सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे , परंपरा व समाज, हर समाज में कुछ परंपराएं होती है,
जिन्हें बगैर किसी भी जांच के जारी रखा जाता है, जो भी परंपराएं विकसित की गई थी, वह समय अनुकूल सही भी हो सकती है व गलत भी हो सकती है, उन्हें आज के संदर्भ में परखा जाना चाहिए, जो परंपरा
समाज की उन्नति में सहायक हो, समाज को ऊपर उठाती हो, वह निरंतर जारी रखी जानी चाहिये, लेकिन जो परंपरा समाज के लिए ठीक नहीं, समाज को पीछे ले जाती हो, उन्हें पुनर्भाषित करने की जरूरत है, जो भी परंपरा समाज में स्वस्थ मूल्यों को स्थापित करें, उन्हें बढ़ावा दे, व जो आज के समय में अनुकूल परंपराएं नहीं है, उन्हें हटाते भी जाये,
जैसे बाल विवाह की परंपरा, यह ठीक नहीं है,
मृत्यु भोज पर अपनी सीमा रेखा से बाहर जाकर आयोजन करना, इस प्रकार की जो सामाजिक परिवेश में एक बुराई के रूप में
परंपरा है, जिसे लोगों का हित संवर्धन नहीं होता, बल्कि वे और पीछे की और आते हैं,
उन परंपराओं पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है, जैसे हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति, इसमें नैतिक मूल्यों पर व पर्यावरण की रक्षा पर जोर दिया गया,
प्रकृति व पर्यावरण से सहयोग करते हुए आगे बढ़ने की जिसमें बात कही गई, ऐसी परंपराओं को बचाने की भी आवश्यकता है,
स्वस्थ परंपराओं को हम बल प्रदान करे व
वह जो आज समाज के अनुकूल नहीं है, उन परंपराओं को हम हटाए भी, परंपरा इसलिए बनाई जाती है, ताकि वे समाज के संवर्धन
में सहयोगी हो, लेकिन कोई परंपरा समाज के लिए ठीक नहीं, तो सामूहिक रूप से उस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, आज के समय में सभी परंपरा अच्छी हो, यह जरूरी भी नहीं, जांचने परखने के बाद जो भी परंपरा समाज के मूल्यों को स्थापित करती हो, जिसे समाज में एक सकारात्मक बदलाव होता है, संगठन की भावना का विकास होता है, जैसे मिलजुल कर त्योंहार मनाना, इससे एक सामुदायिक भावना का विकास होता है,
एक जगह एकत्रित होने से हमें एक दूसरे के सुख दुखों को आपस में बांटने का मौका मिलता है, हम आपस में एक दूसरे को समझ पाते हैं, सामूहिक उत्सव की जो परंपरा है, यह एक अच्छी परंपरा है, इसे जारी रखा जाना चाहिये, बदलते परिवेश में शिक्षा एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है, समाज में सभी को
समान रूप से शिक्षा का अवसर प्राप्त हो,
ऐसा हमें परंपरा में स्थापित करना चाहिये,
इसके लिए हो तो एक सामूहिक कार्य योजना तैयार कर उस पर कार्य करना चाहिये,
स्वास्थ्य के संदर्भ में भी हमें मिलकर एक ऐसी परंपरा का विकास करना चाहिये, जिस व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व का विकास हो,
वह किसी भी बात के संपूर्ण पहलू को जांच परख कर फिर उस पर निर्णय करें, तो स्वस्थ मूल्यों को स्थापित करने वाली परंपराओं को बचाना व व आवश्यकता पड़े तो नई परंपराओं को विकसित भी करना चाहिये,
जो आज के समय से मेल खाती हो।
विशेष:- समाज में जो भी परंपरा स्थापित होती है, वह समाज के विकास के लिये होती है, लेकिन अगर कोई परंपरा समाज को अवनति की ओर ले जा रही है, तो उसे हमें हटाना भी चाहिये, वह कोई नयी परंपरा, जो हमें सामाजिक संदर्भ में आवश्यक प्रतीत है, जो आज के सामाजिक परिवेश में मनुष्य के सर्वांगीण विकास में आवश्यक हो, जो नैतिक, आर्थिक, सामाजिक विकास की ओर हमें अग्रसर करें, ऐसी परंपराओं का हम पोषण करें ।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।
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