सत्ता

प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
आज प्रवाह में हम बात करेंगे सत्ता पर, 
सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए, सभी को
सत्ता चाहिए, यह एक छोटा सा शब्द है,
मगर इसके मायने बड़े है।
      जिस किसी के पास भी सत्ता आती है,
वह साथ में मद भी लाती है, जो सत्ता पाकर
मद में नहीं आता, वह बुद्धिमान है, मगर 
ऐसा होता नहीं है, कोई भी व्यक्ति जब सत्ता धारण करता है, तब  स्वाभाविक रूप से 
सत्ता का मद उसे आता ही है, जिन बातों के लिए पूर्व में आसीन सत्ताधारियों को कोसता 
था, सत्ता प्राप्ति के बाद वह भी उन्ही राहो पर चल पड़ता है, सत्ता का असर ही कुछ ऐसा है।
सत्ता प्राप्ति के बाद सत्ता का सदुपयोग होना चाहिए, मगर देखने में आता है, सत्ता प्राप्त होने के बाद वह भी अपनी पूर्ववर्ती सत्ताधारियों जैसा ही आचरण करने लगते हैं, 
जिन बातों के लिए उनकी आलोचना करते थे,
अब वह स्वयं भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं, और यह समाज के लिए बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, इसमें बदलाव तभी संभव है, जब स्वच्छ छवि वाले राजनेता, जिन्हें  सत्ता का मोह नहीं है, जो अच्छे कार्य के लिए संकल्पित है, जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हीं लोगों के हाथ में सत्ता 
 रहे, एक कहावत भी है, यथा "राजा तथा प्रजा" यानी जैसा शासक होगा, जैसी सत्ता होगी, उनके जैसा आचरण  होगा, जनता भी उनके ही पदचिन्हो पर चलेगी।
विशेष:- सत्ता का हमेशा सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं, क्योंकि समाज में जैसा शासक संदेश देता है, वह आचरण करता है, जनता भी वैसा ही करती है। सत्ता हमेशा विवेकशील लोगों के हाथों में होना चाहिए।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

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