व्यक्तित्व के लिए दिशा बोध

जय श्री राम,

मानव के चित्त व देह का अहंकार प्रभु भक्ति के मार्ग का सबसे बड़ा अवरोधक, जिस किसी भी मनुष्य ने इस जीवन काल में इस सत्य को भली-भांति समझ लिया वह उस मोक्ष-मार्ग का अधिकारी बन जाता है। दुनिया के समस्त धर्म, संप्रदाय  या मार्ग  अंततः उस एक महाशक्ति में ही विलय हो जाते है।  

जो अपने अंतर्मन में उस परम-पिता की परम भक्ति को धारण कर लेते हैं ,वे अहंकार से मुक्त होकर अपने जीवन की यात्रा को सुंदर बना लेते हैं। 



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उसकी शरण ही एकमात्र विकल्प है ,वह चाहे गुरु कृपा से ,माता पिता के आशीर्वाद से ,स्व अध्ययन से या किसी भी प्रकार जीवन में जागृत हो सके। तब स्वयं वह प्रभु प्रतिक्षण दिशा-निर्देश देते हुए समस्त कार्यों का भार ले लेते हैं, और सारा संसार आश्चर्य की भांति उन्हें देखता ही रह जाता है। 

एक श्रेष्ट समन्वय की भूमिका का निर्वाह स्वयं के व्यक्तित्व को प्रखर व तेजस्वी तो बनाता ही है, उसके कर्मों की खुशबू स्वयमेव ही हर और फैल जाया करती है,यह जो में इस देह में इस वाणी के माध्यम से, दृश्य-अदृश्यअनुभूतियों में उसका प्रकाश देखने में समर्थ हो सका हूँ, यह उनकी दैवी कृपा के बिना संभ ही नहीं है। 

उस परम की इस हृदय मंडल में उपस्थिति हर परिस्थितियों में क्या कदम उठाना चाहिए, इसका हमें भान करवा देती है।
वर्तमान समय में वैसे ही जीवन में कई प्रकार की चुनौतियां सामने आती है। जागरण के कारण ही उनका मुकाबला करना संभव हो सकता है ,अन्य कोई उपाय है ही नहीं। 
जिस प्रकार का बोध मेरे जीवन में जागृत हो चुका है, मेरी ह्रदय से इच्छा है कि मैं उस अनुभव को अन्य सभी से बाँट सकूँ। मार्ग ज्ञान मार्ग भी हो सकता है कर्म मार्ग भी हो सकता है योग मार्ग भी हो सकता है और तीनों का थोड़ा-थोड़ा उचित मात्रा में सम्मिश्रण भी हो सकता है। 

आपको अपने व्यक्तित्व व चित्त के जो अधिक अनुकूल जान पड़ता है ,उस मार्ग का आश्चर्य ले, व अपने जीवन काल में ही इस मोक्ष को प्राप्त कर लेवे ,मोक्ष तो हमारी एक परिकल्पना है। वस्तुतः समग्र विवेचन करने से हमें यह प्राप्त होता है कि संपूर्ण कर्मों का जिनका सृजन करते हैं ,उनमे विसर्जन का भाव भी हम हृदय में ला सके तो कल्याण अपने आप ही होने लगता है। 

इस परंपरा को हम गणेशोत्सव में जैसे हम गणेश की स्थापना करते हैं ,जो की बुद्धि के देवता है, उनका भी हम विसर्जन करते हैं यानी जब तक हम अपने अहंकार का उन परम पिता के श्री चरणों में विसर्जन नहीं कर पाते हैं , तब तक हम हमेशा दुविधा की स्थिति में ही अपने आप को पाएंगे। 


गरल सुधा रिपु करहि मिताई ,गोपद सिंधु अनल सितलाई ,
गरुण सुमेरे रेनु सम ताही, राम कृपा करती चितवा जाही।

राम कृपा से भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुल जाता है रामसुमिरन कभी व्यर्थ नहीं जाता वह अपना अमिट प्रभाव दिखलाता ही है। 

भारतीय संस्कृति की  इस अनूठी भाव धारा के प्रवाह को जितना मैंने कुछ तो स्व-अध्यय से ,स्व-अनुभव से, कुछ परंपरा से प्राप्त ज्ञान के आधार पर आप तक पहुंचाने का प्रयास किया है। 
बिना कष्टों को सही तो किसी भी मनुष्य का रूपांतरण नहीं हो सकता है जो विपत्तियों को सहज भाव से अपना लेता है, वह अपने जीवन काल में ही कई असाधारण उपलब्धियों का द्वार खोल देता है। 


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