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प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हमारा विषय है ,आवरण 
हम जैसे हैं, उस पर हम एक आवरण चढ़ा लेते हैं, और धीरे-धीरे उन आवरणों की संख्या
इतनी अधिक हो जाती है, हम अपना मूल स्वरूप ही खो बैठते हैं, हम जैसे हैं, जो भी हमें प्रकृति से प्राप्त है, उसे उसी मूल रूप में रखना हमारा कर्तव्य है, मगर शायद आज का दौर प्रस्तुतीकरण का दौर है, आपमें भले उतनी काबिलियत ना हो, पर उस पर आवरण तो चढ़ा ही सकते हैं, एक या दो आवरण हो, 
तब तक तो ठीक है, मगर जब आवरण की परतें इतनी अधिक हो जाए कि सत्य ही समझ नहीं आये, तो हमें फिर से एक बार 
यह समझना होगा, सत्य छिपता नहीं, भले ही उस पर कितने भी असत्य के आवरण चढ़ा दिये
 जाये, मगर वर्तमान परिदृश्य मैं अगर हम समाज को देखें, तो चहूं और एक ही प्रकार
का वातावरण है, किस प्रकार हम ऐसा प्रस्तुतीकरण करें कि हमारी खामियां तो 
नजर ही नहीं आये, हमारा ऊपरी आवरण 
इतना प्रभावशाली हो, कोई व्यक्ति  हमारा सही व्यक्तित्व जान ही न सके, जो हम आवरण में लपेटकर पेश कर दे, बस वही सच नजर आये, यह विकृति समाज में, राजनीतिक दलों में व संपूर्ण समाज के विभिन्न वर्गों में 
तेजी से व्याप्त हो गई है, हम किसी के भी व्यक्तित्व का सही आकलन ही नहीं कर पाते, क्योंकि आवरणों की परत ही इतनी चढ़ी हुई है, जिसमें सब कुछ धुंधला नजर आता है। 
समाज में व्याप्त यह जो परिवर्तन है, वह सामाजिक हित में तो कतई उचित नहीं है,
सच आखिरकार कितनी भी परतो में हो, सामने आता ही है, इसलिए आवरण कितना जरूरी है, यह अवश्य समझे, अनावश्यक रूप से इसका जो दुरुपयोग हो रहा है, उससे हमें सावधान रहने की जरूरत है। 
विशेष:- आज हर व्यक्ति इतने आवरण में कैद है, कि उसका मूल व्यक्तित्व या स्वरूप 
जो प्रकृति ने उसे प्रदान किया है, आवरणों 
की परतो ने समाज में एक अस्वस्थ परंपरा को जन्म दे दिया है, जहां बिना आवरण के कोई सामने आना ही नहीं चाहता, और यह समाज के लिए घातक है, कोशिश करें आवरण की आवश्यकता जितनी उचित हो, 
केवल उतनी मात्रा में ही उसका प्रयोग करें। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
     प्रवाह किसी अद्भुत वैचारिक यात्रा में आप सभी का स्वागत है, आप सभी को हृदय से मंगल प्रणाम, 
      पुनः आप सभी को सादर नमन, प्रजातंत्र या जनतंत्र , यानी 
जनता के लिये, जनता के द्वारा, जनता की भलाई के लिए चुना गया तंत्र। 
      इस पूरे तंत्र में जन का महत्व सबसे अधिक है, वह समय-समय पर जनता ने इसे अपने महत्वपूर्ण अभिमत द्वारा सिद्ध भी किया है।
      हमारे राष्ट्रगान की प्रथम पंक्तियां भी इसी महत्वपूर्ण भाव को कहते हुए हमें एक राष्ट्र के रूप में बांधती है, हमें स्वत: ही इसे समझना होगा, हम जहां पर भी हैं, पूर्ण गरिमा के साथ उस पद,
जगह पर अपनी पूर्ण चेतना का उपयोग समाज -हित और राष्ट्रहित में किस प्रकार हो, इसके लिए सर्वप्रथम हमें स्वयं के कर्तव्य वह उत्तरदायित्व के प्रति भी सजग होना पड़ेगा, केवल आलोचना मात्र से इसका जवाब न देकर हमें अपने मूल कर्तव्य के प्रति भी सजग होना ही पड़ेगा, अगर हम कोई भी कदम, चाहे वह कितना ही छोटा ही क्यों ना हो, किसी और ले जाते हैं, उस और अगर हम सचेत नहीं है, तो हमें किसी को दोष देने का अधिकार भी नहीं है। पहले हम अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हो, अगर हम ईमानदारी से अपने कर्तव्य को पूरा करते हैं, तो यह भी एक राष्ट्रभक्ति ही है, और अगर हम अपनी जो भी कर्तव्य है, उनके परिपालन में कोई त्रूटि करते हैं, तो इसके दोषी हम स्वयं है, कोई अन्य नहीं। 
          राष्ट्र ने हमें अधिकार तो दिये ही है, मगर इसके प्रति हमारे कर्तव्य भी है, वह जनतंत्र की, जनता की भूमिका इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण इसीलिये हैं, क्योंकि इसकी रचना संविधान में इस राष्ट्र के उत्थान हेतु जो शक्ति हमें संविधान में प्रदान की है,
उसका सदुपयोग तो हमें करना ही चाहिये, जहां पर इसका दुरुपयोग हो रहा है, वहां पर भी सतर्कता आवश्यक है। 
       तभी जनतंत्र शब्द की गरिमा वह इस राष्ट्र की गरिमा दोनों के साथ हम न्याय कर सकेंगे। 
      अगर कोई भी बात जो हमें ऐसी प्रतीत हो, जो समाज या राष्ट्र को विखंडित करती हो, तो यह भी जनता का दायित्व है, उसे पूर्ण शक्ति से नकारे, यही जनतंत्र की असली ताकत भी है। 
        हमारे राष्ट्रगान की प्रथम पंक्तियां भी इसी बात की और संकेत करती है, "जन गण मन अधिनायक जय है, भारत भाग्य विधाता" इतना स्पष्ट संदेश हमारे राष्ट्रगान ने हमें दिया है, तो हमें आंतरिक रूप से जागृत होना चाहिये, जहां पर भी हमारी आंतरिक चेतना इस बात के लिए समर्थन न दे, उसे  सदैव जागृत रखें, आज भी जब राष्ट्रगान हमारे कानों में गूंजता है, तो हमारा सीना गर्व से, मस्तक भी गर्व से ऊंचा हो जाता है, जैसे ही हम राष्ट्र बोध से अपने को परिपूर्ण करते हैं, हमारी उस चेतना से  , हमारे भीतर एक ऊर्जा का संचार होता है, और वही आंतरिक ऊर्जा हमें अपने कर्तव्य के प्रतिपादन के लिए प्रेरित करती है।
      राष्ट्र के प्रति प्रेम -भाव , व जागरूकता दोनों ही आवश्यक है,
अत्यधिक जोश में हम कोई गलत निर्णय तो नहीं कर रहे, इसके 
प्रति सदैव सचेत रहें, राष्ट्र प्रथम हैं, मगर इसका निर्माण तो जनतंत्र में जनता से ही हुआ है, तो जनता को भी अपने दायित्व को समझना होगा, जो भी राष्ट्रहित में हो उसका पूरजोर समर्थन करें,
जो भी गए थे हम राष्ट्र के हित में उचित नहीं लगती, उसका विरोध भी अवश्य करें, केवल तटस्थ रहने से कार्य नहीं चलेगा।
           इस राष्ट्र की असली शक्ति स्वयं जानता है, जिसके द्वारा हम सत्ता को चलाने वाले, जो भी हमारा नेतृत्व कर रहे हैं, उनका चयन करते हैं। 
           राष्ट्र प्रेम से जो भी आंतरिक रूप से ओत-प्रोत है, वह इस राष्ट्र के संवर्धन में जो भी उचित लगे, उसका हदय से समर्थन करें, 
साथ ही जहां पर भी आपको यह ज्ञात हो, कि आपके इस कदम से राष्ट्र की क्षति है, तो वह न उठाएं, विनम्रता पूर्वक प्रतिरोध भी 
अवश्य करें, केवल मुक दर्शक बने रहकर अगर हम सब देखते हैं,
तो जागरूकता के अभाव में, जो इस राष्ट्र के प्रति हमारा मूल्य दायित्व भी है, उसका निर्वाह नहीं कर रहे हैं।
      हमारी स्वतंत्रता हमें कहीं क्रांतिकारियों के बलिदान के बाद
प्राप्त हुई है, अतः एक राष्ट्र के नागरिक के रूप में, अगर हमारे अधिकार हैं ,तो कर्तव्य भी है।
     अपने- आप से संवाद अवश्य करें, क्या हमारी भूमिका, जो चाहे बहुत छोटी क्यों ना हो? इस राष्ट्र के निर्माण में हमारी क्या भूमिका है? सर्वप्रथम हम जहां पर भी हैं, पूर्ण चेतना युक्त होकर हमारे कदम को स्वयं परखे, हमें देश ने कुछ मौलिक अधिकार दिए हैं तो कुछ मौलिक कर्तव्य भी प्रदान किये है।
        हम अधिकारों की तो बात करते हैं, मगर कर्तव्य का भी 
स्मरण रखें, और यह स्मरण हमें केवल स्व जागरण द्वारा ही हो सकता है, अन्य कोई दूसरा मार्ग  है ही नहीं।
      जब भी हम संशय की स्थिति में हो, अपने अंतर्मन में झांकें,
सबसे सही उत्तर हमें वहीं से प्राप्त होगा, क्या उचित है? क्या अनुचित है? इस पर गहरा विचार करें, गहन विचार करने के उपरांत ही हम कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय करें, ऐसे किसी भी 
कार्य का समर्थन किसी भी कीमत पर ना करें, जो आपके आंतरिक मूल्यों से मेल न खाती हो, हम राष्ट्र को जोड़ने वाले प्रत्येक कार्य का समर्थन करें, पर साथ ही जो राष्ट्र के प्रति सही न हो, राष्ट्रीय विखंडन की जो बात करें, सर्वप्रथम उसके आचरण को परखे, अगर आचरण राष्ट्र हित की और नजर आता है, तो निश्चित ही उसका समर्थन भी अवश्य करें, वह जो भी राष्ट्र विरोधी कृत्य करता हो, उसका समर्थन न करें, तभी हमारे जनतंत्र की सार्थकता होगी। हम स्वयं भी  वह आचरण न करें, जिसकी उम्मीद हम सामने वाले से करते हैं। मेरा आशय यहां यह है, की सर्वप्रथम जनता को भी राष्ट्र के प्रति जागरूक होना ही होगा। 
  विशेष:- जनतंत्र में जनता जनार्दन की महिमा हमारे राष्ट्रगान की प्रथम पंक्तियों में ही वर्णन कर दी गई है, आइये, राष्ट्र की गरिमा के प्रति हम स्वयं तो सचेत रहे, हमारे आस-पास भी उसे चेतना का हम निर्माण करें, राष्ट्र की गरिमा ही सर्वप्रथम है, इसे सदैव जनता भी ध्यान रखें, तभी जनतंत्र , हमें राष्ट्रबोध के साथ ही अपने आसपास घट रहे वातावरण से भी परिचित होना होगा, क्योंकि चेतना से युक्त होने पर ही हम सही निर्णय कर सकेंगे। 

आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद

प्रिय पाठक वृंद,
        सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      हम सभी उस परमपिता की ही संतान है, मानव जीवन की उपयोगिता क्या है? क्यों यह अन्य से सर्वश्रेष्ठ है, निश्चित ही जब हम इसका उत्तर खोजने के लिए भीतर की और मुड़ते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि हमारी जो भी विचारधारा है, वह ही हमारे भाई यह जीवन को भी प्रतिबिंबित करती है।
         जब हम आचरण व अपनी सोच दोनों में ही अंतर ले आते हैं, तो हमारा जीवन वहीं से पतन की और जाने लगता है। जो हम कहते हैं, जो करते हैं, क्या वह उचित है या अनुचित, इसका जो हमें बोध कराती है, वह हमारी आंतरिक प्रज्ञा ही है। 
         बस इसी एक स्तर पर हम पृथ्वी के अन्य सभी प्राणियों से अलग है, यही दिशा हमें अन्य से अलग करता है।
        हमारे भीतर की आंतरिक ऊर्जा जब तक सही दिशा की ओर परिवर्तित नहीं होती, तब तक हम मानव कहला ही नहीं 
सकते, मनुष्य जन्म होना ही अपने-आप में एक उपलब्धि है,
मनुष्य जन्म की जो आंतरिक दिव्यता है, वही असल जीवन है, 
हम चाहे जिस दिशा की और अपने आप को मोड सकते हैं, यहीं पर आकर हम माननीय श्रेष्ठता की और अग्रसर होते है।
      जब हम नैतिक मूल्यों पर खड़े होते हैं, उसे समय हम सबसे अधिक ताकतवर होते हैं, जैसे ही हम उन मूल्यों से जीवन को 
हटाते हैं, इस समय हमारा क्षरण प्रारंभ हो जाता है।
      मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठता तब ही है, जब हम अपना स्वयं का जीवन तो आनंदपूर्वक जीते हैं, साथ में सभी को इस प्रकार का आनंदमय व बोधपूर्वक जीवन जीने के लिये प्रेरित करते हैं। 
    आत्म मंथन करते हुए हम अपने जीवन को तो मानवीय दृष्टिकोण से समझे व अन्य सभी को ईस और प्रेरित करें।
    जिस प्रकार हम एक ईश्वर के बनाए हुए हैं, उसी की कृपा हम सभी को प्राप्त हो रही है, इस दिव्य परमात्मा की दिव्य शक्ति हम सभी में समाहित है, वही दिव्यता ही हमें सन्मार्ग पर ले आती है, 
देंवीय  गुण जब हमारे भीतर प्रविष्ट हो जाते हैं, हमारा जीवन दैदीप्यमान हो उठता है। 
    चिंतन करते हुए जब हम मानवीय मूल्यों को जीवन की आधारशिला बना लेते हैं, हमारी आंतरिक सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा का हमारे भीतर जागरण हो जाता है, और वही जागरण हमें दिशाबोध प्रदान करता है।
     यही मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठता का हमें बोध कराती है, इसी एक बिंदु पर हम अन्य सभी प्राणियों से अलग है, वैचारिक बिंदु पर, आइये मंथन करें, स्वयं पहले आचरण करें, फिर उसे आचरण को परिवार के अंदर दृढ़तापूर्वक उतारे और अंत में समाज की और इसी आचरण को ले चले, जब आचरण की दृढ़ता हमारे भीतर होगी, अपने आप ही एक आंतरिक दृढ़ता का अनुभव हम करेंगे। 
 विशेष:- मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठता इसी में है, अपना जीवन हम
             सहज रूप से जिये व अन्य को भी इसके लिये  प्रेरणा प्रदान करें।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद।
 प्रिय पाठक गण,
      सादर वंदन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      मेरी यह प्रवाह यात्रा आप सभी के हृदय को निश्चित ही छू रही होगी। 
    इसी क्रम में आज का विषय है सफलता का रहस्य। 
इसका सर्वप्रथम रहस्य तो यह है कि हम अपने जीवन में जो भी कार्य करना चाहते हैं, उसमें हमारी पूर्ण अभिरुचि अवश्य हो, इसका मुख्य कारण यह है कि वह कार्य आपकी अभिरुचि का है,
तो आप अपने समय की भी परवाह न करते हुए उस कार्य को अवश्य करेंगे।
     द्वितीय, हमें हमारे लक्ष्य निर्धारण करने में स्पष्टता बरतना चाहिए, हमें क्या करना है? क्यों करना है? हम जो कार्य कर रहे हैं, हमें उसके परिणाम के बारे में अवश्य बोध होना चाहिये, तभी हम सही दिशा बोध होने पर उस कार्य को करेंगे वह निश्चित ही हम सफलता का ही वरण करेंगे।
     हमें अपने लक्ष्य, जो भी हमने स्वयं निर्धारित किये हैं, पूर्ण स्पष्टता  पूर्वक उन पर कार्य करना चाहिये, तभी परिणाम भी सटीक प्राप्त होंगे। 
     किसी अन्य की देखा अच्छी चीजों का अनुसरण न करें, अपने लक्ष्य को अपनी आंखों के सामने रखें, वह आपको हमेशा प्रेरणा प्रदान करते रहेगा। 
       अपने लक्ष्य को आप लिखकर रखें, उनमें प्राथमिक, आवश्यक क्या है? इसे अपने सकारात्मक चिंतन द्वारा संचालित 
करें।
      लक्ष्य चाहे छोटा हो या बड़ा, एक निरंतरता  का होना आवश्यक है, निरंतरता होने पर ही हम सफलता की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं।
    अन्य कोई उपाय नहीं है, अपने आस-पास घट रहे घटनाक्रम को पूर्ण सजगता पूर्वक अवलोकन करें, सभी बातों को स्पष्ट रूप से समझे, अपने कार्य पर पूर्ण दृष्टि रखें, जो भी कार्य करें, पूर्ण सजगता पूर्वक करें।
       सजगता पूर्वक कार्य करने पर ही आपको सफलता प्राप्त हो सकती है।
     आप जीवन में जो भी कार्य कर रहे हैं ,पूर्ण ईमानदारी से अवश्य करें, निश्चित ही तब परमपिता परमात्मा भी आपके साथ खड़े होंगे।
       हमारी सफलता का रहस्य केवल हमारा दृढ़ निश्चय है, दिल निश्चय के बिना आप किसी भी क्षेत्र में सफल नही हो सकते।
    अपनी अभिरुचि, दृढ़ निश्चय वह निरंतरता, यह तीन बातें ही 
आपकी सफलता में मुख्य कारक की भूमिका निभाते हैं। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद।


प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम,
मुझे पूर्ण विश्वास है, आप सभी को मेरे द्वारा लिखित लेख, जो लिखना होकर आपसी संवाद है, पसंद आ रहे होंगे।
        आज का हमारा विषय है, विश्व परिवार दिवस, तो चलिए चलते हैं आज के सफर पर, इस माह की 15 तारीख को विश्व परिवार दिवस मनाया जा रहा है, यह अभी-अभी चलन हुआ है,
की विभिन्न विषयों पर किसी विशेष दिन को हम किसी दिवस के नाम से संबोधित करने लगे हैं।
          अब विश्व परिवार के बारे में हम भारतीय संस्कृति का अवलोकन करते हैं, क्या कहती है? हमारी अपनी संस्कृति, 
हमारी संस्कृति में एक वाक्य है"वसुधेव कुटुंबकम" यानी संपूर्ण विश्व यह भूमंडलपर रहने वाले समस्त प्राणी जो भी है, सभी एक परिवार है।
हमारी प्राचीन संस्कृति में तो पहले से ही संपूर्ण विश्व को एक परिवार ही माना गया है। 
     पहले हमारे यहां संयुक्त परिवार होते थे, संगठन होता था,
अब यह परिपाटी धीरे-धीरे हट रही है। 
      यह संपूर्ण विश्व आपस में जुड़ा हुआ है, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु यह पांच तत्व संपूर्ण विश्व में व्याप्त हैं, व यह सभी का समान रूप से पोषण करते हैं , मनुष्य मात्र में किसी भी प्रकार का भेड़ कभी प्रकृति ने किया ही नहीं, वह तो सर्वत्र सबको समान रूप से उपलब्ध है, मनुष्य ही नहीं, वरन् पृथ्वी पर रहने वाले अन्य वन्य जीव, जल में रहने वाले जलचर, आकाश में विचरण करने वाले प्राणी, छोटे से छोटे जीव जंतु यह सभी कहीं न कहीं आपस में एक सामंजस्य द्वारा जुड़े हुए हैं।
       मनुष्य में सबसे अधिक बुद्धिमत्ता होने के कारण वह हर प्रकार की योनि से श्रेष्ठ है, वह चाहे तो निर्माण कर सकता है, वह चाहे तो ध्वंस, मनुष्य की प्रज्ञा जागृत होने पर वह निर्माण की ओर ही जायेगा, प्रकृति ने एक दिव्य सतुलन अपने आप ही रच रखा है, जिसे हम केवल अपने निजी स्वार्थ के कारण समझ नहीं पाते हैं, 
मनुष्य का अत्यधिक लालच वह प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहारों का 
अंधाधुंध दोहन , उनके संरक्षण की दिशा में सही कदम ना उठाना, 
इन सब के कारण जो क्षति हो रही है, उसका एकमात्र उपाय हमें प्रकृति से सामंजस्य  स्थापित करना होगा , जितना हम उससे लेते हैं, क्या हम पुनः उसे प्रदान करते हैं, हमें भूमि पर वृक्षारोपण अनिवार्य रूप से करना ही चाहिये व जो भी वृक्ष है उन्हें बचाना 
और वृक्ष लगाना यहां पर्यावरण की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है। हमें इस प्रकार की जीवन शैली को अपनाना होगा , जहां सभी एक दूसरे के पूरक के रूप में काम करें, केवल भौतिकवाद की बहुत अधिक मात्रा विश्व को विनाश की और अग्रसर कर सकती है, हमारी प्राचीन सभ्यता का अगर हम अध्ययन करें, तो वहां हमें सभी तत्वों का पूजन व  उनके संरक्षण का भाव शुरू से ही विद्यमान रहा है, हमारी संस्कृति "वसुधैव कुटुंबकम" की रही है,
हम इसके मंत्रो भी अगर देखते हैं, तो संपूर्ण विश्व के मंगल का भाव उनमें छुपा हुआ है।
  " सर्वे भवंतु सुखिन, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मां कश्चित दुख भाग भवेत "
        इसमें यह कामना की गई है, सब सुखी हो, सब निरोगी हो, 
सब भद्र हो, यानी सब की एक दूसरे के प्रति मंगल भाव की कामना हो व वैसा ही आचरण हो, कोई भी संसार में दुखी ना हो,
ऐसी मंगल भाव से हमारी संस्कृति ओत-प्रोत है, आश्चर्य तो इस बात का है , हमारी संस्कृति में इतने मंगलमय भाव होते हुए भी
हम  ही हमारी संस्कृति की मूल अवधारणा से सही तरीके से परिचित नहीं हैं, इतना सुंदर दर्शन क्या किसी अन्य संस्कृति में हमें देखने को मिलता है।
      केवल भारतीय संस्कृति में ही संपूर्ण विश्व को एकजुट रखने 
का मूल भाव छुपा हुआ है, हमारी संस्कृति सदैव सामंजस्य वह साहचार्य की रही है, हमें हमारी संस्कृति पर पूर्ण  गर्व  होना चाहिये, इसमें संपूर्ण विश्व की भलाई के सारे सूत्र  विद्यमान है।
       हमारी संस्कृति में एक शब्द है देवता, देवता यानी देने वाले, 
तो हमारे पंच तत्वों को भी देने वाली प्रवृत्ति होने के कारण देव ही माना गया है। 
        हमारी संस्कृति दैवीय संस्कृति है, जो केवल देना जानती है,
संपूर्ण विश्व को शांति का संदेश, आपस में मिलकर रहने का संदेश
अगर किसी संस्कृति ने सर्वप्रथम दिया है, तो हमारी प्राचीन संस्कृति ही है। 
       आप देखेंगे हमारे जितने भी देव-स्थान है, वे या तो पहाड़ों पर है, यह नदियों के किनारे, प्राचीन काल में तो शिक्षा भी वनों में गुरुकुलों में होती थी, इस प्रकार हम अध्ययन करें तो तो पायेंगे,
कि हमारे प्राचीन ऋषि मुनि कितने विद्वान थे, उन्होंने उसे समय ही प्रकृति से साहचार्य की भावना के कारण तीर्थ क्षेत्रों का निर्माण 
पहाड़ों व नदियों के किनारे किया, ताकि पहाड़ों व नदियों का भी संरक्षण हो सके, ऐसी सुंदर विचारधारा वाली संस्कृति को छोड़कर इसमें संपूर्ण विश्व के मंगल का ही भाव छुपा है, हमेशा की अन्य संस्कृतियों को अपनाते जा रहे हैं, हमारी जो मौलिक संस्कृति है, 
वह "सादा जीवन ,उच्च विचार की रही है" , वह जो मूल भाव हमारी संस्कृति का है, उसे दर्शन को छोड़कर हम प्रदर्शन में व्यस्त हो गये, तो जहां मूल दर्शन विद्यमान हैं, वहां आज भी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं मिलेगी, क्योंकि वहां सामंजस्य व सहचार्य की भावना निश्चित ही होगी ।
        विश्व परिवार दिवस यह दिवस मनाने की अवधारणा तो अभी आई है, हमारी प्राचीन संस्कृति में चाहिए मूल भाव शुरू से ही विद्यमान रहा है और इसीलिए हमारी संस्कृति अभी तक नष्ट भी नहीं हुई, क्योंकि इसकी मूल अवधारणा को यहां का जन-जन पहचानता है वह उससे मजबूती से जुड़ा हुआ है। हमारी संस्कृति में वह सब विद्यमान है, जो बाहर से हमें मिलता है, पर बड़े ही आश्चर्य का विषय है, विदेशी लोग हमारी संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं और हम भारतीय ही अपनी संस्कृति की मूल अवधारणा को भूलते जा रहे हैं। 
     सभी को विश्व परिवार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, 
मेरा इस लेख को लिखने  का उद्देश्य यह है कि हमारी संस्कृति पूर्णतः वैज्ञानिक अवधारणा पर बनी हुई है, इसमें सभी के मंगल की कामना भी की गई है वह किस प्रकार से हमें यज्ञ आदि द्वारा 
उसको चैतन्य रखें, यह भी हमारी संस्कृति में बताया गया है। 
ऐसी महान संस्कृति में जन्म लेने पर हम सभी को गर्व होना चाहिये, इसमें ज्ञान- विज्ञान का जो प्रयोग बताया गया है, वह सृष्टि का कल्याण किस प्रकार हो, हमारे प्राचीन ग्रंथो में उसकी सुंदर सब विधि भी बताई गई है। 
विशेष:- मेरा विनम्र निवेदन उन महानुभावों से है, जिन्होंने हमारी प्राचीन संस्कृति का अध्ययन ही नहीं किया व बगैर सही अध्ययन के , वे इसके विरोध में खड़े हो जाते हैं, अगर आप हमारी मूल संस्कृति का सही अध्ययन करें तो पाएंगे यह विश्व के सर्वांगीण विकास की और ही संकेत करती है, पर बात इसे पूर्ण ईमानदारी से अपनाने की है।
आपको अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद

सुप्रभात, 
         आप सभी का दिन मंगलमय हो, आज हम बात करेंगे स्वयं दिशा तय करें, मेरे लेखों के जरिए आप मेरे विचार से तो परिचित होते ही जा रहे हैं ।
               जीवन में किसी भी कार्य को करने के लिए हम सबसे पहले उसे कार्य को क्यों कर रहे हैं, उसके पीछे हमारा क्या उद्देश्य है, जो भी कार्य हम कर रहे हैं, उसे कार्य का क्या परिणाम होगा।
                 इस प्रकार से मंथन करने के बाद हम उसे कार्य को अगर करते हैं तो कई बातें हमारे सामने बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर हमारी अभिरुचि कृषि में है, उसमें हम किसी प्रकार का कार्य करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमारे पास क्या संसाधन हैं, उन संसाधनों का हम किस प्रकार बुद्धिमत्ता पूर्वक उपयोग करते है।
                 जैसे हमारे पास कृषि भूमि तो है, पर उन्नत बीज व खाद तथा समयबद्धता से हम कार्य करेंगे तो परिणाम भिन्न होंगे।
कृषि में भी फलदार वृक्षों, सब्जियां, अनाज, फूलों की खेती, वनस्पतियों की खेती, मसाले की खेती, इस प्रकार हमारी रुचि किस प्रकार की खेती में है, क्या हमारी जमीन उसे प्रकार के लिये उपयुक्त है, इस प्रकार विचार कर हम कार्य करते हैं तो हमें परिणाम अच्छे प्राप्त होंगे।
                  दूसरा उदाहरण अगर हम राजनेता बनना चाहते हैं 
तो एक राजनेता में सबसे बड़ी खूबी तो संवाद की होना चाहिये।
राजनीति में आप कितनी कुशलता से संवाद करते हैं, यह सबसे अधिक मायने रखता है। 
                  हम स्वयं अपने आप से पूछे कि हमारी सबसे अधिक रूची किस क्षेत्र में है, वह उसके बाद हम अपनी समस्त शक्ति व  समय व विचार तथा उसकी बेहतर योजना इन सब पर  हम कार्य करेंगे, उतने ही अपेक्षित परिणाम आपको उसे क्षेत्र में प्राप्त होंगे।
            हमारी अभिरुचि जिस क्षेत्र में सबसे अधिक है, उसने हम दिल लगाकर कार्य करते हैं, फिर अगर हम दिल से उस कार्य को करेंगे तो फिर हमारे लिए समय भी बाधा नहीं होगा, क्योंकि जिस क्षेत्र में हमारी रुचि है, उस क्षेत्र  में कार्य करने पर हमें आनंद भी प्राप्त होता है।
      इस प्रकार जब कोई भी निर्णय हम स्वयं करते हैं तो उसकी जवाबदेही  भी हमारी होती है, पूर्ण जवाबदेही  से अपनी कार्ययोजना पर आप कार्य करें। आपकी राह में आपका आत्मविश्वास ही आपकी सफलता की सर्वप्रथम कुंजी होगी।
           ऐसा कोई भी कार्य नहीं है, जिसे हम पूर्ण मनोयोग से करें और हमें परिणाम न मिले, हमारी दिशा हंस स्वयं तय करें वह दशा बदलने के लिए जिस दिशा में हम जाना चाहते हैं अथवा जो भी कार्य क्षेत्र हम अपनाना चाहते हैं, उसका अधिकतम  ज्ञान जहां से प्राप्त हो, वह हासिल करें। 
           इस प्रकार आप जीवन में तो सफल बनेंगे ही, कई व्यक्तियों के लिए प्रेरणास्रोत भी होगेे।
        विशेष:- जब आप स्वयं किसी भी कार्य को करने का मानस बनाते हैं, कार्य योजना तय करते हैं, अपनी अभिरुचि को ध्यान में 
रखकर आप कार्य करते हैं, तो आदि सफलता आपकी उसी समय तय हो जाती है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
            सादर नमन 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 हिंदू नव वर्ष व चैत्र नवरात्रि का रविवार से शुभारंभ होने जा रहा है, आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शभकामनाएं।
         इस दिन से विक्रम संवत भी प्रारंभ हो रहा है, यह तिथि बहुत ही महत्वपूर्ण है, हम प्राचीन काल से इसे मनाते आ रहे है।
         भारतीय नव वर्ष का प्रारंभ  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इसी रविवार को प्रारंभ हो रहा है
          रविवार को सूर्योदय के समय नव वर्ष और नवरात्रि दोनों की ही शुरुआत हो रही है। 
          30 मार्च रविवार को प्रारंभ होने वाली यह नवरात्रि  व नव वर्ष आप सभी के लिए मंगलकारी हो, आप सभी को नववर्ष की अनंत शुभकामनाएं। 
          इस वर्ष के राजा सूर्य  व मंत्री भी सूर्य है, सूर्य प्रशासन का भी कारक है, इस वर्ष प्रशासनिक स्तर पर अधिक कसावट होगी,
कई कठोर निर्णय राज्य पक्ष की ओर से होंगे।
          इस वर्ष स्पष्ट वादी विचारधारा को और अधिक बल प्रदान होगा, इसका कारण सूर्य के मंत्री  व राजा दोनों होने के कारण से होगा, क्योंकि ज्योतिष में सूर्य को प्रशासन का कारक माना जाता है। निश्चित ही सामाजिक हित में कठोर प्रशासनिक निर्णय हमें इस वर्ष देखने को मिलेंगे। 
            जो भी स्पष्ट विचारधारा के राजनेता है उनकी इस वर्ष और अधिक उन्नति होगी।
           इस तिथि का प्राचीन महत्व भी बहुत अधिक है, इसी दिन सृष्टि का प्रारंभ भी हुआ था, 
           वैज्ञानिक दृष्टि से भी हम देखें तो इस समय वसंत ऋतु चल रही होती है, प्रकृति मानो हमें उत्सव का आमंत्रण देती है, 
          किसानो की फसल भी लगभग इसी समय तैयार होती है, वे भी अपनी फसलों के तैयार होने का आनंद मना रहे होते हैं, प्रकृति का वातावरण भी सुरम्य  होता है।
           इस प्रकार अनेक  कारणों से हमारा नव वर्ष और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, हमारे नव वर्ष की जो प्राचीन परंपरा रही है, वह किस प्रकार बुद्धिमत्ता पूर्वक प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए की गई है, यह एक विचारणीय विषय है। 
           हमारा हिंदू नव वर्ष ही नहीं वरन् हमारे सारे त्यौहार प्रकृति से ही जुड़े हैं व हमारी पूर्ण संस्कृति उल्लास व त्यौहारों की संस्कृति है। 
          आइये नव वर्ष का स्वागत नए सुंदर विचारों से करें, सभी के लिए मिलकर मंगल कामना करें, हम सभी संगठित हो, 
क्योंकि संगठन में ही बल होता है। 
          नव वर्ष में शुभ संकल्पों से संकल्पित हो, उन पर पूर्ण दृढ़ता पूर्वक हम कार्य करें। 
          आप सभी को पुनः नव वर्ष की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
           यह  वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग के शुभ मुहूर्त से भी संयुक्त है,
यह वर्ष अनेक प्रकार से मंगलकारी होने वाला है, राजनीतिक चेतना से यह वर्ष परिपूर्ण होगा, ईमानदार व स्पष्ट राजनेताओ की निश्चित ही इस वर्ष छवि और अधिक निखरेगी ।
            प्रशासन से जुड़े सख्त फैसलों के लिए जो भी राजनेता जाने जाते हैं उन लोगों के लिये  यह वर्ष और मंगलकारी होगा, चाहे वे राजनेता किसी भी दल से क्यों न जुड़े हो।
            कई मायनों में यह नव वर्ष क्रांतिकारी साबित होने जा रहा है, इसकी झलक नव वर्ष के प्रारंभ में ही आपको देखने को मिल जायेगी।
      आपका अपना 
      सुनील शर्मा 
      जय हिंद,
       जय भारत।