सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
प्रवाह की इस मंगलमय यात्रा में आप सभी का स्वागत है, नव वर्ष शुरू हो गया है,
नवीन संकल्पों को हम गढ़े, और विषम परिस्थितियों में हम कैसे संतुलन स्थापित करें, यह सीखने का प्रयास करें।
अनुकूल परिस्थितियों हो, तब तो हर कोई बाजी जीत ही जाता है, परंतु विपरीत परिस्थितियों हो, समय विषम हो, तब किस प्रकार से हम किसी भी समस्या का समाधान निकालते हैं, वहीं हमारी योग्यता का परिचय हमें देना होता है।
जहां विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होने पर साधारण व्यक्ति उनसे हार मान लेते हैं, साधारण व्यक्तित्व के धनी वहीं से अपनी राहे तैयार कर लेते हैं, यानी कुल मिलाकर मेरा यह मानना है, परिस्थितियों चाहे कितनी भी विषम क्यों न हो, कोई ना कोई द्वार तो अवश्य होता है, बस वही हमें पूर्ण धैर्य से खोजना होता है,
कैसे हम अपनी समस्या के विभिन्न पहलुओं की जांच करते हैं, उन्हें में उसका समाधान भी छिपा होता है।
कोशिश करते रहे, कोई भी समस्या हो, विषमता में समता हम किस प्रकार से
स्थापित करें, यही हमारी योग्यता का पता हमें चलता है।
सामान्य स्थिति व विषम परिस्थिति में अंतर तो निश्चित होता है, पर धैर्य पूर्वक अगर हम स्थितियों का आकलन अगर हम करते हैं,
तो उन्हें विषम परिस्थितियों में ही हमें मार्ग भी मिल जाता है।
विषम से विषम परिस्थिति भी हो, अगर हम धैर्य रखें तो हमें समझ में आता है, की समस्या को हम किस प्रकार सुलझा पायेंगे।
परिस्थितियों विषम भी हो, तो भी कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलता ही है, सूझबूझ व धैर्य पूर्वक अवलोकन से हमें राह मिल ही जाती है। प्रतिकूलता में अनुकूलता या विषमता में समता हम कैसे स्थापित करें,
प्रयास करते रहने पर हम उसमें कामयाब हो सकतें हैं।
अगर हमारे व्यक्तित्व में यह खूबी है, तो उसका हमें पता भी होना चाहिये वह समय आने पर हम उसका किस प्रकार से स्थितियों को अपने पक्ष में करें, जिस किसी का नुकसान भी ना हो वह हमारा कार्य भी सिद्ध हो जाये।
यह जीवन में अनुभव द्वारा ही सीखा जा सकता है, बुद्धिमान मनुष्य परिस्थितियों का सही आकलन करते हैं, वह फिर निर्णय करते हैं।
जहां सभी हार मान जाते हैं, एक कुशल रणनीतिकार वहीं से अपनी जीत को तय करते हैं। साहसिक व दूरदर्शी बने, समय अनुकूल क्या उचित है, यह अध्ययन करें, राह स्वयं ही निकल जाती है। विषमता में समता को जो खोज लेता है, वह अपनी राहें बनाना जानता है।
विशेष:- विषमता में समता को देख लेना, किस प्रकार से हल निकलेगा, वह हमारे व्यक्तित्व की दुरंदेशी को बताता है, परिस्थितियों से हारे नहीं , वरन् उनसे जूझने का आंतरिक सामर्थ्य अपने आप में उत्पन्न करें, विषमता में समता का अभ्यास करें, उसमें पारंगत होने पर आपके हल दूसरों से भी जल्दी होंगे, क्योंकि आपने एक ही समस्या के विविध पक्षों को भली भांति समझ कर फिर निर्णय लिया है।
आपका अपना
सुनील शर्मा
जय भारत,
जय हिंद,
वंदे मातरम।
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