अपेक्षा

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, अपेक्षा पर, 
अपेक्षा यानी किसी से कोई आशा या उम्मीद, 
यह शब्द लगता तो छोटा सा है, मगर इसका प्रभाव बहुत ही गहरा है, हम सभी का जीवन 
जो हम जीते हैं, कहीं ना कहीं हम किसी से
कोई ना कोई अपेक्षा तो रखते हैं। 
      और यह स्वाभाविक भी है, हर कोई जो भी जीवन में कार्य करता है, उस कार्य के फल स्वरुप कुछ पाने की अपेक्षा भी रखता है, यह और बात हैं, वह  अपेक्षा पूरी हो भी सकती है,
नहीं भी।
       माता-पिता हमेशा अपनी संतान से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह अपने जीवन मे उनसे भी अधिक अभिवृद्धि को प्राप्त  हो, वह अपने जीवन में वह मुकाम हासिल करें, जो वे नहीं कर पाए, और यह अपेक्षा पूर्ण रूप से स्वाभाविक भी है, इसमें कोई संशय नहीं।
        ऐसे ही किसी भी देश के खिलाड़ियों से 
वहां के नागरिक यह अपेक्षा करते हैं, वह अपने खेल से स्वयं का व देश का नाम रोशन
करें , और जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, 
तो सभी को बड़ा दुख होता है।
         तो आप सभी ने देखा की अपेक्षा शब्द तो बड़ा छोटा सा है, मगर इसका प्रभाव बहुत 
गहरा है, नेताओं से नागरिकों को यह अपेक्षा होती है, वह उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे, इस प्रकार हम पाएंगे की हर व्यक्ति को, हर वर्ग को किसी ने किसी से कुछ अपेक्षाएं होती है, हर संबंध आपसे कुछ अपेक्षा चाहता है, और वह पूरी न होने पर 
वह आपसे नाराज भी हो सकता है, संबंध तोड़ भी सकता है, तो अपेक्षा करें, कि हम जीवन में किसी से अत्यधिक अपेक्षा ना करें, 
स्वाभाविक रूप से जो घटे, उसे हम जीवन में स्वीकार करें, और मैं भी इसी अपेक्षा के साथ, कि मेरे लेखों द्वारा समाज में कोई रचनात्मक परिवर्तन आए, सभी खुले मन से सोच सके, 
वार्तालाप कर सके, इसी अपेक्षा से मैं भी लेख लिखता हूं।
विशेष:- जीवन में दूसरों से अपेक्षा करना स्वाभाविक है, मगर क्या हम भी दूसरों की अपेक्षा पर उतने ही खरे उतरते हैं, अगर नहीं, 
तो हम उनसे यह अपेक्षा क्यों करते हैं? हमें सहज रूप से चीजों को स्वीकार करना चाहिए। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।


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