विकास या विनाश

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    मुझे पूर्ण विश्वास है, आप सभी को प्रवाह में मेरे द्वारा लिखे लेख पसंद आ रहे होंगें,
इन्हीं में से एक ज्वलंत विषय है, विकास या विनाश, आज मनुष्य केवल अपने भौतिक 
संसाधनों को बढ़ाने हेतु तत्पर है, व इसका परिणाम पर्यावरण पर क्या होता है, इसकी परवाह किए बगैर केवल अपने आर्थिक संसाधन बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है, और इस भूमंडल पर पर्यावरण को क्या नुकसान हो रहा है, इस और जागरूक नहीं है। 
     तो मेरा प्रश्न आप सभी से यह है, यह कैसा विकास है, या विनाश है, जब हम विकास की अवधारणा को समझते हैं, तो यह केवल भौतिक विकास नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें विकास का संवर्धन करते समय सभी पक्षों को ध्यान में रखना चाहिए, पर्यावरण के अलावा 
भी मानवीय मूल्यों को स्थापित करना व बढ़ावा देना भी हमारा प्रयास होना चाहिए।
         अगर हमारी विकास की अत्यधिक गति से पर्यावरण बाधित होता है, व संतुलन बिगड़ता है, तो हमें फिर से एक बार सोचने की जरूरत है, हम किस प्रकार के विकास की ओर जा रहे हैं, केवल भौतिक संसाधन बढ़ाने 
व हमारी शक्ति में अभिवृद्धि होने से ही 
हमारा विकास नहीं हो जाता, वरन यह पर्यावरण व समस्त प्रकार के संतुलन को ध्यान में रखकर किया गया विकास ही सही 
विकास है।
          आज के समय में जिस  गति से केवल विकास के भौतिक पक्ष पर ही बल दिया जा
रहा है, उससे अन्य पक्ष उपेक्षित हो रहे हैं,
अगर हम संपूर्ण ब्रह्मांड को क्षति पहुंचाते हुए विकास कर रहे हैं, तो अंततः यह हमारे लिए विनाशकारी ही सिद्ध होगा। अतः संतुलन के साथ किया गया विकास ही सही है।
      खास तौर से पर्यावरण को कम से कम क्षति पहुंचे, इस प्रकार से हमारे विकास की अवधारणा होना चाहिए, अभी का परिदृश्य देखते हुए तो ऐसा नहीं लगता, कहीं ऐसा ना हो विकास ही विनाश का रूप ले ले। 
     विशेष:- विकास हमारे लिए विनाश का कारण न बने, इसके लिए हमें प्राकृतिक संतुलन की अवधारणा को ध्यान में रखना होगा, अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब विकास  ही हमें विनाश के द्वार पर खड़ा कर देगा।
 आपका अपना, 
  सुनील शर्मा, 
   जय भारत, 
   जय हिंद।

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