सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, लोकोक्ति
यानी अपने अनुभवों के आधार पर लोगों द्वारा कहा गया कथन, जो समाज में प्रचलित हो जाता है, और गहरे अनुभव के कारण उन लोकोक्तियां में काफी वजन होता है, क्योंकि वह जनमानस द्वारा खुद जो उन्होंने अनुभव किया है, उसके आधार पर उनका वह कथन होता है, बोलचाल की भाषा में हम सामान्य रूप से इनका प्रयोग करते हैं।
इससे भाषा की समृद्धि व गहराई में वृद्धि होती है, आईए जानते हैं, कुछ लोकोक्तियों के बारे में, जैसे दिन भर चले ढाई कोस, यानी काफी मेहनत के बाद भी परिणाम का न मिलना, तो इसके बाद इस कहावत का जन्म हुआ, ऐसी ही एक और कहावत हम देखते हैं,
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद, यानी किसी
ऐसे व्यक्ति को कोई चीज प्राप्त हो जाना, जिसे उसकी उचित कद्र ही न हो, तब इस प्रकार की लोकोक्ति का जन्म हुआ, इसी प्रकार जनमानस में कहावतें या लोकोक्ति का प्रयोग शुरू हुआ, लोकोक्ति यानी, लोक की उक्ति या कथन, जो उनके सामान्य जनजीवन में उपजे अनुभव के आधार पर आता है।
सैंया भये कोतवाल, तो ड़र काहे का,
यह लोकोक्ति भी काफी प्रचलित है, यानी जिसके पास ताकत है, शक्ति है, उसका वरदहस्त प्राप्त होना, उसका साथ मिलना।
एक और कहावत या लोकोक्ति प्रचलित है, यथा राजा तथा प्रजा, यानी ऊपर के लोग जो आचरण करते हैं, जो शक्तिशाली है, सामान्य जन भी उनके पद चिन्हों पर चलते हैं या उनका अनुसरण करते हैं।
धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का,
यानी बहुत अधिक चतुर लोगों को कुछ नहीं प्राप्त होता है, अधिक चतुराई के कारण वे सब कुछ खो देते हैं, तब यह लोकोक्ति प्रचलन में आई।
इस प्रकार हम पाते हैं, कि हमारे सामान्य जनजीवन में ऐसी बातें जो हमें
प्रभावित करती है, उन्हें हम किस प्रकार से
अपने अनुभव के आधार पर शब्दों में पिरो देते हैं, वही धीरे-धीरे लोकोक्ति का रूप धारण कर लेती है, और यह गहरे अनुभव के बाद
कोई कहता है, तो वह धीरे-धीरे प्रचलन में आ जाती है।
एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा,
सोने पर सुहागा, इस प्रकार की अनेकों
लोकोक्तियां द्वारा भाषा की समृद्धि और गहराई बढ़ती जाती है, कम शब्दों में कैसे अपनी बात कहना, और उसकी पूर्ण प्रभाव पड़ना, यह हम लोकोक्तियो के प्रयोग द्वारा समझ सकते हैं।
विशेष:- लोकोक्तियां से भाषा की समृद्धि और गहराई में वृद्धि होती है, जनमानस में यह प्रचलित होती है, अनुभव के आधार पर , सामान्य लोग अपना कथन कहते हैं, वह धीरे-धीरे लोकोक्ति के रूप में प्रचलित हो जाता है। इसका प्रभाव समाज पर पड़ता है,
क्योंकि यह गहरी अनुभव के बाद रची जाती
है।
आपका अपना,
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।
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