकते हैं, यह दिशाबोध हमें होना आवश्यक है।
       जननी, जन्मभूमि, इन दोनों का ही ऋण हम चाह कर भी नहीं उतार सकते।
     हम कितना भी कर ले, माता-पिता व जन्मभूमि के ऋण से हम कभी मुक्त नहीं हो 
सकते।
      हमें अपने कर्म से कुल का गौरव बढ़ाना चाहिये, परिवार की मान मर्यादा का हमें ख्याल रखना चाहिये, परिवार की मान मर्यादा का मान-सम्मान , वह किस प्रकार के हमारे कर्म द्वारा समाज में कुल का मान बढ़े।
         यह हमारा प्रयास होना चाहिये, नित्य-निरंतर हमारे प्रयास द्वारा किस प्रकार से कुल की ख्याति में अभिवृद्धि हो, यही प्रयास हमें कर देना चाहिये।
     रिश्ते कुछ प्रकृति से हमें प्राप्त होते है, जैसे माता-पिता, भाई, बहनें वह अन्य जोभ  परिवार में रिश्ते हैं।
    कुछ हम स्वयं चुनते हैं, हम अपनी ओर से सदैव ही प्रयास करें, जो भी रिश्ते हम स्वयं 
अपनी मर्जी से चुनते है, उनमें हम पारदर्शिता पूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दे, छल- कपट से दूर रहे, तभी हम मानवीय रिश्तों की खुशबू को बरकरार रख सकते हैं। 
      जहां पर निश्छल भाव होगा, वहां पर स्वमेव ही परमात्मा की उपस्थिति होगी, नित्य प्रति मंगल की हम कामना करते रहे, हमारे कर्म की दिशा भी वही हो।
          हमारी संस्कृति की मूल ताकत जो है,
वह है ,इसकी मानवीय संवेदना, जो भी मानवीय संवेदनाये है, वे ही हमें मनुष्य बनाती 
 है, मानव बनाती है।
         इस प्रकार हम अपने जीवन को परिवार वह समाज के लिए जिये, सामाजिक सद्भाव को प्राथमिकता हमेशा दें, निरंतर चेतनायुक्त रहे। 
       उसे परमात्मा की असीम अनुकंपा को सदैव अपनायें, उसे धन्यवाद प्रेषित करें। 
        अहो भाव से वंदना करें, अपने कर्तव्यों को ईमानदारी पूर्वक निभाये।
      शेष परमात्मा स्वयं देखेंगे, इस सुंदर भाव के साथ हम अपना जीवन उल्लासपूर्वक उसकी कृपा में व्यतीत करें, हम सभी पर, आप सभी पर ईश्वर की अनुकंपा सदैव रहे।
          नीर-क्षीर, विवेक को अपने जीवन में
स्थान दे, अपने जीवन की डोर को उस ईश्वर के हाथों में सौंप दे, फिर वह कल्याण ही करेंगे।
      एक निश्चित कालखंड हम सभी को प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करें, हम किस प्रकार से उसे व्यतीत करते हैं, वही हमारे भविष्य का निर्माण करती है, वर्तमान में रहे,
रिश्तों की नाजुक डोर को संभाले रखें, समाज में अपने अच्छे कर्मों द्वारा हम पूजित होते हैं,
स्वकर्म हमारा जो भी है, उसे पुर्ण ईमानदारी मानदारी से हम करें , साथ ही औरों को भी जो हमारे आसपास है, इसकी प्रेरणा प्रदान करें। 
विशेष:- समाज में हम जो भी दे रहे हैं, वही हमें प्राप्त होता है, हम अगर अशांति दे रहे हैं, तो हमें बदले में अशांति ही प्राप्त होगी, अगर हम समरसता,शांति सद्भाव प्रदान कर रहे हैं, तो हमें बदले में वही प्राप्त होगी, शांत चित्त होकर हम चीजों को समझें, जीवन एक निरंतर चलने वाली लंबी प्रक्रिया है, जीवन जटिल होता नहीं, बहुत सरल होता हैं, अहो भाव से उसे जिसमें, परमात्मा को धन्यवाद दें, 
इतना सुंदर जीवन उसने हमें प्रदान किया।





प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का हृदय से स्वागत।
       हम सभी आपस में एक अदृश्य सत्ता द्वारा संचालित है, जो हमें नजर नहीं आती, 
मगर वही सत्ता सभी का संचालन कर रही है,
हम अपने-अपने अहंकार के कारण उस सूक्ष्म सत्ता को देख नहीं पाते।
     मगर हमारे तत्व वेत्ता , मनीषी,ऋषि व शास्त्र मर्मज्ञ जो हमारे पूर्वज भी थे, वे इस सूक्ष्म विज्ञान से परीचित थे, वे अपनी सीमा- रेखा का उल्लंघन कभी नहीं करते थे, उनके आचरण की जो दृढ़ता थी, वही उनके सशक्त व्यक्तित्व को परिभाषित करती थी, हम सभी उसी विराट के अंश है, मगर माया का जाल इतना प्रबल होता है, हम चाह कर भी उसे काट नहीं सकते, यह संपूर्ण ब्रह्मांड उसी परम सत्ता द्वारा संचालित है। 
        यह सरकार व निराकार दोनों ही रुप में है, यह साकार रूप से हम सभी में विद्यमान है, वह अदृश्य रूप में भी हम सब में विराजमान हैं।
         उसकी कृपा हम सभी पर समान है, मगर हमारी विभिन्न देशों में जो भेद दृष्टि है,
वह हमें उसे व्यापकता का बोध नहीं होने देती,
जैसे दूध में भी घी विद्यमान है, पर एक प्रक्रिया प्राप्त होने के बाद ही हम उसे प्राप्त कर सकते हैं, स्वर्ण एक धातु है , मगर विभिन्न विभिन्न आभूषण बनने पर कहीं हमसे हार, कहीं अंगूठी, कहीं पर नथ, कुंडल, मंगलसूत्र 
इस प्रकार से जी आभूषण के रूप में हम उसे ढाल देते हैं, हम उसी नाम से पुकारते हैं।
         वस्तुत:  वह सभी स्वर्ण के ही विभिन्न रूप है।
       आंतरिक भाव गहरा अगर हम परमात्मा से जोड़ सके तो हमें यह समझ में आने लगेगा। 
    नारी शक्ति में वह स्नेह, वात्सल्य, करुणा, ममता, सद्भाव के रूप में व्याप्त होता है।
     इसीलिए हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ नारी शक्ति
को प्रथम स्थान देते हैं।
        नारी का मूल स्वभाव समर्पण है, वह जिसे भी हृदय से चाहती है, पति, परिवार व बेटे -बहू व परिवार के सदस्य, उनका वह अहित नहीं होने देती। 
         नारी को ईश्वर ने ममता व वात्सल्य यह दो गुण विशेष प्रदान किये हैं।
      वह समतापूर्वक परिवार में सभी का ध्यान रखती है, बदले में उसे मात्र परिजनों के स्नेह व सम्मान की आकांक्षा होती है।
     तो परमपिता ने जो इस दृश्य रूप में हमें दिया है, हमारा आदर्श संसार या शक्ति जिसे हम सूक्ष्म रूप भी कह सकते हैं, वह स्थूल से भी शक्तिशाली है। 
       उस पराशक्ति को हृदय से नमन, वह सभी का रक्षण करती है, हमारे भीतर के मनोभाव जितने शुद्ध होते जायेंगे, उतना ही हम उसके करीब होते जायेंगे।
        उसकी कृपा हम सभी पर समान रूप से बरस रही है, मगर जिस प्रकार बिजली हमारे घर में मौजूद तो होती है, पर वह माध्यम  कहीं पंखे में ,कहीं अन्य उपकरणों में, बल्ब में स्विच के माध्यम से पहुंचती है।
      इस प्रकार सद्गुरु या ग्रंथ के माध्यम से, यह हमारी वैचारिक परिशुद्धता के माध्यम से 
हम धीरे-धीरे अपने अनुभव के आधार पर 
जीवन में परिपक्वता को प्राप्त करते हैं, जब तक वह ऊर्जा सकारात्मक प्रवाह का रूप नहीं लेती, तब तक हम अपने स्वरूप को
जान नहीं सकते। 
         इस संपूर्ण ब्रह्मांड में ऊर्जा ही है जो अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है, विभिन्न व्यक्तियों में
ऊर्जा अलग-अलग प्रकार की होती है, विभिन्न व्यक्तित्वों व ऊर्जा के बीच हम अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करते हैं।
     हमारे जीवन काल में अलग-अलग समय- चक्र से हम गुजरते हैं , उसे समय चक्र में हमने किस प्रकार बुद्धिमत्ता पूर्वक अपना कार्य किया, उसी के परिणाम हमारे सामने आते है।
       जो भी निर्णय हम जीवन में करते हैं, वह तात्कालिक परिस्थिति , हमारे दीर्घकालिक अनुभव व समयानुकूल क्या अधिक आवश्यक है, इन तीन सूत्रों पर आधारित अवश्य होना चाहिये।
      हमें अगर व्यावहारिक जगत में सफल होना है, तो इन सूत्रों को हमें ध्यान रखना होगा।
     हम अपनी ओर से जीवन में दो प्रकार के लक्ष्यों  को प्राथमिकता दें, एक तात्कालिक वह दूसरे दीर्घकालिक, कहीं निर्णय हमें परिस्थिति के अनुसार तत्काल भी लेने पडते हैं, वह कहीं निर्णय दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित होते हैं।
विशेष:- हम सभी का जीवन अपने-अपने प्रयासों का ही परिणाम है, हमने समय अनुकूल क्या निर्णय किये, तात्कालिक व दीर्घकालिक रणनीति का कितनी सुंदरता से समावेश किया, इस पर आपके जीवन की आर्थिक वह मानसिक समृद्धि निर्भर है, केवल आर्थिक या केवल मानसिक, दोनों समृद्धि अति महत्वपूर्ण है, मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होने पर हमारा शरीर अच्छा होगा व आर्थिक समृद्धि होने पर हम अपना जीवन यापन परिवार का जीवन यापन ठीक से कर सकेंगे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है।
   हम सभी की जिंदगी एक सफर है, यात्रा है,
इसके कई पड़ाव है, हम अपने जीवन के सब पड़ावो को कितनी खूबसूरती से पार करते हैं,
यही सबसे महत्वपूर्ण है। 
        जीवन के इस सफर में हमेशा हमारे सामने कई प्रकार के मोड़ आते हैं, उनका हम किस प्रकार खूबसूरती से सामना करते हैं। 
         कई प्रकार के उतार व चढ़ाव हमारे सामने आते हैं, कितनी बुद्धिमत्ता पूर्वक व कुशलता से हम उन्हें पार कर पाते हैं, यही हमारे जीवन यात्रा या सफर को एक आनंद में परिवर्तित कर देती है, हम सभी का जीवन कई प्रकार के रीति-रिवाजों  से बंधा हआ है,
कहीं रीति रिवाज अच्छे हैं, वह कुछ में खामियां भी है, हम अपने जीवन को कितना बेहतर बना सकते हैं, यहीं से हमारे जीवन का असली संघर्ष शुरू होता है, जीवन में अपने मूल्यों की प्रतिबद्धता अवश्य बनाए रखिये,
यही आपको अपने जीवन में शीर्ष पर पहुंचा सकती है, अन्य कोई उपाय है ही नहीं।
       हमें वास्तविकता व भ्रम  दोनों में अंतर
को समझना चाहिये, जीवन का उद्देश्य क्या हो?   किस प्रकार से हम आगे बढ़े वह साथ ही हमारे साथी गणों को भी प्रेरित करें, अगर आप अपनी जगह सही है, तो यह प्रकृति या सृष्टि आपकी मदद अवश्य करती है। 
          आत्मविश्वास से भरपूर रहे, अपने जीवन में कुछ अच्छे लक्ष्य चुने वह उन पर पूर्ण समर्पण भाव से कार्य करें, अगर आप अपने लक्ष्य के प्रति पुर्ण ईमानदारी हैं, तो यह पूरा ब्रह्मांड आपकी मदद को तत्पर है, लक्ष्य पर दृष्टि बनाये रखें, अपने लक्ष्यों को सदैव अपने सामने रखें, आपके जो भी लक्ष्य है, वह आपकी ताकत है, कभी-कभी जीवन में हमें पराजय का भी सामना करना पड़ता है, उन्हें अपने अनुभव के रूप में ले, पुनः प्रयास करें,
निरंतर प्रयास  ही आपको सफलता की और ले जाएंगे, बगैर किसी भी लक्ष्य के जीवन को जीना उसे परमपिता के द्वारा दिए गये इस जीवन का अपमान है।
       हमेशा लक्ष्यज्ञअच्छे रखें, विचार पूर्वक उनका निर्धारण करें वह उस पर चलते रहे ,
आपकी अपने लक्ष्य के प्रति निरंतरता ही आपके लक्ष्य तक पहुंचा देगी। 
    जो भी लक्ष्य आप ले, अपनी संपूर्ण ईमानदारी से उसे निभाने की कोशिश करें, कामयाबी आपकी राह देख रही है।
    कुछ महत्वपूर्ण सूत्र जीवन के यह है, जिस घर या परिवार में आप रहते हैं, अपने तमाम वैचारिक के मत-मतांतर के बाद भी परिवार को जोड़े रखने का पूर्ण प्रयास करें, परिवार के सामूहिक हित को सदैव आगे रखें। 
      आपकी सबसे पहले जवाब देही उसे घर के प्रति है, जहां पर आप स्वयं रहते हैं, उसके बाद बारी आती है, सामाजिक सपर्कों की, सामाजिक संपर्क सदैव बनाये रखें, नित्य नियम पूर्वक अपने सभी कार्यों को करें। 
      जीवन में चुनौतियों का सामना अवश्य करें, वह चुनौतियां ही आपके जीवन में निखार लाती है, और आपके उज्जवल भविष्य की राह भी  तय करती है। हमेशा सजग अवश्य रहे, सजग होने पर ही हम किसी भी कार्य को अंजाम दे सकते हैं।
       जीवन की इस राह में सबसे पहले साथी आप स्वयं है, दूसरा कोई भी नहीं। 
       जो भी लक्ष्य आप ले, चाहे वह छोटा हो या बड़ा हो, उसे पूरी ईमानदारी पूर्वक निभाये
      हमेशा सजग व चौकस रहे, पारदर्शिता संबंधों में रखें, पारदर्शिता अगर होगी तो ही आप सफल होंगे, जितनी पारदर्शिता आपकी नीति में होगी, परिणाम भी उतने ही बेहतर प्राप्त होंगे, जीवन में स्वप्न अवश्य देखें, उन स्प्नों पर पूर्ण ईमानदारी से कार्य करें, आप देखेंगे, धीरे-धीरे ही सही, बदलाव तो आता ही है। 
       कभी भी आपने जो लक्ष्य चुना है, इसकी अनदेखी न करें, जो भी आप सोचते हैं, भीतर से जो आवाज आती है, उसे पर कार्य करें। 
विशेष:- हम सभी को उस परमपिता परमात्मा ने एक सा समय दिया है, बस हम उसे क्रियान्वित किस प्रकार करते हैं, अपने समय को कहां लगाते हैं, यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात है, आर्थिक व मानसिक दोनों ही संपन्नता जरूरी है, अपने विभिन्न प्रयासों को कभी न रोके, क्या होगा ,हमें नहीं मालूम, 
पर निरंतर प्रयास से कुछ तो परिणाम आता ही है।