विस्तार

प्रिय पाठक गण,
    सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम परिचर्चा करेंगे, विस्तार शब्द पर, अब प्रश्न यह उठता है? विस्तार किसका, सबकी अपनी अपनी दृष्टि हो सकती है, सामान्य रूप से हर कोई जिस जगह है, उस जगह से वह अपना और अधिक विस्तार करना चाहता है, यह एक सामान्य सी मानवीय इच्छा है, मगर जब कोई व्यक्ति 
विस्तार करना चाहता है, तो उसके सामने दो प्रमुख बातें होती है, एक वह नियम पूर्वक, 
निष्ठापूर्वक अपना विस्तार करना चाहता है, 
व एक दूसरा पक्ष ऐसा भी है, जो विस्तार करते समय न मूल्य की परवाह करता है, न
उसे नियमपूर्वक पाना चाहता है, वह तो साम, दाम, दंड ,भेद किसी भी प्रकार अपना विस्तार करना चाहता है, बस यहीं से समाज में दो वर्ग उत्पन्न होते हैं, एक वे जो निष्ठा पूर्वक कार्य करना चाहते हैं, नियम पूर्वक कार्य करना
चाहते हैं, दूसरे वे जो किसी भी प्रकार से बस अपना विस्तार करना चाहते हैं, और अधिकतर देखने में यह आता है, कि अधिकतर दूसरा पक्ष, जो नियमों की अवहेलना कर रहा है, वह विस्तार को प्राप्त 
कर रहा है, बस यहीं से मूल्यों का अवमूल्यन चालू होता है , व समाज में वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने लगती है। 
     विस्तार की महत्वाकांक्षा हम सभी की है,
मगर अगर हम इस नियम व निष्ठा पूर्वक
करते हैं, तो एक बेहतर समाज की स्थापना हम करते हैं, इसके विपरीत विस्तार करते समय हम अगर नियमों की अवहेलना करते हैं, तो समाज में एक गलत परिपाटी का जन्म हम कर देते हैं।
विशेष:-  समान रूप से हम सभी में हम जिस जगह पर है, उससे और अधिक विस्तार चाहते हैं, और यह कोई गलत भी नहीं, मगर नियम व
निष्ठापूर्वक किया गया विस्तार समाज में एक अच्छा संदेश देता है, व एक बेहतर समाज की स्थापना को बल प्रदान करता है, इसके विपरीत नियमों की अवहेलना करने से अच्छा सामाजिक संदेश नहीं जाता। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

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