निज कर्तव्य व गीता

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
      हम सभी उस विराट के अंश है, हम चाहे अथवा न चाहे, माने अथवा न माने, कुछ चीजें हमारे हाथ में है, कुछ नहीं। 
      यहीं पर हमें श्रीमद् भागवत गीता को सही अर्थों में समझने की आवश्यकता है।
     यहां भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से इसकी व्याख्या करते हैं, वह कर्म की महत्ता को समझाते व कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए 
श्रीमद् भागवत गीता में स्पष्ट घोषणा करते हैं,
की स्वधर्म का पालन हीं सबसे अधिक उत्तम धर्म है, न कि पर धर्म का।
     स्पष्ट रूप से वे कहते हैं, कि आपका जो भी कर्म है, वह गुण दोष से युक्त हो सकता है, 
जैसे अग्नि में धुंआ, सूर्य में अत्यधिक ताप,
जो भी गुण धर्म जिस भी वस्तु या जीव के है,
वे स्वाभाविक है। 
      यहां पर मनुष्य योनि सर्वोपरि इसलिये कही गई है, कि वह विवेकपूर्ण ढंग से अपने जीवन को जी सकता है, उसे किस प्रकार का जीवन जीना है, वह यह तय कर सकता है, 
मनुष्य में कई प्रकार की पूर्व जन्म से प्राप्त धारणाएं व इस जन्म के कर्म सभी का फल उसे प्राप्त होता ही है। 
    निज कर्तव्य को भगवान  श्रीकृष्ण सर्वोपरि  मानते हैं, फिर भी वह गीता जी में 
तीन मार्ग निष्काम कर्म मार्ग, सांख्य योग व भक्ति योग तीनों का ही विवेचन करते हैं, तीनों ही मार्ग मुझ तक आते हैं, यह वह स्पष्ट वर्णन करते हैं, परंतु आपका स्वभाव किसके अधिक अनुकूल है, वह मार्ग आपके लिए श्रेष्ठ है, कर्म सिद्धांत को  सर्वश्रेष्ठ घोषित इसलिये करते हैं,
क्योंकि यह सबसे सरलतम सिद्धांत है, कोई भी जीव कर्म करे बिना रह ही नहीं सकता, तो उन्होंने निज कर्तव्य को श्रेष्ठ कहा।
      इसकी सही व्याख्या हम इस प्रकार कर सकते हैं, जैसे कोई इंजीनियर है, कोई डॉक्टर है, कोई राजनेता है, अध्यापक है, विद्यार्थी है, 
धर्म का उपदेशक है, तब जो भी उसका निज कर्तव्य जो उसने चुना है, या प्रारब्ध वश उसे प्राप्त हुआ है, उसे पूर्ण निष्ठा व मनोयोग पूर्वक वह करें। 
         इतने मात्र से भी हम अपने जीवन में संतुलन ला सकते हैं, व ईश्वरीय कृपा के पात्र बन सकते हैं।
       गीता में निज  कर्तव्य को वे सर्वोपरि मानते हैं, व इसी और वह जगत को प्रेरित करते हैं, क्योंकि यह बड़ा ही सरल व सुलभ मार्ग है, इसमें साधारण शब्दों में गहरी बात कही गई है, इतनी सरलतम व्याख्या भी अगर हम नहीं समझ पाये तो फिर इसमें भगवान का भी क्या दोष?  वे तो सदैव प्राणी मात्र के हित का ही चिंतन करते हैं।
         फिर वे सांख्य योग का भी वर्णन करते हैं, पर वे उसमें कहते हैं व्यक्ति को अपनी अहंकार भाव का व देह के अभिमान का भी 
पूर्णतः त्याग करना होगा, यह मार्ग थोड़ा कठिन होने से वह कर्मयोग को ज्यादा सहज मानते हैं, एक और भक्तिमार्ग का भी विवेचन में करते हैं, वह कहते हैं, तू जो कुछ भी करता है, वह मेरे अर्पण कर दे, नित्य मेरे नाम का
सुमिरन करते जा, नित्य उनका सुमिरन करने से फिर धीरे-धीरे भाव शुद्ध होने लगेंगे, और यह भक्तिमार्ग से भी संभव है।
      आपका चित्त व शरीर किस प्रकार से बना है, इन तीनों मार्ग में से आपके स्वभाव 
के अनुसार आपको कौन सा मार्ग अधिक अनुकूल प्रतीत होता है, वह आप अपना सकते हैं, मार्ग तीनों ही सही है, पर भगवान  श्री कृष्ण ने निष्काम कर्मयोग को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया, उन्होंने निज कर्म जो आपने चुना है, या  प्रारब्ध वंश आपको प्राप्त हुआ है, उसे आप पूर्ण ईमानदारी व निष्ठापूर्वक करें, बस यही श्री कृष्ण जी का 
संदेश है, और यह कालजयी है, सदा शाश्वत है।
     भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, आप अपना  कर्म निष्ठा पूर्वक करें वह उसके फल का भार मुझ पर छोड़ दे, अपने अहं भाव का त्याग करें,
चाहे वह कर्मयोग, सांख्य योग, भक्ति योग 
किसी भी माध्यम से हो, निज कर्तव्य को 
निष्ठापूर्वक करने की बात कहता है। 
     हमें इसी जीवन में ईश्वर का सामीप्य प्राप्त हो सकता है, अगर हम  निष्काम भाव से कार्य करने की प्रेरणा श्रीमद्भगवतगीता से प्राप्त करें। यह एक कालजयी  ग्रंथ है, और बहुत ही सरल ,सहज रूप में कर्म सिद्धांत की इसमें व्याख्या की गई है। 
    निज  कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक करना ही इसका मुख्य संदेश है।
विशेष:- अपने-अपने कर्म को पूर्ण निष्ठा व
ईमानदारी पूर्वक हम करें, अहंकार भाव का त्याग करें, समर्पण व निष्ठापूर्वक अपने कार्य को करें, बस इतने मात्र से भी आप उनकी कृपा के पात्र बन सकते हैं, अपने कर्तव्य को करें व परिणाम की चिंता उस प्रभु पर छोड़ 
 दे, यही गीता -सार है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत 
जय हिंद 
वंदेमातरम्।

0 टिप्पणियाँ: