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प्रिय पाठक गण,
      सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, स्वाभिमान पर, स्वभाव+अभिमान, इन दो शब्दों से मिलकर यह बना है, जो भी प्रकृति से हमें 
प्राप्त हुआ, वही सत्य है।
      स्वाभिमान, यानी अपनी मूल प्रवृत्ति या
प्रकृति जो हमें ईश्वर ने प्रदान की है, वही हमारा स्वभाव है, या स्वाभिमान भी है।
        सभी की अपनी- अपनी आदतें होती हैं,
मगर एक बात अगर हम गहराई पूर्वक विचार करें , तो वह यह है, कि मानवीय करुणा से 
ओत-प्रोत होना, मनुष्य होना यह हम कभी न भूलें।
        हमारा जो भी स्वभाव है, स्वाभिमान है, 
वह ऐसा हो, जिससे हमारे आत्म सम्मान को 
भी ठेस न पहुंचे, साथ ही अन्य के भी आत्म सम्मान को हम ठेस न लगायें।
       मनुष्य की मूल प्रकृति यह रही है, कोई उसे पहचाने, जाने, उसकी लोकप्रियता हो,
यह एक ऐसी ख्वाहिश है, जो सभी के अंतर्मन में बसी होती है।
         अपनी मौलिक विशेषताओं को हमें
पहचानना चाहिये व पूर्ण ईमानदारी से उस
पर कार्य करें, अगर हममें कोई भी हुनर है, 
तो उसे हमें लगातार, निरंतर अभ्यास के द्वारा 
हम किसी भी विधा में शीर्ष पर जा सकते हैं। 
हम सभी के जीवन में उतार- चढ़ाव, जय पराजय, हानि -लाभ, सभी आते ही हैं, मगर अपने अच्छे समय में हम बिल्कुल शांतचित्त होकर उसका आनंद उठायें, व विपरीत समय होने पर भी धैर्य बनाए रखें। 
      अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को 
कभी भी नीचा न होने दे, हम जीवन में जो भी कर रहे होते हैं, वह कोई और भले ही नहीं जानता हो, हम स्वयं तो जानते ही हैं।
    जैसे ही हम अपनी विशेषताओ पर सही तरीके से कार्य करना सीख जाते हैं, जीवन को सही अर्थों में हम जीना ही सीखने है।
    जीवन का हर पल आनंदमय व खुशनुमा ही है, मगर उसके लिए हमें बाह्य जगत के साथ अपने आंतरिक जगत यानी अपने मनोभावों पर भी कार्य करना होंगा।
     शांतचित्त  से हम सब घटनाक्रम जो हमारे जीवन में घटित हुए हैं, कुछ में तो हमारी मर्जी शामिल होती है, कुछ में नही।
       अगर प्रकृति ने हमें सामंजस्यता का गुण
प्रदान किया है, तो हमें आगे बढ़कर नेतृत्व करना ही चाहिये, क्योंकि यह गुण आपके नेतृत्व की क्षमता को प्रदर्शित करता है।
        इसी प्रकार हम अपने स्वभाव के अनुसार अगर अपनी जीवन शैली को ढालते 
हैं, तो हमें जीवन में प्रतिकूल भी अनुकूल जाना पड़ेगा। 
       अपने निजी स्वभाव को समझकर फिर उस पर पूर्ण रूप से , दृढ़ता पूर्वक अगर हम अमल करते हैं, तो हमें कामयाबी भी प्राप्त
होगी, व अपनी पहचान को हम अपने उस
गुण की बदौलत ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। 
       धन हमें भौतिक सुख सुविधाएं तो प्रदान कर सकता है, मगर हमारा आंतरिक वैभव हमारी असली पूंजी है।
       भौतिक व आध्यात्मिक  दोनों ही पहलू जरूरी भी है। 
      सबके अनुभव अपने हैं, समस्याएं भी अलग-अलग है, मगर अपने स्वभाव को समझकर हम अपने कार्य को अगर करते हैं,
और अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते हैं, धैर्य पूर्वक हम उनका सामना करते हैं, चीजों को वास्तविक रूप से किस प्रकार घटेगी ,देखते हैं, तो आपकी कामयाबी की राह पक्की है। 
विशेष:- हम सभी को ईश्वर ने कोई न कोई मौलिक विशेषता प्रदान की है, और उसी मौलिक विशेषता को हम पहचाने व पूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करें, आपका 
स्वाभिमान भी सुरक्षित रहेगा, कामयाबी  भी प्राप्त होगी, अपने लक्ष्यों के प्रति ईमानदार रहे।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदेमातरम्।
प्रिय पाठक गण,
       सादर नमन, 
   आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे, गरिमा यानी कि हर व्यक्ति का आदर, हर वह वस्तु भी जो हमें प्राप्त है, जो भी साधन हमें प्राप्त है, उनके प्रति  आदरयुक्त होना, उन्हें सम्मान प्रदान करना, समय अगर अच्छा चल रहा है, तो पूर्ण गरिमा व विनम्रता से उसका भी सम्मान करें, 
विपरीत समय का भी गरिमा पूर्ण तरीके से स्वागत करें, इसका कारण यह है कि विपरीत समय हमें सिखाता है, विपरीत समय हमें संघर्ष का मूल्य बताता है,  तो उसे भी गरिमा हम प्रदान करें, विपरीत समय ही वह समय काल है, जब आपका व्यक्तित्व निखर रहा था, समय के संघर्ष से। 
     तपे बिना तो स्वर्ण में भी निखार नहीं आता, जो व्यक्ति जितने विविध अनुभव व कठिनाइयों से गुजरता है, वह उनसे सीख प्राप्त करता है।
      सीढ़ी दर सीढ़ी उसकी यात्रा चलती है,
वह उस यात्रा को अपनी बुद्धिमत्ता, जिजीविषा व अथक परिश्रम द्वारा सार्थक बनाता है।
       कोई भी व्यक्ति एक दिन में महामानव नहीं बनता, यह एक निरंतर चलने वाली यात्रा है।
    हम सभी ईश्वरीय शक्तियों के मालिक हैं,
पर हम उनका सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग, जो भी इन शक्तियों का स्वयं के लिये, परिवार के लिये, समाज के लिये 
सदुपयोग करता है, अंततः वही विचारधारा ही उसे उस प्रकार के कर्म की और प्रेरित करती 
हैं, व धीरे-धीरे वह अपनी उस यात्रा को वहां 
तक ले जाता है, जिसके लिये आखिरकार उसका जन्म हुआ है, वह प्रेरणा उसे भीतर से प्राप्त होने लगती है। 
      यह सब अनायास नहीं होता, आंतरिक प्रज्ञा जब मनुष्य की जागृत हो जातीं है, तो वह गरिमामय जीवन स्वयं तो जीता ही है, अन्य सभी के लिये भी प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। 
     शब्दों की भी गरिमा है, हम क्या सोच रहे
हैं? उसके पीछे का हमारा मूल हेतु क्या है?
क्या वह किसी के हित की भावना से प्रेरित है, या अहित के भाव से, जब भी हमारा हेतु स्वयं का स्वार्थ न होकर परमार्थ की शक्ति से प्रेरित होता है, हम भीतर से शक्ति युक्त होते हैं। 
     हमारी शक्ति व सामर्थ्य अगर हम स्वयं के, परिवार के वह समाज के संवर्धन में लगा रहे हैं, तो निश्चित इसके दूरगामी  परिणाम आपकी गरिमा में वृद्धि करेंगे।
        यह यात्रा कोई सामान्य यात्रा नहीं है, यह मानव के मानवीय परिष्कार की एक अद्भुत यात्रा है, जो भी अपने जीवन काल में यह तथ्य समझ जाता है, वह फिर अपने आप उस यात्रा की और खींचा चला जाता है।
       कोई अज्ञात शक्ति आपको प्रेरणा भीतर से प्रदान करती जाती है, मार्ग प्रशस्त करती जाती है, और आप अपने पथ पर आगे बढ़ने लगते हैं। कोई तो ऐसी शक्ति अवश्य ही  इस संपूर्ण ब्रह्मांड में विद्यमान हैं, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन कर रही है। 
      हम और आप केवल निमित्त होकर अपनी अपनी भूमिकाओं का निर्वहन भर कर रहे हैं।
    यह कितनी कुशलता पूर्वक व गरिमामय  तरीके से हम कर पाते है , वही हमारी व सभी की यात्रा है, भीतर से बाहर की और, अंतः प्रेरणा से, स्वप्रेरणा से जागृति की और। 
       अपनी गरिमा सदैव बनाये रखें, कोई विपरीत भी आपसे जा रहा हो, जाने दे, कोई अनुकूल भी है, तो भी ज्यादा गर्व न करें। 
     दोनों ही स्थितियों में शांत चित्त रहे, व अपने मौलिक स्वभाव, जो प्रकृति ने आपको प्रदान किया है, दयामय, क्षमाशील, उसे धारण करके रखें। 
      जीवन में अनुकूलता-प्रतिकूलता, यश-अप यश, मान-अपमान यह सभी अवसर आयेंगे ही, पर अपने मूल मार्ग से विचलित न होना ही अपनी गरिमा बनाये रखना है।
विशेष:- हर क्षण आपकी परीक्षा की घड़ी है, आप उसमें क्या करते हैं? वह आपकी स्वयं की ही चुनी हुई राह है, अक्सर कामयाबी की राह बड़ी व बाधाओं से भरी होती है, चुनौतियों से परिपूर्ण होती है, मानवीय जीवन की गरिमा उन चुनौती पूर्ण स्थितियों को स्वीकार कर
उन्हें अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग जब हम मान लेते हैं, तो वे चुनौतियां ही हमें गरिमा प्रदान करने लगती है, पूर्ण साहस से उनका सामना करें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

प्रिय पाठक गण,
   सागर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
       आज मेरा विषय है, उम्मीद से ऊर्जा,
अगर मनुष्य के जीवन में उम्मीद या कहे, आशा खत्म हो जाये, निराशा घर कर ले, तो फिर मनुष्य अपने किसी भी कर्म को आखिर
क्यों करेगा? 
       भले ही उसकी वह उम्मीदें पूरी हो ना हो, यह एक अलग बात है, मगर मनुष्य मात्र को अपने जीवन में आगे बढ़ने का हौसला उम्मीद प्रदान करती है, व्यक्ति अपनी आंतरिक ऊर्जा क अगर सही उपयोग कर सके, जो उसका यह जीवन है, वही पूर्ण सुखमय हो सकता है,
       स्वर्ग नरक की सारी परिकल्पनाएं हमारे अपने मस्तिष्क की उपज है, यह हमें  जीवन के वास्तविक लक्ष्यों से दूर करती है, हमें भ्रमित करती है।
         स्वर्ग हमें इसी जीवन में प्राप्त है ही, 
मगर हम स्वयं ही उसे अनदेखा किये हुए हैं।
    अगर हमारे मन में आनंद व प्रफुल्लिता हर समय बनी रहती है, हम किसी भी परिस्थिति में हमारे भीतर की ऊर्जा को नष्ट नहीं होने देते, सदा ऊर्जावान रहकर अपने लक्ष्य की
और चलते रहते हैं, तो यह ब्रह्मांड स्वयं ही आपकी सहायता को तत्पर है। 
       आप आशावादी रहे, निरंतर सकारात्मक चिंतन को ही जीवन में स्थान दें, आप पायेंगे,
हर और से आपको सकारात्मक संदेश ही प्राप्त हो रहे हैं, आप प्रगति के नित्य नये सोपानों को छु पा रहे हैं, जब भी हम किसी बड़े कार्य को करने का मानस बनाते हैं, तो सर्वप्रथम हम अवचेतन में उसके बीज बो रहे होते हैं, अतः जब हम विचार को भी अपने भीतर प्रवेश दे, वह सकारात्मक विचार ही हो,
क्योंकि जो आप अपने भीतर बो रहे हैं, अंततः समय आने पर आपको उसकी ही फसल काटना है, विचारों को जब आप अपने भीतर स्थान दें, तो वह विचार, शुद्ध , पवित्र, आंतरिक ऊर्जा से युक्त होना चाहिये।
          इसलिये अपने मन में कभी भी हीन विचारों को स्थान प्रदान न करें, पूर्ण आशावादी रहे, सकारात्मक प्रयत्न सदैव करते रहे, अपनी आंतरिक ऊर्जा शक्ति पर कभी भी संदेह न करें। 
      हम सभी इतनी अधिक सामर्थ्य अपने भीतर रखते हैं, जिसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, सकारात्मक रहे, नित्य सुंदर भाव व
विचारों से आप परिपूर्ण रहे, अपनी आंतरिक सामर्थ्य को जगाये, आप अपने इसी जीवन में
चमत्कारिक परिणाम प्राप्त करने लगेंगे। 
           समय कभी भी बदलता नहीं, आपको अपने अवचेतन व स्वयं को बदलना होता है,
परिकल्पना हमेशा बड़े स्वप्नों की करें, क्योंकि जो भी निरंतर आपके भीतर चल रहा है, अंततः वह एक दिन घटेगा अवश्य, उसे घटने से कोई भी नहीं रोक सकता।
    अच्छे स्वप्न देखें, जब आप विचार अच्छा आगे बढ़ने का, मन में प्रस्कफुटित करोगे,
तभी तो यह संपूर्ण ब्रह्मांड आपकी सहायता करेगा। 
        मन के भीतर जो भी विविध विचार है,
उनमें से श्रेष्ठतम विचार कौन सा है?  उसे निरंतर दोहराये, कुछ दिनों में आप पायेंगे ,
आपकी पूरी दुनिया बदल रही है। 
       आंतरिक विचारों को शुद्ध व प्रेरणा पूर्ण बनाये , प्रसन्न चित्त रहे  , अपना स्वयं का
अवलोकन करें, कहां पर चूक हुई, सुधारते रहे, यह ब्रह्मांड की शक्तियां आपकी सहायता करना चाहती है, पर आप उन शक्तियों से जुड़िये है तो सहीं।
         आंतरिक ऊर्जा को बदले बगैर हम बाह्य ऊर्जा को सकारात्मक कैसे कर सकते हैं? 
       सबसे पहले अपने मानस पर कार्य करें, 
उसे निर्देश दें, सब कुछ संभव है, इस प्रकार के सकारात्मक विचार निरंतर अपने भीतर प्रवाहित होने दे, एक दिन यह सकारात्मक ऊर्जा ही आपको शिखर पर पहुंचा देगी, परिकल्पना सदैव शुभ करे, जब आप शुभ की परिकल्पना करते हैं, तो भीतर एक विचार उत्पन्न कर रहे होते हैं, इसलिए सबसे पहले अपने आप को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाये 
ऐसा करते ही आप पायेंगे, यह ब्रह्मांड की शक्तियां तो सदैव आपके साथ ही थी।
     आपके भीतर जो विचारों की श्रृंखला है,
उन्हें सदैव सकारात्मक विचारों से परिपूर्ण 
करते रहे, अंततः वही सकारात्मक ऊर्जा आपके लिए मार्ग प्रशस्त करेगी।
विशेष:- सर्वप्रथम जीवन में सदैव हर परिस्थिति में सकारात्मक रहे, परिकल्पना तो हम सकारात्मक कर ही सकते हैं, सदैव अच्छी व बेहतर परिकल्पना ही करें, क्योंकि जो आप अपने भीतर बो रहे होते हैं, आखिरकार फसल तो उसकी ही आप काटेंगे, इसलिये अच्छे व शुभ विचारों को स्थान दें, आप जो भी विचार कर रहे होते हैं, आकर्षित उसे ही करेंगे, निरंतर सकारात्मक रहे, प्रयास करते रहे , सफलता आपके कदम चूम रही है, यह भरोसा रखें। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदे मातरम्।
प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
        हम हमारे सभी कार्य करते हुए भी अपनी आंतरिक शांति को बनाए रख सकते है, धीमे-धीमे हम अपने कदम मजबूती से बढ़ाते जाएं, जीवन में समन्वय की कला जिसे भी आ गई, फिर उसके लिए कोई भी कार्य इस जगत में, संसार में कठिन नहीं है, जो निरंतर जगरुक है, अपने भीतर व बाहर दोनों ही क्रिया कलापों में  पूर्ण होशपूर्वक अपने जीवन के निर्णयों को करता है, परिस्थितियों का सही तरीके से अध्ययन करता है, भूतकाल में की गई गलतियों से सबक सीखता है, वर्तमान क्षण में सही निर्णय को करता है, अपने आसपास घट रहे परिदृश्य का सावधानी पूर्वक जो अध्ययन- मनन करता है,
वह अपने इसी जीवन काल में समस्त उपलब्धियों को हासिल करता जाता है।
   दृढ़ निश्चय से बढ़कर जीवन में कुछ भी अधिक मूल्यवान नहीं है, मगर वह दृढ़ निश्चय, संकल्प अपनी स्वयं की आंतरिक शांति, घर में शांति व समाज में शांति किस प्रकार स्थापित हो?   किस प्रकार से हम समन्वय करे, कि स्वयं का, हमारे घर का, जहां हम रहते हैं, उस स्थान का व समाज का, इन सब बातों के बीच में आप कितना बेहतर तालमेल बिठा पाते हैं, उन सभी से कितनी खूबसूरती से समन्वय बिठा पाते हैं, जैसे-जैसे आप परिपक्व होंगे,
जीवन के अनुभव बढ़ने लगेंगे, और वही जीवन के जो निजी अनुभव है, वही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है, भौतिक धन हमें एक बार प्राप्त होने पर वह कितने समय हमारे हाथ में  रहेगा, यह हमें भी पता नहीं होता है। 
     अगर आप किसी भी कला में माहिर हो या कोई ऐसा कर्म आप कर रहे हैं, जिसे आपने अपने जीवन में समय दिया है, तो वह कला आपके लिए वरदान है, क्योंकि वह आपकी ऐसी निजी संपत्ति है, जिसे आपने वर्षों की मेहनत के फल स्वरुप पाया है। 
       समाज के भीतर जो भी बुजुर्ग है, वे अपने अनुभवों की परिपक्वता के कारण 
आदरणीय व पूजनीय है, व हर परिस्थिति से जो उनके जीवन काल में उपस्थित हुई, उसका उन्होंने किस प्रकार धैर्य पूर्वक सामना किया, 
वह हमें इसका ज्ञान दे सकते हैं। जीवन में मात्र भौतिकता ,मात्र आध्यात्मिकता या केवल सामाजिक संबंध, यह तीनों ही अपने आप में अपूर्ण है, जब तक इन तीनों का सही तरीके से समन्वय हम अपने जीवन में नहीं करते, हम सही परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते। 
        भौतिक साधन जीवन यापन के लिये,
आध्यात्मिक ऊर्जा हमें चेतनायुक्त रखने के लिये, सामाजिक सौहार्दपूर्ण संबंध हमें सामाजिक ऊर्जा से, सकारात्मक ऊर्जा से युक्त करते हैं, हम जितना इन बातों को गहराई से समझते हैं, उतना ही हमारा जीवन शांतिपूर्ण ढंग से चलने लगता है। 
      और स्वयं का अनुशासन इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो भी व्यक्ति स्व अनुशासन का पालन करता है, वह अधिकतम उपलब्धियां को अपने इसी जीवन काल में प्राप्त कर सकता है।
         एक बार अपनी जीवन यात्रा में जो भी आप कर रहे हैं, सही तरीके से समझने का ईमानदार प्रयास आप अवश्य करें, आपके जीवन की दिशा एक सकारात्मकता की और जब बढ़ती है, तब आप अपना स्वयं तो सुधार करते ही हैं, कई अन्य लोगों के लिए मजबूत प्रेरणास्त्रोत भी आप बन जाते हैं।
      जितना हम गहन अध्ययन करेंगे, हमारे जीवन को उतना ही बेहतर हम कर पायेंगे,
इसमें तनिक भी संदेह नहीं, तो इस प्रकार तीन प्रकार की ऊर्जा, भौतिक, आध्यात्मिक, 
सामाजिक इस त्रिवेणी को हम अपने जीवन में स्थान दें, आपको फिर किसी अन्य त्रिवेणी स्नान की आवश्यकता ही महसूस नहीं होगी। 
      अगर इन तीनों का सही समन्वय आपने अपने जीवन में जिया है, व उस पर ईमानदारी पूर्वक आप चले हैं, तो आपका वर्तमान व भविष्य दोनों ही उज्जवल है।
     मानस में मंथन लगातार हम करते रहे, 
स्वयं का, जितना हम मंथन करेंगे, उतने ही अधिक मोती हमें प्राप्त होंगे।
विशेष:- अपने जीवन में अपने अनुभव, बुजुर्गों के अनुभव, स्वयं कुछ नया सीखने की ललक 
व युवा वर्ग से बेहतर तालमेल, अगर हम यह  50 से 70 वर्ष के बीच का जो समय है, वह जो उम्र के इस दौर से गुजर रहे हैं, वे यह कर पाये तो शेष जीवन बेहतरीन अंदाज में जीते हुए इस संसार से प्रयाण करेंगे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।
 
प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   हम सभी एक सामाजिक व्यवस्था में रहते हैं, वह उसके कुछ सामान्य से नियम हैं, एक बात जो हमेशा हमारे सामने आती है, वह है, 
की अधिकतम सभी अधिकारों की तो बात कहते हैं, मगर हमारे अपने कर्तव्य क्या है ?
          वह हम नहीं देखना चाहते, और यह किसी भी काल में संभव ही नहीं कि आप कर्तव्य तो पूरे नहीं करें और अधिकारों की बात करें।
       जो भी व्यक्ति अपने दायित्व या कर्तव्य ईमानदारी से पूर्ण करता है, उसे अपने अधिकारों की प्राप्ति तो स्वत: ही हो जाती है।
         जाने अंजाने में हम यह न्यायिक सिद्धांत भूल गए कि अधिकार प्राप्त ही तब होते हैं, जब आप अपने कर्तव्य को ईमानदारी पूर्वक निभाते हैं।
       यह दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,  इन  दोनों का ही समान महत्व है। 
     जो भी अपने कर्तव्यों को पूर्ण ईमानदारी पूर्वक निभाता है, उसे अधिकारों को प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करना
पड़ते, यह तो उसे स्वत:  ही प्रकृति द्वारा प्रतिफल में प्राप्त हो ही जाते हैं।
     हमारा स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, फिर समाज के प्रति, इस प्रकार से दायित्व या कर्तव्यों को को निभाना चाहिये, अधिकार तो 
हमें स्वयं प्रकृति ही प्रदान कर देगी। 
        यही तो खूबसूरती है, उस परमपिता के न्यायिक सिद्धांत की, हम चाहे किसी भी प्रकार से इन बातों की अनदेखी कर दें, मगर ईश्वर का न्यायिक सिद्धांत पूर्ण रूप से अटल है, उसमें हेर- फेर की कोई गुंजाइश है ही नहीं।
        हम अपने कर्तव्य व दायित्वों का ध्यान
रखें, उन्हें सही ढंग से निभाये, तभी हमें अधिकारो की प्राप्ति  भी होगी।
    जिस प्रकार से यह प्रकृति हम सभी पर समान रूप से कृपा करती है, भेदभाव नहीं करती, कोशिश करें, जो भी कार्य  हम अपने हाथों में ले, उसे पूर्ण निष्ठापूर्वक प्रयास अपनी ओर से निरंतर करते रहे।
    आपका निरंतर सही दिशा में किया गया प्रयास एक अद्भुत शक्ति  व सामर्थ्य  का निर्माण आपके भीतर करता है। आत्म बल व आत्मविश्वास से पूर्ण होने पर आपके अंदर एक दैवीय शक्ति  अपने आप ही जागृत हो जाती है।
       निरंतर प्रयासरत रहे, अपनी निष्ठा को,
   कर्म पूर्ण श्रद्धापूर्वक हम पालन करें, नित्य प्रयास करें, आंतरिक प्रेरणा से कार्य करें। 
    यह संपूर्ण ब्रह्मांड आपकी सहायता को
सदैव तत्पर है। 
    अधिकारों का प्रयोग सावधानी पूर्वक इस प्रकार करें, संतुलित नजरिया हमारा हो, किसी को भी भावनात्मक ठेस पहुंचाये बगैर हम अपनी इस यात्रा को अविरल जारी रखें, एक समय ऐसा अवश्य आयेगा, आपको अपने आप ही आभास होने लगेगा, अपने निज कर्तव्य को पूर्ण ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करने पर हमें सभी उपलब्धियां स्वत:  ही प्राप्त होती जाती है। 
      अपने अधिकारों का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं, फिर आप देखेंगे, चमत्कारिक ढंग से आपका जीवन परिवर्तित होने लगेगा। 
   जैसे-जैसे हम परिपक्व होते हैं, जीवन की गहराइयों को समझते हैं, हमारा जीवन प्रकाशमय होने लगता है।
      आंतरिक शांति हमारी बढ़ने लगती हैं, व दिव्य प्रवाह, जो संपूर्ण सृष्टि का प्रेरक व रखवाला है, उसकी कृपा आप पर बरसने  लगती है।
    अंतर्मन में सद्भाव अगर जागृत हो रहा है, कोई प्रेरणा भीतर से उठ रही है, तो अवश्य ही दैवीय कृपा आप पर हो रही है।
    परिस्थितियों से घबराएं नहीं, वे तो आती जाती रहेंगी, अपना आत्मबल बनाये रखें,
व अपना मार्ग जो भी भीतर से आपने चुन
रखा है , उस परमात्मा की कृपा शरण होकर उसे करते रहे।
विशेष:- अपने कर्तव्यों को पूर्ण निष्ठा पूर्वक हम करते जाये, हमें अच्छे प्रतिफल ही प्राप्त होंगे, ऐसा कभी होता ही नहीं, आपके कर्म की दिशा सही हो और परिणाम विपरीत आये, आंतरिक रूप से चेतना को हमेशा जागृत रखें।
शेष परमात्मा पर छोड़ दें, कुछ हमारे व कुछ उस सृष्टि कर्ता के हाथों में है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद 
जय भारत 
वंदे मातरम।