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प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       प्रवाह की इस मंगल में यात्रा में आप सभी का स्वागत है, हमारा जीवन एक अथाह सागर के समान है, जिसमें हर पल नई चुनौतियां और अवसर आते रहते हैं। 
         ऐसे में निडरता ही वह गुण है, जो मनुष्य को इन चुनौतियों 
का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है, निडर होने का अर्थ भय से मुक्त हो जाना ही है, क्योंकि जो भयमुक्त हो गया, उसे ही हम निडर कह सकते हैं। 
        हम निडरता पूर्वक कोई भी बात कहे, मगर उसका हेतु 
वास्तव में क्या है, यह  हमें ज्ञात होना चाहिये।
     इतिहास साक्षी है कि जिन महापुरुषों ने निडरता का परिचय दिया, वही युगों -युगों तक याद किये जाते हैं।
       महाराणा प्रताप का संघर्ष हो या भगत सिंह का बलिदान, 
स्वामी विवेकानंद का शिकागो में  भाषण हो, गांधी जी का अहिंसा आंदोलन, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की स्थापना,
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पूर्ण स्वराज की मांग, यह सारे उदाहरण उनकी निडरता को दर्शाते हैं, जिन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप नेतृत्व की बागडोर संभाली, निडरता वह गुण है, जो साधारण से व्यक्ति को भी असाधारण बनाने की क्षमता रखता है, निडरता का सही अर्थ सही समय पर सही बात कहने
कि कला भी है।
        निडरता जब ज्ञान से परिपूर्ण हो, तो वह और सशक्त हो जाती है, तीसरा तत्व है , अभ्यास, निरंतर अभ्यास से निडरता का 
हम में संचार होता है, वास्तविक निडरता  मे विवेक अवश्य होना चाहिये। 
निडर व्यक्ति खतरों को भी समझते हैं, वह समय पर साहस भी करते हैं, समाज के विकास के लिए निडरता का होना अत्यंत आवश्यक है।
जब हम किसी भी अन्याय के खिलाफ खड़े होना सीख जाते हैं,
पूर्ण  निडरता पूर्वक अपनी बात को सामने रखते हैं , तभी सामाजिक परिवर्तन संभव है। 
       आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो निडरता आत्मज्ञान है, जिसने स्वयं को पहचान लिया, उसे फिर किसी का भय नहीं होता ।
      गीता में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को निडर होने का उपदेश देते हैं, क्योंकि निडरता ही मनुष्य को कर्तव्य पथ पर अडिघ रह सकती है।
            व्यक्तिगत जीवन में निडरता हमें स्वयं पर विश्वास करना सिखाती है, यहीं पर मानव से महामानव बनने की प्रक्रिया की शुरुआत होती है।
            स्वामी विवेकानंद का भी प्रसिद्ध कथन हैं, उठो, जागो, और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, यही निजता का सच्चा स्वरूप है।
             सत्य पर अटल रहे, सत्य को कोई भी पराजित नहीं कर सकता, सत्य सदैव ही विजयश्री का ही वरण करता है।
विशेष:- भयमुक्त होकर अपने लक्ष्य की और बढे। जीत की और एक कदम आगे बढ़ायें, संग्राम से कभी पीछे न हटे, परिस्थितियों जिसे डिगा न सके, वह हौसला हम में होना चाहिये।

प्रिय पाठक गण, 
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, हम सभी के जीवन में आत्म मंथन का अवसर हमें मिलता है, जैसे-जैसे हम जीवन के उत्तरार्ध की और बढ़ते हैं, हमारी परिपक्वता गहरी होती जाती है। 
     जितनी गहरी हमारी परिपक्वता होती है, उतना ही जीवन का आनंद भी बढ़ जाता है, विभिन्न परिस्थितियों हमारे जीवन में आती है, जाती है, मगर हम निरंतर चलते रहे, तो उन सभी बाधाओं को हम पर कर सकते हैं। 
    गहराई पूर्वक जीवन को समझे, हमारा जीवन एक सुंदर यात्रा है, इस सफर का आनंद लीजिये, जीवन से भागिये मत, उसे पूर्ण आनंद से जीने का अभ्यास करें, जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हमारे अनुभव गहरे होते जाते हैं।
   अपनी यात्रा को आप जितनी कुशलता पूर्वक पूरा करते हैं, जीवन में  सफर के दौरान सभी प्रकार के अनुभव आते ही हैं,
उनका भी आनंद उठायें।
    किसी को भी कुछ कहने से पहले आत्म मंथन करें, क्या उचित है? क्या अनुचित है? विचार पूर्वक समझे, उसे परम पिता का
धन्यवाद करे, जिसने यह सृष्टि -चक्र बनाया। 
    आत्मबोध के साथ जीवन को जिये, हर  क्षण आनंद का अनुभव करें, ईश्वर के प्रगाढ़ प्रेम को भीतर गहरे महसूस करे,
उसकी अनन्य कृपा को भीतर समाने दे, सब कुछ आनंदमय है,
उसे चित्त के आनंद को, उसकी  कृपा को , परमात्मा की शक्ति को
निरंतर जागृत हो कर महसूस करें। 
      हमारे चित्त में उस परमानंद स्वरूप को हम बसा ले, वह जो भी कर रहा है, कुछ तो उसमें भी राज है, अनन्य शरणागति भाव को अपना ले, फिर अपने -आप ही वह स्वयं सारे द्वार खोल देता है।
      उसकी अनन्य कृपा को जीवन में अनुभव करें, उसे अपनी नित्य दिनचर्या का हिस्सा बना लें, सब कुछ अपने -आप ही घटता जायेगा, उसकी शरणागति को हम अपना ले।
     अपनी दृढ इच्छा शक्ति को हम आधार तो माने, पर वह दृढ़ता भी हमें प्रभु कृपा से ही प्राप्त हुई है, पता उसका नित्य पति स्मरण करते हुऐ परम अहोभाव से, शरणागत होकर समस्त कार्यों को
करें, वह दिव्या सत्ता हमेशा साथ में है, यह अनुभव करें, वह कभी भी आपके साथ कुछ भी विपरीत घटने ही नहीं देगी, ऐसा मन में पूर्ण विश्वास रखें।
      उसकी कृपा पर पूर्ण विश्वास करें, जो भी विपरीतता होगी,
वह अपने आप ही चली जायेगी, स्वीकृति का भाव रखें, परमात्मा जो भी घटना घटा रहा है, उसके पीछे का रहस्य केवल वही जानते हैं, और कोई भी नहीं। पूर्ण श्रद्धा वह असीम कृपा को जीवन में 
नित्य प्रति अनुभव करें, शरणागति जब प्रभु के समक्ष हम विनय भाव से करते हैं, इस समय से उसकी मंगल कृपा हो जाती है, 
आपकाअपना 
सुनीलशर्मा 
जयभारत 
जय हिंद
प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
 आप सभी को मंगल प्रणाम, हम जितना अधिकतम समय अपने आप को देंगे, स्वयं से संवाद स्थापित करेंगे, हमारे अंतरचक्षु खुलने लगेंगे, हम बाह्य जगत की यात्रा तो नित्य करते हैं, हमने अपने आंतरिक जगत की यात्रा कब की थी, कब हमने स्वयं से संवाद स्थापित किया था, कितना समय हम स्वयं को, कितना परिवार
को, कितना समाज को देते हैं, क्या कभी हमने इस पर विचार किया है?
तो हमें मंथन करना होगा, आप अपना स्वयं का मंथन करिये,
जिंदगी की आपा-धापी में हम किधर जा रहे हैं, जिधर सारी दुनिया दौड़ रही है, क्या हम भी उधर ही दौड़ रहे हैं, या कुछ पल ठहर कर अपने जीवन को एक व्यवस्थित आकार हम दे रहे हैं।
        जैसे ही हम अपने- आप को समय देते हैं, हमें वास्तविक स्थिति का ज्ञान होता है, कितना स्वयं के लिये, कितना परिवार के लिये, कितना समाज के लिये, इस प्रकार हम इन तीन बातों को
अपने जीवन में सही ढंग से समझ सके तो स्वयं  व परिवार यह दो मूलभूत इकाई , इन पर अगर हमने सही कार्य किया तो तो समाज स्वमेव ही बन जायेगा, स्वयं  व परिवार इन दोनों पर ईमानदारी से कार्य करने की उपरांत ही हम समाज से रूबरू होते हैं, आप यकीन माने, अगर आपने पूर्ण ईमानदारी पूर्वक इसे जिया है 
या जीने की कोशिश की है, तो परिणाम बहुत ही आशाजनक
होगे।
जितना हम गहरा मनन- चिंतन करते हैं, द्वार स्वयं खुलने लगते हैं, 
यह मेरे निजी जीवन का भी ऐसा स्व अनुभूत प्रयोग है, जिसके आशजनक परिणाम मुझे अपने जीवन में प्राप्त हुए हैं, पूर्ण ईमानदारी पूर्वक जैसे ही हम अपने जीवन को एक निश्चित दिशा प्रदान करते हैं, हमारा स्वयं का जीवन तो सुखद होता ही है, हम हमारे आसपास जो हमारा परिवार है, हमारे आसपास का समाज 
हैं, हमारी दृढ़ इच्छा शक्ति को देखकर लाभान्वित होता है, हमें तो अपने जीवन में समस्त लाभ प्राप्त होते ही है, हमारे साथ जो है,
उन्हें भी इसका लाभ प्राप्त होता है।
        इस प्रकार हम अपने जीवन को व्यवस्थित करते हुए परिवार व समाज को भी सही दिशा की और अग्रसर कर पाते है। अगर हमारा चिंतन, मनन सही होगा तो कार्य की दिशा भी निश्चित ही सही होगी व परिणाम भी अच्छे प्राप्त होंगे।
       हम समाज से केवल शिकायत न करें, पहले स्वयं को, फिर परिवार को जीवन मूल्यों की शिक्षा दें, आज का परिवेश भले ही बदला हो, आंतरिक स्थिति तो हमें ही सुधारनी होगी , वह जितनीअधिक व्यवस्थित होगी, परिणाम भी सही प्राप्त होगे।
        यह मैंने स्वयं अपने जीवन में किया है वह इसके उत्तम परिणामों को प्राप्त किया है, पर  हमारा जीवन केवल हमारा ही ना होकर इस संपूर्ण अस्तित्व के प्रति जवाबदेह हैं, इसलिए मैंने इन लेखो के माध्यम से समाज को अपनी ओर से कुछ देने का प्रयास किया है।
जब हम अपने आंतरिक जुड़ाव को सही दिशा की और मोड़ देते हैं, उतने ही आप परिपक्व होते हैं वह आपको मार्ग भी प्राप्त होता है।
मेरी यह यात्रा जो मेरे लिए तो फलप्रद साबित हुई है।
      मेरे स्वयं के अनुभव इस लेख में समाहित करने का मुख्य उद्देश्य ही मेरा यह है कि मुझे जो लाभ जीवन में प्राप्त हुए, वह आप सभी को भी प्राप्त हो। 
   सादर प्रणाम। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद।


प्रिय पाठक वृंद,

       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
        पूर्ण विश्वास है, मेरी यह विचारों की प्रवाह श्रृंखला आपको अच्छी लग रही होगी, इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है यह लेख।
       स्वयं के भीतर आये।
हम सभी अपने दैनंदिन जीवन में विभिन्न अनुभव से गुजरते हैं, 
खट्टे-मीठे , उतार- चढ़ाव, आशा -निराशा, जय-पराजय ऐसी विभिन्न प्रकार के मनोभावों से हम अपने जीवन में गुजरते हैं, 
       जीवन के इस सफर में हमारी कई व्यक्तियों से मुलाकात होती है, जिनमें से कुछ का व्यक्तित्व हमारे जीवन में गहरी छाप छोड़ जाता है, इस जीवन सफर में निजी अनुभव के माध्यम से
हम निरंतर गुजरते जाते हैं, और नित्य नये अनुभवों का खजाना हमारे पास बढ़ता जाता है, और हम स्वाध्याय द्वारा जो प्राप्त
करते हैं, वह हमारे जीवन की एक अमूल्य धरोहर है, हम में से हर एक व्यक्ति की जीवन शैली भले ही अलग हो, मगर हमारे अनुभव भिन्न-भिन्न होंगे ही,  जब उन निजी अनुभवों से हम गुजरते हैं, 
तब हम सभी का अनुभव अलग-अलग प्रकार का होगा।
        मेरी नजर में स्वाध्याय का अर्थ है, स्वयं का अध्ययन, हम जितना अपने आप को व्यवस्थित रखेंगे, उतना ही हमारे जीवन में 
तरक्की के सोपान खुलेंगे।
           हमें अपने जीवन में कई प्रकार के बंधनो का सामना भी करना पड़ता है, कहीं मित्रता का बंधन, कहीं हमारे स्वयं के स्वभाव का अध्ययन, कहीं राष्ट्र का बंधन, कहीं हमारे दायित्वों का बंधन, इन सब बंधनो को जीते हुए भी हमें हमारे जीवन यात्रा पूर्ण करनी ही होती है।
       इन सब बंधनो को जीते हुये एक खालीपन सा जीवन में
बना रहता है, वह क्यों है, किस कारण से है, उसकी खोज में ही 
हमारे जीवन का अधिकांश हिस्सा गुजर जाता है, हमें हमारे जीवन ऊर्जा  अधिकांश समय हम ऐसे कार्यकलापों में निकाल देते हैं, 
जिनका हमारे जीवन की प्रगति से कोई लेना देना नहीं होता,
हम हमारे जीवन में क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर हमें स्वयं ही खोजने होते हैं।
       क्या कभी किसी दिन हमने कुछ समय ठहरकर अपने आप से भी संवाद किया है, जो भी हम कर रहे हैं, उसके पीछे हमारा मुख्य उद्देश्य क्या है, या हम यूं ही बगैर किसी उद्देश्य के जीवन को गुजारना चाहते हैं। 
         सभी से संवाद करियै, इसमें भी कोई बुराई नहीं, पर जब आप सबसे संवाद कर रहे हो, तो क्या हमें अपने आप से भी संवाद स्थापित नहीं करना चाहिये।
        जीवन भर हम दूसरों से ही संवाद करते रहे , इतना संवाद हमने अपने आप से पूर्ण ईमानदारी से किया होता या अभी भी कर ले, तो जीवन की दशा व दिशा दोनों ही परिवर्तित हो सकती
 है।
सभी प्रकार के विचारों को कुछ समय रोककर कुछ समय केवल मौन हो जाये तो भीतर से ही एक अद्भुत ऊर्जा का संचार हमारे भीतर होने लगेगा 
पूर्ण ईमानदारी से जब हम अपने आप से संवाद स्थापित करते हैं, 
तो वह आंतरिक प्रकाश जो हमारे भीतर ही विद्यमान है, उसे और हमारी दष्टि पहुंचती है व जीवन जो हम जी रहे हैं, उसमें क्या 
आवश्यक सुधार हमें करना है, हमें स्वयं ज्ञान होने लगता हैं।
         जितनी   ईमानदारी से हम सभी से संवाद स्थापित करते हैं,
उतनी ही ईमानदारी से हम स्वयं से भी संवाद स्थापित करें, सारे प्रश्नों के उत्तर हमारे पास ही है। 
       आपका अपना 
        सुनील शर्मा 
         जय भारत, 
          जय हिंद