अंतर दृष्टि व बाह्य दृष्टि

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
  आप सभी को मंगल प्रणाम, 
हर मनुष्य के पास बुद्धि अवश्य होती है, वह अपना हित किस कार्य में है, यह वह भलीभांति जानता है, जो वह इस बात को जानता है, वह उसे किस प्रकार से जानता है, 
उसे हम बाह्य दृष्टि कह सकते हैं, जो हम जगत में, संसार में कैसे हम व्यवहारकुशल हो,
किस प्रकार से अपनी वाणी का प्रयोग  करें,
बुद्धि का प्रयोग करें, यह हमें बताती है, बाह्य जगत में, सांसारिक जगत में कैसा हम व्यवहार करें, इसका हमें बोध कराती है, यह तो हुई हमारी बाह्य दृष्टि। 
              अब हम आंतरिक दृष्टि की बात करते हैं, हमारे अपने गुण दोष क्या है? उसे और हमें जागृति प्रदान करती है, हर मनुष्य गुण दोषयुक्त ही है, मगर अपने स्वयं के गुण दोष पहचान कर गुणों से किस प्रकार हम कार्य करें, दोषों का हम किस प्रकार से परिमार्जन करें, अपने स्वयं को किस प्रकार से हम परिष्कृत करें, यह गुण हममें आंतरिक चेतना विकसित करने पर बढ़ते हैं।
      हमें जीवन में बाह्य दष्टि, जिससे हम जगत को जाने वह अंतर्दृष्टि जिससे हम स्वयं को भी जाने, इन दोनों का ही बोध होना परम आवश्यक है, या यह कह सकते है, हमारे पास दोनों ही दृष्टियां अगर है, तो हम तुलनात्मक अध्ययन द्वारा कहां किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, कहां पर बोलना है? कहां नहीं, यह समझ आने लगेगा। 
         जीवन को जीने के लिए हमें अंतर्दृष्टि व
बाह्य दृष्टि दोनों के ही उचित संतुलन की कला
का निरंतर अभ्यास करना होगा, तभी हम धीरे-धीरे साम्यावस्था को प्राप्त हो सकते हैं,
यानी हमारी धीरे-धीरे समदृष्टि विकसित होने से हम दोनों ही प्रकार के व्यवहार मे निपुणता 
प्राप्त कर सकते हैं।
         जगत में हमें व्यवहारिक कला में निपुण होना पड़ेगा वह अपनी स्वयं की आंतरिक
समृद्धि के लिये हमें अपनी आंतरिक दृष्टि को
विकसित करना होगा।
     हम सामान्य जीवन जीते हुए भी जब इन 
दोनों का संतुलन करना सीख गये, तो जीवन की जो कला है, किस प्रकार का हमें व्यवहार करना है, यह हमें ज्ञात हो जायेगा।
     क्रमशः हम आंतरिक दृष्टि व बाह्य दष्टि 
दोनों में उचित संतुलन रखते हुए इस संसार सागर की यात्रा को इन दोनों ही समानांतर पटरियों पर अपने जीवन रूपी रेलगाड़ी को 
चलाने की कला को सीख पायेंगे।
       जितना हमारा अभ्यास बढ़ेगा, हम परिपक्व होते जायेंगे, जीवन के संतुलन को साधते जायेंगे , उतना ही हमारा व्यक्तित्व भी निखरेगा, इस प्रकार हम अंतर्दृष्टि का विकास
करके आंतरिक अनुभूति व शांति को प्राप्त कर पायेंगे वह बाह्य जगत को देखने व घटनाक्रमों को ठीक ढ़ंग से समझने की कला को सीख जायेंगे।
विशेष:- अंतर्दृष्टि विकसित होने पर हमारा अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली होगा, वह बाह्य दृष्टि विकसित होने पर हमें व्यवहारिक कुशलता का ज्ञान होगा, और जीवन में दोनों की ही हमें आवश्यकता पड़ती है, इति शुभम भवतू ।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद, 
वंदे मातरम।

0 टिप्पणियाँ: