प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, अखंड राष्ट्र की जो परिकल्पना हैं, वह मेरी कुछ इस प्रकार से है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम सभी जातिवाद, संकीर्ण सोच को छोड़ नहीं पाये हैं,
क्या सही अर्थों में समावेशी संस्कृति को स्थापित कर पाये हैं।
हम सभी को अपनी-अपनी जाति पर, जिसमें हम उत्पन्न हुए, गर्व अवश्य होना चाहिए, मगर जब बात राष्ट्र की हो, तो हर व्यक्ति के लिए राष्ट्र ही प्रथम होना चाहिये।
इस देश में अब सभी प्रकार के आरक्षण हटाकर केवल आर्थिक कमजोरी के आधार पर आरक्षण को लागू करना चाहिये।
इससे सभी वर्गों को बराबरी से लाभ भी मिलेगा वह सभी के साथ न्याय होगा।
जातिगत आधार को हटाकर आर्थिक आधार को मानने से वास्तव में जिनको इसकी जरूरत है, उन्हें अधिकार प्राप्त होगा, निश्चित यह फैसला लेने में सभी राजनीतिक दलों को थोड़ी कठिनाई तो आयेगी, मगर इसमें किसी का नुकसान न होकर सुधार है।
आर्थिक आधार भी जो वास्तव में बहुत ही कमजोर स्थिति में हो, केवल उन्हीं के लिये हो,
इससे शासन पर बोझ भी अधिक नहीं आयेगा वह जिन लोगों को तक वास्तव में इसका लाभ पहुंचना है उन तक इसका लाभ पहुंचेगा,
जब सरकारी समय-समय पर अलग प्रकार के संशोधन करती है, तो फिर इस प्रकार का संशोधन क्यों नहीं, अगर सभी राजनीतिक पार्टियों इस पर सहमत हो तो काफी अच्छा कार्य हो सकता है।
और यह देश के हित में भी है, क्योंकि इसमें सभी वर्ग जो आर्थिक रूप से बहुत कमजोर है, वे सभी पात्र होंगे, इसके लिए आवश्यक सशोधन पूर्ण विचार विमर्श के बाद आ सकता है।
देश में नीतियों पर तो अब तर्कपूर्ण फैसले होने चाहिये।
इससे सभी वर्गों के बीच में आपसी समन्वय भी स्थापित होगा, क्योंकि इसका मूल आधार आर्थिक होगा।
जिस समय संविधान में यह व्यवस्था दी गई, निश्चित ही वह उस समय की आवश्यकता रही होगी, लेकिन समय के साथ अगर परिवर्तन करना आवश्यक है, तो उसे पर भी गहराई से विचार किया जाना चाहिये, मेरे विचार से कोई भी प्रबुद्ध नागरिक मेरे इस विचार से असहमत नहीं होगा।
क्योंकि ऐसा करने से एक समन्वय की भी स्थापना होगी। पर केवल जो बहुत अधिक आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, उन्हीं को इसका लाभ दिया जाना चाहिये, दूसरा कदम शिक्षा
वह स्वास्थ्य पर होना चाहिये, क्योंकि यह भी हमारी मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी हुई
बातें हैं, सरकारी स्कूलों की पढ़ाई की गुणवत्ता पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिये, ताकि
वह गुणवत्ता के मामले में अन्य महंगे स्कूलों का मुकाबला कर सके।
साथ ही शिक्षा में राष्ट्रीय स्वाभिमान की शिक्षा भी देना चाहिये, कि जब राष्ट्र की सरकार हमारे बारे में इतना कुछ कर रही है, तो हमारा भी दायित्व है ,हम राष्ट्रीय स्वाभिमान को प्रथम स्थान जीवन में प्रदान करें।
क्योंकि अधिकार व कर्तव्य एक ही सिक्के के दोनों पहलू है, और दोनों ही अनिवार्य घटक है। शिक्षा में स्व रोजगार से जुड़ी शिक्षा पर प्राथमिक स्तर से ही ध्यान देने
की जरूरत है, इसमें किसका रुझान किधर है ऐसा पहचान कर उसे प्रारंभ से ही उसके रुझान के अनुसार शिक्षा दी जाये, इससे यह होगा कि स्वरोजगार भी विकसित होता जायेगा।
स्कूल शिक्षा में जो भी बालक पढ़ने आते हैं वह अबोध होते हैं, उन में प्रारंभ से ही राष्ट्र प्रेम को विकसित किया जाना चाहिये, क्योंकि आखिरकार उन्हें ही देश को चलाना व इसमें रहना है।
हम सब भारतीय हैं ,ऐसा राष्ट्रीय स्वाभिमान सभी में जागृत हो, आपसी सद्भाव, भाईचारा,
प्रेम, मिलजुलकर कार्य करने का भाव, पर्यावरण के प्रति रुझान इस प्रकार के भावों को प्रारंभ से ही विकसित किया जाना चाहिये।
एक नागरिक होने के नाते हम अपने स्तर पर अपने राष्ट्र के लिए क्या बेहतर कर सकते हैं, इस पर भी विचार हो, राष्ट्र ने हमें क्या दिया उसकी बजाय हम यह सोचे हमने राष्ट्र को क्या दिया।
स्वतंत्रता व स्वच्छंदता में बड़ा अंतर है, इस अंतर को हमें समझना होगा, हमारी स्वतंत्रता हममें एक बोध जगाने वाली होना चाहिये।
स्वतंत्र जरूर हो, मगर स्वच्छंद ना हो, कोई भी कदम उठाने से पहले उसे कदम का अपने राष्ट्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह प्रश्न अपने आप से हम अवश्य पूछे। इस राष्ट्र के नवनिर्माण ,पुनर्निर्माण में हमारी क्या रचनात्मक भूमिका है, इसे अवश्य समझे।
विशेष:- यह राष्ट्र किसी जाति , धर्म, संप्रदाय, भाषा, बोलियां इन सभी से ऊपर है, इस प्रकार की भावना जब इस देश में बालक, युवा, वरिष्ठ नागरिक गण , सभी में सामूहिक रूप से होगी, तभी अखंड राष्ट्र की हमारी परिकल्पना साकार हो सकती हैं, जिसकी कल्पना हमारे क्रांतिकारी व स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी, गर्व से कहो हम सब भारतीय हैं।
आपका अपना
सुनील शर्मा
जय भारत
जय हिंद